Saturday, October 26, 2019

नई पीढ़ी : घटती दृष्टि, बढ़ता विजन


नई पीढ़ी : घटती दृष्टि, बढ़ता विजन हालिया जयपुर यात्रा के दौरान दो युवा बुजुर्गों के सान्निध्य में कुछ पल बिताने का मौका मिला। इनमें से एक अनौपचारिक शिक्षा की बड़ी हस्ती हैं तो दूसरी बाल साहित्य की नामी शख्सियत। अंकलजीने दुनिया भर के शिक्षण संस्थानों में जाकर शिक्षा का अलख जगाया और उम्र के सातवें दशक में भी उसी चुस्ती-फूर्ति के साथ अपने मिशन में जुटे हैं। वहीं, दीदी वर्षों बाल पत्रिका का संपादन करने के बाद स्वाध्याय और साहित्य-साधना में लीन हैं। जब मैं अंकलजी के पास पहुंचा, तो वहां तीन अलग-अलग परिवारों के चार बच्चे भी थे। 7-8 साल से लेकर 17-18 वर्ष आयुवर्ग के इन बच्चों में दो समानताएं थीं। पहली, चारों बच्चे इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ने वाले। और दूसरी, चारों को नजर का चश्मा लगा हुआ। बच्चों के हाव-भाव और आपसी बातचीत से उनकी मेधा का सहज ही अंदाजा हो रहा था। आपस में और बड़ों से बात-व्यवहार के सलीके से लेकर प्रेजेंस ऑफ माइंड तक में कोई कमी नहीं। कंप्यूटर, लैपटॉप और स्मार्टफोन चलाने में सिद्धहस्त ये बच्चे आगे चलकर विभिन्न क्षेत्रों में नाम कमाएंगें। देश-दुनिया के बारे में इनका जितना ज्ञान होगा, मैं विश्वासपूर्वक कह सकता हूं कि इनकी उम्र में उसके पांच प्रतिशत की भी जानकारी मुझे नहीं थी। वजह, तब टेलीविजन तो बहुत दूर की बात है, रेडियो भी हर घर में नहीं हुआ करता था। अखबार और पत्रिकाओं की तो सोच भी नहीं सकते थे। ऐसे में सामान्य ज्ञान के विस्तार की गुंजाइश बहुत ही कम थी। हां, गुरुजनों के अपने कर्तव्य के प्रति समर्पण के भाव ने पाठ्यक्रम आधारित पढ़ाई में हमें कभी पिछड़ने नहीं दिया। यह तो हुई विजन की बात। अब दृष्टि पर आते हैं। हमारे जमाने में प्राइमरी और मिडिल की कौन कहे, हाईस्कूल तक में याद नहीं आता कि हमारे किसी सहपाठी की आंखों पर चश्मा चढ़ा हो। हमारा हाईस्कूल आस-पड़ोस के दर्जनों गांवों में इकलौता था, इसलिए एक हजार से ज्यादा ही विद्यार्थी रहे होंगे, लेकिन उनमें इक्का-दुक्का ही चश्मा लगाते रहे होंगे। यहां तक कि कॉलेज और विश्वविद्यालय के दिनों में भी यह तादाद ज्यादा नहीं बढ़ पाई थी। जहां तक मैं समझ पाता हूं, नई पीढ़ी की आंखें कमजोर होने के पीछे खान-पान की उनकी आदतें भी काफी हद तक जिम्मेदार हैं। आजकल बच्चे खाने के मामले में काफी चूजी हो गए हैं, जबकि हमारे समय में संयुक्त परिवार होने की वजह से भोजन में विकल्प की गुंजाइश बहुत कम होती थी। नतीजतन जो भी बनता, बच्चों को खाना ही पड़ता, लेकिन इसका सुफल उनके अच्छे स्वास्थ्य के रूप में मिलता। 07April 2018 lucknow

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