Thursday, November 4, 2010

लीपने से विहंस उठता था आंगन


अपने देश में भले ही बड़ी-बड़ी आवासीय अट्टालिकाएं और व्यावसायिक कॉम्पलेक्स बन चुके हैं, इसके बावजूद सचाई यह है कि भारत की आत्मा आज भी गांवों में ही बसती है। बात दीगर है कि सबको पेट भरने वाले अन्नदाता किसान ही दो वक्त की रोटी के लिए मोहताज हैं। खैर, अभी त्योहार का माहौल है और ऐसी गंभीर बातें करने का मेरा भी इरादा नहीं है, लेकिन इसे नकारा भी नहीं जा सकता।
मैं दिवाली की पूर्व संध्या पर आपसे अपनी पुरानी यादें शेयर करने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूं। श्रीमतीजी कई दिनों से यथाशक्ति घर की साफ-सफाई में लगी हैं और मन ही मन हाथ न बंटाने के लिए मुझे कोसने से भी बाज नहीं आतीं।
गुलाबी नगर में लोगों ने एक-डेढ़ महीने पहले से घरों में रंग-रोगन का काम शुरू करवा दिया था और अब उन पर चीन से आई सस्ती बिजली की लड़ियां जगमगा रही हैं। इन घरों की आभा आंखों को भाती जरूर है, लेकिन उस उल्लास का उत्स कहीं नहीं दिखता। गांवों में ऐसे पर्व-त्योहारों पर घर-आंगन को गोबर से लीपा जाता है, तो उसे देखकर लगता है जैसे आंगन विहंस उठा हो। उसकी चमक और महक अतुलनीय होती है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के शब्दों में कहूं तो---चमन में फूल खिलते हैं, वन में हंसते हैं।--तो मुझे भी कुछ ऐसी ही अनुभूति इस महानगर में होती है। लगता है बहुत कुछ पीछे छूट गया है, जिसे चाहकर भी साथ में सहेजकर नहीं रखा जा सकता। हां, यादें हैं तो सांसों के साथ अंतिम समय तक बनी रहेंगी।
सभी ब्लॉगर साथियों को इन शब्दों में ज्योतिपर्व दीपावली की मंगलकामनाएं----------

फैले यश का उजास
पूरे हों सकल आस
इस बार की दिवाली
आपके लिए हो खास....
आप सब पर मां महालक्ष्मी की कृपा बनी रहे।

1 comment:

अशोक बजाज said...

'असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय ' यानी कि असत्य की ओर नहीं सत्‍य की ओर, अंधकार नहीं प्रकाश की ओर, मृत्यु नहीं अमृतत्व की ओर बढ़ो ।

दीप-पर्व की आपको ढेर सारी बधाइयाँ एवं शुभकामनाएं ! आपका - अशोक बजाज रायपुर