Friday, September 4, 2009

भुट्टे की भ्रूणहत्या


दसवीं पास करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए गांव छोड़कर शहर में आया तो मक्के का लावा (जिसे अब पॉप कॉर्न कहा जाने लगा है) ठेले पर बिकता देख अक्सर अचरज होता था कि यह भी कोई बिकने की चीज है। गांवों में तो इसे सबसे अधिक हेय समझा जाता था। हालात ऐसे थे कि मजदूर भी मजदूरी में मक्का लेना पसंद नहीं करते थे। बदलते हुए समय के साथ बहुत कुछ बदला। अब कभी काफी हिम्मत जुटाकर किसी मल्टीप्लेक्स में फिल्म देखने जाता हूं तो बच्चे के कहने पर पॉप कॉर्न खरीदना पड़ता है। पांच रुपए में गिनती के दाने मिलते हैं।
खैर, यह तो समय-समय की बात है। अभी चार-पांच दिन पहले पत्नी और बच्चे के साथ बिग बाजार गया। वहां पॉलीथिन में पैक भुट्टे देखकर बरबस ही निगाह उस ओर चली गई। देखा तो पचीस रुपए में दो भुट्टे थे और उस पर अंग्रेजी में अमेरिकन पॉप कॉर्न की परची चिपकी हुई थी। इंग्लिश स्कूल में पढ़ने वाले गांव की संस्कृति से अनजान बच्चा मचल गया तो मजबूरन दो भुट्टों का एक पैकेट लेना ही पड़ा। मजबूरी यह भी थी कि एक भुट्टा खरीदने की छूट नहीं थी। उसके बगल में ही मैंने एक और उससे भी छोटा पैकेट देखा, जिसमें भुट्टा खाने के बाद जो अवशिष्ट (जिसे हम गांव की भाषा में नेढ़ा कहते थे) जैसा कुछ था काफी पतला। सेल्समैन से पूछा तो उसने बताया कि यह भुट्टे में दाने आने से पहले की चीज है इसकी सब्जी बनती है। उसकी कीमत भी दो सौ रुपए प्रतिकिलो से अधिक थी। अपनी जेब और जरूरत से बाहर की चीज थी, सो मैंने खिसकना ही उचित समझा।
अब इसके दूसरे पहलू पर गौर करें तो कुछ बातें ऐसी हैं, जो कचोटती हैं। इस साल मानसून की बेरुखी ने विश्वभर के नीति नियंताओं की पेशानी पर पसीना ला दिया है। हर ओर यहीं चिंता है कि मंदी के इस दौर में बढ़ती महंगाई और अनाज के घटते उत्पादन के कारण लोगों का पेट भरना भी कहीं मुश्किल न हो जाए। ऐसे में मोटे अनाज से भी जरूरतमंदों का पेट भर जाए तो बड़ी बात है। इस तरह के हालात में हम यह सोचने को बाध्य हैं कि महज कुछ लोगों के मुंह के स्वाद के लिए इन तथाकथित अमेरिकन भुट्टे की भ्रूणहत्या न की जाए, तो इनसे होने वाला मक्का काफी लोगों के पेट भर सकता है।

7 comments:

Udan Tashtari said...

विचारणीय..भुट्टा तो अब डेलिकेसी हो लिया है.

Mrs. Asha Joglekar said...

baby corn to cheeni japaniyon kee den hai. ta ye bhroon hatya bhee unake sar.

mehek said...

butte ke bhi din badal gaye hai,gaon se shahar aakar wo bhi modern ho gaya hai,big bazar mein bikta hai,bahut achhi post rahi.

Suresh said...

Butte ki kahanee bahut hee rochak hai.Gaon se shahar me aakar badla hai butte ka rang.butte ke bhi din badal gaye hai.

Thanks
Suresh Pandit
Email: biharsamajsangathan@gmail.com
www.biharsamajsangathan.org

Dipti said...

मुझे ऐसा लगता है कि बेबी कॉर्न और कॉर्न में कुछ अंतर हैं।

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

रोचक पोस्ट्!!!
शीर्षक आपने बडा चुन के रखा है!!

varsha said...

baby corn se mature corn tak ka ye safar sochne par majboor karta hai.