Sunday, December 24, 2017

जो जितना है दूर मही से, उतना वही बड़ा है...


‘ एक और प्रॉब्लम है। मैं कभी प्लेन में नहीं बैठी। ’ फिल्म ‘सेक्रेट सुपरस्टार’ की नायिका जब अपने स्कूली दोस्त से यह बात कहती है तो महसूस होता है कि हवाई सफर को लेकर अधिकांश भारतीय की ऐसी ही स्थिति है। वैज्ञानिक अपनी दिन-रात की मेहनत से अनुसंधान, आविष्कार करते हैं ताकि जनसामान्य का जीवन सुगम हो सके। दुश्वारियों का अंत हो सके। इसके बाद बारी आती है, जनप्रतिनिधियों की जो आधुनिकतम तकनीक का लाभ आमजन तक पहुंचाएं। इसी उम्मीद से हर पांच साल बाद जनता अपना अमूल्य वोट देकर अपना जनप्रतिनिधि चुनती भी है, मगर अफसोस...एमएलए-एमपी चुने जाने के बाद जब उसे सारी सुविधाएं मुहैया हो जाती हैं तो वह आमजन को होने वाली असुविधाओं से मुंह मोड़ लेता है। उनकी तरफ देखना भी पसंद करता। उसकी दृष्टि संकुचित हो जाती है या फिर वह जान- बूझकरआंखें बंद कर लेता है। हमारे सभी राजनेता ट्रेनों के फर्स्ट क्लास में सफर करते हैं या फिर हवाई जहाज में। ट्रेनों के इन कूपों में भारी-भरकम पर्दे लगे होते हैं, जिनके आर- पार कुछ दिखाई नहीं देता। वहीं, हवाई जहाज की खिड़की अव्वल तो काफी छोटी होती है। और फिर ऊपर से आसमान से धरती की हकीकत नजर ही कहां आती है, ऐसे में आमजन को होने वाली दुश्वारियों और उसकी आंखों में पलते सपनों के बारे में वे कैसे जान पाएंगे। ...और इस सबका नतीजा यह होता है कि चुनाव दर चुनाव जनप्रतिनिधि भले ही बदलते जाएं, जनता के लिए हालात नहीं बदलते। इसी का नतीजा है कि आजादी के 70 साल बाद भी आम भारतीय के लिए हवाई सफर कल्पना लोक की ही बात है। शायद हमारे नुमाइंदों को इस बात का भय भी सताता है कि यदि आम जनता भी उन्हीं सुख-सुविधाओं का उपभोग करने लगेगी तो नेता होने का उनका रुतबा-रुआब कैसे कायम रह पाएगा। ऐसे में अपनी कविताओं से मुजफ्फरपुर का नाम हिन्दी साहित्य के क्षितिज पर पहुंचाने वाले प्रसिद्ध कवि जानकी वल्लभ शास्त्री की ये पंक्तियां बरबस ही जेहन में धमाचौकड़ी मचाने लगती हैं : जनता धरती पर बैठी है, नभ में मंच खड़ा है। जो जितना है दूर मही से, उतना वही बड़ा है। 20 दिसंबर 2017

बस से बंगलोर-5


आसमां से धरती के नजारे रात दो बजे तक काम करने के बाद दफ्तर से सीधे एयरपोर्ट के लिए निकल गया था। वहां भी करीब साढ़े तीन घंटे आंखों ही आंखों में कटे। ऐसे में बंगलोर के लिए एयरबस में सवार होने के साथ ही नींद के झोंके आने लगे थे। वहीं दिमाग इस पहले हवाई सफर के हर अनुभव को संजो लेने को सन्नद्ध था, ताकि इसे अपने उन प्रियजनों से बांट सकूं, जो अब तक इससे वंचित हैं। इसलिए नींद से बोझिल होने के बावजूद आंखें खिड़की के बाहर आसमान में निहार रही थीं। रन वे से उड़ान भरने के बाद एयरबस की रफ्तार का अहसास केवल उसकी तेज आवाज से ही हो रहा था। इससे अधिक रोमांच का अनुभव तो बचपन में सोनपुर मेले में हवाई झूले पर होता था। सोचता हूं, जैसे शारीरिक पीड़ा हद से बढ़ जाने पर दिमाग को उस अनुपात में अहसास नहीं होता, शायद वैसे ही हवा में बात करते विमान की रफ्तार का अहसास भी उसमें बैठे यात्री को नहीं हो पाता है। विज्ञान और दर्शन की इन गुत्थियों में खुद को क्यों खपाया जाए, कम समय में मंजिल तक पहुंचने का मकसद पूरा हो जाए, यही काफी है। बंगलोर से वापसी में फ्लाइट सुबह 11 बजे थी। स्नान-ध्यान के साथ भरपूर नाश्ता, प्रिय मित्र, आदरणीया भाभीजी, प्यारी बिटिया की शुभकामनाएं और मित्र के पूजनीय सासूजी और श्वसुरजी का आशीर्वाद लेकर निकला था, सो तन-मन में भरपूर ताजगी थी। खिड़की के किनारे वाली सीट सोने पर सुहागा का अहसास करा रही थी। अच्छी-खासी धूप खिली थी, सो बाहर सब कुछ बिल्कुल साफ था। गतिमान बादलों के रंग-रूप और हरियाली को छोड़ दें तो विमान के गतिमान होने के बावजूद नीचे का नजारा लगभग एक जैसा ही था। कुछ कुछ वैसा ही जैसा गूगल मैप को जूम करने पर दिखाई देता है। लैंड करने का समय नजदीक आने के साथ ही ऊंचाई कम होने पर विमान से धरती के नजारे साफ नजर आने लगे। इसकी अनुभूति भी काफी आकर्षक रही। इति

बस से बंगलोर-4


भीतर से सब एक यात्रियों के चेहरे पर अभिजात्य होने का मुखौटा अब पूरी तरह उतर चुका था। ट्रेन में जैसे स्लीपर क्लास में मिडिल और अपर बर्थ वाले बढ़ती उम्र, कमर दर्द का वास्ता देकर सहयात्री से लोअर बर्थ एक्सचेंज करने का अनुरोध करते हैं, फ्लाइट में भी कुछ ऐसी ही अनुभूति हुई। मेरी सीट अंदर से किनारे वाली थी। एक नौजवान ने मुझसे आग्रह किया कि मैं सीट की अदला-बदली कर लूं तो वह अपनी महिला सहयात्री के साथ सफर का लुत्फ उठा सकेगा। मैं उसका अनुरोध स्वीकार कर बगल वाली रो में समान स्थिति में आसीन हो गया। करीब दो घंटे के सफर में जब भी हमारी नजरें मिलतीं, वह नौजवान कृतज्ञता का भाव जताने से खुद को नहीं रोक पाता। इस बीच चाय-नाश्ता आदि परोसे जाने की उद्घोषणा हुई। आम तौर पर किसी चीज की कीमत बढ़ जाने पर हम ‘महंगाई आसमान पर पहुंची’कहते हैं, यहां तो चीजें वाकई आसमान में बिक रही थीं, सो दाम दस गुना से भी अधिक होना लाजिमी था। ऐसे में चाय न पीने की अपनी आदत का बड़ा फायदा होता नजर आया। करीब डेढ़ घंटे बाद ही गंतव्य तक पहुंचना था, सो इतनी देर के लिए नाश्ता को भी मुल्तबी करना ही मुनासिब समझा। सर्द सुबह में वनस्पति तेल के भाव पानी खरीदने का कोई मतलब ही नहीं था। यह तो मेरा गणित था, लेकिन अधिकतर सहयात्री मेरी ही सोच के थे। जैसे सही शब्दों में ‘इकोनॉमी’ क्लास के यात्री होने की भूमिका का मन से निर्वाह कर रहे हों। ऐसे में इक्का-दुक्का ऑर्डर आने का मलाल एयर होस्टेस के चेहरे पर साफ नजर आ रहा था। थोड़ी ही देर में उद्घोषणा हुई कि बंगलोर बस आने को ही है। वहां का अनुकूल मौसम हमारी मेजबानी के लिए तैयार है। ...और वाकई बंगलोर आ गया। वहां का हवाई अड्डा लखनऊ के मुकाबले काफी आलीशान है। (क्रमश:) 19 दिसंबर 2017

बस से बंगलोर-3


बस से बस तक सबकी निगाहें गेट नंबर तीन के बंद दरवाजे और कान उसे खुलने को लेकर होने वाली उद्घोषणा पर लगे थे। थोड़ी ही देर में शीशे के उस पार खर्रामा-खर्रामा आती दो नीली बसें दिखीं। इसी बीच गेट खुलने के साथ उद्घोषणा हुई कि बंगलोर की फ्लाइट के सभी यात्री बस में सवार हो जाएं। यह क्या...महज कुछ ही कदम चलकर बस रुक गई। इससे अधिक दूरी तो ट्रेन का अंतहीन इंतजार करते हुए हम प्लेटफॉर्म पर चहलकदमी करते हुए तय कर लेते हैं। खैर, बस से उतरते ही सामने इंडिगो का विमान उड़ान भरने के लिए खड़ा था। हालांकि इस पर कहीं भी एयरोप्लेन या विमान शब्द नहीं दिखा। हां, एयरबस 320 जरूर लिखा था। चोंच, पूंछ और डैनों को छोड़ दिया जाए, तो यह अपेक्षाकृत लंबी बस से अधिक कुछ नहीं लग रही थी। इसमें सवार होने के लिए ऊंची और घुमावदार सीढ़ी लगी हुई थी। दरवाजे खुलने के साथ ही यात्री इसमें दाखिल होने लगे। अंदर से भी यह मुझे बस जैसी ही लगी। बसों में जहां 34 से लेकर 72 तक सवारियों के बैठने की जगह होती है, वहीं इसमें 180 सीटें थीं। इससे कहीं आरामदेह सीटें तो आजकल वॉल्वो और स्कैनिया बसों में होती हैं। दरअसल बोर्डिंग पास पर लिखा ‘इकोनोमी’ क्लास इस अहसास-ए-कमतरी की गवाही दे रहा था। संतेष इस बात का था कि तथाकथित ‘बिजनेस’ क्लास का कोई नामो निशान नहीं था। जरूरी एहतियात की उद्घोषणा के बाद एयरबस सरकने लगी। डैने थोड़े और खुले और रन-वे पर धीरे-धीरे फर्राटे भरने के साथ ही एयरबस आकाश में पहुंचने लगी। ...लेकिन यह क्या, अब हमें उस हवाई रफ्तार का कोई अहसास नहीं हो रहा था जो सैकड़ों किलोमीटर की दूरी को महज कुछ ही मिनट में तय कर लेती है। (क्रमश:) 18 दिसंबर 2017

बस से बंगलोर-2


हवाई सफर का हव्वा मैं इधर मोबाइल पर मित्रों के फेसबुक पोस्ट, वॉट्सएप संदेश और कादम्बिनी के आलेख पढ़ने में लीन था, उधर घड़ी की सुइयां भी धीरे-धीरे तारीख बदलने में जुटी थीं। इस बीच इक्के-दुक्के यात्री आते रहे। अभिजात्य वर्ग के संस्कारों का असर कहें कि कुर्सियां खाली होने के बावजूद लोग एयर पोर्ट के लाउंज में किसी के बगल में बैठने के बजाय अलग-थलग बैठना ही पसंद कर रहे थे। ऐसे में हवाई सफर का हव्वा मेरे दिलो-दिमाग में तरह-तरह के सवाल जगा रहा था। इस बीच करीब पौने चार बज गए और यात्रियों के साथ ही एयरपोर्ट कर्मियों की हलचल भी बढ़ने लगी। देखते ही देखते यात्री बिना किसी निर्देश के स्वत : स्फूर्त से सामान चेक कराने के लिए एक काउंटर पर जाकर खुद-ब-खुद कतार में खड़े होने लगे। मैं भी उनके पीछे खड़ा हो गया। मेरे पास महज एक बैग था, सो गंतव्य पूछने के बाद मुझे इंडिगो के काउंटर पर जाने को कहा गया। वहां वेब चेक इन का कंप्यूटर प्रिंट दिखाने पर चिकने मोटे कागज पर छपा टिकट मिला। साथ ही गेट नंबर तीन पर जाने को कहा गया। लाइन में खड़े एक यात्री से पूछा तो पता चला कि इसी प्रिंटेड टिकट को भारी-भरकम भाषा में बोर्डिंग पास कहा जाता है। गेट नंबर तीन पर पहुंचा तो सुरक्षा जांच के लिए लोग लाइन में खड़े थे। जो लोग रेलवे स्टेशन पर जीआरपी और आरपीएफ के जवान के सवालों पर उन्हें आंखें दिखाने और हड़काने से बाज नहीं आते, वे अच्छी-खासी सर्दी के बावजूद जैकेट और कोट उतारकर खड़े थे। यह हवाई हड्डे के वातावरण का असर था या फिर सीआईएसएफ के चौकस कर्मचारियों की मुस्तैदी का, मैं समझ नहीं पा रहा था। खैर, सामान और खुद की सुरक्षा जांच के बाद अंदर लॉबी में जाकर बैठ गया। (क्रमश:) 17 दिसंबर 2017

बस से बंगलोर -1

कल्पना बनी हकीकत स्कूल के दिनों में अमूमन हर परीक्षा में दो विषयों पर निबंध पूछे जाते थे। पहला, यदि मैं प्रधानमंत्री होता और दूसरा, मेरी पहली हवाई यात्रा। दोनों के ही जवाब विशुद्ध कल्पना पर आधारित होते थे। चूंकि गुरुजी के लिए भी ये दोनों ही विषय हकीकत से परे थे, इसलिए काम भर के अंक मिल ही जाते थे। सवा अरब देशवासियों की तरह पहला प्रश्न तो अब भी कल्पना में ही है, मगर हवाई सफर पिछले दिनों हकीकत में तब्दील हो गया। मेरे परम मित्र पप्पूजी Amrendra Mishra की बिटिया के एंगेजमेंट में बंगलोर जाना था। ट्रेन से जाने-आने में ही 90 घंटे से अधिक लग जाते, ऐसे में कम से कम हफ्ते भर की छुट्टी चाहिए होती। इसलिए समय के साथ ही पैसे बचाने के लिए चार महीने पहले ही एयर टिकट बुक करा लिया था। बाकी परेशानी क्रेडिट कार्ड ने दूर कर दी। हवाई जहाज तो दूर, अब तक हवाई अड्डा भी नजदीक से नहीं देखा था। ट्रेन से गुजरते हुए दूर से ही पटना, आगरा में हवाई अड्डे पर खड़े विमान ही देखे थे। ऐसे में मुझसे पहले हवाई सफर का लुत्फ उठाने वाले मित्रों से जरूरी जानकारी हासिल की। लखनऊ से सुबह छह बजे फ्लाइट थी, सो दफ्तर से काम खत्म करने के बाद रात दो बजे निकल गया। साथ काम करने वाले मित्र ने स्कूटी से अमौसी एयरपोर्ट ले जाकर छोड़ दिया। वहां रोशनी की जगमगाहट तो अच्छी-खासी थी, लेकिन इक्के-दुक्के सुरक्षाकर्मी के अलावा सन्नाटा पसरा था। टिकट और आधार कार्ड दिखाकर अंदर दाखिल हो गया। मोबाइल पर फेसबुक-वॉट्सएप के सहारे इंतजार के अलावा और कोई उपाय नहीं था। अधिक इस्तेमाल से स्मार्ट फोन की बैटरी कहीं दम न तोड़ दे, इसलिए कादंबिनी के पन्ने पलटता रहा। (क्रमश:) 16 दिसंबर 2017 ( 25 नवंबर 2017 के हवाई सफर का हासिल )

Thursday, October 19, 2017

ममता का सिमटता साया


ज्ञानी और विद्वान भारतीय समाज को भले ही पुरुषप्रधान कहते रहें, लेकिन हमारे जीवन में हर जगह मातृपक्ष ही हावी दिखता है। नानी का प्यार दादी के दुलार पर, मां की ममता पिता के स्नेह पर और बहन का अनुराग भाई के अपनापन पर अक्सर भारी पड़ता है। मेरे मन में मातृपक्ष के प्रति अधिक आकर्षण की वजह शायद ननिहाल में मेरा जन्म होना है। नाना का निधन तो मेरे बचपन में ही हो गया था, इसलिए उनकी धुंधली-सी याद ही मेरे जेहन में बाकी है। हां, नानी से जुड़ी बहुत-सी बातें यदा-कदा बरबस ही याद आ जाती हैं। कन्हैया को माखन प्रिय था और नानी ने रोज-रोज भरपूर मलाई खिलाकर इस मोहन को मलाई का प्रेमी बना दिया। यही वजह है कि अपने घर में चूल्हे पर चढ़े दूध से मलाई निकाल कर खाने के चक्कर में कई बार हथेली जला चुका हूं। नानी के रहते हुए और उनके जाने के बाद भी मामियों ने दुलार भरे मनुहार से हमें नानी की कमी महसूस नहीं होने दी। कभी किसी चीज को लेकर ममेरे भाई-बहनों से झड़प होने पर हमेशा ही हमारा ही पक्ष लिया। पिछले बुधवार को बड़ी मामी के आकस्मिक निधन से ननिहाल से जुड़ी यादें बरबस ही ताजा हो आईं। सबके ननिहाल, हमारा ममहर आम तौर पर मां के मायके को ननिहाल के नाम से ही जाना जाता है। इसके पीछे शायद अवधारणा हो कि नाना-नानी के रहने तक ही ननिहाल से नाता रहता है। इसके बाद धीरे-धीरे कम होने लगता है। लेकिन दुनिया को गणतंत्र का पाठ पढ़ाने वाले बिहार के वैशाली की बात ही अलग है। वैशाली की स्थानीय बोली वज्जिका में ननिहाल को ममहर कहते हैं। इसमें आशावाद का भाव छिपा है। जहां तक मैं समझता हूं, इसके पीछे मान्यता है कि नाना-नानी के बाद भी ननिहाल का अस्तित्व और वहां से बना नाता खत्म नहीं होता। मामा-मामी और ममेरे भाई-बहनों के रहने तक भी संबंधों की गर्माहट कायम रहे, इसीलिए ननिहाल को ममहर कहा जाता है। 13 मई 2017