Sunday, August 2, 2020

राखी का त्योहार : भावनाओं को भुनाता बाजार

मई-जून की चिलचिलाती धूप की तपन को कभी रिमझिम कभी झमाझम से बुरी तरह धोकर संपूर्ण जीव जगत और वनस्पति को तृप्त-संतृप्त कर देने वाले सावन की पूर्णाहुति भाई-बहन के प्यार के पर्व रक्षाबंधन से होती है। चंद घंटों के बाद ही क्षितिज पर भगवान भास्कर की लालिमा के साथ यह पवित्र पर्व एक बार फिर दस्तक देने वाला है। दफ्तर से लौटा हूं और न जाने पिछले कितने वर्षों की यादें किसी फिल्म के फ्लैश बैक की तरह  दिमाग में धमाचौकड़ी मचाने लगी हैं।

बचपन के दिनों में राखी के त्योहार पर उत्साह-उमंग का एक अद्भुत माहौल हमारे मन में ही नहीं, वातावरण में भी व्याप जाता था। तब खाली जेब की मजबूरी और इस मौसम में खेती के कामों की अधिकता लोगों को बाजार जाने की इजाजत नहीं देती थी। बहनें गांव में साइकिल से फेरी लगाने वाले से ही राखी खरीदती थीं। राखी भी अति साधारण-रंग-बिरंगे स्पंज वाली। हां, कुछ राखियां दो-तीन मंजिली होती थीं और उनका आकार और ऊंचाई कुछ ज्यादा हो जाया करती थी। कुछेक राखियों में चमकीली पत्तियां भी लगी होती थीं, मगर सबके मूल में स्पंज ही होता था।

रक्षाबंधन के दिन हम सुबह-सुबह नहा-धोकर तैयार हो जाते और दीदी के साथ ही छोटी बहन हमारे ललाट पर रोली का चंदन लगाकर हमारी कलाई पर अपने स्नेह का धागा बांधतीं। इसके बाद पेड़ा खिलाकर हमारा मुंह मीठा करातीं। तब गांवों में अक्सर सभी लोग गाय-भैंस पालते थे। ऐसे में पेड़ा बड़ी आसानी से घर पर ही बना लिया जाता था। तब बहन का मतलब केवल सगी बहनों से ही नहीं हुआ करता था। दीदी की सहेलियों और दोस्तों की बहनों के लिए भी हमारा स्थान उनके सगे भाई से कम नहीं होता था। सो कलाई से कोहनी तक  हमारा हाथ रंग-बिरंगी राखियों से सज जाता था और आस-पड़ोस में घूम-घूम कर एक दूसरे को अपनी राखियां दिखाया करते थे। 

समय बीतने के साथ बहुत कुछ बदल गया। पहले पढ़ाई और फिर रोजी रोजगार के लिए घर छोड़ना पड़ा और फिर रक्षाबंधन से कई दिनों पहले से आंखें डाकिये की आहट सुनने को बेताब रहती हैं। कई ज्ञात-अज्ञात कारणों से डाक विभाग के हिस्से का बहुत सारा काम कूरियर कंपनियों ने हथिया लिया है, सो कई बार राखियां कूरियर से भी आती हैं। अब तो बाजार में अनगिनत डिजाइन की राखियां नजर आती हैं। मिकी माउस, डोरेमान सरीखे कार्टून कैरेक्टर से होता हुआ राखियों का सफर अब फाइटर जेट विमान राफेल तक पहुंच चुका है। 
आज जब कोरोनावायरस की वैश्विक महामारी की वजह से हम दहशत के साए में जीने को विवश हैं, ऐसे में रक्षाबंधन का त्योहार भी इससे अछूता नहीं रह पाया है। वहीं ऑनलाइन मार्केटिंग कंपनियों ने इस आपदा को अवसर में तब्दील करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। 
पीतल जैसी चमकीली तारों से बुनी करीब चार इंच परिधि वाली खिलौना नुमा टोकरी में एक सिंपल राखी, अक्षत के आठ-दस दाने, नाममात्र की रोली और एक रुपया में चार के हिसाब से मिलने वाली सुनहरे कागज में लिपटी कुल जमा पंद्रह टॉफियां...और  कीमत ढाई सौ में एक रुपया कम...मात्र दो सौ उनचास रुपये। इस व्यापार को क्या कहा जाए। भाई के लिए बहन का स्नेह अनमोल है, चंद रुपयों में उसका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता, लेकिन भाई तक अपनी स्नेहिल भावनाओं को भेजने के लिए इतनी अधिक कीमत वसूलने को कदापि उचित नहीं ठहराया जा सकता।



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