Saturday, October 3, 2009

गांधी का गुणगान, लालबहादुर लापता


कल यानी शुक्रवार दो अक्टूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती धूमधाम से मनाई गई। संयोग कहें या दुरयोग कि पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री का जन्मदिवस भी इसी दिन था। कल के अखबारों में विभिन्न राज्य/केंद्र सरकारों और सरकारी संस्थाओं की ओर से भरपूर मात्रा में विज्ञापन प्रकाशित हुए। खलने वाली बात यह रही कि इस तुलना में लाल बहादुर शास्त्री को दस प्रतिशत भी तवज्जो नहीं दी गई। इस अवसर पर हुए आयोजनों के केंद्रबिंदु में भी महात्मा गांधी ही थे। शास्त्रीजी को याद करने के कार्यक्रम तो महज रस्म अदायगी जैसे थे। क्या लालबहादुर शास्त्री के महान व्यक्तित्व को हमारे नीति नियंताओं ने इतनी जल्दी भुला दिया। हालांकि ऐसा करने से शास्त्रीजी का कद कदापि छोटा नहीं पाएगा। शास्त्रीजी ने अपने चरित्र से जो मिसाल कायम की, उसे भुलाया नामुमकिन है। इक्के-दुक्के संगठनों को छोड़कर अधिकतर ने महात्मा गांधी पर केंद्रित कार्यक्रम ही आयोजित किए।
कायस्थ समाज से जुड़े कुछ संगठनों ने लालबहादुर शास्त्री को अवश्य याद किया, लेकिन यहां सोचने का विषय है कि क्या शास्त्रीजी को याद करने का दायित्व महज एक समाज विशेष का ही है। इसे हम देश की बदकिस्मती ही कहेंगे कि आजादी के बाद से सत्ता में आए लोगों ने जगह-जगह गांधी की प्रतिमाएं स्थापित कर, उनके नाम से संस्थाएं स्थापित कर, देश की करेंसी पर राष्ट्रपिता की फोटो छापकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली, यदि वे गांधी के आदरशों को आचरण में लाते तो ऐसी महान विभूतियों को को इस तरह भुलाने की आदत उनमें नहीं पनपती।
अपने-अपने आराध्य
कांग्रेस ने अपने आकाओं को हर तरह से तवज्जो दी, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। इसमें भी नेहरू परिवार से जुड़े नेताओं का नाम प्रथम गण्य है। भाजपा ने भी आरएसएस और जनसंघ के संस्थापकों और सरदार पटेल जैसे अपनी पसंद के नेताओं को ही अपना आराध्य समझा। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती की मेहरबानी से पूरा सूबा बाबा साहब अंबेडकर की प्रतिमाओं के पार्क के रूप में विकसित हो रहा है। इतना ही नहीं, अपने अनुयायियों द्वार भुलाए जाने की आशंका से ग्रसित बसपा सुप्रीमो जीते जी अपनी प्रतिमाएं स्थापित करने में लगी हैं। हालात ऐसे हैं कि सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में दखल देना पड़ा।
नीतीश कुमार की सार्थक पहल
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शनिवार को घोषणा की कि भारत के प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की समाधि स्थल को दर्शनीय स्थल के रूप में विकसित किया जाएगा। वे प्रथम राष्ट्रपति की 125 वीं जयंती के उपलक्ष में उनकी पुनर्प्रकाशित पुस्तकों के लोकार्पण अवसर पर बोल रहे थे।

उन्होंने शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव को निर्देश दिया कि डॉ. राजेन्द्र बाबू की समाधि स्थल पर उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी शिलालेख के माध्यम से उल्लिखित कराएं ताकि नई पीढ़ी को इस महान विभूति के बारे में जरूरी जानकारियां मिल सकें। नीतीश ने केन्द्र सरकार से भी राजेन्द्र बाबू के कृतित्व एवं व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को नयी पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए यथासंभव प्रचार-प्रसार कराए जाने का अनुरोध किया।

2 comments:

RAJNISH PARIHAR said...

शास्त्री जी को एक गुप्त योजना के तहत अलग थलग कर दिया गया है!गांधी जी को हीरो और शास्त्री जी को जीरो बनाना कांग्रेस की चाल है!इसी विषय पर मेरा आलेख भी पढें..

Suresh said...

Bahut Achcha Vichar hai.

Suresh Pandit