Wednesday, June 18, 2008

...कनॅल ने थाम लिया झुनझुना


छब्बीस दिनों के बाद आखिरकार बुधवार 18 जून को गुर्जर आरक्षण आंदोलन का पटाक्षेप हो गया। इससे पहले मंगलवार को मानसून गुलाबीनगर को तर-बतर कर गया। इधर इंद्रदेव मेहरबान हो रहे थे, उधर मोहतरामा वजीरे आला वसुंधरा राजे एक तीर से कई शिकार करने की अपनी साध पूरी करने में लगी थीं। उन्होंने गुर्जरों को अतिपिछड़ा वर्ग में चार से छह प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा के साथ ही सवर्ण समाज को भी आर्थिक आधार पर आरक्षण देने के संकेत दे दिए। ब्राह्मणों के साथ ही राजपूत, कायस्थ व सवर्ण समाज की अन्य जातियों ने पहले से ही अपने इरादे जता दिए थे कि आर्थिक आधार पर आरक्षण लिए बगैर वे नहीं मानेंगे। डॉ. किरोड़ीलाल मीणा ने भाजपा से इस्तीफा देकर मीणा समाज में अपना कद बढ़ाने के साथ ही सरकार को भी स्पष्ट कर दिया था कि यदि जनजाति आरक्षण से छेड़छाड़ की गई तो इसके दूरगामी घातक परिणाम हो सकते हैं। तय है कि वसुंधरा राजे राजनीति के साथ कूटनीतिक बिसात पर भी चाल चलने से पहले आराम से हर पहलू पर सोचती रहीं और जैसा कि होता है एक सीमा के बाद आदमी हारता भी है, थकता भी है। आरक्षण आंदोलन से गुर्जरों के सबसे बड़े नेता होकर उभरे कनüल किरोड़ी सिंह बैंसला ने ना-नुकर करते हुए हेलीकॉप्टर की सवारी और पिंकसिटी के होटल तीज में वीवीआईपी ट्रीटमेंट के बाद एसटी में चिट्ठी की सिफारिश के राग को भुलाकर सरकार की पेशकश को स्वीकार कर लिया।
अब सवाल यह उठता है कि कनॅल को यदि यही फैसला मंजूर करना था, यदि उनका साध्य इतना तुच्छ था तो गुर्जर समाज के दर्जनों नौजवानों की बलि उन्होंने क्यों ली। 27 दिनों तक दिल्ली-मुंबई रेलमार्ग पर हजारों लोगों के साथ तंबू लगाकर लाखों लोगों की यात्रा का कार्यक्रम रद्द कराने के पीछे उनका क्या मकसद था। महज यही तो नहीं कि यह समय खेतीबाड़ी का नहीं होता, सो अपने भाई-बंधुओं के साथ पटरी पर पिकनिक मनाएं। यदि वाकई उनमें सोद्देश्य आंदोलन करने और लंबे समय तक इसकी कमान थामे रखने का माद्दा था तो फिर उन्हें अपना यह जीवट भारतीय समाज में कोढ़ बनी आरक्षण की व्यवस्था को ही समूल नष्ट करने के लिए प्रयास करना चाहिए था। हां, गुर्जरों के साथ ही समाज के अन्य दलितों-वंचितों को शिक्षा तथा अन्य सुविधाएं मुहैया कराने का आंदोलन यदि वे चलाते और इसमें भले ही कितना भी बलिदान देना पड़ता, वे भारतीय इतिहास में अमर हो जाते। अभी तो गुर्जर आंदोलन का जिस तरह से पटाक्षेप हुआ है, जैसे-जैसे सरकार से मिले झुनझुने के बोल लोगों की समझ में आएंगे, वे अपने समाज में भी तिरस्कृत और बहिष्कृत हो जाएंगे। जिन अबोध बच्चों के पिता इस आंदोलन में अकाल काल कवलित हो गए, जिन बहनों की आंखें अभी दो माह बाद और फिर हर साल रक्षाबंधन पर भाई की अंतहीन इंतजार करने को मजबूर हो गईं, जिन ललनाओं का सुहाग उजड़ गया वे क्या कभी अपने ददॅ को भुला पाएंगी। संभव है कि कभी अकेले में कनॅल की आत्मा भी नौजवानों के बलिदानों के लिए उन्हें धिक्कारे। कुल मिलाकर तथ्य यही है कि छोटी उपलब्धियों के लिए बड़े स्तर पर इस तरह जनमानस को उद्वेलित और आतंकित करने का अधिकार किसी को नहीं होना चाहिए। वक्त सबको आईना दिखा देता है और समय का इंसाफ अंतत: स्वीकार करना ही पड़ता है। आशा करना चाहिए एक समय अवश्य आएगा जब आरक्षण की कोढ़ से हमारे समाज को हमेशा के लिए निजात मिल जाएगी।

4 comments:

प्रभाकर पाण्डेय said...

सटीक और सामयिक लेखन। लिखते रहें। साधुवाद।

neelima sukhija arora said...

सही, विधूड़ी सहित दूसरे गुर्जर नेताओं की नाखुशी जाहिर करती है कि सभी गुर्जर इस समझौते से खुश नहीं है

sudhakar soni,cartoonist said...

kahi aisa na ho manglam ji ,gurjaron k jhunjhuna samajh aate hi chunavon me sarkar ka band baja den?

DUSHYANT said...

भाई मंगलम जी ,आपकी भी कलम अब ज़ोर नहीं करती की बोर्ड वाले हो गए हो ,खुदा करे कलम वाले बने रहें ...कलम की ताकत की बोर्ड में कहाँ