Monday, November 16, 2009

जीते-जी क्यों न पढ़ लें गरुड़ पुराण ?

महानगरीय जीवन की कुछ मान्यताएं बीतते हुए समय के साथ परंपरा में तब्दील हो जाती हैं। गुलाबी नगर में भी ऐसी ही एक परंपरा है। यहां किसी के परलोकगमन पर मृत्यु के तीसरे दिन तीये की बैठक होती है, जिसमें परिजन-पुरजन-मित्रजन-रिश्तेदार-साथ काम करने वाले सभी एकत्रित होते हैं और मृत व्यक्ति को श्रद्धांजलि-पुष्पांजलि निवेदित करते हैं। आम तौर पर यह कार्यक्रम एक घंटे का होता है। जिनकी मृत्यु हो चुकी है, उनके प्रति श्रद्धा निवेदित करना और उनके परिजनों के प्रति शोक-संवेदना व्यक्त करना भारतीय परंपरा के अनुकूल है।
मैं यहां कुछ अलग किस्म की पीड़ा को शेयर करने के लिए मुखातिब हूं। यहां अमूमन तीये की बैठक के दौरान पंडितजी गरुड़ पुराण के कुछ अंशों का पाठ करते हैं। जैसा कि सर्व विदित है, गरुड़ पुराण में व्यक्ति के जीवन में किए गए काम के आधार पर भोगे जाने वाले हजारों तरह के नरक का वर्णन किया गया है।
भारतीय मान्यताओं के अनुसार, यदि हमारे पुराणों में कही गई बातें सत्य हैं और हमारे जीवन के कामकाज का फल हमें मरने के बाद भोगना ही पड़ता है, तो सावधानी के तौर पर हम जीवनकाल में ही गरुड़ पुराण को क्यों न पढ़ लें, जिससे हम अपने जीवन में अच्छे काम करके अपना अगला जन्म भी संवार लें।
गरुड़ पुराण के पाठ के दौरान पंडितजी जब प्रेत के द्वारा भोगे जाने वाले असह्य कष्टों का वर्णन करते होंगे, तो उनके प्रियजनों-परिजनों को कितनी पीड़ा होती होगी। क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि ऐसे अवसरों पर गरुड़ पुराण की बजाय श्रीमद्भगवद्गीता के कुछ श्लोकों का पाठ किया जाए, जिमें मानव जीवन का सार छिपा हुआ है।

मोबाइल क्यों नहीं होता मौन?
जब किसी व्यक्ति के चिरमौन धारण करने पर शोकाभिव्यक्ति के लिए लोग एकत्रित होते हैं, ऐसे में भी कुछ लोगों का मोबाइल जब वाचाल हो जाता है तो उक्त व्यक्ति के संवेदनाशून्य होने का बोध होता है। क्या कुछ देर के लिए मोबाइल को मौन मोड पर नहीं रखा जा सकता। भाई, यदि मोबाइल प्रेम इतना ही अधिक है और उसके मौन होने पर आपका भी दिल दुखता हो तो मोबाइल को कंपायमान मोड पर कर दें, ताकि उसकी धड़कनों का अहसास आपको हो जाए और फिर आप जैसा उचित समझें, कर डालें। इतना तो ध्यान रखना ही चाहिए कि एक दिन हम सबको सदा के लिए मौन धारण करना ही है तो फिर कुछ पलों के लिए मोबाइल क्यों नहीं मौन हो सकता?

4 comments:

vishnu said...

yah duniya ko pata hai ki aadami ko ek din marna hai phir bhi vah khud ko ajar amar samajhata hai ese me garudpuran ka us par koi asar nahi hota hai

Manoj said...

hi

Manoj said...

bilkul sahi kha aapne..insan ke mrne k pashchat grud puran ka nhi geeta ka path hona chahiye.jisse k mrne wale ki aatma ko shanti mile.pr aisa hota nhi hai.reason to main nhi janta bt ha itna janta hu k is dunia mein log hmesha ulte kaam hi krte hain.jb koi mar bhi jata hai tb bhi ye smjhne ki koshish nhi krte k uske ghar walo pr kya beet rhi hogi.koi nhi smjhta unka dukh.bs sb dikhawa krte hai.yaha tk k apne bhi.kbhi kbhi to sharam aati hai k hum kaise smaaj mein jee rhe hai

Unknown said...

bada sahi sujhaaya hai aapne. Bhagvad Gita se na sahi Garud Puraan se subhaarambh kar lo. jeete hue hi samajh lo. parantu dukh kii baat hai ki ab to priyajan ke marne ke baad bhi garud puraan sahi dhang se nahin sun jaata hai. Bhagvaan bachaaye:

ANand, goshakti@gmail.com