Wednesday, September 18, 2013

बाट निहारें रोज निगाहें...


आज से करीब पौने दो साल पहले जब आखिरी ब्लॉग पोस्ट किया था, तो बाबूजी के स्वास्थ्य की चिंता चरम पर थी। जब से होश संभाला, दमा के कारण अक्सर उन्हें बेदम होते देखा था। मरणासन्न होने की नौबत आ जाती थी, लेकिन दवाओं के प्रभाव और मां की दिन-रात की सेवा के बदौलत रिकवर कर लेते थे। ऐसे में आशा थी कि अभी कुछ वर्षों तक सिर पर उनका हाथ रहेगा, लेकिन अपने सोचने से सब कुछ कहां हो पाता है। ईश्वर को धन्यवाद देना चाहूंगा कि बाबूजी के स्वर्गारोहण के महज एक महीने पहले ही गांव जाने का सुअवसर मिल गया था जिससे बाबूजी के साथ कुछ पल बिता पाया था। उस दौरान भी कुछ ऐसा आभास नहीं हुआ कि यह मनहूस घड़ी इतनी पास आ जाएगी। स्वास्थ्य को लेकर उनके स्वर में निराशा अवश्य झलक रही थी, लेकिन जज्बा पूरी तरह चूका नहीं था। खैर, नियति को जो मंजूर होता है, उसे कौन रोक सकता है। पत्रकारिता की नौकरी के कारण मुझे छुट्टी मिलने में दिक्कत होगी, फिर बाहर अकेले रहते हुए मैं कहीं अधिक परेशान न हो जाऊं, इसलिए बाबूजी जब तक होश में रहे, उन्होंने हमेशा अपनी परेशानी मुझे बताने से परहेज किया। तीन-चार दिन से छोटे भाई का फोन आ रहा था कि बाबूजी की तबीयत ज्यादा ही बिगड़ती जा रही है। मैंने भी उन्हें हिम्मत बंधाई। हाजीपुर जाकर दिखाने को कहा, लेकिन उनकी आवाज में निराशा की अनुगूंज सुनाई देने लगी थी। 16 अगस्त को मन कुछ बेचैन सा होने लगा तो मां से पूछा। आज तक धरती सा धैर्य धारण करने वाली मां का जवाब था-आना चाहते हो तो आ जाओ, बाद में कहीं तुम्हें अफसोस न हो। बस, उसी समय निकल पड़ा। जयपुर से लखनऊ आ जाने के कारण दूरी आधी रह गई थी। तरह-तरह की आशंकाओं में डूबता-उतराता 12 घंटे की यात्रा करके घर पहुंचा। स्थिति जो थी, उसे शब्दोंं में बयां नहीं कर सकता। दो-तीन दिन में ही सारा खेल खत्म हो गया। --जातस्य मृत्यु: ध्रुवं --की अवधारणा को कौन झुठला सका है। संतोष इसी बात का रहा कि अंतिम क्षणों में उनके पास रह पाया। अब तो बस हर पल दिल से एक ही कसक निकलती है- बाट निहारें रोज निगाहें, लौट के उनके आने की जाने कौन दिशा में ऐसी कर गए हैं प्रस्थान पिता।

Thursday, December 1, 2011

'बड़की मायÓ के साथ एक युग का अवसान

आजकल बाबूजी का स्वास्थ्य कुछ ठीक नहीं चल रहा। नौकरी की अपनी मजबूरियां हैं कि चाहकर भी भौतिक दूरियां कम नहीं हो पा रहीं। हां, मन तो वहीं लगा रहता है, बाबूजी का हालचाल जानने के लिए फोन किया तो छोटा भाई घर से दूर कहीं खेत में मजदूरों से काम करवा रहा था। उसने बाबूजी के स्वास्थ्य में सुधार की सूचना दी तो मन को तसल्ली मिली लेकिन अगले ही पल उसने कहा-'बड़की माय नहीं रहींÓ। यह समाचार सुनते ही फ्लैश बैक में कई सारे दृश्य घूमने लगे। भला हो बाबूजी का जिनकी प्रेरणा से गत अगस्त में गृह प्रवास के दौरान ' बड़की मायÓ के अंतिम दर्शन का सौभाग्य मिल पाया। संयोग ऐसा कि साथ में मां-बाबूजी के साथ मेरा लंगोटिया यार अरविंद भी था जिसके साथ मैंने न जाने कितनी बार 'बड़की मायÓ के हाथों से बने व्यंजनों का लुत्फ उठाया होगा।
आज जब पुरानी यादों को सहेजने बैठा हूं तो सब कुछ किसी काल्पनिक कहानी सा लगता है। मेरा गांव बिहार का नामी ब्राह्मण बहुल गांव है। हमारे पड़ोस में है धनकौल। दूरी महज इतनी कि हमारे खेतों के पार से थोड़ा आगे बढ़ो तो वहां पहुंच जाओ। उस गांव की सर्वाधिक महत्वपूर्ण हस्ती थे श्री योगेंद्र सिंह। मेरे गांव के लगभर हर परिवार के साथ उनका उठना-बैठना-अपनापा था। यूं कहें कि मेरे गांव में होने वाले आपसी विवादों के निबटारे में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका हुआ करती थी और इसमें उनका राजपूत होना कभी आड़े नहीं आता। सही मायने में वे मानव थे-महामानव। अक्सर शाम को वे नियम से पैदल ही हमारे गांव में आते और कभी हमारे दरवाजे पर तो पड़ोस में या फिर गांव में और कहीं उनकी महफिल सजती। लोग बैठकर दिनभर का हाल-ए-बयां करने के साथ ही अपनी परेशानियां भी आपस में बांटकर मन हल्का कर लेते थे। बहुत बचपन की बात करूं तो तब तक चाय का चलन शुरू नहीं हुआ था, सो खैनी और सुपारी से ही एक-दूसरे का स्वागत किया जाता था। चूंकि मेरे बाबूजी का नाम भी योगेंद्र मिश्र है और बिहार में ऐसी परंपरा है कि लोग अपने नाम वाले व्यक्ति को नाम लेकर नहीं पुकारते बल्कि आपस में एक-दूसरे को 'मीतÓ कहा करते हैं। सो बाबूजी भी उन्हें 'मीतÓ कहा करते थे और हम सभी भाई-बहन उन्हें 'बाबाÓ या 'धनकौल वाले बाबाÓ कहकर पुकारते थे। मेरे ताऊजी 'बाबाÓ के हमउम्र थे, लेकिन बाबूजी से भी उनकी अच्छी पटती थी। 'बाबाÓ के छोटे भाई श्री देवेंद्र सिंह हाई स्कूल में गणित के सिद्धहस्त शिक्षक थे और अंग्रेजी पर भी उनका अधिकार था। पढ़ाने का तरीका इतना सहज कि एक बार जो बता दिया वह कभी भूलता नहीं था। उन्हीं का आशीर्वाद था कि बीजगणित और त्रिकोणमिति के सवालों ने मुझे कभी परेशान नहीं किया।
खैर, बात 'बाबाÓ की दरियादिली की। उनका स्टेटस क्या था, इसका अंदाजा तो मुझे किशोरावस्था में भला क्या होना था, लेकिन एक बात थी कि अपनी कैसी भी परेशानी लेकर उनके शरण में जो भी आता, उसकी समस्या लौटते वक्त नहीं रहती थी। ऐसे में मैंने ' बड़की मायÓ के चेहरे पर भी कभी शिकन या शिकायत का भाव नहीं देखा। न जाने क्या हुआ कि जब मैं बीए में पढ़ रहा था, एक दिन खबर मिली कि डकैतों ने पीट-पीटकर 'बाबाÓ की हत्या कर दी। उसके बाद जब कभी उनके घर पर गया तो जैसे लगता था कि 'बाबाÓ के साथ ही उस घर के सारे संस्कार भी विदा हो गए। कुछ वर्षों बाद देवेंद्र बाबू भी नहीं रहे। इतना ही नहीं, हमारी पीढ़ी में भी सेंध लग गया और एक असाध्य बीमारी ने अवधेश भाई साहब को भी असमय हमसे छीन लिया। रही-सही यादें 'बड़की मायÓ के साथ जुड़ी थीं, लेकिन उनके परलोकगमन के साथ ही जैसे एक युग का अवसान हो गया। ईश्वर से यही प्रार्थना है कि इन पुण्यात्माओं को शांति प्रदान करे और आने वाली पीढ़ी में ऐसे संस्कार जिनसे लोगों को याद करने का चलन बना रह सके।

Wednesday, November 16, 2011

दृढ़ इच्छाशक्ति से रुकेगी कालाबाजारी


तत्काल कोटे में दलाली रोकने के लिए नियमों में संशोधन के साथ मॉनिटरिंग भी है जरूरी
मोहन कुमार मंगलम्
रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी की तत्काल कोटे में रिजर्वेशन के नियमों में परिवर्तन की घोषणा स्वागतयोग्य है। कई बार अपरिहार्य कारणों से बहुत ही कम समय में रेलयात्रा की योजना बनानी पड़ती है। ऐसे यात्रियों की सुविधा के लिए ही तत्काल कोटा शुरू किया गया था, लेकिन इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि आम आदमी की सुविधा के लिए जो नियम-कानून बनाए जाते हैं, उसका लाभ अवांछित लोग उठाने लगते हैं।
शुरुआत में पांच दिन पहले तत्काल टिकट लेने का नियम था, लेकिन टिकटों की कालाबाजारी की काफी शिकायतें मिलने के बाद वर्ष 2009 में इसे घटाकर दो दिन कर दिया गया था। इसके बावजूद बड़े पैमाने पर टिकटों की कालाबाजारी जारी रही। इसके मद्देनजर पिछले दिनों देशभर में सीबीआई ने छापेमारी भी की थी। इसमें सामने आया था कि एजेंट समय से पहले ही बुकिंग करा लेते थे और फिर वे इन टिकटों की कालाबाजारी करते थे। इसमें रेलवे काउंटर पर बैठे कर्मचारियों की मिलीभगत की बात भी सामने आई थी। नए नियमों के अनुसार तत्काल कोटे में टिकट अब दो दिन की बजाय एक दिन पहले ही बुक करवाए जा सकेंगे और टिकट लेते समय आईडी प्रूफ दिखाना जरूरी होगा। इसके साथ ही रेलवे काउंटरों पर सीसीटीवी कैमरे लगाने की भी घोषणा की गई है, जिससे दलालों के साथ ही इस घालमेल में लिप्त रेलकर्मियों के चेहरे भी सामने आ सकेंगे। कन्फर्म तत्काल टिकट कैंसिल कराने पर रिफंड नहीं मिलने से भी दलाल हतोत्साहित होंगे।
(जयपुर से छपने वाले हिंदी दैनिक डेली न्यूज में 15 नवंबर को संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित)

Wednesday, November 9, 2011

नारायणी में स्नान, नारायण के दर्शन


आज कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी पर बचपन या कहें किशोरावस्था की अचानक याद आ गई। मेरे गृह जिला वैशाली के मुख्यालय हाजीपुर में कार्तिक पूर्णिमा पर नारायणी (गंडक) नदी के किनारे कौनहारा घाट पर श्रद्धालुओं का भारी मेला भरता है। हर साल हम भाई-बहनों की दिली ख्वाहिश होती थी कि बाबूजी से कैसे भी मेला जाने की अनुमति मिल जाए। बाबूजी की दमा की बीमारी तथा बूढ़ी दादीजी की देखभाल की जिम्मेदारी के कारण मां को इन धार्मिक प्रयोजनों में सहभागिता का अवसर नहीं मिल पाता था, लेकिन मेरी सबसे बड़ी चाची (जिनकी कोई संतान नहीं थी) बिना नागा हर साल इस पुण्य वेला में नारायणी-स्नान करने अवश्य जाती थीं। तीन-चार दिन पहले से ही हम भाई-बहन चाची की खुशामद में लग जाते थे कि बाबूजी को मनाकर वे हमें भी अपने साथ ले चलने को राजी कर लें। बूढ़ी दादी का भी बिना शर्त समर्थन हमें मिलता था और देर-सवेर बाबूजी भी हमें भी मेला जाने की इजाजत दे ही दिया करते थे। इस मेला में जाने पर ही पता चला कि वैशाली की विश्वप्रसिद्ध ऐतिहासिकता से भी कहीं बढ़कर हाजीपुर की ऐतिहासिकता है। अमूमन हम आज के दिन ही कौनहारा घाट पहुंच जाते और जहां जगह मिलती, अपने आस-पड़ोस के लोगों और दूर-दूर के रिश्तेदारों को खोजकर उनके साथ जगह छेककर अपना ठिया बना लेते। वहां गज-ग्राह के मंदिर में जाकर बाल मन गौरव से भर जाता कि हमारी इसी धरती पर कभी भगवान विष्णु को एक हाथी की पुकार सुनकर आना पड़ा था।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार विष्णुभक्त गज एक बार नारायणी नदी में पानी पीने गया तो जल में छिप ग्राह उसका पैर पकड़कर उसे खींचने लगा। गज ने बार-बार उससे छोडऩे की विनती की, लेकिन ग्राह ने एक न सुनी। इस पर गज ने अपने प्रभु की शक्ति को याद करते हुए ग्राह से कहा कि जब तक मेरे विष्णु हैं, तुम मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते। इस पर ग्राह उसे खींचकर पानी में ले जाने लगा। गज ने आत्र्त स्वर में भगवान विष्णु को पुकारा तो क्षणभर में वे प्रकट हो गए। इससे प्रफुल्लित गज ने ग्राह को ललकारते हुए कहा कि अब बताओ-कौन हारा? भगवान ने दुष्ट ग्राह को मारकर अपने प्रिय भक्त गज को मुक्ति दिलाई। आज भी गजेंद्रमोक्ष के श्लोक इस पौराणिक कथा की पुष्टि करते हैं। भगवान विष्णु अर्थात हरि के आने के कारण ही प्राचीन समय में इस शहर का नाम हरिपुर था, जिसे कालांतर में मुगल शासनकाल में हाजी शमसुद्दीन के नाम पर हाजीपुर कर दिया गया। न जाने हमारे राजनेताओं को इस गौरव का भान क्यों नहीं होता कि वे मुगल शासक हाजी शमसुद्दीन के नाम पर आज तक हाजीपुर नाम को ढो रहे हैं। कौनहारा घाट पर ही नेपाली छावनी मंदिर है, जो अपनी काष्ठ कला के लिए प्रसिद्ध है। वैशाली, हाजीपुर या कहें कि बिहार के राजनेताओं की ही कमजोर इच्छाशक्ति का दुष्परिणाम यह नेपाली छावनी भुगत रही है, अन्यथा यहां बने काठ के मंदिरों पर जितनी बारीकी से कलाकारी उकेरी गई है, उसके सामने अजंता-एलोरा की कलाकृतियां कहीं भी न टिकें।
इस मेले के साथ ही गंडक के उस पार सोनपुर का विश्वप्रसिद्ध मेला भरता है। इसे हरिहर क्षेत्र कहा जाता है, जहां भगवान विष्णु और शंकर एक साथ विराजते हैं। कार्तिक पूर्णिमा पर तड़के तीन-चार बजे ही नारायणी में डुबकी लगाने के बाद चाची से अनुमति लेकर अपने हमउम्र दोस्तों के साथ हम सोनपुर का रुख कर लेते थे। कौनहारा से सोनपुर की लगभग तीन-चार किलोमीटर तथा कई किलोमीटर में फैले सोनपुर मेले को हम बिना किसी थकान के अपने नन्हे कदमों से ही नाप देते थे। पाथेय के रूप में नया चिवड़ा (पोहा), गुड़ और डाला छठ महापर्व का प्रसाद ठेकुआ-टिकड़ी ही हमारा नाश्ता और भोजन सभी हुआ करते थे। गिनती के पांच-दस रुपए किसी बार बाबूजी से मिल जाते थे तो कई बार उनकी आज्ञा की अवहेलना कर मेला देखने की सजा के रूप में खाली हाथ भी जाना पड़ता था। ऐसी स्थिति में मेला में कुछ खरीदने की हमारी ख्वाहिश भी जन्म नहीं ले पाती थी, लेकिन उस मानव समुद्र में सामाजिकता के विकास के कई पाठ वहां सहज ही सीखने को मिल जाते थे। मेले में खोये बच्चों-बुजुर्गों को उनके परिजनों तक पहुंचाने के लिए लाउड स्पीकर पर अनाउंस करते स्काउट के जवान, पग-पग पर व्यवस्था संभालने को तैनात विभिन्न संगठनों के स्वयंसेवक, रेलवे, कृषि विभाग, पुलिस सहित विभिन्न सरकारी विभागों की कार्यप्रणाली को दर्शाती प्रदर्शनियों में संपूर्ण भारतीयता के दर्शन से जो सीख मिली, उसे कैसे भुलाया जा सकता है।
हाई स्कूल पास कर जब कॉलेज में गया तो कुछ तो पढ़ाई का बोझ, फिर मा-बाबूजी से दूर रहने के कारण आत्मानुशासन का अंकुश कि अकेले रहते हुए भी कभी मुजफ्फरपुर से हाजीपुर जाकर मेला देखने की हिम्मत नहीं जुटा सका। कॉलेज-यूनिवर्सिटी की पढ़ाई पूरी करने के बाद हाजीपुर तो क्या, बिहार ही बहुत पीछे छूट गया। बचपन के मित्र जो अब भी सौभाग्य से वहां हैं, शायद इन मेलों की भीड़ का हिस्सा बन पाते होंगे। तकनीक जब आधुनिकता की सीढ़ी पर नित नए परवान चढ़ रही है, न जाने मेले का स्वरूप भी अब कितना बदल गया होगा। विगत करीब तीन दशक से जब भी कार्तिक पूर्णिमा आती है, दिल में एक कसक सी उठती है और सोचता हूं कि अगले साल अवश्य ही ऐसी जुगत बैठाऊंगा कि इस मेले में जाऊं, लेकिन कब यह दिन दुबारा आ जाता है और मन में मलाल लिए एक साल और इसी उधेड़बुन में बिताते हुए पुरानी यादें संजोने को विवश हो जाता हूं।

Wednesday, November 2, 2011

तन-मन-जीवन कर दो निर्मल



संपूर्ण चराचर जगत को अपने आलोक से प्रकाशित करने वाले भगवान सूर्य की आराधना-उपासना अनादि काल से होती रही है। इसी क्रम में कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से सप्तमी तक मनाए जाने वाले सूर्य षष्ठी पर्व का महत्वपूर्ण स्थान है। बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड के जन-मन में बसे इस पर्व को 'छठ महापर्वÓ भी कहा जाता है। इस पर्व में भगवान सूर्य को अघ्र्य दी जाने वाली सामग्री कच्चे बांस की टोकरी (डाला) में रखकर नदी या तालाब किनारे तक ले जाई जाती है, इसलिए इसे 'डाला छठÓ के नाम से भी जाना जाता है।
ऋग्वेद में देवता के रूप में सूर्य की पूजा का उल्लेख है। कई पुराणों में भी भगवान सूर्य की उपासना की चर्चा की गई है। पौराणिक काल में सूर्य को आरोग्य प्रदाता देवता के रूप में माना जाने लगा था। ऐसी मान्यता है कि नियम-निष्ठापूर्वक यह पर्व करने से कुष्ठ रोग ठीक हो जाता है। सनातन धर्म के देवताओं में अग्नि के बाद सूर्य ऐसे अकेले देवता हैं जिन्हें मूर्त रूप में देखा जा सकता है।
छठ पर्व का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष इसकी सादगी, पवित्रता और आडंबर व दिखावा से रहित होना है। इस पर्व में न तो मंदिर की जरूरत होती है, न प्रतिमा की, न ऋचाओं-मंत्रों की, न पंडित-पुरोहितों की। पूजन सामग्री जुटाने के लिए भी ज्यादा भागदौड़ अपेक्षित नहीं होती। इसमें बांस की टोकरी, सूप, मिट्टी के बरतनों, दीपकों, गन्ना, गुड़, चावल, गेहूं से निर्मित प्रसाद, शकरकंद, हल्दी-अदरक की गांठ, केला, नींबू जैसी सामग्री का प्रयोग किया जाता है, जो सहज ही उपलब्ध हो जाती हैं। सहकार का भाव भी इस पर्व के मूल में है, जिसके तहत हर व्यक्ति अपने पास उपलब्ध सामग्री खुले मन से आस-पड़ोस में वितरित करता है, जिससे किसी को भी किसी सामग्री की कमी नहीं रह पाती है। पर्यावरण संरक्षण का भाव भी इस महापर्व से अनायास ही जुड़ा हुआ है। इस पर्व में नदी-तालाब-जलाशयों के घाटों की सफाई कर इसे सजाया जाता है, जिससे इनका अलग ही रूप निखरकर सामने आता है। भगवान सूर्य और छठ मइया की आराधना में गाए जाने वाले सुमधुर लोकगीतों से युक्त होकर यह पर्व लोक जीवन की भरपूर मिठास का प्रसार करता है।
जिस तरह सूर्य बिना किसी भेदभाव के संपूर्ण जगत पर अपनी कृपा-किरणों की बौछार करते हैं, उसी प्रकार जाति-धर्म-संप्रदाय की सीमाओं से ऊपर उठकर यह पर्व मनाया जाता है। इसी भावना का प्रमाण है कि बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड के अनेक मुस्लिम परिवारों में भी दशकों से छठ पूजा की परंपरा चली आ रही है।
छठ पर्व के रूप में पूरब से प्रस्फुटित सूर्य आराधना की रश्मियां इसे मनाने वालों के अन्य प्रदेशों का रुख करने के साथ ही साल-दर-साल विस्तार पाती हुई संपूर्ण भारतवर्ष को अपनी ज्योति से आलोकित करती जा रही है। विदेशों में भी जहां-जहां इस पर्व को मनाने वाले गए, वे अपने साथ सांस्कृतिक-धार्मिक विरासत के रूप में इस पर्व को ले गए और धीरे-धीरे कहीं लघु तो कहीं वृहद स्तर पर छठ पर्व मनाया जाने लगा है। छठ व्रत प्राय: महिलाओं द्वारा किया जाता है किंतु विशेष मनौती पूरी होने पर कुछ पुरुष भी यह कठिन व्रत रखते हैं। सूर्य की शक्तियों का मुख्य स्रोत उनकी पत्नी उषा और प्रत्यूषा हैं। छठ पर्व के दौरान सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण (प्रत्यूषा) तथा प्रात:काल में सूर्य की पहली किरण (उषा) को अघ्र्य देकर भगवान भास्कर के साथ-साथ इन दोनों शक्तियों की संयुक्त आराधना की जाती है। कमर भर पानी में खड़े होकर भगवान सूर्य का ध्यान करते समय व्रतियों के मन में प्रार्थना का यह भाव रहता है कि हे सूर्यदेव, हमारे तन-मन-जीवन का खारापन मिटाकर इसे निर्मल-मधुर कर दो जिससे बादलों से बरसने वाले पवित्र जल की तरह हम स्वयं के साथ ही जन-गण-मन के लिए मंगलकारी हो सकें।

Monday, October 10, 2011

सनातन धर्म की गौरवशाली परंपराएं



'पितृ देवो भवÓ की संस्कृति वाले देश में पूर्वजों के तर्पण और शक्तिस्वरूपा मां भगवती की आराधना के बाद आती है देवोत्थान एकादशी


अभी हाल ही संपन्न हुए शारदीय नवरात्र के दौरान जब हिंदू परिवारों में घर-घर शक्तिस्वरूपा मां भगवती की साधना-आराधना का दौर चल रहा था, मंदिरों में घंटा-घडिय़ाल से लेकर दुर्गा सप्तशती के श्लोकों की गूंज सुनाई दे रही थी, ऐसे में सनातन धर्म की गौरवशाली परंपराओं का सहज ही स्मरण हो आया। 'पितृ देवो भवÓ का उद्घोष करने वाले सनातन धर्म ने इसे महज वक्तव्यों और शास्त्रों तक में ही सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे आचरण में भी अपनाया। इसी का परिणाम है कि सनातन परंपरा में हमें जीवन देने वाले पूर्वजों-पितरों का स्थान देवताओं से भी ऊपर माना गया है। हिंदी पंचांग में पितृपक्ष के बाद देवोत्थान एकादशी का आना भी इसका ही सूचक है। पितरों के प्रति श्रद्धा के समर्पण को ध्यान में रखते हुए भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन माह की अमावस्या तक को पितृपक्ष या कनागत के रूप में वर्णित किया गया। इस दौरान पूर्वजों-पितरों की मृत्यु तिथि के हिसाब से उनके श्राद्ध-तर्पण-पिंडदान का विधान किया गया है। किसी भी महत्वपूर्ण तिथि को भूल जाने की मनुष्य की सहज प्रवृत्ति का भी सनातन धर्म के पुरोधाओं ने ध्यान रखा, जिसे उनकी दूरंदेशी का सूचक माना जा सकता है। किसी कारणवश यदि अपने पितरों की मृत्यु तिथि याद नहीं रख पाएं तो उनके श्राद्ध-तर्पण के लिए आश्विन अमावस्या को सर्वपितृ अमावस्या का विधान रखा गया है। इस दिन लोग अपने घर पर तो पितरों का तर्पण-श्राद्ध करते ही हैं, कई स्थानों पर सामूहिक श्राद्ध-तर्पण की व्यवस्था की जाती है ताकि साधनविहीन आदमी भी पितृ ऋण से मुक्ति पा सके।
सनातन धर्म की उदात्त सोच के विस्तार का ही परिणाम है कि भारत में पुरुष प्रधान समाज होने के बावजूद शक्ति की आराधना को वरीयता दी गई है। पितृपक्ष-कनागत की समाप्ति के तुरंत बाद आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को नारी शक्ति की प्रतीक के रूप में मां भगवती की पूजा-अर्चना का दौर शुरू हो जाता है। शारदीय नवरात्र के दौरान नौ दिनों तक शक्तिस्वरूपा मां दुर्गा के विविध रूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। राजस्थान में जहां घर-घर घट स्थापना कर मां दुर्गा की आराधना की जाती है, वहीं पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल और पूर्वोत्तर के राज्यों में सामूहिक स्तर पर उत्सव के रूप में यह त्यौहार मनाया जाता है। लाखों-करोड़ों रुपए खर्च कर पांडाल बनाए जाते हैं और सांस्कृतिक-धार्मिक आयोजन होते हैं। इसके बावजूद मां दुर्गा, महिषासुर, लक्ष्मी-सरस्वती तथा कार्तिकेय-गणपति की मिट्टी की ही प्रतिमाएं बनाई जाती हैं। दुर्गा पूजा की पूर्णाहुति कन्याओं के पूजन और जीमन से होती है। आज जब समाज से कन्या भ्रूणहत्या का कलंक मिटाने के लिए सरकारी-गैर सरकारी स्तर पर किए जा रहे प्रयास भी नाकामी साबित हो रहे हैं, ऐसे में इस बात पर हमें गर्व करना चाहिए कि सनातन धर्म के कर्ता-धर्ताओं ने इस स्थिति को सदियों पहले भांप लिया था और कन्या-पूजन के रूप में नारी के महत्व को प्रतिपादित कर दिया था। शारदीय नवरात्र के दौरान नौ दिनों तक रोज विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हुए इन प्रतिमाओं के प्रति लोगों की श्रद्धा और प्रीति सहज ही बढ़ जाती है, इसके बावजूद मानव जीवन को क्षणभंगुर मानने वाला सनातन दर्शन देवी-देवताओं को भला कहां स्थायी मानने की भूल करता। ऐसे में विजयादशमी पर इन प्रतिमाओं को शोभायात्रा के रूप में ले जाकर जलाशयों-नदियों में विसर्जन कर दिया जाता है। प्रकाश के साधनों के आविष्कार के बाद मनुष्य ने अंधकार पर विजय पाई, लेकिन धरती से अंधकार को दूर भगाने का उदाहरण केवल सनातन परंपरा में ही मिलता है, जब कार्तिक कृष्ण अमावस्या पर दीपों की जगमगाहट अंधकार के साम्राज्य को पूरी तरह मात दे देती है। अंधकार पर प्रकाश के विजय के इस पर्व के बाद कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवोत्थान एकादशी के रूप में मनाया जाता है और सनातन परंपरा स्वयं को देवताओं की पूजा-अर्चना में संलग्न कर देव ऋण से मुक्त होने का प्रयास करती है।

Thursday, September 22, 2011

घटती लोकप्रियता का संकेत


जनकल्याण के मूल उद्देश्य को भूल रही सरकार के प्रति लोगों में बढ़ा असंतोष


इस माह के पहले सप्ताह में कराए गए 'लेंसऑनन्यूजÓ सर्वेक्षण के अनुसार केंद्र सरकार के प्रति देशवासियों का असंतोष काफी बढ़ गया है। सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार करीब 74 प्रतिशत देशवासी यूपीए सरकार के कामकाज से असंतुष्ट हैं। सर्वेक्षण में शामिल लोगों ने माना कि मुद्रास्फीति, भ्रष्टाचार, नक्सली तथा आतंकी हिंसा पर लगाम लगाने में केंद्र पूरी तरह विफल रहा। इससे पहले अगस्त में हुए सर्वेक्षण में 61 प्रतिशत लोगों ने केंद्र सरकार के प्रति असंतोष जताया था।
बेलगाम महंगाई ने आम आदमी का जीना मुहाल कर दिया है। महंगाई को रोकने के लिए किए जा रहे प्रयास जनता को राहत नहीं पहुंचा रहे। पेट्रोल की कीमत में की गई बढ़ोतरी ने महंगाई से त्रस्त लोगों की परेशानी और भी बढ़ा दी है। महंगाई पर काबू पाने के उपाय के नाम पर हाल ही रेपो और रिवर्स रेपो दर में बढ़ोतरी से ऋणों पर ब्याज दर बढऩे की मार भी आमजन को झेलनी पड़ेगी। वहीं इस सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार 84 प्रतिशत लोगों ने अन्ना हजारे और उनके सहयोगियों द्वारा तैयार जन लोकपाल विधेयक को समर्थन दिया। लोगों का मानना है कि देश के विकास को दीमक की तरह चाट रहे भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने में यह विधेयक काफी हद तक प्रभावी होगा। ऐसे में केंद्र सरकार को चाहिए कि जनकल्याण के अपने मूल उद्देश्य को ध्यान में रखकर आमजन की परेशानियां दूर करने की पहल करे, अन्यथा आमजन की उपेक्षा उसे भारी पड़ सकती है।
(जयपुर से प्रकाशित हिंदी दैनिक समाचार पत्र डेली न्यूज में 22 सितंबर को प्रकाशित)