Thursday, September 17, 2009

सैशे में बिकता सुख


राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कहा करते थे कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है और उनके तथाकथित अनुयायियों ने गांधी दर्शन को दरकिनार कर दिया। सत्तासीन नेताओं ने गांवों को उनके हाल पर छोड़ दिया। सुविधाओं के अभाव में गांव लाचार लोगों की शरणस्थली बनकर रह गए और न जाने क्या-क्या खोने की कीमत पर आज भी शहरों की ओर पलायन थमा नहीं है।
कवि गाते-गाते अघाते नहीं रहे कि भारतमाता ग्रामवासिनी, लेकिन कविहृदय व्यक्ति के सत्ता के शीर्षस्थ पद पर पहुंचने के बावजूद गांवों की तकदीर नहीं बदली। गांव में रहने वालों की न जाने कितनी लालसाएं धन के अभाव में दम तोड़ती रहीं।
बदलते समय के साथ राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने गांधी के गांवों की ओर रुख किया है और आज सैशे की शक्ल में गांव और गरीबों की जेब के हिसाब से सारे उत्पाद उपलब्ध कराए जा रहे हैं। जी हां, नीम-बबूल की दातुन करने वाले बच्चे कॉलगेट पाउडर और डाबर दंतमंजन से दांत साफ कर रहे हैं। झोपड़ी में रहने वाली रमणी भी एक रुपए के शैंपू से अपने बालों को रेशमी लुक देती है। अब वह कपड़े धोने वाले पाउडर से बालों की गंदगी मिटाने को मजबूर नहीं है। पीयर्स जैसा अभिजात्य वर्ग का साबुन छोटी साइज में आने के कारण सर्वसुलभ हो गया है।
राम करे ऐसा न हो
महंगाई ने सुरसा की तरह मुंह फाड़ना शुरू कर दिया है और हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह कोई हनुमानजी तो हैं नहीं कि अपनी बुद्धिमत्ता से सुरसा से पार पा जाएं। आज की तारीख में आम आदमी का जीना मुश्किल हो रहा है। आटा-दाल-आलू-सब्जियों के भाव आसमान छू रहे हैं। टिफिन में रोटियां कम हो रही हैं, दाल पतली हो रही है, सब्जी की गिरती क्वालिटी का तो कहना ही क्या? अभी पिछले दिनों मीडिया में खबर आई कि मध्य प्रदेश में पाउच में दाल बिक रहा है। महंगाई की रफ्तार यही बनी रही तो वह दिन दूर नहीं जब आटा-चावल भी पाउच में मिले। ईश्वर से यही प्रार्थना है कि ऐसा दिन कभी न आए और आम आदमी को पेट भरने में कोई मुसीबत नहीं आए।

2 comments:

rakesh ravi said...

sahi kha hai aapne ki gaon laacha logon ko jamghat ban chuka hai. iske apwad ho sakte hain magar baat moooltah sahi hai. kaaran anek hain,
main samjh nahi saka ki sachets me bikti khushiyan gaon ke liye achchi ya buri kabar hai.

Suresh said...

Very Good.

Suresh Pandit