Wednesday, November 28, 2007

जयपुर समारोह में कविताओं की बरसात-तीन

और अब हाजिर हैं गाजियाबाद से आए युवा गीतकार डॉ. कुमार विश्वास की कुछ रचनाएं, जिनसे उन्होंने रसिक श्रोताओं की काव्य पिपासा को शांत किया, गहराती सदॅ रात में इश्क-ओ-हुस्न की गरमाहट परोसी, आप भी लीजिए इसका आनंद-----
महफिल महफिल मुस्काना तो पड़ता है, खुद ही खुद को समझाना तो पड़ता है
उनकी आंखों से होकर दिल तक जाना, रस्ते में ये मयखाना तो पड़ता है
तुमको पाने की कोशिश में खत्म हुए, इश्क में इतना जुरमाना तो पड़ता है

पनाहों में जो आया हो तो उस पर वार क्या करना
जो दिल हारा हुआ हो उस पर फिर अधिकार क्या करना
मोहब्बत का मजा तो डूबने की कशमकश में है
जो हो मालूम गहराई तो दरिया पार क्या करना

....... चूडि़यों से भरे हाथ लिपटे रहे, सुखॅ होठों से झरना सा झरता रहा
एक नशा सा अजब छा गया कि हम खुद को खोते रहे,
तुमको पाते रहे पनघटों से बहुत दूर पीपल तले,वेग के व्याकरण पायलों ने गढ़े
शाम गीतों के आरोह-अवरोह में मौन के चुम्बनी सूक्त हमने पढ़े
सौंपकर उन अंधेरों को सब प्रश्न हम एक अनोखी दीवाली मनाते रहे
देह की उरमियां बन गईं भागवत, हम समपॅण भरे अथॅ पाते रहे
मन में अपराध की एक शंका लिए, कुछ क्रियाएं हमें जब हवन सी लगीं
एक-दूजे की सांसों में घुलती हुई, बोलियां भी हमें जब भजन सी लगीं
कोई भी बात हमने न की रातभर, प्यार की धुन कोई गुनगुनाते रहे

बात इश्क से दुनियादारी तक कुछ यूं पहुंची--
रंग दुनिया ने दिखाया है निराला देखूं, है अंधेरे में उजाला तो उजाला देखूं
आईना रख दे हाथ में मेरे आखिर, मैं भी कैसा लगता है तेरा चाहने वाला देखूं
जिसके आंगन से खुले थे मेरे सारे रास्ते, उस हवेली पे भला कैसे मैं ताला देखूं

फिर कुमार के दिल की कुछ बातों से श्रोता भी हमराज हुए-------
उनकी खैरो खबर नहीं मिलती, हमको ही खासकर नहीं मिलती
शायरी को नजर नहीं मिलती, मुझको तू ही अगर नहीं मिलती
जिस्म में दिल में रूह में दुनिया, ढूंढता हूं मगर नहीं मिलती
लोग कहते हैं रूह बिकती है, मैं जिधर हूं उधर नहीं मिलती

और अब वे बातें, जिन्हें कवि हृदय दो-चार होता है, हमारा और आपका भी अक्सर इनसे सामना होता है--------
इतनी रंग-बिरंगी दुनिया दो आंखों में कैसे आए
हमसे पूछो इतने अनुभव एक कंठ से कैसे गाए
ऐसे उजले लोग मिले जो अंदर से बेहद काले थे
ऐसे चतुर मिले जो मन से सहज सरल भोले भाले थे
ऐसे धनी मिले जो कंगालों से भी ज्यादा रीते थे
ऐसे मिले फकीर जो सोने के घट में पानी पीते थे
मिले परायेपन से अपने अपनेपन से मिले पराये
हमसे पूछो इतने अनुभव एक कंठ से कैसे गाए
जिनको जगत विजेता समझा मन के द्वारे हारे निकले
जो हारे-हारे लगते थे अंदर से ध्रुवतारे निकले
जिनको पतवारें सौंपी थीं वे भंवरों के सूदखोर थे
जिनको भंवर समझ डरता था आखिर वही किनारे निकले
वे मंजिल तक कैसे पहुंचें जिनको खुद रस्ता भटकाए
हमसे पूछो इतने अनुभव एक कंठ से कैसे गाए।

कवि सम्मेलन की कुछ और रचनाओं के लिए कीजिए इंतजार....पढ़ते रहिए दिल से दिल की बात...शुक्रिया

5 comments:

महेंद्र मिश्रा said...

बहुत बढ़िया

डॉ. दुष्यंत said...

अगर आप उन्हें जानते हैं तो मेरी जिज्ञासा है कि क्या ये वही कुमार विश्वास हैं जिन पर राजस्थान के सूरतगढ़ कस्बे में रचना चोरी का मुक़दमा चला था और आरोप साबित होने पर उन्हें जुर्माना देना पडा था ?

rajendra said...

भाई मंगलम.
आप तो छुपे रुस्तम निकले. खूबसूरत ब्लॉग है आपका और साथ में लिखते भी खूब हो. आप की इन पसंदों और सरोकारों का पता तो अब चला. नीलिमा जी के ब्लॉग से राजीव के ब्लॉग पर और वहाँ से आपके द्वार. क्या संयोग है. फिर आते रहेंगे आपके चिट्ठे पर. फिर से बधाई.

suresh said...

My Dear sir

Very good.

suresh Pandit, jaipur

sa said...

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