Sunday, January 20, 2008

ब्लॉग से पैसा मिले तो बने बात


अभी तीन-चार दिन पहले एक वरिष्ठ सज्जन घर पर मिलने आए। कुछ महीनों पहले सरकारी सेवा में आला अफसर पद से रिटायर हुए हैं। पढ़ने-लिखने का शौक शुरू से रहा है। उनकी कई सारी उपाधियां इसका जीवंत प्रमाण हैं। सेवाकाल में भी विभिन्न मुद्दों पर नियमित रूप से अखबारों-पत्रिकाओं में लिखते रहे हैं। रिटायर होने के बाद यह अनुपात और भी बढ़ गया है। उनसे देश-दुनिया के कई ज्वलंत प्रकरणों पर बातचीत हुई। इन दिनों क्या पढ़ रहे हैं, इस सबसे होती हुई बातचीत ब्लॉग पर आ गई। मैंने जब उनसे ब्लॉग पढ़ने की बाबत पूछा तो उनका कहना था कि इंटरनेट कनेक्शन नहीं होने के कारण इसे नियमित पढ़ना संभव नहीं हो पाता औऱ साइबर कैफे जाकर पढ़ना काफी खचॅप्रद है। अब उनकी उत्सुकता मेरे ब्लॉग लिखने के बारे में थी। जब मैंने उन्हें बताया कि यह विधा न केवल नौजवानों, बल्कि पढ़ने-लिखने वाले उम्रदराज लोगों में भी दिनोंदिन लोकप्रिय होती जा रही है औऱ विभिन्न समसामयिक विषयों पर लिखने वाले अपनी बेबाक राय ब्लॉग के माध्यम से व्यक्त करते हैं। इस पर उनका सहज सवाल था कि इससे कुछ पैसा भी मिलता है क्या। अब मेरा चेहरा देखने लायक था। उनसे मैं क्या कहता, बस मना कर दिया कि अभी तो मुझे ही क्या, मेरे जैसे सैकड़ों ब्लॉगसॅ को बस लिखने भर से आत्मतुष्टि मिलती है और कुछ विचारवान पाठकों की टिप्पणियां यदि मिल जाती हैं, तो लिखना साथॅक सा लगने लगता है।
अनादिकाल से ही मनोरंजन मानव की सहज आवश्यकता रही है। यह मनोरंजन किसी भी विधा से प्राप्त हो सकता है। वे लोग जो मनोरंजन करते हैं, वे इसके जरिये अपनी आजीविका भी चला लेते हैं, इसमें कोई दो राय नहीं है, लेकिन जिनका मनोरंजन हो, उनकी भी कमाई हो, यह तो जरूरी नहीं है।
बहुत पहले संस्कृत का एक श्लोक पढ़ा था --
काव्यशास्त्र विनोदेन कालो गच्छति धीमताम्।
व्यसनेन च मूखाॅणां निद्रया कलहेन वा।।
तब गुरुजी ने इसकी व्याख्या कुछ इस तरह की थी कि विद्वानों (जिसे पढ़े-लिखे सामान्यजन भी कह सकते हैं) का खाली समय काव्य शास्त्र पढ़ने में बीतता है जबकि मूखॅ लोग इसे सोकर या किसी से झगड़कर व्यथॅ बिता देते हैं। मेरे किशोर मन में यह बात इस कदर पैठ गई कि तब से आज तक जब भी अवकाश मिलता है, कुछ न कुछ अवश्य ही पढ़ना चाहता हूं। जेब इजाजत न दे तो मांगकर पढ़ने में भी शमॅ नहीं करता। ऐसे में मुझे इस बात से पीड़ा अवश्य हुई कि खुद को बौद्धिक मानने वाले को इस तरह हर जगह हर काम में अथॅप्राप्ति को ही अपना एकमात्र उद्देश्य नहीं बनाना चाहिए। मुझे तो लगता है कि ऐसे बहुत से लोग होंगे जिन्होंने महज इस कारण से ब्लॉग लिखना शुरू नहीं किया होगा, क्योंकि इससे तुरत किसी आमदनी की आशा नहीं होती। ऐसे लोगों से मेरा सादर अनुरोध है कि दैनिक डायरी लिखने में भी कोई आमदनी नहीं होती, लेकिन कई साल बाद जब हम इसका सिंहावलोकन करते हैं, तो लगता है कि दुबारा हम उन पलों को जी रहे हैं, ऐसे में इस ऑनलाइन डायरी ब्लॉग का आइडिया भी इतना बुरा नहीं है। आप यदि इस पर अपने दिल की बात कहते हैं और आपके दिल की कई गांठें खुलेंगी। हमराज मिलने से आपको सुकून भी मिलेगा, यह विश्वास है मेरा।

6 comments:

Mired Mirage said...

सही कह रहे हैं आप ।
घुघूती बासूती

Dr.Parveen Chopra said...

मंगलम जी, आप ने बिल्कुल ठीक कहा है कि डायरी लिखने का कोई मेहनताना नहीं मिलता। यह तो बस आत्मसंतुष्टि का एक मंच है। अपने उस मित्र को भी जोड़िए---कोशिश तो कीजिए, चाहे मुझे भी ज्यादा उम्मीद तो नहीं है क्योंकि उन का पहला प्रश्न ही काफी कुछ ब्यां कर रहा है, दोस्त। आप तो लगे रहिए।

mamta said...

आप बिल्कुल सही फरमा रहे है।

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल said...

मंगलम जी,आपने एकदम सही कहा है. लेकिन दुखी न हों. दुनिया में ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है जिन्हें वह हर काम मूर्खतापूर्ण लगता है जिसमें पैसे न मिलते हों. ऐसे लोगों को अपने हाल पर छोड देना चाहिए, यह कहते हुए कि हे प्रभु इन्हें माफ करना, ये नहीं जानते कि...

suresh said...

Dear Manglam ji
You are all right.

Suresh Pandit

Poet from Pinkcity said...

pahali baar thoda waqt dekar aapke blogs padhey hain. bahut bahut badhai.shubhkamnayen.
Prem