Sunday, November 4, 2007

.....तो क्या प्रेमचंद पोखर खुदवाते

आइए, आज आपको अपने गांव ले चलता हूं। जिन गिनी-चुनी प्रतिभाओं की बदौलत हमारे गांव की ख्याति राष्ट्रीय क्षितिज पर हैं, उनमें मैथिली अथ च हिंदी के भी स्वनामधन्य साहित्यकार व दशॅनशास्त्री हरिमोहन झा अग्रगण्य हैं। दसवीं के बाद से ही पहले पढ़ाई, फिर आजीविका के सिलसिले में लगातार गांव से बाहर रहने के कारण मैं भी उनकी कृतियों का आनंद नहीं ले सका। बमुश्किल दो-चार मैथिली कहानियां ही पढ़ पाया था। आजकल मुझ पर पढ़ने की धुन सवार है, सो हाल ही साहित्य अकादमी से प्रकाशित उनकी प्रतिनिधि कहानियों का संकलन--बीछल कथा (मैथिली)--और हास्य-व्यंग्य विधा की पुस्तक---खट्टर काका (हिंदी में)---पढ़ने का अवसर मिला। पढ़ा तो पढ़ता ही गया और दोनों पुस्तकें पूरी करके ही दम लिया। उनकी शेष रचनाएं भी मंगाने के लिए प्रयासरत हूं ताकि उनके समग्र कृतित्व से परिचित हो पाऊं। मैथिली में प्रकाशित उनकी रचनाओं का आज भी मिथिला क्षेत्र में क्या जलवा है, इसे तो वहां जाकर ही महसूस किया जा सकता है, उनकी अधिसंख्य रचनाएं विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में स्वीकृत हैं।----खट्टर काका--- तो प्रकाशन काल से ही अखिल भारतीय स्तर पर (किंवा भारत से बाहर भी) साहित्यप्रेमियों की पसंद और चरचा का विषय रही है।
अब वो बात, जिसने मुझे प्रेरित किया यह सब लिखने को। जयपुर में हाल ही प्राथमिक शिक्षकों का राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ। इसमें भाग लेने के लिए मेरे गांव से भी एक सेवानिवृत्त शिक्षक पधारे। मैंने सहज जिज्ञासावश उनसे स्वनामधन्य हरिमोहन झा के बारे में गांव और ग्रामीणों की राय के बारे में पूछा। अगला वषॅ उनका जन्म शताब्दी वषॅ होगा।
मास्टर साहब का कहना था कि हरिमोहन झा ने अपने लेखन से साहित्य जगत को भले ही उपकृत किया हो, लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकारों में अपनी जगह बनाई हो, साहित्यप्रेमियों के लिए पूज्य बने हों, लेकिन गांव या गांव वालों के लिए क्या किया।
इस जवाब ने मुझे झकझोरकर रख दिया। मैं कुछ समझ नहीं पाया कि एक नौकरीपेशा आदमी ऐसा क्या करे कि गांव वाले उपकृत हो सकें। प्लेस ऑफ वकॅ तथा नेचर ऑफ वकॅ और फिर सीमित मात्रा में उससे प्राप्त धन से अपना व अपने परिवार का गुजर-बसर करना क्या कम कठिन होता है। मुंशी प्रेमचंद ने जिस मुफलिसी में दिन काटे यह किसी से छिपा नहीं है, ऐसे में जनसेवा के लिए वे पोखर कैसे खुदवा पाते। तो क्या लमही (प्रेमचंद का जन्मस्थान) के लोग उन्हें भुला दें। गोस्वामी तुलसीदास का जीवन काल जिस तरह बीता, मुझे नहीं लगता कि उन्होंने अपने पैतृक गांव में तुलसी के दस-बीस बिरवे भी लगाए होंगे। निराला ने अपनी जन्मस्थली में कितने स्कूल खुलवाए? तो क्या इसी बिना पर उन्हें भुला दिया जाए।
मेरा तो मानना है कि आपके इदॅ-गिदॅ से निकले मुकेश-अनिल अम्बानी, एल. एन. मित्तल सरीखे धनकुबेर अकूत दौलत और ख्याति कमाने के बाद यदि अपनी जन्मस्थली को बिसरा दें, हां की जनता के कल्याण के लिए कुछ भी न सोचों तो आप भी बेशक उन्हें बिसरा दें, इससे आपका भी कुछ नहीं बिगड़ेगा। आप यदि कतॅव्यपथ पर अग्रसर रहे, तो आपको भी जीने का रास्ता मिल ही जाएगा, लेकिन समाज को राह दिखाने वाले साहित्यकारों की उपेक्षा से आने वाली पीढियां उनके मागॅदशॅन से वंचित रह जाएंगी।
अतः मेरा निवेदन है कि आपके आसपास यदि कोई ऐसी विभूति हुई है, जिसने अपनी विलक्षण प्रतिभा का लोहा मनवाया है, तो उसके जीते-जी अथवा दिवंगत होने पर भी उनसे परिचित हों, गौरवान्वित महसूस करें, आने वाली पीढियों को भी परिचित कराएं। इसका सबसे अच्छा उदाहरण बंगाली समाज में मिलता है जहां गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की ---गीतांजलि---को गीता से कम महत्व प्राप्त नहीं है। अधिकांश घरों में आपको यह अमर कृति मिल जाएगी।

3 comments:

अतुल said...

लेकिन गांव या गांव वालों के लिए क्या किया। यह बेवकूफ़ों की भाषा महान लोगों के बारे में हर गांव में सुनने को मिलती है.

अतुल

Udan Tashtari said...

सही संदेश. जरुर परिचय करवाना चाहिये. साथ ही प्रयास कर विकि पर भी डालें तो विस्तार मिलेगा.

suresh said...

Namaskar !!!

Good information.

Regards

Suresh Pandit, Jaipur
E mail: biharssangathan@yahoo.com