Monday, February 25, 2008

जुगाड़ टैक्नोलॉजीः अपना हाथ जगन्नाथ

अभी कुछ दिन पहले ट्रेन में करीब डेढ़ हजार किलोमीटर यात्रा करने का सुयोग मिला। सहयात्री सरल औऱ मधुर स्वभाव के थे, इसलिए यात्रा मंगलमयी रही। हालांकि भारतीय ट्रेन में यात्रा के दौरान हमेशा सुखद अनुभव नहीं होते। हमारे स्वनामधन्य रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव अपनी प्रबंधन कला के लिए नाम कमाने के अभियान में जुटे हैं और एक रिकाडॅ बनाने की ओर अग्रसर हैं। मीडिया में ऐसी खबरें आ रही हैं कि लगातार चार साल तक उन्होंने अपने रेल बजट में किराया नहीं बढ़ाया और शायद पांचवीं बार भी वे ऐसा ही करेंगे।
अब पिछली गली से उन्होंने रेलयात्रियों से कितनी वसूली की है,इसका तो प्रमाण उपलब्ध है ही। रेलवे की लाखों एकड़ जमीन के व्यावसायिक उपयोग से होने वाली आमदनी हो या फिर उनसे पहले वाले रेल मंत्री नीतीश कुमार के दूरदरशितापूणॅ फैसलों की क्रियान्विति का सुफल लालू जी को मिल रहा हो, (हालांकि मैं न तो नीतीश कुमार का मुरीद हूं और न ही समथॅक, लेकिन यह मानने को विवश जरूर हूं कि लालूजी यदि प्रबंधन में इतने ही कुशल होते तो पंद्रह वषॅ के प्रत्यक्ष परोक्ष शासनकाल में बिहार की वह दुरदशा नहीं होती, जैसी हुई। )
खैर, यह तो रेल मंत्री का विशेषाधिकार है कि वे किस तरह रेलवे की आमदनी बढ़ाते हैं और किस तरह सब कुछ करने के बावजूद अपनी लोकप्रियता का डंका पीटते रहते हैं।
मैं जिस बात को लेकर मुखातिब होना चाहता था उससे शायद डिरेल हो गया हूं, क्षमा करेंगे। पिछले बजट में लालूजी ने ट्रेनों के शयनयान वाली बोगियों में बथॅ की संख्या 72 से 81 करने की घोषणा की थी। अब बोगियों की लंबाई तो बढ़नी नहीं थी सो नहीं बढ़ी, हां, उसी में बथॅ की संख्या बढ़ा दी गई। मेरा ऐसी ट्रेन में यात्रा करने का यह पहला अनुभव था, सो डिब्बे में जगह संकुचित होने के कारण परेशानी तो झेलनी ही पड़ी। इसके अलावा खिड़की के शीशे भी गायब थे। हाड़ कंपाती सरदी में यात्रा का सारा मजा काफूर हो जाता, लेकिन भला हो मुझसे पहले यात्रा करने वालों का, जिन्होंने शटर टाइप खिड़कियों के छिद्रों को अखबार के टुकड़ों से बखूबी भरकर हवा के प्रवेश पर रोक लगा दी थी। शताब्दी और राजधानी में यात्रा करने वालों के मनोरंजन का ध्यान ही लालूजी रख पाते हैं, अब जनता क्लास क्या करे। वह तो अपने स्तर पर ही मनोरंजन के साधन जुटाएगी। सो एक बैंक कमॅचारी सहयात्री ने फिलिप्स की रेडियो पर फरमाइशी गीतों के कायॅक्रम सुनवाए तो बाकी सहयात्रियों के एफएम वाले मोबाइल सेट भी अपना दायित्व बखूबी निभा रहे थे। ये है अपनी आम जनता की जुगाड़ टैक्नोलॉजी, जो कभी किसी का इंतजार नहीं करती, जिसके लिए अपना हाथ ही जगन्नाथ हुआ करता है।
जहां तक मैं मानता हूं,आरक्षित श्रेणी में यात्रा करने वाले रेल किराये में प्रति सौ-दो सौ किलोमीटर के हिसाब से दो-पांच रुपए की बढ़ोतरी को कदापि बुरा नहीं मानेंगे, यदि उन्हें टिकट आरक्षित करवा लेने के बाद यात्रा के दौरान किसी दुखद अनुभव का सामना नहीं करना पड़े। पैंट्री कार में अच्छा खाना मिले, डिब्बे के अंदर स्वच्छता के साथ ही शौचालयों की नियमित साफ-सफाई हो, बीच रास्ते चलते हुए शौचालयों के नलों की टोंटी न सूख जाएं। बिना किसी लूट-मार के, सुरक्षा के लिए तैनात तथाकथित पुलिस के जवानों की ज्यादतियों के बिना यात्री सुरक्षित अपने गंतव्य पर पहुंच जाएं, टीटी बिना बात भोले-भाले ग्रामीण अंचल के यात्रियों को टिकट होने के बावजूद परेशान न करें। शयनयान श्रेणी की प्रतीक्षा सूची में यात्रियों की संख्या सुनिश्चित की जाए और यदि फिर भी यह सूची लंबी होती है तो प्रतीक्षा सूची के यात्रियों के लिए अलग से बोगी लगाने की व्यवस्था की जाए।
ये तो मेरे अरमान हैं, जिसे आपलोगों की समानानुभूति (empathy) भले ही मिल जाए, लालू जी को तो जो करना था, वे कर चुके, जिससे मंगलवार सुबह हमारा सामना होगा। देखना है, लालूजी क्या-क्या लाते हैं हमारे लिए अपनी छुक-छुक गाड़ी में।

3 comments:

राजीव जैन Rajeev Jain said...

सही कहा आपने
लालू तो नीतिश की पूंजी खा रहे हैं, उनके पांच साल के काम पर ये चार साल तो आराम से निकाल गए, किस्‍मत अच्‍छी रही टेन भी कम डीरेल हुई और लालूजी भी।

suresh said...

Dear sir

Aapne sahi likha, Lalooji ke train se public ko pareshani badegi.

Thanks

Suresh pandit

पद्मनाभ मिश्र said...

मै फिर उपलब्ध हूँ अपने बकवास के साथ एक बार जरूर दर्शन देवेँ. दर्शन देने के लिए यहाँ क्लिक करेँ .