Saturday, June 14, 2008

चिट्ठी आई थी...आती नहीं...फिर आएगी

इंदिरा गांधी एक बार कश्मीर के टूर पर गई थीं और वहां के रमणीक वातावरण से सम्मोहित और उल्लसित होकर अपने पिता जवाहर लाल नेहरू को पत्र लिखा। उसमें कुछ शब्द थे- `काश! ये शीतल मंद पवन के झोंके मैं आपको भेज पाती´। इसके जवाब में नेहरू ने लिखा- `...लेकिन वहां इलाहाबाद का लंगड़ा आम (जिसे मालदह भी कहा जाता है) नहीं होता।´
आप सोच रहे होंगे कि ऐसा क्या हुआ कि ब्लॉग पर मैं अपने मन की बात करने की बजाय इन विभूतियों के पत्रों का जिक्र करने लगा। तो सचाई बता दूं कि न तो इंदिरा-नेहरू के प्रति मेरा कोई पूर्वाग्रह युक्त सम्मान उमड़ पड़ा है न ही कश्मीर की वादियों और लंगड़ा आम की मिठास से मैं आपको रू-ब-रू कराना चाहता हूं।
हुआ यूं कि ऐतिहासिक नगर वैशाली में अवस्थित शिक्षक मित्र के पुत्र का आज जन्मदिन था। सुबह करीब साढ़े आठ बजे बच्चे को बधाई देने के लिए फोन किया। पूछने पर उसने बताया कि पापा अभी भी बिस्तरों में ही हैं। मैंने जब मित्र से कारण पूछा तो उन्होंने उपरोक्त संदर्भ को रेखांकित करते हुए कहा कि जेठ में ही सावन की झड़ी लगी हुई है, ऐसे में बाहर निकलकर भी क्या करूं, सो बिस्तर में लेटकर ही मौसम का लुत्फ उठा रहा हूं। रिमझिम मेघ मल्हार और शीतल मंद बयार के झोंके तो वे चाहकर भी मुझे नहीं भेज सके, लेकिन मुझे उनकी किस्मत से रस्क जरूर हुआ कि सुहाने मौसम के साथ लंगड़ा आम का दोहरा आनंद वे उठा रहे हैं।
अब आता हूं उस मुद्दे पर जिसने मुझे लिखने के लिए प्रेरित किया। जैसा कि मैंने पहले भी कहीं जिक्र किया था कि आजकल कई बार ऐसा लगता है जैसे लिखने के खिलाफ कोई साजिश या अभियान चल रहा हो। हर जगह ऐसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं कि बिना लिखे, महज बोलने से या फिर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से आपका काम चल जाए। ऐसे में आपस में राफ्ता कायम करने का सबसे महत्वपूर्ण साधन फोन (मोबाइल या लैंडलाइन) ही है। पत्रलेखन की तुलना में इसमें समय और धन दोनों ही अधिक खर्च होता है लेकिन वह तसल्ली या आत्मसंतुष्टि नहीं मिल पाती जो कभी पत्र लिखने के बाद या फिर मिलने से हुआ करती थी। बरसों बाद प्रियजनों के पत्र आज भी लोगों ने सहेजकर रखे हुए हैं और उन्हें बार-बार पढ़कर जो सुखद अहसास होता है, उसका तो कहना ही क्या? पत्र लिखते समय हमारे पास कई सारे विकल्प खुले होते हैं। मसलन कोई शब्द या अंश पसंद नहीं आया या माफिक नहीं लगा तो आप उसे हटा सकते हैं, उसके स्थान पर मनमाफिक शब्द का प्रयोग कर सकते हैं। फिर, पत्र लिखते समय ऐसी जल्दबाजी या प्रत्युपन्नमतित्व (ultra presence of mind) की जरूरत नहीं होती जो अमूमन फुनियाते समय हुआ करती है। पत्रोत्तर लिखते समय भी जो सहज प्रवाह हुआ करता है कि एक-एक शब्द, एक-एक पंक्ति को अपने प्रियजन के साथ जीते हुए आप उसके सामने अपनी उपस्थिति का आभास कराने के लिए स्वतंत्र होते हैं। फ्लैश बैक में जैसे सारी पुरानी घटनाएं चलती रहती हैं। फोन चाहकर भी ऐसी सुविधा उपलब्ध नहीं करा सकता, भले ही उसमें वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधा क्यों न हो। इतना ही नहीं, आपके पास इसके बाद के जेनरेशन की ऑनलाइन चैटिंग की सुविधा उपलब्ध हो, तो भी आप पत्राचार का सुखद अहसास महसूस नहीं कर सकते।
जमाना आधुनिकता का है। गुजरे दौर की बात करना बेमानी होगी, फिर भी आशा तो कर ही सकता हूं कि जब भी समय मिले, हमें अपने प्रियजनों को विशेष अवसरों पर पत्रों का तोहफा अवश्य ही देना चाहिए। अवश्य ही वह दौर आएगा जब हम उम्मीद करेंगे कि चिट्ठी आएगी...आएगी....जरूर चिट्ठी आएगी।