Saturday, October 26, 2019

हां कि ना


Mohan Manglam September 29, 2018 · हां कि ना वैसे तो हर दिन शुभ होता है, फिर भी हम कोई काम शुरू करने से पहले तिथि, दिन, शुभ मुहूर्त का विचार करना नहीं भूल पाते। मेरे एक प्रियजन ने सावन में आम के पौधे लगाने की सोची। शुभ मुहूर्त की जानकारी के लिए वे विशेषज्ञ से मिले तो सलाह दी गई कि जिस हिन्दी महीने के अंत में न हो, उसमें पौधरोपण नहीं करना चाहिए। ...और इस तरह पौधरोपण का कार्यक्रम आगे बढ़ गया। सावन में पौधरोपण न करने के पीछे शास्त्रीय कारणों के बारे में तो मुझे नहीं पता, लेकिन व्यावहारिकता की धरातल पर सोचें तो सावन का महीना धान आदि खरीफ की फसल के लिए महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में आम के पौधे लगाने पर उनकी देखभाल के कारण खरीफ फसल की निकाई-गुड़ाई आदि से ध्यान न बंट जाए, शायद इसीलिए सावन में फलदार वृक्षों के पौधरोपण का निषेध किया गया होगा। सावन के अलावा हिन्दी पंचांग में तीन और महीने ऐसे हैं, जिनके अंत में न आता है- आश्विन, अगहन और फागुन। ...और इन तीनों महीनों में भी अलग-अलग कारणों से कुछ कार्यों की मनाही है। आइए, डालते हैं एक नजर : आश्विन निषेध : भादो पूर्णिमा से पितरों केप्रति श्रद्धा निवेदित करने का महापर्व पितृपक्ष शुरू हो जाता है, जो आश्विन माह की अमावस्या तक चलता है। कई स्थानों पर ऐसी मान्यता है कि पितृपक्ष के दौरान कोई शुभ कार्य नहीं करना चाहिए। हकीकत : भारतीय सनातन परंपरा कृतज्ञता पर आधारित है। अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा-समर्पण, पिंडदान-तर्पण के प्रति एकाग्रता बनी रहे, मन दूसरे सांसारिक कार्यों में न भटके, शायद इसीलिए पितृपक्ष के दौरान शुभ कार्यों का निषेध किया गया होगा। और धीरे-धीरे यह परंपरा में शामिल हो गया। अगहन निषेध : शास्त्रीय मान्यताओं केअनुसार भगवान राम और जगज्जननी जानकी का विवाह अगहन शुक्ल पक्ष पंचमी को हुआ था। इस तिथि को विवाह पंचमी भी कहा जाता है। बिहार में अमूमन इस महीने में विवाह-शादी के आयोजन नहीं होते। हकीकत : सीताजी को शादी के कुछ दिनों बाद ही पति के साथ वनवास पर जाना पड़ा और फिर अपहरण की दुखद त्रासदी झेलनी पड़ी। यही नहीं, बाद में राम ने उन्हें तब वन में अकेली छुड़वा दिया, जब सीता के गर्भ में जुड़वां पुत्र लव-कुश पल रहे थे। सीताजी की शादी अगहन में हुई थी और उन्हें इतनी परेशानियां झेलनी पड़ीं, शायद इसीलिए अगहन में शादी का निषेध कर दिया गया। फागुन निषेध : रंगों के त्योहार होली के लिए प्रसिद्ध फागुन राग-फाग और मस्ती का महीना माना जाता है। मगर फागुन पूर्णिमा के आठ दिन पहले होलाष्टक के बहाने गृह प्रवेश, शादी-विबाह जैसे मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं। हकीकत : माघ शुक्ल पंचमी से ही होली की मस्ती का सुरुर छाने लगता है। मनुष्य की कौन कहे, आम के वृक्ष में मंजर आने के साथ ही वातावरण में मस्ती छा जाती है। ...लेकिन मनुष्य की अपनी मजबूरियां हैं। यदि वह पूरी तरह मस्ती में डूब जाए तो रोजमर्रा की जरूरतें कैसे पूरी होंगी। सो दैनंदिन जीवन के कार्य करने भी जरूरी होते हैं। फिर भी होली की मस्ती से मुंह तो नहीं मोड़ा जा सकता। शायद इसलिए होलाष्टक का प्रावधान किया होगा जिससे बाकी चीजें भूलकर होली का आनंद लिया जा सके। चलते-चलते : एक मित्र को घर में रिनोवेशन का कुछ काम कराना था। सुबह उन्हें फोन किया तो उन्होंने कहा कि पितृपक्ष में काम कैसे शुरू होगा। ...और फिर चिंतन की चक्की चल पड़ी। उससे जो कुछ निकला, उसे आप मित्रों से साझा करने से खुद को नहीं रोक पाया। हां, बदलते हुए समय के साथ बहुत कुछ बदल जाता है। ऐसे में निषेध संबंधी इन मान्यताओं को छोड़कर व्यावहारिक होने में कोई बुराई नहीं है। वरना आज की इस भागम भाग वाले जीवन में साल के चार महीने यूं ही व्यर्थ चले जाएंगे। September 29, 2018 ·

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