Sunday, February 22, 2009

चिठिया हो तो हर कोई बांचे...


कई महीनों से ब्लॉग और ब्लॉगरों की दुनिया से दूर हूं। कुछ ऐसी व्यस्तताएं थीं कि चाहकर भी लिखने-पढ़ने का समय नहीं निकाल पाया। किन कारणों से ऐसा हुआ, इसकी चरचा फिर कभी। आज तो कुछ विशेष अनुभूतियों को लेकर हाजिर हूं, जिन्हें शेयर करने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूं।
आज सुबह करीब साढ़े सात बजे मोबाइल की रिंगटोन से नींद खुली। अखबार के दफ्तर से दो बजे फ्री होने के बाद सोते-सोते करीब तीन बज ही जाते हैं। ऐसे में सुबह नींद में खलल पड़ती है तो बहुत ही बुरा लगता है, लेकिन जब मोबाइल के दूसरी ओर कोई ऐसा शख्स हो जिसकी मधुर आवाज सुनना नींद से अधिक प्रिय हो तो फिर कोई शिकायत नहीं होती। आज भी कुछ ऐसी ही स्थिति थी। उधर से आवाज आई---`आप मंगलम जी बोल रहे हैं। मैं भागलपुर से संजीव...बीएड में हम साथ थे।´ इन अल्फाजों को सुनते ही क्षणमात्र में महीनों साथ गुजारे गए लम्हों का फ्लैश बैक मानस पटल पर घूम गया। पूछा-आपको मेरा नंबर कैसे मिला? जो जवाब मिला, उससे और भी तसल्ली हुई। उन्होंने कहा-आपने कभी पोस्टकार्ड भेजा था मेरे नाम। मम्मी कहीं रखकर भूल गईं। आज सुबह नजर पड़ी तो मैंने सोचा देखता हूं नंबर मिलाकर और बात हो गई। फिर तो हम दोनों ने बीते हुए करीब 13-14 साल का ब्यौरा एक-दूसरे को सुनाया। जहां तक मुझे याद आता है, मैंने मोबाइल कनेक्शन लेने के बाद अपने कई मित्रों को पोस्टकार्ड लिखे थे और उसमें अपनी वर्तमान स्थिति, निवास और मोबाइल नंबर का भी जिक्र किया था ताकि संबंधों को पुनरजीवित किया जा सके। पत्र लिखने की मेरी आदत रही है, जो कई मित्रों की पत्रोत्तर देने की उदासीनता की भेंट चढ़ती जा रही है, लेकिन संजीव भाई के फोन ने पत्रों की उपादेयता की नई सिरे से व्याख्या कर दी है। मैं एक बार फिर इस तथ्य को कहना चाहूंगा कि मोबाइल और इंटरनेट के इस युग में भी पत्रों की अहमियत कम नहीं हुई है।
कोशिश करूंगा कि अपने पुराने मित्रों से पत्राचार कर एक बार फिर संबंधों को रिन्यू करने की कोशिश करूं। उम्मीद है जीवन के इस मोड़ पर उन मित्रों से जुड़कर जीवन के पलों को और खुशनुमा बना सकूंगा।