Friday, September 25, 2009

पत्नी न चाहे तो...


अभी शçक्त की आराधना का पर्व नवरात्र चल रहा है। सच है, शçक्त के बिना व्यçक्तत्व की कल्पना बेमानी है। शçक्त - वैचारिक, शारीरिक, बौद्धिक, सामाजिक, राजनीतिक हर रूप में जरूरी है। इस शçक्त की पहली इकाई पत्नी है, जिसके मिलने के बाद ही व्यçक्त पूर्ण हो पाता है। व्यçक्त की परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व के प्रति जो भी जिमेदारियां हों, लेकिन एक पति की सबसे बड़ी जिमेदारी पत्नी के अरमानों को पूरा करना ही होता है। ऐसा मैं नहीं कह रहा, बल्कि महान लोगों का भी यही कथन है। मैं तो महज -महाजनो गतो स पन्थाज् -का अनुपालन करते हुए इसकी पुनरावृçत्त कर रहा हूं। सच है, यदि पति के व्यवहार से पत्नी संतुष्ट नहीं हो तो तिल का ताड़ बनाकर आदमी का जीना मुश्किल कर सकती है। बाद में बच्चों का साथ भी यदि मां को मिल जाए तो पति के लिए तो इहलोक और परलोक दोनों ही बिगड़ जाते हैं।
यह तो पृष्ठभूमि थी। भागीरथी सेवा प्रन्यास और अन्य सहयोगी संस्थाओं की ओर से जयपुर में गुरुवार को आयोजित एक कार्यक्रम में मुयमंत्री अशोक गहलोत ने यात पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा की पत्नी को क्वकस्तूरबा गांधी सेवा पुरस्कारं प्रदान किया। इस अवसर पर विमला बहुगुणा ने अपने संबोधन में महात्मा गांधी की शिष्या सरला बहन के साथ पहाड़ों में किए गए समाज सुधार के कामों से लोगों को अवगत कराया।
प्रन्यास के अध्यक्ष पंचशील जैन ने बताया कि यह पुरस्कार पति के साथ कंधा से कंधा मिलाकर चलने वाली विभूति को दिया जाता है। इसमें कोई शक नहीं कि मोहनदास करमचंद गांधी की पत्नी कस्तूरबा गांधी ने यदि उनका हर कदम पर साथ नहीं दिया होता, तो शायद वे महात्मा गांधी, राष्ट्रपिता और बापू नहीं बन पाते। ऐसी किस्मत विरले लोगों को ही मिल पाती है और फिर वे अपने जीवन में यथेष्ट की प्राçप्त कर पूर्ण संतुष्ट होकर जीते हैं और कई मामलों में मील के पत्थर भी साबित होते हैं। प्रन्यास ने पिछले वर्ष प्रथम कस्तूरबा गांधी पुरस्कार प्रसिद्ध समाजसेवी बाबा आटे की पत्नी साधना ताई को उनके आश्रम में जाकर दिया था।
निष्काम कर्मयोगी का समान


कार्यक्रम में दो दर्जन से अधिक संस्थाओं के संस्थापक, महात्मा गांधी की नीतियों को आत्मसात करने वाले निष्काम कर्मयोगी मोहनभाई को 90 वर्ष पूरे कर दसवें दशक में प्रवेश पर समानित किया गया। 91 वर्ष की आयु में भी मोहनभाई की सक्रियता युवाओं का मार्ग प्रशस्त करती है। जब वे माइक पर आए तो उनकी उपस्थिति तथा वक्तृत्व को पूरा सभागार अनुभूत कर रहा था। इतनी उपलçब्धयों के बावजूद इतनी सरलता-सहजता से परिपूर्ण व्यçक्तत्व जिसके बारे में बताने के लिए शब्द नहीं मिलें। ईश्वर से प्रार्थना कि ऐसी विभूति को अच्छे स्वास्थ्य के साथ लंबी आयु प्रदान करे जिससे भावी पीढ़ी उनका मार्गदर्शन ले सके।
(तकनीकी कारणों से हुई अशुद्धियों के लिए खेद है)

3 comments:

प्रवीण जाखड़ said...

विमला बहुगुणा जी को शुभकामनाएं और आपको अच्छे लेखन के लिए बधाई।

Suresh said...

Many Many thanks.

Suresh Pandit

अर्शिया said...

ऐसे प्रयासों की जितनी प्रशंसा की जाए कम है।
दुर्गा पूजा एवं दशहरा की हार्दिक शुभकामनाएँ।
( Treasurer-S. T. )