Tuesday, December 18, 2007

रजनीगंधा में कुछ गीत गुनगुनाइए

मौसम के तेवर दिनोंदिन तीखे होते जा रहे हैं और सूरज की तपिश को तो मानों बरफीली हवाओं ने ढंक सा लिया है। सरकारी संस्था नगर निगम ने काव्यप्रेमियों के लिए खुले आसमान के नीचे सामियाना लगाकर कवि सम्मेलन आयोजित करने का दायित्व निभाया तो गुलाबी नगर की एक साहित्यिक संस्था रसकलश के मानद सचिव ख्यात हास्य कवि सम्पत सरल ने जवाहर कला केंद्र के साथ मिलकर रंगायन सभागार में काव्यसंध्या----रजनीगंधा---सजाई। इस रजनीगंधा की सुगंध बिना किसी व्यापक प्रचार-प्रसार के इस कदर फैली कि सभागार की कुरसियां तो भर ही गईं, काव्यरसिक श्रोता फशॅ पर भी बैठकर इस सुहानी शाम का आनंद लने से नहीं चूके। इस काव्यसंध्या के सितारे थे उदयप्रताप सिंह और दिनेश रघुवंशी।
फरीदाबाद से आए दिनेश रघुवंशी ने इन पंक्तियों में दुनियादारी की सीख दी---
साथ चलने का इरादा जब जवां हो जाएगा
आदमी मिल आदमी से कारवां हो जाएगा
तू किसी के पांव के नीचे तो रख थोड़ी जमीं
तू भी नजरों में किसी के आसमां हो जाएगा
धूल जैसे कदम से मिलती है
जिंदगी रोज हमसे मिलती है
यह बताया गहन अंधेरों ने
रोशनी अपने दम से मिलती है

मैनपुरी से शिकोहाबाद औऱ फिर दिल्ली होते हुए आए वरिष्ठ कवि उदयप्रताप सिंह ने
अपनी ढलती उम्र के अनुभवों को इन शब्दों में बयां किया--
पुरानी किश्ती को पार लेकर फकत हमारा हुनर गया है
नए खिवैये कहीं न समझें नदी का पानी उतर गया है
आज के जमाने में राम के नाम पर हो रही राजनीति पर उन्होंने फरमाया---
जिसकी धरती चांद तारे आसमां सोचो जरा
उसका मंदिर तुम बनाओगे अमां सोचो जरा
न तेरा है न मेरा है घर हिंदुस्तान सबका है
नहीं समझी गई यह बात तो नुकसान सबका है
माहौल को हल्का करने के लिए या यूं कहें कि मॉडनॅ लाइफ स्टाइल और दुनियादारी को उन्होंने छंद में यूं उतारा---
मोबाइलों के दौर के आशिक को क्या पता
रखते थे कैसे खत में कलेजा निकाल के
सब फैसले होते नहीं सिक्के उछाल के
ये दिल के मामले हैं जरा देखभाल के
रोएगी नई रोशनी ये कहके एक दिन
अच्छे थे वही लोग पुराने ख्याल के
आंधी उड़ा के ले गई ये और बात है
कहने को हम भी पत्ते थे मजबूत डाल के
तुमसे मिला है प्यार सभी रत्न मिल गए
अब क्या करेंगे और समंदर खंगाल के
सचाई और ईमानदारी से जीने वालों का इस जमाने में क्या हश्र होता है, इसे कवि उदयप्रताप सिंह ने कुछ यूं बयां किया
इस दौर में कोई न जुबां खोल रहा है
तुझको ही क्या पड़ी है कि सच बोल रहा है
बेशक हजार बार लुटा पर बिका नहीं
कोहिनूर जहां भी रहा अनमोल रहा है
तिनके की चटाई को कोई खौफ न खतरा
हर पांव सिंहासन का मगर डोल रहा है
शोहरत के मदरसे का गणित हमसे पूछिए
जितनी है पोल उतना ही बस ढोल रहा है
कुछ पंक्तियां और भी किसी भी हाल में हौसला और उत्साह से लबरेज रखने के लिए..................
एक मेरा दोस्त मुझसे फासला रखने लगा
रुतबा पाकर पिछला रिश्ता क्यों भला रखने लगा
जब से पतवारों ने मेरी नाव को धोखा दिया
मैं भंवर में तैरने का हौसला रखने लगा
मौत का अंदेशा उसके दिल से क्या जाता रहा
वो परिंदा बिजलियों में घोंसला रखने लगा
मेरी इन नाकामियों की कामयाबी देखिए
मेरा बेटा दुनियादारी की कला रखने लगा
और फूलों और कलियों के बहाने कवि ने दुनिया और दुनियादारी का कच्चा चिट्ठा खोल दिया---
अगह बहारें पतझड़ जैसा रूप बना उपवन में आएं
माली तुम्हीं फैसला कर दो हम किसको दोषी ठहराएं
वातावरण आज उपवन का कड़वाहट से भरा हुआ
कलियां हैं भयभीत फूल से फूल शूल से डरा हुआ है
धूप रोशनी अगर चमन में ऊपर ही ऊपर बंट जाएं
माली तुम्हीं फैसला....
सुनते हैं पहले उपवन में हर ऋतु में बहार गाती थी
कलियों का तो कहना क्या है मिट्टी से खुशबू आती थी
कांटे उपवन के रखवाले अबसे नहीं जमाने से हैं
लेकिन उनके मुंह पर ताले अब से नहीं जमाने से हैं
ये मुंहबंद उपेक्षित कांटे अपनी कथा कहें तो किस से
इसी प्रश्न को लेकर कांटे गर फूलों को चुभ जाएं
माली तुम्हीं फैसला...
और इस तरह संपन्न हुई यह काव्यसंध्या और काव्यरसिक श्रोताओं की तृप्ति का तो कहना ही कहना, हर चेहरा प्रफुल्लित था, धन्य समझ रहा था कि वह इस रजनी में रजनीगंधा का साक्षी बन पाया । आज के कवि सम्मेलनों में जब कविगण कविताई कम करते हैं और तालियों के लिए रिरियाते रहते हैं कि पं. नरेंद्र मिश्र को ----गिड़गिड़ाते तालियों के वास्ते शब्द के साधक भिखारी हो गए----। यहां तो आलम यह था कि निडिल ड्रॉप साइलेंस के बीच कवि के कंठ से शब्दों के फूटते ही तालियों की तुमुल गड़गड़ाहट से सभागार गूंज उठता था।
आचायॅ रामचंद्र शुक्ल के निबंध में कहीं पढ़ा था-चमन में फूल खिलते हैं वन में हंसते हैं--इसे मैं कुछ इस तरह से जोड़कर आपके सामने रखना चाहता हूं। बाग में पेड़ परचढ़कर पके आम तोड़कर उन्हें खाने में जो सुख मिलता है, कवियों की जुबानी उनकी कविताएं सुनने में वही आनंद मिलता है। बीबीसी की मेहरबानी से दिनकर, बच्चन जैसे कवियों को भी सुनने का मौका मिला, इससे मैं अपने धन्य समझता हूं। तो मैंने सोचा कि हर कोई आम तोड़े यह तो इतना संभव नहीं है, लेकिन अपने तोड़े हुए आम तो मैं आप सबकी थालियों में परोस ही सकता हूं, सो आपका आभारी हूं कि आपने अपना अमूल्य समय मेरे काव्यप्रेम का साझेदार बनने में व्यतीत किया। कविताएं कुछ अधूरी रह गईं है, कुछ अशुद्धियां भी रह गई होंगी, तो इस सबके लिए क्षमा चाहता हूं। फिर मिलते रहेंगे, यह वादा रहा आज का।

1 comment:

suresh said...

Hello sir

Very good, Just smile.

Regards

Suresh Pandit, Jaipur
Email: biharssangathan@yahoo.com