Friday, September 18, 2009

...ये कहां आ गए हम

... तो आज अमिताभ बच्चन की फिल्म -सिलसिला-से अपनी बातचीत का सिलसिला शुरू करता हूं। सुबह बिहार के किशनगंज से एक डॉक्टर मित्र का फोन आया। वे बिहार में विधानसभा की 18 सीटों पर हुए उपचुनाव में सत्तारूढ़ जनता दल यू और भाजपा की करारी शिकस्त से दुखी थे। उपचुनाव में जनता दल यू को तीन और भाजपा को मात्र दो सीटों पर संतोष करना पड़ा। पटरी से उतरे लालू यादव की लालटेन अचानक चमक उठी और राजद ने सबसे अधिक छह सीटों पर जीत हासिल की। लालू का गमछा पकड़कर रामविलास पासवान भी वैतरणी पार उतर गए और उनके प्रत्याशियों ने तीन सीटें झटक लीं। आमजन को महंगाई के मझधार में छोड़कर मितव्ययिता का राग अलापने वाली कांग्रेस के उम्मीदवार भी दो सीटें निकाल ले गए।
मेरा मकसद यहां उपचुनाव के परिणाम का विश्लेषण नहीं करना नहीं, बल्कि अपने मित्र की पीड़ा पर मरहम लगाना भर है। यह पक्की बात है कि मेरे मित्र किसी राजनीतिक दल की विचारधारा से ताल्लुकात नहीं रखते, लेकिन धरा से जुड़े होने के कारण धरातल पर होने वाले काम उनकी नजरों से नहीं बच पाते। कभी आम सुविधाएं नहीं मिलने से त्रस्त थे तो आज चिकनी सड़क पर उनकी कार भी बिना धचके दिए चलती है। आज से पांच साल पहले यदि कोई बिहार गया हो तो उसे अहसास होगा कि लालू-राबड़ी के पंद्रह साल के शासनकाल में बिहार किस हद तक पिछड़ गया था।
मेरे मित्र का तर्क था कि नीतीश कुमार ने सत्ता संभालने के बाद बिहार के कायाकल्प का प्रयास अवश्य शुरू किया है और आज सड़कों से लेकर अस्पतालों तक के सुधरे हुए हालात इसका बयान करते हैं। अन्य क्षेत्रों में भी प्रगति की रफ्तार देखी जा सकती है। मित्र की चिंता इस बात की है यदि हालात ऐसे ही रहे और लोग विकास को दरकिनार कर यदि जात-पांत जैसे मुद्दों पर मतदान करते रहे तो बिहार एक बार फिर पिछड़ेपन की गर्त में चला जाएगा। हालात बदलने के साथ विचारों में भी नयापन आना चाहिए और हमारे सोचने के स्तर में भी विकास अपेक्षित है। अन्यथा हम यही कहने को विवश होंगे.....ये कहां आ गए हम।
मैंने मित्र को दिलासा दिया कि संभव है कि नीतीश और सुशील मोदी भारतीय क्रिकेट टीम की तरह लीग मैचों में करारी शिकस्त के बाद फाइनल में शानदार वापसी करें। हालांकि उपचुनाव के परिणामों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि जनता दल यू ने रमई राम और श्याम रजक को अपनी गोद में बिठा लिया, जिनकी करतूत का फैसला जनता ने कर दिया और जनता दल यू को सीट के साथ साख व प्रतिष्ठा भी गंवानी पड़ी।
किसी विचारधारा का समर्थक होना एक बात है और किसी एक के खिलाफ बाकी सभी का एकजुट हो जाना दूसरी बात। हालांकि राजनीति में किसका गठजोड़ किसके साथ कितनी अवधि के लिए रहेगा, इसकी भविष्यवाणी करना आसान नहीं है। अंत में उधार की चार पंक्तियों के साथ अपनी बात खत्म करूंगा, शायद मेरे मित्र को कुछ तसल्ली मिले-
राजनीति में मित्र कठिन है, खुद से परे चरित्र कठिन है।
किसी जुआरी के अड्डे पर वातावरण पवित्र कठिन है।।

2 comments:

Udan Tashtari said...

राजनीति में मित्र कठिन है, खुद से परे चरित्र कठिन है।
किसी जुआरी के अड्डे पर वातावरण पवित्र कठिन है।।

-ये बात सही लगी.

Suresh said...

Aap ne thik he leekha hai.
राजनीति में मित्र कठिन है, खुद से परे चरित्र कठिन है।
किसी जुआरी के अड्डे पर वातावरण पवित्र कठिन है।।

Thanks

Suresh Pandit