Saturday, March 29, 2008

शॉर्ट फिल्में देखने के लिए हुए लंबलेट

इन दिनों राजस्थान सरकार विभिन्न संगठनों के सहयोग से राजस्थान दिवस समारोह का आयोजन कर रही है। इसके तहत पिछले 24 मार्च से सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। चूंकि जयपुर ही नहीं, राजस्थान के दूसरे शहर भी अपने धरोहरों की थाती के कारण देशी-विदेशी सैलानियों के आकर्षण के केंद्र रहे हैं, इसे देखते हुए राजस्थानी लोकसंस्कृति और परंपराओं की सीमारेखा नहीं खींचते हुए बॉलीवुड तक से सितारे बुलाए गए। इसी क्रम में 27 मार्च को जवाहर कला केंद्र में शॉर्ट फिल्म फेस्टिवल शुरू हुआ। आज यानी शनिवार को एक मित्र ने वहीं से फोन किया कि आओ, लघु फिल्में देखते हैं। कई बार ऐसा होता है कि दोस्तों का मन रखने और खुद के बारे में उनका भ्रम कायम रखने के लिए मैं ऐसे कार्यक्रमों में जाने से मना नहीं कर पाता, जिसके विषय में मैं बिल्कुल ही कुछ नहीं जानता हूं। तो साहब, आज भी मैं उनका मन रखने के लिए चला गया। जवाहर कला केंद्र के दो ऑडिटोरियम में यह शॉर्ट फिल्म फेस्टिवल चल रहा था। एक ऑडिटोरियम में खाली कुरसियां पंद्रह-बीस दर्शकों के साथ फिल्मों का आनंद ले रही थीं, सो हमने दूसरे ऑडिटोरियम का रुख करना ही मुनासिब समझा। वहां कुरसियां नहीं हैं, फर्श पर ही कालीन बिछी है, और उसी पर बैठकर कलाप्रेमी यहां होने वाली विचार गोष्ठियों, संगीत सभाओं और अन्य कार्यक्रमों का आनंद लेते हैं। आज इस तथाकथित शॉर्ट फिल्म फेस्टिवल में जो नजारा दिखा, हमें हतप्रभ करने के लिए काफी था। युवक ही नहीं, उनके साथ आई युवतियां भी (जो संभवतया कॉलेज गलॅ थीं), बाजाप्ता लेटकर फिल्म का लुत्फ उठा रहे थे। अब उनकी निगाहें स्क्रीन पर थीं या बगलगीर पर, यह तय करना मुश्किल हो रहा था। इनमें शॉर्ट फिल्मों की समझ रखने वाले कितने थे और बाहर की तपिश से बचने के लिए एसी की ठंडी हवा का लुत्फ उठाने वाले कितने, इसका निर्णय कर पाना हमारे लिए संभव नहीं था।
वह तो गनीमत थी कि दिहाड़ी मजदूर टाइप के तीन-चार ऑपरेटर ही प्रोजेक्टर के सहारे फिल्म दिखा रहे थे और इन फिल्मों के प्रबुद्ध देशी-विदेशी निर्माता-निदेशक नदारद थे, अन्यथा वे हमारी इस अपसंस्कृति पर एक और शॉर्ट फिल्म शूट करने से बाज नहीं आते। हम तो चूंकि काफी देर से गए थे, सो तीर्थराज पुष्कर पर फिल्माई गई एक फिल्म देखी, चूंकि पुष्कर-दशॅन हम दोनों पहले ही साक्षात देख चुके थे, सो ज्यादा इंटरेस्टिंग नहीं रहा।
इन çदनों राजस्थान सरकार विभिन्न संगठनों के सहयोग से राजस्थान çदवस समारोह का आयोजन कर रही है। इसके तहत पिछले 24 मार्च से सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। चूंकि जयपुर ही नहीं, राजस्थान के दूसरे शहर भी अपने धरोहरों की थाती के कारण देशी-विदेशी सैलानियों के आकर्षण के केंद्र रहे हैं, इसे देखते हुए राजस्थानी लोकसंस्कृति और परंपराओं की सीमारेखा नहीं खींचते हुए बॉलीवुड तक से सितारे बुलाए गए। इसी क्रम में 27 मार्च को जवाहर कला केंद्र में शॉर्ट फिल्म फेçस्टवल शुरू हुआ। आज यानी शनिवार को एक मित्र ने वहीं से फोन किया कि आओ, लघु फिल्में देखते हैं। कई बार ऐसा होता है कि दोस्तों का मन रखने और खुद के बारे में उनका भ्रम कायम रखने के लिए मैं ऐसे कार्यक्रमों में जाने से मना नहीं कर पाता, जिसके विषय में मैं बिल्कुल ही कुछ नहीं जानता हूं। तो साहब, आज भी मैं चला गया। जवाहर कला केंद्र के दो ऑडिटोरियम में यह शॉर्ट फिल्म फेçस्टवल चल रहा था। एक ऑडिटोरियम में खाली कुçर्सयां पंद्रह-बीस दर्शकों के साथ फिल्मों का आनंद ले रही थीं, सो हम दूसरे ऑडिटोरियम में चले गए। यहां कुçर्सयां नहीं हैं, फर्श पर ही कालीन बिछी है, और उसी पर बैठकर कलाप्रेमी यहां होने वाली विचार गोçष्ठयों, संगीत सभाओं और अन्य कार्यक्रमों का आनंद लेते हैं। आज इस तथाकथित शॉर्ट फिल्म फेçस्टवल में जो नजारा çदखा, हमें हतप्रभ करने के लिए काफी था। युवक ही नहीं, उनके साथ युवतियां भी, बाजाप्ता लेटकर फिल्म देख रहे थे। अब उनकी निगाहें स्क्रीन पर थी, या बगलगीर पर, यह तय करना मुश्किल हो रहा था। इनमें शॉर्ट फिल्मों की समझ रखने वाले कितने थे और बाहर की तपिश से बचने के लिए एसी की ठंडी हवा का लुत्फ उठाने वाले कितने थे, इसका निर्णय कर पाना हमारे लिए संभव नहीं था।
वह तो गनीमत थी कि तीन-चार ऑपरेटर ही प्रोजेक्टर के सहारे फिल्म çदखा रहे थे और इन फिल्मों के प्रबुद्ध देशी-विदेशी निर्माता-निदेüशक नदारद थे, अन्यथा वे हमारी इस अपसंस्कृति पर एक और शॉर्ट फिल्म शूट करने से बाज नहीं आते। हम तो चूंकि काफी देर से गए थे, तीर्थराज पुष्कर पर फिल्माई गई एक फिल्म देखी, लेकिन चूंकि यह नजारा हम दोनों पहले ही साक्षात देख चुके थे, सो ज्यादा इंटरेस्टिंग नहीं रहा। हां, एक फिल्म जरूर अच्छी थी, जिसमें इस तथ्य को बताने का साथॅक प्रयास किया गया था कि सारे आतंकवादी मुस्लिम हो सकते हैं, लेकिन सभी मुस्लिम आतंकवादी नहीं होते।
वैसे इतना तो होना ही चाहिए कि हम ऐसे कायॅक्रमों में जाएं तो तमाशबीन ही बने रहें, खुद तमाशा न बनें। ऐसे में व्यक्ति विशेष की ही नहीं, समाज, राज्य और राष्ट्र की भी बदनामी होती है।

Wednesday, March 5, 2008

हैप्पी मैरिज एनिवर्सरी टू बम-बम भोले


गुरुवार को महाशिवरात्रि है। आज के दौर में विशेष अवसरों पर एसएमएस और ई-मेल से आने वाले संदेशों की भूमिका बढ़ गई है और लोग अपने प्रियजनों को इस तरह के संदेश भेजना और पाना हमारी दिनचर्या में शुमार हो गया है। तो साहब, मुझे भी आज यानी बुधवार को ही एक मित्र का एसएमएस संदेश मिला--`भगवान शिव के जन्मदिन का पर्व महाशिवरात्रि आपके लिए मंगलमय हो´। संदेश पाकर मैं यह सोचने को विवश हो गया कि एक स्थापित मान्यता किस प्रकार हर अवसर पर लागू होने लगती है। जब मैंने उक्त मित्र को फोन करके मैसेज के बारे में पूछा तो उनका सहज उत्तर था कि भगवान राम के जन्म की खुशी में रामनवमी मनाई जाती है, भगवान कृष्ण के जन्म की खुशी में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाती है तो शिवरात्रि भी भगवान शिव के जन्मदिन पर ही तो मनाई जाती होगी। मैंने उनकी अज्ञानता का निवारण किया तो सोचा कि अधिकांश लोग इस तथ्य से अवगत होंगे, फिर भी कुछ लोग यदि नावाकिफ हों तो उन तक भी यह जानकारी पहुंचाई जानी चाहिए।
भगवान शिव की महिमा अपरम्पार है और देश के हर हिस्से में गली-मोहल्लों में हर चौराहे पर भगवान शिव के मंदिर इसके प्रमाण हैं। इनकी पूजा-अर्चना के लिए कोई विशेष तामझाम की आवश्यकता नहीं होती। हमारे आसपास सहज उपलब्ध आक-धतूरे के फूल, भांग, बिल्वपत्र चढ़ाने और जलाभिषेक मात्र से वे प्रसन्न हो जाते हैं। बात दीगर है कि जिनके पास उपलब्ध है, वे दूध ही क्या पंचामृत तक से शिव का अभिषेक करते हैं, सोने-चांदी के नाग-नागिन और आभूषण भी चढ़ाते हैं। धर्मशास्त्रों में शिव को इतना सरल बताया गया है कि उनका नाम ही भोला बाबा रख दिया गया और उनका क्रोध इतना प्रचंड है कि तीसरी आंख खुले तो प्रलय हो जाए।
भगवान शिव संभवत: ऐसे पहले देवता होंगे जिनकी शादी की वर्षगांठ पर इस तरह का उत्सवी माहौल होता है। हालांकि धर्मप्राणों की नगरी जयपुर को छोटी काशी कहा जाता है, इससे स्पष्ट है कि यहां भगवान शिव की भक्ति की रेटिंग क्या है। गुरुवार को भक्त यहां के प्रसिद्ध झाड़खंड महादेव, ताड़केश्वर महादेव, राजराजेश्वर महादेव, एकलिंगेश्वर महादेव मंदिरों के अलावा गली-मोहल्लों के शिव मंदिरों में औढरदानी भगवान भगवान भोले की आराधना में लीन रहेंगे।
कई शहरों में महाशिवरात्रि की शाम को शिव बारात की झांकी सजाई जाती है और तीन-चार किलोमीटर लंबा जुलूस निकाला जाता है। इसमें आगे-आगे वृषभ नंदी पर भगवान शिव विराजमान होते हैं और उनके पीछे उनके गणों और भूत-प्रेतों की बारात होती है। फिर उसके पीछे अन्य झांकियां और बैंड-बाजे, हाथी-घोड़ों का लवाजमा होता है। आयोजकों में शिव बारात को साकार करने की प्रतिस्पर्धा होती है। ऐसे दृश्य देखने के बाद बच्चा-बच्चा महाशिवरात्रि मनाने का उद्देश्य समझ जाता है और फिर मेरे मित्र ने जिस तरह का एसएमएस मुझे भेजा, इसकी गुंजाईश कदापि नहीं रहती।
मुझे मिले मैसेज को सुधार करते हुए मैं तो भगवान नीलकंठ को यही कहूंगा- `हैप्पी मैरिज एनिवर्सरी टू बम बम भोले´।
आप सब पर भगवान शिव और जगज्जननी पावॅती की मंगलमयी कृपा रहे, इन्हीं शुभकामनाओं के साथ अपनी अल्पज्ञता को सावॅजनिक करने के लिए क्षमा चाहता हूं।

Friday, February 29, 2008

मछली पकड़ना सिखाते तो और बात होती

अपने केन्द्रीय वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम ने आज शुक्रवार को चित्त (दिल) खोलकर बजट भाषण पढ़ा। जैसी कि अथॅशास्त्र के विद्वानों, राजनीति के जानकारों के साथ आम लोगों को उम्मीद थी, वित्त मंत्री ने सबकी सुविधाओं का ख्याल रखा, हां, देश की सुविधा का ख्याल रखना भूल गए।
मैंने किसी लेख में किसी महान विचारक के विचार कभी पढ़े थे कि आप यदि बच्चे को मछली पकड़ना सिखा देते हो तो वह जिंदगी में कभी भूखा नहीं रहेगा, लेकिन यदि उसे मछली पकड़कर-पकाकर खिलाते हो, तो वह सदैव ही इस आस में रहेगा कि बिना मेहनत के ही फल की प्राप्ति हो जाए, इस तरह उसकी उद्यमशीलता हमेशा-हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी।
आज सुबह बजट भाषण में जब किसानों की कजॅमाफी की घोषणा की गई तो सहसा यह दृष्टांत स्मरण हो आया। न जाने हमारी सरकारें जीवट के धनी किसानों की उद्यमशीलता का हरण कर उन्हें काहिल बनाने में क्यों जुटी है। पूवॅ प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के राज में भी किसानों का कजॅ माफ किया गया था, लेकिन उस कड़वे तथ्य को कैसे झुठला दूं जिसे बचपन में किताबों में पढ़ा था कि भारतीय कृषि मानसून का जुआ है। अब मानसून तो चुनावों के मौसम का ख्याल रखने से रहा, सो इसका कोई भरोसा नहीं कि कब इतना मेहरबान हो जाए कि फसलों के ऊपर से पानी बहने लगे और कभी इतना खफा हो जाए कि फसलों का कंठ ही सूख जाए। दोनों ही स्थिति में किसानों की कमर तो टूटनी ही है। ऐसे में किसानों की कजॅमाफी के मद में जो साठ हजार करोड़ रुपए की भारी राशि दी गई है, वह राशि यदि बाढ़ और सूखा से फसलों को बचाने की चिरस्थायी योजना पर खचॅ करने का प्रस्ताव रखा जाता तो हमेशा हमेशा के लिए किसानों का भला हो जाता। आज जब आधुनिक तकनीकी का बोलबाला है तो किसानों के हित में विज्ञान के अधिकाधिक उपयोग को प्रश्रय क्यों नहीं दिया जाता। सभी छोटे-बड़े किसानों को गांवों-कस्बों तक में उन्नत बीजों और उवॅरकों की सप्लाई सुनिश्चित क्यों नहीं की जाती। किसानों को आत्मनिभॅर बनाने के और जतन क्यों नहीं किए जाते। खेती के साथ उद्यानिकी को बढ़ावा देकर मानसून की अनिश्चितता से काफी हद तक बचा जा सकता है। बरसात के मौसम में जहां नदियों में आने वाला उफान अभिशाप बन जाता है, उसका रुख कम बारिश वाले राज्यों की तरफ मोड़कर उसे वरदान में तब्दील क्यों नहीं किया जाता। पूवॅ प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने शायद इसी उद्देश्य के मद्देनजर नदियों को जोड़ने का सपना देखा था, तो यदि उनकी सरकार चली गई तो आने वाली यूपीए सरकार ने उस सपने को सिरे से क्यों नकार दिया। क्या सत्तापक्ष और विपक्ष में नेवले और सांप जैसी दुश्मनी ही जरूरी है, क्या देश के व्यापक हित में विरोधी राजनीतिक दलों की योजनाओं पर अमल करना सत्तासीन राजनीतिक दल का कतॅव्य नहीं बनता।
किसानों के कजॅ माफ करने की घोषणा के बावजूद इतनी बड़ी राशि से केवल किसानों का ही भला होगा, इसकी क्या गारंटी है? क्या बिचौलिए इस राशि में अपना हिस्सा नहीं मार लेंगे? देश में भ्रष्टाचार का बोलबाला जिस रवानी पर है, उससे मुकाबला करना कैसे संभव हो सकेगा? खैर, किसानों और किसानी के जो हालात हैं, उस पर तो अलग से भी बहुत कुछ लिखा जा सकता है, मगर इतना तो कहा ही जा सकता है कि वित्तमंत्री ने देश के हित की कीमत पर अपनी पारटी के राजनीतिक हितों को जिस तरह तरजीह दी है, उसे देश का मतदाता अच्छी तरह समझता है। सुविधाओं के बदले ताली बजाने वाले हाथ चुनाव में आपके निशान पर ही ठप्पा लगाए या इलेक्ट्रॉनिक मशीन पर आपके चुनाव चिह्न वाला बटन ही दबाए...यह पब्लिक है सब जानती है।

Thursday, February 28, 2008

चिदम्बरम के घड़ियाली आंसू, बह मत जाना धार में


केंद्रीय वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम ने आम बजट से पहले गुरुवार को संसद में वषॅ 2007-08 का आरथिक लेखा-जोखा पेश करते हुए आरथिक सरवेक्षण की रिपोटॅ में देश में लगातार बढ़ रही महंगाई पर गहरी चिंता जताई। इतना ही नहीं, उन्होंने खाने-पीने की वस्तुओं की कीमतों में हो रही बढ़ोतरी के मद्देनजर महंगाई के और भी बढ़ने की आशंका से इनकार नहीं किया। सत्तानशीं ही यदि आशंका जताकर ही अपने फजॅ की इतिश्री कर लें, तो जनता का तो भगवान ही रखवाला है। आज जैसे हालात हैं, इसमें आम आदमी को दाल-रोटी मिलना भी मुश्किल हो गया है, बात दीगर है कि मालदार लोगों को मटर-पनीर थोक में मिल रहा है।
अब चिदम्बरम साहब को कौन समझाए कि इस महंगाई के लिए उत्तरदायी कौन है। यूपीए सरकार आने से पहले महंगाई कितनी कम थी, देश में आरथिक इसके गवाह देश के करोड़ों नागरिक हैं और ये सभी नागरिक मेरी तरह भाजपा के वोटर नहीं हैं, लेकिन सच्चाई के आईने को तो वे तोड़ने से रहे। आपको याद होगा कि उस समय ब्याज दरों में भारी कमी के कारण कितनी अधिक संख्या में हाउसिंग लोन लेकर लोगों ने अपने घरों के सपने साकार किए थे। उस समय ब्याज दरें कम होने के बावजूद जिन्होंने फिक्स्ड रेट पर
हाउसिंग लोन नहीं कि फ्लोटिंग रेट रहेगी तो फायदे में रहेंगे, ऐसे लोगों के सपनों पर यूपीए सरकार की नीतियों ने जो हमला किया, उसके बाद वे चीखने लायक भी नहीं रहे।
गिनाने के लिए तो बहुत सी बातें हैं जिनका असर यूपीए की सरकार के दौरान आम आदमी को भुगतना पड़ रहा है। अब अंतिम साल में ऐसा लग रहा है कि चिदम्बरम का चित्त भी शुक्रवार को डोलेगा और वे आगामी चुनाव में यूपीए की चेयरपसॅन सोनिया गांधी की सोणी सी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मनमोहनी छवि बनाने के लिए कुछ ऐसा बजट लाएंगे कि आम आदमी को कुछ राहत मिल पाए। वैसे तो यह बजट आम आदमी के लिए आंकड़ों का मकड़जाल ही होता है, उसे तो बस इतने से ही मतलब होता है कि उसके जरूरत की चीजें कितनी सस्ती हो पाती हैं औऱ उसका जीवन कितने सहज-सरल तरीके से बीत सकता है। अगर कुछ ऐसा हुआ भी (जिसकी अत्यधिक आशा नहीं की जानी चाहिए) तो भी कांग्रेस नीत यूपीए सरकार का बेड़ा गकॅ होने से कहां तक बच पाता है, यह तो इस देश का वोटर और आने वाला समय ही बताएगा।

Tuesday, February 26, 2008

थोड़ा है थोड़े की जरूरत है

महज घोषणाएं ही नहीं, उन्हें पूरा करने की इच्छाशक्ति भी हो
अभी चार-पांच दिन पहले एक मित्र ने बहुत आग्रह किया घर आने के लिए। महीनों से उन्हें गोली दे रहा था, मगर इस बार उन्होंने जिस कारण से बुलाया था, कि नकारना मुश्किल था। मित्र के वृद्ध माता-पिता सुदूर बिहार के किसी गांव से गुलाबीनगर आए हुए थे और उनसे आशीष लेने का सुअवसर मैं भी नहीं छोड़ना चाहता था। तो साहब अपने साप्ताहिक अवकाश की शाम को श्रीमतीजी और बच्चे को लेकर उनकी सेवा में पहुंच गया। मेरा बच्चा मित्र के बच्चों के साथ खेलने के लिए ऐसे भागा जैसे जेल से छूट गया हो, श्रीमतीजी मित्र की माताजी और पत्नी के साथ शायद अपने ददॅ बांटने लगी और बचा मैं तो मित्र से कम, उनके पिताजी से मुखातिब होकर उनसे बातें करने में मशगूल हो गया।

दरअसल पीढ़ियों में अंतराल को महसूस करने की मेरी सहज पिपासा कभी शांत नहीं हो पाती। पिताश्री का कहना था कि अब गांव में भी पहले से हालात नहीं रहे। भौतिक और मानसिक दोनों ही स्तरों पर तीव्रतर बदलाव हो गए हैं। बांस और (खर) फूस की कोई कद्र नहीं है, इनसे छप्पर बनाने वाले कारीगर बेरोजगार हो रहे हैं। हां, ईंट-गाड़े के कंक्रीटों के जंगल गांवों में भी उग आए हैं। भित्ति के घर तो अब दिखते ही नहीं। नए बनते नहीं और पुराने जो थे, उन्हें बाढ़ का पानी बहा ले गए। उन्होंने बड़े ही व्यंग्यपूणॅ लहजे में कहा कि भैंस चराता किशोर भी साथ में मोबाइल लेकर चलता है। मोबाइल की उसके लिए क्या उपयोगिता या उपादेयता है,यह सवाल उनके लिए भी अनसुलझा था, मैं भला क्या जवाब दे पाता। गुलाबीनगर में व्याप्त महंगाई पर बात छिड़ी तो उनका कहना था कि गांव में भी आटा 15-16 रुपए किलो के हिसाब से मिलता है। सामान्य चावल के दाम की शुरुआत ही 18-20 रुपए किलो से होती है। सब्जियों के भाव भी यहां से कुछ कम नहीं हैं। इसके बाद जब मैंने उनसे गांव के और भी हालात के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि गांवों में रोजगार नहीं होने के कारण बच्चे किशोर होने से पहले ही परिवार का बोझ उठाने के लिए अपने बड़े भाई या पिता या फिर किसी रिश्तेदार की अंगुली पकड़कर शहरों की राह पकड़ लेते हैं। (फिर बड़े शहरों में राज ठाकरे और बाल ठाकरे जैसों के बयानों के बाद उनकी क्या दुःस्थिति होती है, यह किसी से छिपा नहीं है। )
गांव की इस प्रगति के बावत पूछे जाने पर उन्होंने संतोष जताया कि हालात अवश्य ही सुधरे हैं। पुराने दिनों की याद ताजी करते हुए उन्होंने कहा कि अब गांव में भूले से भी कोई गूलर के फलों से अपनी भूख नहीं मिटाता। महुआ के रस से बनने वाले देसी दारू के बारे में आप सबने सुना होगा, लेकिन सूखे हुए महुए की खीर और लट्टा से गांवों में गरीब तबके के लोग कभी अपनी भूख भी मिटाया करते थे, लेकिन अब तो बीपीएल या उससे भी आगे अन्त्य स्तर पर रहने वाला भी मड़ुवा-सामा-कादो ही क्या, मकई की रोटी भी खाना पसंद नहीं करता। (यह बात दीगर है कि फाइव स्टार होटलों और बड़ी-बड़ी पारटियों में आजकल मक्के की रोटी अमीरों की पहली पसंद हुआ करती है )। कपड़े-लत्ते का स्तर भी उसी तुलना में सुधरा है, इसमें कोई शक नहीं है।
इतना सब सुनने के बाद मैं यह सोचने को विवश हो गया कि आदमी भले जिस भी स्थिति में गुजर-बसर कर रहा हो, अपनी बेहतरी के लिए प्रयासरत रहता ही है। यदि हमारे राजनेताओं में भी दृढ़ इच्छाशक्ति होती तो गांवों का ही क्या, पूरे देश का नजारा आज कुछ और होता। आजादी के 60 साल बाद भी हमें आज जो एपीएल-बीपीएल की रेखा खींचनी पड़ रही है और अन्त्योदय के बारे में इतनी मशक्कत करनी पड़ती है, वैसा कुछ नहीं होता। जनता तो अपने स्तर पर पसीने बहाते रही, लेकिन जनारदन ( सत्तासीन राजनेताओं) ने उनकी बेहतरी के लिए उस शिद्दत से प्रयास नहीं किए। आम बजट में आज तक जो सब्जबाग दिखाए गए, यदि उन्हें हकीकत में तब्दील करने का जीवट होता, तो कुछ भी मुश्किल नहीं था। समय तो अब भी नहीं बीता है, 29 फरवरी को केन्द्रीय वित्तमंत्री पी. चिदम्बरम बजट रखने वाले हैं, चूंकि यह उनकी सरकार का अंतिम साल है, इसलिए सभी को काफी उम्मीदें हैं, आशा है, वे लॉलीपॉप नहीं देंगे, बल्कि देश को विकास के राह पर अग्रसर करने की सच्ची कोशिश अवश्य ही करेंगे।
राजनेता से प्रबंधन गुरु बने करिश्माई नेतृत्व के धनी बड़बोले रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने लगातार पांचवीं बार किराया नहीं बढ़ाकर अपने नाम रिकॉडॅ बनवा लिया, लेकिन चिदम्बरम के लिए शायद राह इतना आसान नहीं होगा। फिर भी सोचने में क्या जाता है और हम सोचे ही क्यों, ईश्वर से प्राथॅना करें कि वह चिदम्बरम के हृदय में सच्चिदानंद का वास करे जो जनारदन बनकर जनता के ददॅ को दूर करने को तत्पर दिखें।

Monday, February 25, 2008

जुगाड़ टैक्नोलॉजीः अपना हाथ जगन्नाथ

अभी कुछ दिन पहले ट्रेन में करीब डेढ़ हजार किलोमीटर यात्रा करने का सुयोग मिला। सहयात्री सरल औऱ मधुर स्वभाव के थे, इसलिए यात्रा मंगलमयी रही। हालांकि भारतीय ट्रेन में यात्रा के दौरान हमेशा सुखद अनुभव नहीं होते। हमारे स्वनामधन्य रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव अपनी प्रबंधन कला के लिए नाम कमाने के अभियान में जुटे हैं और एक रिकाडॅ बनाने की ओर अग्रसर हैं। मीडिया में ऐसी खबरें आ रही हैं कि लगातार चार साल तक उन्होंने अपने रेल बजट में किराया नहीं बढ़ाया और शायद पांचवीं बार भी वे ऐसा ही करेंगे।
अब पिछली गली से उन्होंने रेलयात्रियों से कितनी वसूली की है,इसका तो प्रमाण उपलब्ध है ही। रेलवे की लाखों एकड़ जमीन के व्यावसायिक उपयोग से होने वाली आमदनी हो या फिर उनसे पहले वाले रेल मंत्री नीतीश कुमार के दूरदरशितापूणॅ फैसलों की क्रियान्विति का सुफल लालू जी को मिल रहा हो, (हालांकि मैं न तो नीतीश कुमार का मुरीद हूं और न ही समथॅक, लेकिन यह मानने को विवश जरूर हूं कि लालूजी यदि प्रबंधन में इतने ही कुशल होते तो पंद्रह वषॅ के प्रत्यक्ष परोक्ष शासनकाल में बिहार की वह दुरदशा नहीं होती, जैसी हुई। )
खैर, यह तो रेल मंत्री का विशेषाधिकार है कि वे किस तरह रेलवे की आमदनी बढ़ाते हैं और किस तरह सब कुछ करने के बावजूद अपनी लोकप्रियता का डंका पीटते रहते हैं।
मैं जिस बात को लेकर मुखातिब होना चाहता था उससे शायद डिरेल हो गया हूं, क्षमा करेंगे। पिछले बजट में लालूजी ने ट्रेनों के शयनयान वाली बोगियों में बथॅ की संख्या 72 से 81 करने की घोषणा की थी। अब बोगियों की लंबाई तो बढ़नी नहीं थी सो नहीं बढ़ी, हां, उसी में बथॅ की संख्या बढ़ा दी गई। मेरा ऐसी ट्रेन में यात्रा करने का यह पहला अनुभव था, सो डिब्बे में जगह संकुचित होने के कारण परेशानी तो झेलनी ही पड़ी। इसके अलावा खिड़की के शीशे भी गायब थे। हाड़ कंपाती सरदी में यात्रा का सारा मजा काफूर हो जाता, लेकिन भला हो मुझसे पहले यात्रा करने वालों का, जिन्होंने शटर टाइप खिड़कियों के छिद्रों को अखबार के टुकड़ों से बखूबी भरकर हवा के प्रवेश पर रोक लगा दी थी। शताब्दी और राजधानी में यात्रा करने वालों के मनोरंजन का ध्यान ही लालूजी रख पाते हैं, अब जनता क्लास क्या करे। वह तो अपने स्तर पर ही मनोरंजन के साधन जुटाएगी। सो एक बैंक कमॅचारी सहयात्री ने फिलिप्स की रेडियो पर फरमाइशी गीतों के कायॅक्रम सुनवाए तो बाकी सहयात्रियों के एफएम वाले मोबाइल सेट भी अपना दायित्व बखूबी निभा रहे थे। ये है अपनी आम जनता की जुगाड़ टैक्नोलॉजी, जो कभी किसी का इंतजार नहीं करती, जिसके लिए अपना हाथ ही जगन्नाथ हुआ करता है।
जहां तक मैं मानता हूं,आरक्षित श्रेणी में यात्रा करने वाले रेल किराये में प्रति सौ-दो सौ किलोमीटर के हिसाब से दो-पांच रुपए की बढ़ोतरी को कदापि बुरा नहीं मानेंगे, यदि उन्हें टिकट आरक्षित करवा लेने के बाद यात्रा के दौरान किसी दुखद अनुभव का सामना नहीं करना पड़े। पैंट्री कार में अच्छा खाना मिले, डिब्बे के अंदर स्वच्छता के साथ ही शौचालयों की नियमित साफ-सफाई हो, बीच रास्ते चलते हुए शौचालयों के नलों की टोंटी न सूख जाएं। बिना किसी लूट-मार के, सुरक्षा के लिए तैनात तथाकथित पुलिस के जवानों की ज्यादतियों के बिना यात्री सुरक्षित अपने गंतव्य पर पहुंच जाएं, टीटी बिना बात भोले-भाले ग्रामीण अंचल के यात्रियों को टिकट होने के बावजूद परेशान न करें। शयनयान श्रेणी की प्रतीक्षा सूची में यात्रियों की संख्या सुनिश्चित की जाए और यदि फिर भी यह सूची लंबी होती है तो प्रतीक्षा सूची के यात्रियों के लिए अलग से बोगी लगाने की व्यवस्था की जाए।
ये तो मेरे अरमान हैं, जिसे आपलोगों की समानानुभूति (empathy) भले ही मिल जाए, लालू जी को तो जो करना था, वे कर चुके, जिससे मंगलवार सुबह हमारा सामना होगा। देखना है, लालूजी क्या-क्या लाते हैं हमारे लिए अपनी छुक-छुक गाड़ी में।

Saturday, February 23, 2008

कीचड़ कैसे धुलेगा कीचड़ से

सपा नेता अबू आजमी और मनसे प्रमुख राज ठाकरे के बीच शुरू हुए विवाद की चिनगारी अब लपटों की शक्ल अख्तियार कर चुकी है। शुक्रवार को बिहार विधानसभा में बड़बोले लालू यादव की पारटी राजद के विधायकों के साथ विपक्ष ने राज्यपाल आर. एस. गवई का जमकर विरोध किया और राज्यपाल वापस जाओ के नारे लगाने लगे। गवई का यह दोष है कि वे मराठी हैं। नारे लगा रहे विधायकों की शिकायत थी कि राज्यपाल ने अभिभाषण में मुंबई और महाराष्ट्र में हुए बिहारियों और उत्तर भारतीयों पर हमले की चरचा क्यों नहीं की। अब इन बददिमाग बुद्धिशून्य विधायकों को कौन बताए कि अभिभाषण राज्यपाल खुद तैयार नहीं करता, बल्कि सत्तारूढ़ दल ही तैयार करता है। अब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनकी पारटी व सहयोगी दलों ने यदि अभिभाषण में इस पचड़े को नहीं डालना चाहा तो इसमें बुरा क्या है। क्या अभिभाषण में मुंबई में बिहारियों पर हुई ज्यादतियों की चरचा करने से उनका जख्म दूर हो जाता। क्या अभिभाषण में इसके जिक्र से बिहारियों या उत्तर भारतीयों को रोजगार के अवसर उपलब्ध हो जाएंगे। हां, नीतीश कुमार की मंशा यदि सही है तो वे बिहार में ही बिहारपुत्रों को रोजगार उपलब्ध कराने के मिशन पर अवश्य ही काम कर रहे होंगे। और यही उसका सही प्रतिवाद भी होगा जो कुछ मुंबई, पुणे, नासिक या और भी कहीं हुआ।
पटना में आर. एस. गवई का विरोध हुआ तो भला मुंबई में राज ठाकरे कैसे चुप रहते। उन्होंने तो मराठियों के आत्मसम्मान की रक्षा का ठेका लिया हुआ है। उन्होंने सोनिया गांधी से बिहारियों को बिहार भेजने की मांग कर डाली, जैसे कौन कहां रहेगा और क्या करेगा, यह सोनिया गांधी और राज ठाकरे ही मिलकर तय करेंगे। हां, केंद्र में शासन चला रहे सबसे बड़े दल कांग्रेस की मुखिया होने के कारण उन्होंने और उनकी मनमोहनी सरकार ने उस समय जो चुप्पी बनाए रखी थी, उसी ने राज ठाकरे को उनसे यह मांग करने की हिम्मत दे डाली है।
इतना कुछ होने के बाद पुराना अनुभव कहता है कि इन वाद-विवादों के बावजूद बड़ी हस्ती वाले राजनेताओं का तो इससे कुछ नहीं बिगड़ेगा, संभव है कि कुछ दिनों बाद सब कुछ शांत हो जाएगा और ये तथाकथित हस्तियां इन बातों को भुलाकर फिर किसी व्यक्तिगत आयोजन या सावॅजनिक समारोह में गलबहियां डाले दिख जाएं। मुसीबत तो उन गरीब उत्तर भारतीयों की हुई जो अपनी रोजी-रोटी (चाहे जैसी ही रही हो) को छोड़कर वापस अपने देस जाने को विवश हुए और वहां रोजगार ही क्या, दो जून की रोटी को भी मोहताज होंगे। उनके पेट भरने की जिम्मेदारी न तो लालू यादव लेंगे और न ही अमर सिंह या अबू आजमी। इसका दूसरा पहलू भी आज ही किसी अखबार में दिखा कि मुंबई और महाराष्ट्र के अन्य शहरों के उद्योगों को मजदूरों की कमी का सामना करना पड़ रहा है। हो गया न सब गुड़ गोबर। जिसे काम चाहिए उसका काम छिन गया औऱ उद्योगों को मजदूर नहीं मिल पा रहे। अब बढ़ाते रहो विकास दर। वित्त मंत्री पी. चिदंबरम कितना भी कुछ कर लें, इन दुष्परिणामों से देश को कैसे बचा पाएंगे।
एक पुराना वाकया याद आता है। तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के नेतृत्व में चल रही सरकार के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव के दौरान भारी मन से युवा तुकॅ के इस नेता ने कहा था-
गैर मुमकिन है कि हालात की गुत्थी सुलझे
अहले दानिश ने बड़ा सोचकर उलझाया है।
लगता है एक बार फिर वैसी ही परिस्थितियां बन आई हैं हमारे प्यारे देश के सामने। ऊपरवाले से प्राथॅना है कि वही सद्बुद्धि दे इन बददिमागों को और भारत देश महान जैसा है वैसा ही बना रहे-अनेकता में एकता का परचम लहराने वाला।