Saturday, May 3, 2008

जरा याद हमें भी कर लो...

आज बहुत ही निजी बातें, ...हालांकि पहले भी सार्वजनिक अनुभवों से ज्यादा स्थान व्यक्तिगत अनुभव ही घेरते रहे हैं, लेकिन चूंकि कई लोग ब्लॉग को ऑनलाइन डायरी के रूप में परिभाषित करते हैं, सो आज यहां विचार नहीं, नितांत व्यक्तिगत अनुभव या कहें पीड़ा प्रस्तुत हैं, जिन्होंने मुझे-मेरे अंतर्मन को आहत किया। दुनिया चूंकि बहुत बड़ी है....इसलिए इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि कुछ और लोगों का अनुभव भी मेरे अनुभव के इदॅ-गिदॅ रहा हो।
बचपन में दोस्तों की लंबी फेहरिस्त होती है, और उम्र बढ़ने के साथ-साथ इसकी छंटाई होती रहती है। मेरे बचपन में काफी दोस्त थे, जिनमें से दो को मैं अपने अधिक नजदीक महसूस किया करता था। दोनों के घर अपेक्षाकृत दूर थे, सो हमारा साथ स्कूल तक ही सीमित हुआ करता था, लेकिन यह साथ इतनी ऊर्जा भर देता था कि चौबीसों घंटे साथ न होने का मलाल नहीं होता था। बदलते हुए समय के साथ हमारे अध्ययन के क्षेत्र ही नहीं बदले, कार्यक्षेत्र भी बदल गए। एक मित्र अपने गृहजिला मुख्यालय पर हैं, सो सबसे अधिक हमारी जननी-जन्मभूमि-माटी से जुड़े हैं। मैं घर से तकरीबन 35-36 घंटे की दूरी पर हूं और तीसरा दोस्त लंदन में इंजीनियर की नौकरी बजा रहा है। अपनी संपन्नता और सुविधा के कारण वह संभवत: इन घंटों में मुझसे ज्यादा नजदीक है।
यह तो भौगोलिक दूरी की बात है, दोनों मित्रों से मानसिक और भावनात्मक दूरी मैंने कभी महसूस नहीं की। एसटीडी के बावजूद अपने जिला मुख्यालय वाले दोस्त से महीने में एकाध बार बात हो ही जाती है (पहल चाहे जिधर से हो) और विदेश रहने वाला दोस्त शनिवार-रविवार को फोन करना शायद ही कभी भूलता हो।
अभी पिछले दिनों अपने जिला मुख्यालय वाले दोस्त को फोन किया तो उसने बताया कि वह अपने भतीजे के शादी समारोह में है। मैंने जब पूछा कि भाई, शादी थी तो बताते तो सही? इस पर उसने जो जवाब दिया वह मुझे मर्माहत कर गया। उसका कहना था कि यदि मैं तुझे पहले बताता तो क्या तुम आ ही जाते?
अब मैं उसे क्या बताता? सन्न सा रह गया मन मसोसकर, लेकिन उस बातचीत के पांच-छह दिन बाद भी मेरा मन बार-बार मुझे कचोटता रहता है। उसके बाद दुबारा भी उससे बात हुई, शादी सकुशल संपन्न होने की खबर दी उसने, लेकिन मेरे मन का गुबार है कि खत्म होने का नाम नहीं ले रहा। सो मैंने सोचा, दिल की आग पर ब्लॉग के माध्यम से ही कुछ ठंडे छींटे खुद ही डाल लूं। शायद करार आ जाए।
ऐसे मित्रों से मैं यही पूछना चाहता हूं कि हमारे पूर्वजों ने जो परंपराएं बनाई हैं, क्या वे महज खानापूर्ति के लिए हैं, और यदि ऐसा ही है तो हम लकीर पीटने की तर्ज पर उनका पालन क्यों करते हैं। हालांकि मुझे घर छोड़े हुए लगभग ढाई दशक हो चुके हैं, लेकिन परंपराओं को मैं आज भी नहीं भूला हूं, उन्हें आत्मसात करने की भी भरसक कोशिश करता हूं।
जहां तक मुझे याद आता है, हमारे यहां ऐसी परंपरा है कि घर में कोई शुभ कार्य हो तो कुलदेवता, ग्रामदेवता, पूर्वजों के साथ-साथ असंख्य देवी-देवताओं को निमंत्रण çदया जाता है। कोशिश होती है कि जिनसे मनमुटाव या थोड़ी-बहुत दुश्मनी भी है, उन्हें भी मांगलिक कामों में शामिल होने के लिए निमंत्रित करें। शादी-उपनयन से महीनों पहले महिलाएं गीतों के माध्यम से पूर्वजों और देवी-देवताओं के नाम ले-लेकर उनसे यज्ञ (वहां शादी-विवाह को आम बोलचाल की भाषा में यज्ञ ही कहते हैं) में शामिल होने का आह्वान करते हैं। यह हमारे विश्वास का ही प्रतिफल हुआ करता है कि हम मान लेते हैं कि सबकी उपस्थिति से ही यज्ञ सफलतापूर्वक संपन्न हो गया। अब इसकी तो कोई गारंटी नहीं मांगता कि हमने जिन देवताओं और पूर्वजों को बुलाया, उनके आने का प्रमाण-पत्र दिखाओ। यदि उनके साथ ऐसा नहीं है तो फिर दूर बैठे मित्रजनों के लिए दूरी बरतने का क्या प्रयोजन? किन्हीं मजबूरियों के चलते कोई आपसे दूर चला गया तो इसका मतलब यह तो नहीं कि उसे आप अपनी जिंदगी, अपने सुख-दुख से निकाल बाहर कर दो। ...आप यदि ऐसा कर भी देते हो और जिसे देश-प्रदेश से बाहर होने के कारण आपने दिल-निकाला दे भी दिया, लेकिन वह अपने दिल से आपको न निकाल पाए....तो इसका कोई प्रतिकार है आपके पास। सो यही निवेदन है....जरा याद हमें भी कर लो.....।