Friday, October 2, 2009

बापू के बहाने


आज शाम साढ़े चार बजे टेलीविजन का स्विच ऑन किया तो दूरदर्शन के नेशनल चैनल पर नई दिल्ली स्थित तीस जनवरी मार्ग से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जयंती पर आयोजित कार्यक्रम का सीधा प्रसारण चल रहा था। आज की ताजा खबरों से अवगत होने के लिए दूरदर्शन के न्यूज चैनल पर गया तो वह भी राष्ट्रीय धर्म का निर्वहन करते हुए इसी कार्यक्रम को लाइव टेलीकास्ट कर रहा था।
अच्छी बात है, राष्ट्रपिता और जन-जन के बापू के प्रति कृतज्ञता का भाव हमें प्रकट करना ही चाहिए, सो लाइव टेलीकास्ट ही देखता रहा। इस बीच सर्वधर्म प्रार्थना सभा शुरू हुई। इसमें विभिन्न धरमों के प्रतिनिधियों ने अपने-अपने धर्मग्रंथ से प्रार्थना-मंत्र आदि का वाचन किया। मुझे जो बात खली वो यह थी कि हममें से अधिकतर लोगों को अलग-अलग धरमों की प्रार्थना का शब्दार्थ या भावार्थ समझ में नहीं आया। (शायद मुझ सरीखे अन्य लोगों को भी यह बात खली हो।)
ऐसे में मेरी गुजारिश है कि इन धर्म विशेष की प्रार्थना का शब्दार्थ-भावार्थ भी यदि टेलीविजन स्क्रीन पर दिखाया जाए, तो लोग अन्य धरमों की प्रार्थना और उसमें दिए गए मानव-कल्याण के संदेश के बारे में जान और समझ सकेंगे। इससे सर्वधर्म प्रार्थना सभा अपने उद्देश्य में सफल हो सकेगी और देश में सर्वधर्म समभाव का वातावरण भी बन सकेगा। मुझे नहीं लगता कि ऐसा करने से आयोजन में किसी प्रकार का विघ्न हो सकेगा।
...हो चुकी है शुरुआत
बचपन में गांव में सत्यनारायण भगवान की पूजा में जाता था तो पंडितजी संस्कृत में ही कथा का पाठ करते थे। तब अक्सर देखने में आता थी कि हम बच्चे ही नहीं, बल्कि बड़े-बुजुर्ग भी कथा का अर्थ समझें या न समझें, भक्ति भाव से हाथ जोड़े आरती होने और प्रसाद मिलने तक बैठे रहते थे। आजकल गांवों में ही नहीं, शहरों में भी कई बार देखने को मिलता है कि सत्यनारायण भगवान की पूजा के दौरान हिंदी में ही कथा होती है और लोग भक्ति भाव से साथ ही कथा का अर्थ भी समझ पाते हैं। ऐसे में निस्संदेह कथा से उनका जुड़ाव अधिक हो पाता है। हिंदू परिवारों के विवाह समारोहों में भी पंडितजी अक्सर संस्कृत मंत्रों के हिंदी अनुवाद भी बोलते हैं, जिससे परिणय सूत्र में बंधने वाला युगल अपने भावी जीवन के आदरशों को समझ पाता है और विवाह के आयोजन में शामिल होने वाले लोग भी इन वैदिक मंत्रों में निहित भावार्थ के बारे में जान पाते हैं।
...इनका क्या करें?
बापू को श्रद्धांजलि देने के लिए आयोजित कार्यक्रम में एक केंद्रीय मंत्री बार-बार घड़ी देख रहे थे। उनकी यह मनोदशा मन को कचोटती है कि यदि इनके पास समय नहीं था तो महज दिखावे के लिए ऐसे कार्यक्रमों में आने की क्या जरूरत थी। यदि आप स्वर्ग में ही नहीं, बल्कि जन-जन के मन में विद्यमान इन महान विभूतियों के प्रति सच्ची श्रद्धा नहीं रखेंगे, तो आपके अनुयायियों या मतदाताओं में आपके प्रति आस्था कैसे जगेगी।

4 comments:

एकलव्य said...

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जयंती अवसर पर शुभकामना

sudhakar soni,cartoonist said...

uttam vichar!

sandeep sharma said...

बहुत ही अच्छा मुद्दा है ये मंगलम जी...

Suresh said...

Bahut hi achcha vichar hai

Suresh Pandit