Saturday, October 26, 2019

तेरा दर्द न जाने कोय


अभी-अभी दफ्तर से लौटा हूं । घने कोहरे और भीषण ठंड में बाइक से आठ-नौ किलोमीटर की दूरी तय करना भी काफी कष्टप्रद हो जाता है । हाथ-पैर सुन्न हो गये हैं। मोहल्ले में सन्नाटा पसरा है। ऐसे नीरव माहौल में घर के सामने पार्क से आ रही पक्षियों की आवाज इस सन्नाटे को भंग कर रही है । बचपन में गांव से लेकर अब शहरों तक का अनुभव बता रहा है कि यह चिड़ियों की चहचहाहट नहीं है, जो मन को अनुपम आनंद से परिपूर्ण कर देती है । लगता है, जैसे चिड़ियां किसी बड़ी तकलीफ में हैं और चिचिया रही हैं। न जाने उन पर कौन सी विपत्ति आ पड़ी है । अभी तो सर्दी का कहर ही सबसे बड़ी परेशानी का सबब महसूस हो रहा है । पालतू की चिंता तो आम से लेकर खास तक सभी करते हैं, जो फालतू हैं, उनकी खोज-खबर कौन ले ? परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना करता हूं कि सर्दी का सितम कुछ कम करो ताकि बेजुबानों- बेसहारों को कल मिले और परिंदों के कलरव से हर सुबह गुंजायमान रहे। 11 January2018 lucknow

No comments: