Sunday, May 11, 2008

हैंडल द चिल्ड्रन विद `टीपी´ एंड `बीके´


`बचपन के दिन भी क्या दिन थे...´, `बचपन हर गम से बेगाना होता है...´, `नानी तेरी मोरनी को मोर ले गए...´ `लकड़ी की काठी, काठी का घोड़ा, घोडे़ की दुम पर जो मारा हथौड़ा...´ सरीखे गीत वयस्कों ही नहीं, बड़े-बड़ों की भी जुबान पर बरबस आ जाया करते हैं। हो भी क्यों न, बचपन से जुड़ी मधुर यादें इतनी सुखदायी होती हैं कि मन उसके पास आकर ठहर-ठहर जाता है। घर में जब किसी बच्चे की किलकारी गूंजती है तो पूरा परिवार चहक उठता है। इसके बाद तो माता-पिता बच्चे के दिन-प्रतिदिन के विकास को देख-देख कर फूले नहीं समाते। (आजकल चूंकि एकल परिवार का चलन बढ़ गया है, इसलिए सारे परिजनों का जिक्र नहीं कर रहा)। ऐसे परिवारों में पति-पत्नी के बीच बच्चे का विकास, पहला दांत निकलना, बोलना, पहली-पहली बार उसका बैठना, खड़ा होना, चलना ही चर्चा का विषय हुआ करता है। उनकी अपेक्षा के अनुसार यदि बच्चे के विकास में कोई कोर-कसर बाकी रह जाती है तो आज की युवा पीढ़ी डॉक्टर के पास जाने में भी जरा सा देर नहीं लगाती। (दादी-नानी के नुस्खे तो कहां से मिलें)।
बच्चा जब थोड़ा-बहुत बोलना, चलना सीख जाता है तो उसे मैनर्स सिखाने की होड़ भी शुरू हो जाती है। इन मैनर्स को सीखने में बच्चा थोड़ी भी कोताही बरतता है तो मां-बाप का क्रोध सातवें आसमान पर जा पहुंचता है। विशेषकर जब बच्चे के साथ वे किसी के घर जाते हैं या फिर कोई मेहमान उनके घर आता है तो बच्चे की तो मानो शामत ही आ जाती है।
कुछ दिन पहले मैं अपने बेटे के साथ सपत्नीक एक भाभीजी के यहां गया था। न तो मुझमें ऐसे संस्कार हैं कि मैं बच्चे को मैनर्स सिखाऊं लेकिन बार-बार होने वाली सरदी-जुकाम-खांसी के भय से आइसक्रीम और कोल्ड ड्रिंक्स से परहेज का पाठ अवश्य ही पढ़ाना पड़ता है। वहां भी कुछ ऐसा ही हुआ। भाभीजी बच्चे के लिए आइसक्रीम लाईं, तो वह मेरी ओर देखने लगा। भाभीजी के पूछने पर मैंने स्पष्टीकरण दिया कि मैंने बच्चे पर कोई पाबंदी नहीं लगा रखी है और गर्मी के मौसम में मौसमी परेशानियों से मुक्त बच्चा मजे से आइसक्रीम का आनंद ले सकता है। इस पर भाभीजी ने अपनी बहन का संस्मरण सुनाया। उनकी बहन-बहनोई खुद भी काफी अनुशासित हैं और अपने बच्चों को भी उन्होंने अनुशासन का अच्छा खासा पाठ पढ़ाया है। इसके लिए उन्होंने दो कोड वर्ड का ईजाद किया है। इसका लाभ दूसरे भाई भी उठा सकें, सो मैंने सोचा कि इसे ब्लॉग पर डाल दिया जाए।
जी हां, ये दो कोड वर्ड हैं `टीपी´ यानी टूट पड़ो और बच्चे यदि वाकई दायरा तोड़कर टूट पड़े तो `बीके´ यानी बस करो। इस तरह बच्चे की स्वच्छंदता भी बनी रहे और माता-पिता के अहं को भी तथाकथित रूप से ठेस नहीं लगे। बाकी आदर्श परिस्थितियों में तो सहमे हुए रहना तो बच्चों के स्वभाव में ही शामिल हो गया है, लेकिन थोड़ा सा खुला आसमान तो मिले। नुस्खा अच्छा लगे तो अपनाएं अन्यथा यथास्थिति बनाए रखने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है। धन्यवाद।