Monday, September 28, 2009

अर्द्धांगिनी मतलब....

चार दिन पहले मैंने पत्नी के सहयोग से ही बड़ी मंजिलें पाने का जिक्र किया था। आज सुबह एक मित्र से बात की तो पत्नी को लेकर अपनी पीड़ा वे दबा नहीं सके। हालांकि उनकी पीड़ा वैसी नहीं थी, जैसी पत्नी पीड़ितों की होती है। आज तक अमूमन हमलोग यही पढ़ते-सुनते आए हैं कि शादी के बाद पत्नी को पाकर ही मनुष्य का व्यक्तित्व पूर्णता को प्राप्त करता है। मित्र ने अर्द्धांगिनी शब्द की एक नई व्याख्या प्रस्तुत की। उनका कहना था कि जिसके आधे अंग में हमेशा बीमारी रहती हो, उसे अर्द्धांगिनी कहते हैं। यह बीमारी मानसिक, शारीरिक, शक की या कुछ और तरह की हो सकती है। उनकी पीड़ा उनकी पत्नी के अभी हाल ही बीमार हो जाने को लेकर थी। उनकी पत्नी के आधे चेहरे पर लकवा हो गया था, जो उपचार के बाद अब काफी हद तक ठीक है। वे कह रहे थे कि आजकल महिलाओं में व्रत-उपवास करने की क्षमता पहले की तुलना में काफी कम हो गई है, फिर भी वे निर्जला उपवास करने से बाज नहीं आतीं। गांवों में तो महिलाएं आम तौर पर दोपहर दो बजे से पहले खाना नहीं खातीं। इस तरह खाली पेट रहने से होने वाली कई बीमारियां उन्हें घेर लेती हैं।
मित्र ने गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस का रेफरेंस देकर कहा -
नारी सुभाव सत्य कवि कहहिं। अवगुण आठ सदा उर रहहिं।
साहस अनृत चपलता माया। भय अविवेक असौच अदाया।
मैंने कहा कि तुलसी बाबा ने आदर्श नारी में ये अवगुण नहीं गिनाए हैं। काल के मुख में जाने को आतुर खुद अविवेक में अंधे रावण ने मंदोदरी को संबोधित करते हुए उपरोक्त पंक्तयां कही थीं। फिर कोई चाहे कुछ भी तर्क थे, गोस्वामी जी की इन पंक्तियों में कही गई नारी की भूमिका से कोई इनकार नहीं कर सकता __
नारी विवश नर सकल गोसाईं। नाचहिं नट मर्कट की नाईं।।
और तुलसी बाबा ने ही सर्वशक्तिमान ईश्वर के हाथों में मनुष्य की स्थिति का वर्णन करते समय भी कुछ ऐसे ही शब्दों का प्रयोग किया है -
सबहिं नचावत राम गोसाईं। नाचत नट मर्कट की नाईं।
इसलिए नारी के प्रति इस तरह के भाव लाना कदापि उचित नहीं है। मेरे काफी समझाने के बाद वे मेरे तर्क से सहमत हुए। यहां मेरे यह उद्धृत करने का उद्देश्य महज इतना ही है कि अपनी सहगामिनी के प्रति हम मनुष्यों (तथाकथित बुद्धिजीवियों) के मन में सदैव कुछ न कुछ चलता ही रहता है, जिसकी परिणति कभी इस तरह की अभिनव परिभाषाओं से हो जाया करती है।
इससे यदि किसी की भावनाएं आहत हुई हों तो किसी अज्ञात कवि की इन पंक्तियों के माध्यम से क्षमा चाहता हूं -
इस दुनिया में अपना क्या है, सब कुछ लिया उधार।
सारा लोहा उन लोगों का, अपनी केवल धार।।

2 comments:

एकलव्य said...

दशहरा विजयत्सव पर्व की हार्दिक शुभकामना

Suresh said...

Navratra and Vijayadashami ki haardik mangalkamnaae.

Suresh Pandit
Jaipur