केबीसी के मौजूदा सीजन में जहानाबाद के सनोज राज को पहला करोड़पति बनने का गौरव प्राप्त हुआ था और अब बृहस्पतिवार के एपिसोड में मधुबनी के गौतम कुमार झा पंद्रह सवालों के जवाब देकर करोड़पति बने।
रेलवे में इंजीनियर गौतम से जब बिग बी अमिताभ बच्चन ने पूछा कि बिहार के युवाओं में यूपीएससी के प्रति अधिक आकर्षण होता है तो गौतम जी ने कहा कि वहां बचपन से ही सबका लक्ष्य यूपीएससी की परीक्षा पास करना ही होता है।
वे बोले- बिहार में बच्चे जब अल्फाबेट्स सीखते हैं तो उनके दिमाग में एबीसीडी के बाद सीधे यूपीएससी ही आता है। गौतम की तमन्ना भी यूपीएससी परीक्षा पास करके आईएएस अधिकारी बनने की है। गौरतलब है कि जहानाबाद के सनोज राज भी संप्रति सरकारी नौकरी करते हुए यूपीएससी एग्जाम की तैयारी में जुटे हैं। काश! बिहार सरकार वहां के सभी बच्चों को शिक्षा का उचित माहौल मुहैया करा पाती।
17October 2019 Lucknow
Saturday, October 26, 2019
मगध के बाद मिथिला का बजा डंका
केबीसी के मौजूदा सीजन में जहानाबाद के सनोज राज को पहला करोड़पति बनने का गौरव प्राप्त हुआ था और अब बृहस्पतिवार के एपिसोड में मधुबनी के गौतम कुमार झा पंद्रह सवालों के जवाब देकर करोड़पति बने।
रेलवे में इंजीनियर गौतम से जब बिग बी अमिताभ बच्चन ने पूछा कि बिहार के युवाओं में यूपीएससी के प्रति अधिक आकर्षण होता है तो गौतम जी ने कहा कि वहां बचपन से ही सबका लक्ष्य यूपीएससी की परीक्षा पास करना ही होता है।
वे बोले- बिहार में बच्चे जब अल्फाबेट्स सीखते हैं तो उनके दिमाग में एबीसीडी के बाद सीधे यूपीएससी ही आता है। गौतम की तमन्ना भी यूपीएससी परीक्षा पास करके आईएएस अधिकारी बनने की है। गौरतलब है कि जहानाबाद के सनोज राज भी संप्रति सरकारी नौकरी करते हुए यूपीएससी एग्जाम की तैयारी में जुटे हैं। काश! बिहार सरकार वहां के सभी बच्चों को शिक्षा का उचित माहौल मुहैया करा पाती।
17October 2019 Lucknow
नीलकंठ देखें, नीलकंठ बनें
बचपन के दिनों में शारदीय ‘नवरात्र’ घर के बड़े-बुजुर्गों के लिए नौ दिनों तक चलने वाला आध्यात्मिक अनुष्ठान होता था, लेकिन हम बच्चों के लिए तो यह उत्सव प्रतिमाओं के निर्माण के साथ ही शुरू हो जाता। प्रतिमा के आकार लेने की इस कला के हरेक पहलू को बारीकी से देखने की ललक बरबस ही हमें वहां खींच ले जाती थी। नवरात्र के दौरान रोज सुबह दुर्गा सप्तशती के पाठ के बाद प्रसाद में मिलने वाले खीरा का स्वाद आज तक नहीं भूला। दुर्गा पूजा का मेला सप्तमी से परवान चढ़ता। इस दौरान किसी साल नाटक, किसी साल नौटंकी तो किसी साल अन्य आयोजन होते। ... और फिर पूजा की पूर्णाहुति के साथ आती विजयदशमी।
ऐसा माना जाता है कि विजयदशमी की सुबह नीलकंठ पक्षी के दर्शन करने से पूरे साल सभी कार्य सफलतापूर्वक संपन्न होते हैं। इसलिए हम सभी भाई-बहन तड़के ही स्नान कर आस-पड़ोस के पेड़ों पर निगाहें टिका देते थे। नीलकंठ-दर्शन के लिए हमारी व्यग्रता चरम पर होती थी। ... और शायद नीलकंठ पक्षी को भी हमारी व्यग्रता का अहसास हो जाता था। तभी तो देखते ही देखते हममें से किसी न किसी की नजर नीलकंठ पर पड़ जाती और वह दूसरों को भी यह दर्शन-लाभ देकर खुद को श्रेष्ठतर समझता।
नीलकंठ पक्षी की किस विशेषता के कारण उसका दर्शन शुभ फलदायक माना जाता है, आज तक नहीं समझ पाया। हां, ऐसी मान्यता है कि समुद्र मंथन के बाद निकले हलाहल (जहर) के दुष्प्रभाव से संसार को बचाने के लिए भगवान शिव ने इसे अपने कंठ में धारण कर लिया था। इससे उनका कंठ नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाने लगे। और उनका नाम मिल जाने मात्र से नीलकंठ पक्षी की महत्ता इतनी बढ़ गई।
...तो हम भी भगवान शिव का अनुसरण करते हुए अपने जीवन को अर्थपूर्ण बना सकते हैं। इसके लिए किसी और के हिस्से का जहर पीने की जरूरत नहीं है। विजयदशमी पर अपनी सामर्थ्य के अनुसार किसी की परेशानी कम करने में सहायक बनकर हम नीलकंठ की भूमिका निभाकर अपने जीवन को सार्थक बना सकते हैं। जरूरी नहीं कि यह कार्य किसी को आर्थिक सहायता देकर ही किया जाए। किसी के मुश्किलों से घिरे होने पर उससे सांत्वना और दिलासा के दो शब्द बोलकर भी हम उसकी पीड़ा कम कर सकते हैं। किसी मेधावी बच्चे को सफलता के लिए प्रोत्साहित करने का काम भी कम महत्वपूर्ण नहीं होता। कई सारे लोग थोड़ी-थोड़ी मदद करके बहुत बड़ी मुसीबत में फंसे व्यक्ति को इस कठिन हालात से उबार सकते हैं। देश-काल-परिस्थिति के हिसाब से सहयोग के नए आयाम खोजे जा सकते हैं। ... तो आइए...इस विजयदशमी पर हम नीलकंठ के दर्शन के साथ खुद भी नीलकंठ बनें।
08 October 2019 Vijayadashmi
काकू ने करोड़पति बनकर रचा इतिहास
पैसे की बेकद्री
शरबत के बहाने
मंझले की मुसीबत
...सिर्फ अंगूठे हैं हम लोग
साइड लोअर का सुख
धतपत हेमामालिनी...
पहली संतान के साथ दूसरी रेल यात्रा
लाली लाली डोलिया में लाली रे दुल्हनिया...
प्यार बांटते चलो...
रिश्तों में बढ़ती दूरी
ससुरारि पियारि भई जब ते...
एक पीढ़ी का अवसान
अविश्वास की विरासत
पिता की फ़िक्र, कैसे करें ज़िक्र
वैशाली से वैशाली की यात्रा
ट्रेन का सफर : गजब का कॉकटेल
जुग जुग जीओ
जो कुछ भी नहीं जानता, वही शहंशाह
संगीत का आठवां सुर
ज्योति से ज्योति जलाते चलो
मन जब हर तरफ से परेशान हो जाता है तो संगीत के सात सुर उसे सुकून का अहसास कराते हैं। यही संगीत जब किसी जरूरतमंद और उसके परिवार के भरण-पोषण का जरिया बनता है तो आठवां सुर बनकर उसके जीवन में नया रस घोल सकता है।
जुलाई के अंत में लखनऊ से जयपुर जाने के दौरान मरुधर के अंतहीन इंतजार के दौरान देर रात करीब दो बजे मैंने चारबाग स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर हरदोई के भेलावां निवासी दृष्टिहीन बिजनेस कुमार को मासूम बिटिया के साथ देखा था। पिता-पुत्री के बीच क्षणिक मर्मस्पर्शी संवाद को मैंने अपनी फेसबुक वॉल पर पोस्ट भी किया था। सहज ही मेरे मन में उनके लिए कुछ करने के भाव उत्पन्न हुए। चर्चा के दौरान पता चला कि संगीत में उनकी रुचि है। महत्वाकांक्षा और खुद्दारी के धनी इस शख्स से मैंने उनका मोबाइल नंबर ले लिया।
हालांकि व्यक्तिगत व्यस्तताओं में कुछ इस कदर उलझ गया कि...। हाल ही जब मैंने हरदोई जिले के ही रहने वाले समाजसेवा में अग्रणी और दफ्तर में मेरे सहयोगी Vaibhav Shanker वैभव अवस्थी जी से इस बारे में बात की तो बिजनेस कुमार के जीवन में छाए अंधियारे को दीपावली पर स्वरोजगार के दीपक से रोशन करने की योजना बनी। एक से बढ़कर एक मददगार आगे आने लगे। लखनऊ में मेरे मकान मालिक श्री कृष्ण स्वरूप माथुर, मेरे लंगोटिया यार Amrendra Mishra अमरेंद्र कुमार मिश्र के साथ ही दफ्तर के सहयोगी सर्वश्री सुधीर कुमार Sudhir Kumar, वैभव शंकर अवस्थी, सुबीर कुमार शर्मा Subeer Sharma, पुनीत गुप्ता Puneet Gupta, दीपा जी, सौरभ दीक्षित Saurabh Dixit, अतुल मोहन सिंह , महावीर पाराशर Mahaveer Parashar , आदर्श प्रकाश सिंह Adarsh Prakash Singh, विवेक गुप्ता Vivek Gupta और मनोज श्रीवास्तव Manoj Srivastava ने जनकल्याण के इस यज्ञ में आर्थिक सहायता की आहुति दी।
...और इसका सुपरिणाम यह हुआ कि शनिवार को बिजनेस कुमार को लखनऊ बुलाकर उन्हें उनकी पसंद का वाद्य यंत्र सौंप दिया गया। बिजनेस कुमार की अर्द्धांगिनी भी दृष्टिहीन हैं, लेकिन ईश्वर की कृपा से उनकी दोनों बच्चियां और सबसे छोटा बेटा पूरी तरह से स्वस्थ हैं। ऐसे में उनकी जिंदगी को पटरी पर लाने के लिए मदद की यह मुहिम जारी रहेगी।
जड़ से जुड़ाव
सबसे ऊंची प्रेम सगाई..
हां कि ना
मां डांटती ही नहीं, भगा भी देती है
गणित का ज्ञान : अभिशाप या वरदान
सितारों के आगे जहां और भी है...
पिता
खुशियों का सोता छिपा है जहां...
गुस्सा कैसे थूक दें
सूख गया स्नेह का एक और सोता

नदी की धारा को रोक पाना आसान होता है। देश-विदेश में विशालकाय बांध बनाकर बड़ी-बड़ी नदियों की धाराएं रोकी गई हैं, लेकिन समंदर को...उसका विस्तार इतना अधिक होता है कि उसे बांध पाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन होता है। वहीं, नदियां अपने आंचल में मीठे जल का भंडार समाये होती हैं और मिठास को सीमा में बांधना कहीं आसान होता है। वहीं, नदियों का मीठा जल भी समुद्र में मिलने के बाद अपनी तासीर खो देता है। ...और फिर उस खारेपन के पारावार को किसी सीमा में बांध पाना दुश्वार हो जाता है।
समंदर का यह खारापन हमारी आंखों की गहराइयों में भी समाया होता है, जिससे इसका स्वाद भी नमकीन हो जाता है। गमों की मार जब पड़ती है तो आंखों से यह नमक आंसुओं में घुलकर गालों से होता हुआ होठों तक का सफर करता हुआ बरबस ही अपने स्वाद का अहसास कराने लगता है। ऐसे क्षणों में आंसुओं की लड़ी थमने का नाम ही नहीं लेती।
जीवन में कुछ क्षण ऐसे भी आते हैं, जब न चाहते हुए भी हम दुख के समंदर में उठ रही लहरों में डूबने-उतराने को विवश हो जाते हैं। पिछले कुछ दिनों से ऐसे ही दौर से गुजर रहा हूं मैं। इसी का नतीजा है कि न चाहते हुए भी जीवन में एक मौन सा पसर गया है।
...और वे अंतिम सफर पर चले गए
23 मार्च को लखनऊ से जयपुर से लखनऊ जा रहा था। ट्रेन लेट होने से मूड उखड़ा हुआ था। सो बैटरी खत्म होने के डर से मैंने फोन को स्विच ऑफ कर दिया था। दोपहर करीब 12 बजे आगरा पहुंचने के बाद फोन को ऑन किया तो वॉट्सएप पर मैसेज दिखा-मंझली मामी नहीं रहीं। मन खिन्न हो गया। अभी छह-सात दिन पहले ही तो उनसे बात की थी। सब कुछ ठीक था, फिर अचानक ऐसा कैसे हो गया...? उनकी ममता को याद कर बरबस ही दिल रो उठा। इसके तीसरे ही दिन एक और दुखद संदेश मिला कि बड़े मामा नहीं रहे। ऐसे में दुख दोहरा हो गया, लेकिन नियति के आगे किसकी चली है। परिस्थितियों ने पांवों में इस कदर बेड़ियां पहना दीं कि इन महान विभूतियों के अंतिम दर्शन की कौन कहे, इनके श्राद्धकर्म में भी शामिल नहीं हो सका। परमपिता परमेश्वर इन्हें अपने चरणों में स्थान प्रदान करें ।
05 April 2018
नई पीढ़ी : घटती दृष्टि, बढ़ता विजन
पर उपदेश कुशल बहुतेरे
आधी आबादी : बढ़ता वजूद
जी तो करता है, सल्फॉस खा लूं
बदलाव से ही मिटेगी बदहाली
मातृदेवो भव से सेक्रेट सुपर स्टार तक
उर्मिला की अमर परंपरा
तिलकुट भरबे
तेरा दर्द न जाने कोय
चिट्ठी वाले अंकल
गांती की गरमाहट
घटता संवाद, परेशानी का सबब
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