Thursday, December 4, 2008

...और हो गया मतदान


चार दिसंबर यानी गुरुवार को राजस्थान विधानसभा की दो सौ सीटों के लिए मतदान संपन्न हो गया। इसी के साथ ही चार राज्यों दिल्ली, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में हजारों प्रत्याशियों के भाग्य ईवीएम में बंद हो गए। आठ दिसंबर को दोपहर बारह बजते-बजते सैकड़ों प्रत्याशियों के चेहरों पर विजय की मुस्कान होगी तो हजारों प्रत्याशियों के सपने के साथ दिल भी टूटेंगे। उनके लाखों समर्थकों के दिल पर जो बीतेगी, इसका अनुमान लगाना आसान नहीं है।
सत्तासीन राजनीतिक दल चाहे विकास के कामों की कितनी भी दुहाई देते रहे, विपक्षी दल सब कुछ जनता के मनोनुकूल कर डालने के सब्जबाग दिखाते रहे, लेकिन हुआ वही जो होना था। जितने लोगों से बात हुई, उसमें यही ज्ञात हुआ कि भारतीय जनमानस को पूरवाग्रह से मुक्त करना आसमान से तारे तोड़ने से भी कठिन है। चाहे बरसों से किसी दल विशेष से चिपके आम मतदाता हों या फिर भी जातिगत आधार पर पैमाने तय करने वाले कंजरवेटिव मतदाता, सभी अपनी धुरी पर कायम रहे। इन सबसे अलहदा अभिजात्य वर्ग के मतदाताओं ने सरकारी छुट्टी का इस्तेमाल मतदान की बजाय तफरी में किया या फिर टीवी पर बैठकर धारावाहिक व फिल्में देखने में।
हमारे स्वनामधन्य मुख्य चुनाव आयुक्त टी. एन. शेषन ने भारतीय चुनाव प्रक्रिया में आमूलचूल सुधार के तहत फोटो पहचान पत्र की अनिवार्यता लागू करवाई, लेकिन व्यवस्थागत दोष को क्या कहें कि विसंगतियां खत्म होने का नाम ही नहीं लेतीं। आज दशकों बाद भी प्रत्येक मतदाता के पास फोटो पहचान पत्र नहीं हैं। जिनके पास पहचान पत्र हैं, उनके नाम मतदाता सूची में नहीं हैं। किराये पर रहने वालों के नाम मतदाता सूची से हट जाना तो उनकी नियति का दोष है ही, कई तो ऐसे भी मामले दिखे जहां किरायेदारों के पहचान पत्र भी थे और मतदाता सूची में नाम भी था, फलस्वरूप उन्होंने अपने मताधिकार का प्रयोग भी किया, लेकिन बेचारे मकान मालिक हाथ में पहचान पत्र लिए बूथ से सपत्नीक उदासमना लौट आए क्योंकि उनके नाम मतदाता सूची से गायब थे।
...तो फिर इन चुनावों में विजयश्री का वरण करने वाले प्रत्याशियों को अग्रिम बधाई और हारने वालों के प्रति हृदय से संवेदना क्योंकि केवल वे ही नहीं हारेंगे, हमारे देश में हजारों -लाखों लोगों की उम्मीदें छह दशकों से हार रही हैं, फिर भी उन्होंने उम्मीदों का दामन छोड़ा नहीं है।
(मिजोरम की बात मैंने इसलिए नहीं की क्योंकि उस छोटे से राज्य का राजनीतिक महत्व है ही कितना और जम्मू-कश्मीर में चुनाव आज के इंटरनेट के युग में भी आकाशवाणी पर आने वाले धीमी गति के समाचार की तरह हो रहे हैं, फिर भी संतोष की बात यही है कि जब हम चांद पर जाने में गर्व महसूस कर रहे हैं, आज भी धीमी गति के समाचार के श्रोता हैं और इसके प्रसारण की उपयोगिता बरकरार है। कुछ ऐसा ही हाल जम्मू-कश्मीर का है, जहां भले ही दर्जनों चरणों में चुनाव हों, लोकतांत्रिक प्रक्रिया को जिंदा रखने के लिए प्राणवायु की तरह जरूरी हैं। )