Thursday, June 4, 2009

अपहरण का ग्रहण - कब छूटेगा दाग


बस और ट्रेन के सफर में करीब 38 घंटे बिताने के कारण काफी थकान हो गई थी, सो बिस्तर पर जाते ही गहरी नींद की आगोश में समा गया। सुबह करीब छह बजे नींद खुली तो सामने रखे हिंदुस्तान अखबार के मुख्य शीर्षक -बेटा तो नहीं, लाश मिली- ने विचलित कर दिया। समाचार के अनुसार दो दिन पहले शहर के ही 14 वर्ष को दो किशोरों ने कंकड़बाग की पीसी कॉलोनी से एक व्यवसायी के आठ वर्षीय पुत्र सत्यम का अपहरण कर लिया और बाद में उसकी हत्या कर दी। इसके बाद अपहर्ताओं ने बच्चे के पिता से पचास लाख की फिरौती मांगी। पुलिस ने बच्चे का शव बरामद कर अपहरण और हत्या के आरोपी अविनाश और मो. खुर्शीद उर्फ मोनू को गिरफ्तार कर लिया।
यह दीगर बात है कि लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के करीब पंद्रह वर्ष के शासनकाल में अपहरण उद्योग अपने चरम पर था, लेकिन नीतीश राज में भी यह सिलसिला थमा नहीं है। गाहे-बेगाहे ऐसी खबरें आती ही रहती हैं। सरकार यदि दृढ़ इच्छाशक्ति दिखाए और सुशासन देने के अपने वादे पर कायम रहे तो अपहरण के दाग को भी धोया जा सकता है। अभी हाल ही हुए लोकसभा चुनाव में बिहार के मतदाताओं ने बाहुबलियों और उनके परिजनों को हराकर अपने दामन से बहुत बड़ा कलंक धो दिया है। जनता भी जागरूक रहे तो अपराध और अपराधियों पर अंकुश लगाना मुश्किल नहीं होगा।


यह कैसी प्रतिभा
बिहार में पिछले डेढ़ दशक के लालू-राबड़ी राज में अपहरण उद्योग जिस तरह चरम पर था, उससे प्रेरित होकर बिहार से ही जुड़े प्रकाश झा ने -अपहरण-फिल्म बनाई थी, जो देशभर में चरचा का विषय बनी थी। पुलिस पूछताछ में बालक सत्यम के अपहरण और हत्या के आरोपियों ने कबूल किया कि उन्होंने कई बार -अपहरण- फिल्म देखी और इसके एक-एक फ्रेम का गहन अध्ययन किया। दरअसल दोनों आरोपी फटाफट अकूत धन-संपत्ति हासिल कर रईसजादों की तरह जीना चाहते थे। ऐसे में यह जानकर अफसोस होता है कि एक फिल्म निर्माता निर्देशक बिहार की तथाकथित यथास्थिति को बखूबी रूपहले परदे पर उतारकर नाम और दाम कमाना चाहता है तो उससे प्रेरणा लेने वाले बिहार के ही किशोर किसी मासूम की जान लेकर अपना खुद का वर्तमान और भविष्य दोनों बिगाड़ लेते हैं। ऐसे में जरूरी है कि बिहार को बीमारू राज्य की श्रेणी से निकालने और बदहाली से मुक्ति दिलाने के लिए राजनीति से ऊपर उठकर उद्योग-धंधों का जाल बिछाया जाए। लोगों को काम मिलेगा तो वे संभवतया अपराध के दलदल में नहीं फंसेंगे और फिर इस तरह किसी का लाल असमय उससे नहीं छिनेगा।

3 comments:

अजय कुमार झा said...

दरअसल इस अपहरण उद्योग के बढ़ते जाने का सबसे बड़ा कारण है...इसके मुजरिमों का बच निकलना...फिर प्रशाशन और पुलिस पर से अविश्वास के कारण लोग खुद ही फिरौती देकर अपने की जान बचाना ठीक समझते हैं....सामयिक एवं सटीक लिखा आपने....

Mired Mirage said...

खैर रोजगार अपनी जगह ठीक है परन्तु जब जबरदस्त वर्षीय यह सब करने लगें तो रोजगार मिलने से कुछ नहीं होगा। कहीं कुछ बहुत गलत हो गया है जो बच्चे बच्चों को मारने लगे हैं।
घुघूती बासूती

Suresh said...

Manglamji aapne satik leekha hai.
Aajkal pulice aur prasashan par
viswash nahi hai.

Thanking you

Suresh Pandit
email:biharsamajsangathan@gmail.com
www.biharsamajsangathan.org