Monday, October 15, 2007

और अश्वथामा अमर हो गया

नाटक करना कभी मेरा शौक हुआ करता था, लेकिन पत्रकारिता के पेशे में आने के बाद गृहस्थी के बोझ तले कुछ इस कदर दब गया कि जिंदगी ही खुद नाटक बनकर रह गई है। हां, नाटक देखने का शौक अब भी कम नहीं हुआ है। शाम की नौकरी होने के कारण नाटक देखने का भी अवसर कम ही मिल पाता है, फिर भी यदा-कदा समय मिल जाता है, तो छोड़ता नहीं हूं। पिछले शनिवार यानी १३ अक्टूबर को जवाहर कला केंद्र में अश्वथामा जे. डी. ने विलियम शेक्सपियर की प्रख्यात कृति हैमलेट पर आधारित नाटक एक अकेला हैमलेट की सोलो प्रस्तुति दी। इसकी खासियत यह थी कि इसका लेखन, निरदेशन और अभिनय सब कुछ अकेले अश्वथामा का ही था। यह सब कुछ इतना प्रभावी था कि दरशक बिल्कुल निस्तब्ध होकर नाटक में खो से गए थे। नाटक के पात्र के अनुरूप पल-पल बदलती भाव-भंगिमा, स्वर का उतार-चढ़ाव देखते ही बनता था। संवाद और उनकी अदायगी इतनी उम्दा थी कि उन्हें शब्दों में नहीं बांधा जा सकता। आज के दौर में जब बिना किसी उददेश्य के फूहड़ फिल्में दरशकों को परोसी जा रही हैं, यह संवाद तो सुभाषित की तरह ही था कि नाटक समाज को आईना दिखाने का काम करता है ताकि वह अपनी कमियों को देखकर उन्हें दूर करने का प्रयास कर सके। यह तो एक बानगी भर है। सभी संवाद एक से बढ़कर एक थे। हैमलेट से एक अकेला हैमलेट तक की कथायात्रा जिस संजीदगी से प्रस्तुत की गई, वह उन फिल्म निरमाताओं के लिए भी एक सबक है जो करोड़ों रुपए खरचने के बाद भी न तो दरशकों को कोई संदेश दे पाते हैं और न ही उन्हें अपने कथानक से बांधकर रखने में ही सफल हो पाते हैं। नाटक के दौरान कभी सवा घंटे तक सभागार में नीरव निस्तब्धता और नाटक की समाप्ति पर तालियों की अनवरत गड़गड़ाहट से दरशकों ने कृतग्यता का जो परिचय दिया, वह भी काबिले तारीफ था। नाटक के समापन के बाद जब पात्र परिचय के क्रम में अश्वथामा दुबारा जब मंच पर आए तो दरशकों ने खड़े होकर तालियों की तुमुल गड़गड़ाहट से उनका अभिवादन किया। एक कलाकार को अभिभूत करने के लिए इससे बढ़कर कोई तोहफा नहीं हो सकता। भारतीय पौराणिक आख्यानों के अनुसार कुछ विशेष चरित्रों में अश्वथामा को अमर बताया गया है। एक अकेला हैमलेट में अपने संवाद लेखन, निरदेशन और जीवंत अभिनय से अश्वथामा जेडी भी उन दरशकों की नजर में अमर हो गए, जो उस सभागार में उनके अभिनय के गवाह बने। .....और उनसे भी बढ़कर उनकी नजरों में जो किसी कारणवश नाटक तो नहीं देख पाए, लेकिन मुझ जैसे नाचीजों ने उन्हें उन सुखद पलों से रू-ब-रू कराया। नाटक के बीच-बीच में मोबाइल की घंटी खलल पैदा कर रही थी, अंतिम दृश्यों में तो अश्वथामाजी की खिन्नता उजागर भी हो गई। होती भी क्यों नहीं, कलाकार जब नाटक के सारे पात्रों को जी रहा होता है, तो उस पर क्या गुजरती है, इसे कलाकार हृदय ही समझ सकता है। ऐसे में मैं अश्वथामा जी से मैं यही निवेदन करना चाहूंगा कि आज के दौर में जब बेटे के कंधे पर बाप की अरथी होती है, तब भी उसकी जेब में रखे मोबाइल की रिंगटोन सहसा ही बज उठती है.....तू चीज बड़ी है मस्त मस्त....चोली के पीछे क्या है...तुझे देखा तो ऐसा लगा....। जब मंदिर से श्मशान तक मोबाइल की पैठ हो चुकी है तो किसी नाटक का सभागार कैसे वंचित रह सकता है। हां इस समस्या का निदान उनके इसी नाटक का यह संवाद सुझाता है....आदत अभ्यास से बढ़ती है और अभ्यास से ही छूटती है। यदि हम प्रण लें तो मोबाइल को स्विच आफ या साइलेंट मोड पर रखने का विकल्प भी अपना सकते हैं। फिर न तो सुधि दरशकों को कोफ्त होगी और न ही कलाकार को रुष्ट होकर कहना पड़ेगा---इट मे बी माई लास्ट परफोरमेंस आन स्टेज। मेरी तो यही गुजारिश है कि अश्वथामा जेडी यूं ही एक से बढ़कर एक प्रस्तुतियों से अपने प्रिय दरशकों के बीच बने रहें।

3 comments:

राजीव जैन said...

नाटक ही नहीं सभी जगह यही परेशानी है।
मोबाइल उपयोग करने की तो भारतीयों को 'तमीज' ही नहीं है। मैं खुद भी यही चिंता जता चुका हूं। इससे कलाकार की तो एकाग्रता भंग होती ही है, इंटरेस्‍ट लेकर देखने वाला खुद मोबाइलधारी और पडोसी भी परेशान हो जाते हैं।
इस बीमारी का इलाज सिर्फ ए‍क कि
सभागार के बाहर ही चौकीदार मोबाइल 'खोस' ले।
http://shuruwat.blogspot.com/2007/10/blog-post_07.html

ramkumar singh said...

doosara upaay hai ki jiska bhi cellfone baje use jooton ki mala pahna kar shesh natak ke doran manch par khada kar diya jaye.
achha hai.

sa said...

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