Sunday, December 24, 2017
जो जितना है दूर मही से, उतना वही बड़ा है...
बस से बंगलोर-5
बस से बंगलोर-4
बस से बंगलोर-3
बस से बंगलोर-2
बस से बंगलोर -1
कल्पना बनी हकीकत
स्कूल के दिनों में अमूमन हर परीक्षा में दो विषयों पर निबंध पूछे जाते थे। पहला, यदि मैं प्रधानमंत्री होता और दूसरा, मेरी पहली हवाई यात्रा। दोनों के ही जवाब विशुद्ध कल्पना पर आधारित होते थे। चूंकि गुरुजी के लिए भी ये दोनों ही विषय हकीकत से परे थे, इसलिए काम भर के अंक मिल ही जाते थे। सवा अरब देशवासियों की तरह पहला प्रश्न तो अब भी कल्पना में ही है, मगर हवाई सफर पिछले दिनों हकीकत में तब्दील हो गया।
मेरे परम मित्र पप्पूजी Amrendra Mishra की बिटिया के एंगेजमेंट में बंगलोर जाना था। ट्रेन से जाने-आने में ही 90 घंटे से अधिक लग जाते, ऐसे में कम से कम हफ्ते भर की छुट्टी चाहिए होती। इसलिए समय के साथ ही पैसे बचाने के लिए चार महीने पहले ही एयर टिकट बुक करा लिया था। बाकी परेशानी क्रेडिट कार्ड ने दूर कर दी।
हवाई जहाज तो दूर, अब तक हवाई अड्डा भी नजदीक से नहीं देखा था। ट्रेन से गुजरते हुए दूर से ही पटना, आगरा में हवाई अड्डे पर खड़े विमान ही देखे थे। ऐसे में मुझसे पहले हवाई सफर का लुत्फ उठाने वाले मित्रों से जरूरी जानकारी हासिल की।
लखनऊ से सुबह छह बजे फ्लाइट थी, सो दफ्तर से काम खत्म करने के बाद रात दो बजे निकल गया। साथ काम करने वाले मित्र ने स्कूटी से अमौसी एयरपोर्ट ले जाकर छोड़ दिया। वहां रोशनी की जगमगाहट तो अच्छी-खासी थी, लेकिन इक्के-दुक्के सुरक्षाकर्मी के अलावा सन्नाटा पसरा था। टिकट और आधार कार्ड दिखाकर अंदर दाखिल हो गया। मोबाइल पर फेसबुक-वॉट्सएप के सहारे इंतजार के अलावा और कोई उपाय नहीं था। अधिक इस्तेमाल से स्मार्ट फोन की बैटरी कहीं दम न तोड़ दे, इसलिए कादंबिनी के पन्ने पलटता रहा।
(क्रमश:)
16 दिसंबर 2017
( 25 नवंबर 2017 के हवाई सफर का हासिल )
Thursday, October 19, 2017
ममता का सिमटता साया
पहले सीटियां, और फिर सिसकियां
हमबिस्तर...हमराही...
टर्निंग पॉइंट
धोती-कुर्ता वाले इंग्लिश मैन
सोमवार सुबह नींद खुलने के बाद से ही मां से बात करने के लिए कई बार गॉंव फोन किया, लेकिन नेटवर्क डिस्टर्ब होने के कारण कॉल जा ही नहीं रही थी। करीब 10 बजे फोन लगा तो बहूने बताया कि मां घर पर नहीं हैं। सोनेलाल चाचा के अंतिम दर्शन के लिए गई हैं। यह सुनते ही सन्न रह गया। हाई स्कूल के जमाने से लेकर पिछली फरवरी में उनसे हुई मुलाकात तक का हरेक पल दिमाग में धमाचौकड़ी करने लगा।
गांव के मिडिल स्कूल से छठी पास करने के बाद ब्लॉक मुख्यालय पातेपुर स्थित श्री रामचंद्र उच्च विद्यालय में एडमिशन लिया था, जहां सोनेलाल बाबू अंग्रेजी पढ़ाते थे। अंग्रेजी के विद्वान होने के बावजूद वे धोती-कुर्ता ही पहनते थे। उनके अनुशासन का ऐसा असर था कि स्कूल टाइम में कोई भी विद्यार्थी धोखे से भी बरामदे में घूमता या गप्पें लड़ाता नहीं दिखता था।
उस जमाने में अंग्रेजी की औपचारिक पढ़ाई छठी कक्षा से ही शुरू होती थी। इक्के-दुक्के छात्र ही व्यक्तिगत रूप से अपने घर पर अंग्रेजी की अनौपचारिक शिक्षा ले पाते थे। ऐसी पृष्ठभूमि वाले बच्चों को वे ऐसी घुट्टी पिलाते कि साल-दो साल में ही उसके मन से अंग्रेजी का डर पूरी तरह से गायब हो जाता था। आठवीं के बाद तो उन्होंने अंग्रेजी की क्लास में कभी हिंदी शब्दों का प्रयोग नहीं किया। पाठ को पढ़ाने के बाद अंग्रेजी में ही उसे एक्सप्लेन करते, लेकिन लहजा इतना सहज होता कि विद्यार्थियों को कतई परेशानी नहीं होती। बच्चों में अंग्रेजी ग्रामर के ज्ञान का बीजारोपण करने वाले सोनेलाल बाबू नाउन, प्रोनाउन, वर्ब, एडवर्ब आदि इस तरह आत्मसात करा देते कि सोते से भी जगाकर कोई पूछ ले तो बच्चा नहीं अटके। आज भी जब कभी अंग्रेजी में कुछ लिखते हुए वर्ब के तीनों रूप प्रजेंट, पास्ट और पास्ट पार्टिसिपल में किसी का इस्तेमाल करना होता है तो बरबस ही वो दिन स्मृति पटल पर घूमने लगते हैं जब उन्हें ये तीनों रूप सुनाया करता था।
हमारे गांव में ही नहीं, बल्कि पूरे ब्लॉक के दर्जनों गांवों में हमारी, हमसे पहले वाली और हमारे बाद वाली पीढ़ी के लोग जितनी भी अंग्रेजी जानते हैं, वह उन्हीं की देन है। इनमें सैकड़ों लोग ऐसे भी रहे, जिन्हें सोनेलाल बाबू ने अंग्रेजी पढ़ाई और बाद में उनके बच्चे भी उनके शिष्य रहे। उनके शिष्यों में कई प्रशासनिक अधिकारी, डॉक्टर, प्रोफेसर हुए। विभिन्न नौकरियों में छोटे से लेकर शीर्ष पदों तक पर कार्यरत लोगों की तो गिनती ही नहीं है ।
पातेपुर से प्रेम
उनकी नौकरी का अधिकांश समय पातेपुर हाई स्कूल में ही बीता। इस दौरान पातेपुर उनके दिल के इतने करीब आ गया था कि वे छुट्टी के दिन भी एक बार पातेपुर जरूर जाते। यह लगाव ऐसा लगा रहा कि रिटायरमेंट के बाद भी शरीर जब तक साथ देता रहा, वे रोज पातेपुर जाते रहे।
सत्य नाम करु हरु मम सोका
सोनेलाल बाबू बतौर शिक्षक जितने कड़क थे, सामाजिक जीवन में उतने ही सरल-सहज, कोमल और मिलनसार। हमारे गांव में पहले होलिका दहन के बाद हर साल लोग टोली में निकलते और एक-दूसरे के दरवाजे के साथ ही दुर्गा स्थान, ब्रह्म स्थान और शिव मंदिर पर भी होरी गाई जाती। गवैयों की टोली जब ब्रह्म स्थान पर पहुंचती तो सोनेलाल बाबू ही होरी उठाते-सुनहु बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका। उनके पुण्य का प्रताप ही कहेंगे कि परमपिता ने उन्हें अपने परमधाम में बुलाने के लिए जो दिन चुना, वह थी ज्येष्ठ शुक्ल निर्जला एकादशी।
सोना नहीं, पारस
उनका नाम भले ही सोनेलाल था, लेकिन वे सोना नहीं, पारस थे। जिसके सिर पर उन्होंने हाथ रख दिया, वही स्वर्ण सा निखर गया। उनके स्वर्गारोहण के साथ ही एक युग का अवसान हो गया है ।
06 June 2016
पापा जल्दी आ जाना...
तृप्यन्ताम्...तृप्यन्ताम्...
मातृभाषा हिंदी के शब्दों को भी अच्छी तरह बोलना सीखने से कहीं पहले देववाणी संस्कृत के कई शब्द हमारे बाल मनो-मस्तिष्क पर अंकित हो गए थे। इनमें पहला था-तृप्यन्ताम्, तृप्यन्ताम्...दरअसल पितृपक्ष के दौरान बड़का बाबू जब कई दिनों तक लगातार पूर्वजों का पिंडदान-तर्पण करते तो पुरोहित के साथ-साथ उनके द्वारा बार-बार दुहराया जाने वाला
‘तृप्यन्ताम्.तृप्यन्ताम्...’ बरबस ही हम बच्चों की जुबान पर चढ़ जाता।
कुछ बड़े होने पर शारदीय नवरात्र में घर के पास होने वाली सामाूहिक दुर्गा पूजा हम बच्चों को लुभाने लगी। पूजा में रोजाना मिलने वाला प्रसाद खास आकर्षण होता हमारे लिए। वहां नौ दिन तक लगातार सप्तशती का पाठ होता। सप्तशती के सात सौ श्लोक के विषय में तो हम क्या जान-समझ पाते, पर
‘नमस्तस्यै। नमस्तस्यै। नमस्तस्यै नमो नम:’ बिना किसी विशेष प्रयास के हमें कंठस्थ हो गया था।
समय बीतने के साथ बहुत कुछ बदल गया। वर्ष 2012 में बाबूजी के परम सत्ता में विलीन हो होने के बाद से परंपरा का निर्वाह करते हुए पूर्वजों की आत्मोन्नति के लिए पिंडदान-तर्पण मैं भी करता हूं। इस दौरान देवताओं, ऋषियों के साथ ही वनस्पति, पर्वत, जीव-जंतुओं तक के लिए तर्पण का विधान है। कई लोग इस पूरी प्रक्रिया को ढकोसला बताने में संकोच नहीं करते। उनके अनुसार पूर्वजों को तृप्त करने का यह अनुष्ठान कदापि तर्कसम्मत नहीं है।
हमारे द्वारा किया गया पिंडदान-तर्पण पितरों तक पहुंचता है या नहीं, इससे उन्हें तृप्ति मिलती है या नहीं, इसका प्रमाण तो मैं नहीं दे सकता, लेकिन जिन्होंने अपने जीवन का हरेक पल हमारी उन्नति के लिए समर्पित कर दिया, उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का यह प्रयास हमें अवश्य तृप्त कर जाता है। ...और तृप्ति का यह भाव जीवन के सभी भावों से बढ़कर है।
08 September 2017
रामलला की जय हो जय हो
नीलकंठ को नमन
नारी तू नारायणी
आभा का अनुशासन
हारिए न हिम्मत
हिम्मत से बदली किस्मत
शिल्पा का शौर्य
जाह्नवी का जुनून
कविता की कहानी
शोभा की शक्ति
या देवी सर्वभूतेषु ...
पुरुष कितना ही बलशाली हो जाए, सनातन परंपरा स्त्री को ही शक्ति का भंडार मानती है। यही वजह है वर्ष में चार बार चैत, आषाढ़, आश्विन और माघ के शुक्ल पक्ष में नवरात्र के दौरान शक्ति स्वरूपा मां भगवती की पूजा-आराधना की जाती है। इन चारों में शारदीय नवरात्र में चहुंओर मां दुर्गा की पूजा-अर्चना के मंत्रों की गूंज सुनाई देती है।
व्यक्ति से समाज बनता है और कालांतर में किसी व्यक्ति विशेष की ओर से शुरू की गई पहल ही सामाजिक परिपाटी का रूप धारण कर लेती है। ऐसे में कई बार मेरे मन में यह खयाल आता है कि पहले पहल किसी एक व्यक्ति ने अपनी मां, बहन, पत्नी या बेटी के गुणों से प्रभावित होकर उसे देवी का दर्जा दिया होगा और फिर दूसरे लोगों ने भी उसका अनुसरण किया होगा। बीतते हुए समय के साथ यह परंपरा बढ़ती चली गई और फिर प्रतीक रूप में देवी-आराधना से जुड़ गई।
दुर्गा दुर्गति नाशिनी... दुर्गम स्थिति से जो पार लगा दे, वही दुर्गा है। अधिक दूर जाने की जरूरत नहीं है, हमारे आस-पड़ोस, जान-पहचान में ही ऐसी कई महिलाएं हैं, जिन्होंने विपरीत हालात के बावजूद हिम्मत नहीं हारी। अपने दमखम के बल पर परिवार को दुखों के सागर से उबार लाईं।
इस नवरात्र ऐसी ही नौ महिलाओं की कहानी। इनके नाम नहीं, इन्होंने जो मिसाल कायम की, वह हमारे लिए, हमारे समाज के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है। लिहाजा इनके नाम बदल दिए गए हैं ।
21 September 2017
Friday, September 1, 2017
मैं मायके चली जाऊंगी...
लखनऊ में घर के पास ही हलवाई की दुकान है। ऐसे में रविवार सुबह अमूमन जलेबी-समोसे का नाश्ता होता है। अभी थोड़ी देर पहले गया तो जलेबी नजर नहीं आई। अलबत्ता तरह-तरह की मिठाइयां अपनी उपस्थिति से रक्षाबंधन के पर्व का अहसास करा रही थीं।
समोसा अनमना सा एक तरफ उबासी ले रहा था। मैंने पूछा-क्या भाई, आज अकेले कैसे ? लुगाई ( जलेबी) कहां गई ?
यह सुनते ही समोसा बिफर पड़ा। बोला- क्या बताऊं साहब, इंसानों वाली बीमारी हमारे घरों में भी पैर जमा रही है । मायके के लोग आएं तो खुशियों की पूछो ही मत और ससुराल वालों को देखते ही मुंह फूला लेना। सुबह से जैसे ही मेरे रिश्तेदारों- रसमलाई, बालूशाही, पेड़े, बंगाली मिठाइयों को आते देखा, आंखें लाल-पीली करती बोली- मैं जा रही हूं मायके भाई को राखी बांधने।
मैंने काफी रोका। कहा-अपने घर में जब रिश्तेदार आए हों तो इस तरह जाना अच्छी बात नहीं है । वे क्या सोचेंगे। वैसे भी कल सुबह से भद्रा है। दोपहर बाद राखी बांधने का मुहूर्त है। तब तक अपने रिश्तेदार भी लौट जाएंगे। फिर अपन दोनों साथ चलेंगे। मुझे भी तुम्हारी छोटी बहन से मिले काफी दिन हो गये। इस बहाने उससे भी मिलना हो जाएगा । लेकिन साहब, वह तो मेरी बात क्या सुनती, मेरे पर्स से सारे पैसे निकाले और उड़न छू हो गई ।
मैंने समोसे को दिलासा दिलाया कि ऐसे दुखी होने से कुछ नहीं होगा । घर आए रिश्तेदारों की खातिर तवज्जो करो...पत्नी का क्या है... अगले रविवार तक लौट ही आएगी । तब तक मेरी तरह बैचलर लाइफ का आनंद लूटो। यह सुनकर उसका उदास चेहरा खिल उठा और मैं भी दुकान से दही लेकर लौट आया। दही-चिवड़ा उदरस्थ करने के बाद समोसे की दर्द भरी दास्तां आपलोगों से शेयर करने से खुद को नहीं रोक पाया।
कन्हैया को कदम्ब का न्योता
टपलू का टूर
वैसे तो वह मेरे दिल के करीब है, लेकिन संबंधों को बातचीत या फिर पत्र या फोन के माध्यम से सींचते रहने के मामले में अव्वल दर्जे का काइयां। कई बार ऐसा भी हुआ कि फोन करो तो 'सब ठीक है' के साथ ही बोल उठता है- फोन रखूं। ऐसे में मेरा भी मन खट्टा हो जाता है, लेकिन बचपन के दोस्त भुलाए भी तो नहीं जाते। सो अवसर विशेष पर शुभकामनाएँ देने के साथ ही हालचाल भी पूछ ही लेता हूं। भगवान झूठ न बुलाए, उसकी ओर से कभी ऐसी पहल नहीं होती ।
खैर, अभी हाल ही फ्रेंडशिप डे पर उसे फोन किया तो हालचाल बताने के साथ ही हत्थे से उखड़ गया। मैं अचंभे में पड़ गया। पूछा- क्या हुआ भाई ? वह झल्लाते हुए बोला - अरे, होना क्या है, तुम्हें वो टपलू तो याद होगा ?
मैंने कहा- हां वो चंचल सा दुबला-पतला छोरा, जो हाई स्कूल में हमलोगों से तीन क्लास जूनियर था।
वह बोला- हां भाई हां, वही। पिछले दिनों फेसबुक पर न जाने कैसे उसने मुझे ढूंढ लिया और उसके बाद से हफ्ते-दस दिन में याद करना नहीं भूलता।
मैंने कहा- यह तो अच्छी बात है ।
वह बोला- अच्छी बात क्या ? तुम्हारी यही आदत बुरी है, बिना पूरी बात सुने फैसला सुना देते हो। जनाब एमटेक करने के बाद आजकल गुवाहाटी में अच्छे पद पर हैं। कमाई भी अच्छी है।
मैं बीच में फिर बोल पड़ा- यह तो और भी अच्छा है।
उसने कहा- अच्छा नहीं, खाक? पैसे होने से अक्ल थोड़े ही आ जाती है। टपलू ने दो दिन पहले फोन किया तो अपने गोवा टूर के बारे में बताने लगा। बेवकूफ गोवा भी गया तो पत्नी के साथ । अरे भाई, गोवा तो आदमी किसी धार्मिक अनुष्ठान के लिए जाने से रहा कि पत्नी के पल्लू से गांठ बांधकर जाना जरूरी है। गोवा में समुद्र के किनारे जब सौंदर्य का सागर हिलोरें मार रहा हो तो सिर पर सीसीटीवी कैमरा लटकाए रखने का क्या मतलब ? मैं तो पड़ोस के पार्क में भी जाना तभी मुनासिब समझता हूं जब अच्छी तरह आश्वस्त हो लूं कि श्रीमतीजी आधा-पौन घंटा से पहले अपने काम से फ्री न हो पाएंगी।
मैं समझ गया, आग कहां लगी है और कॉलबेल बजने का हवाला देकर फोन काट दिया।
9 August 2017
प्यार की नगरी में पानी का रेला
कल सुबह किशनगंज के एक मित्र का फोन आया। वे आजकल झारखंड में हैं। आवाज कुछ परेशानी भरी थी। बता रहे थे कि किशनगंज में घर में छाती भर से ऊपर तक पानी घुस आया है । वहीं से बीटेक की पढ़ाई कर रहा बेटा अकेले वहां है। मैंने बच्चे को फोन लगाया तो कनेक्ट नहीं हो पाया । बाढ़ की वजह से बिजली न रहने से बैटरी खत्म हो गई थी शायद। फिर ऐसे मौसम में नेटवर्क की भी सांसें उखड़ने लगती हैं।
करता भी तो क्या ? स्मृति पटल पर किशनगंज प्रवास के दौरान बिताया एक-एक पल घूमने लगा। वर्ष 1991 की बात है । संयोग कुछ ऐसा बना कि मुझे किशनगंज जाना पड़ा। तय हुआ था कि चार-पांच महीने वहां रहूंगा। जून का महीना... गांव में भीषण गर्मी। हाजीपुर से शाम को बस पकड़नी थी। शाम करीब सात बजे बस रवाना हुई। सोते-जगते सफर कट रहा था । अचानक संगीत की तेज स्वर लहरियों से नींद खुली। भोरपता चला, दालकोला में बस भोजपुरी गीत वातावरण में मस्ती घोल रहे थे। वहां से बस चली तो मौसम ही नहीं, नजारे भी बदल गये थे। सड़क के दोनों किनारे खेतों में भरा पानी। धान और पटसन की फसल की हरियाली । रिमझिम फुहारों के बाद मूसलाधार बारिश तक ने हमारा इस्तकबाल किया।
वहां जाने के बाद लोगों ने इस अपनापन के भाव से मुझे अपनाया कि तीन साल से अधिक वहां रहा। इस दौरान कभी भी घर से दूर होने का अहसास नहीं हुआ । होली-दिवाली-ईद से लेकर दुर्गा पूजा तक की न जाने कितनी यादें जेहन में आज भी ताजा हैं। कुल मिलाकर कहूं तो किशनगंज के साथ जुडे किशन-कन्हैया के प्यार के संदेश को जीना, उसे निभाना वहां के लोग जानते हैं।
अब जब सारा विश्व उस सर्वशक्तिमान कृष्ण का जन्मदिन कृष्णाष्टमी मनाने की तैयारियों में जुटा है, मैं वंशी बजैया से प्रार्थना करता हूं कि किशनगंज पर आई इस विपदा को दूर कर दे।
14 August 2017
बचपन से मन भाये कन्हैया
हमारे गांव में पैदा हुए शिशु का ईश्वर से सबसे पहला परिचय कुलदेवता से होता है। छठी पर बच्चे को कुलदेवता के सान्निध्य में उसे सुलाकर पूजा की जाती है। इसके बाद माता-पिता और परिवार के लोगों का झुकाव जिस देवता विशेष के प्रति होता है, बच्चे भी उसी हिसाब से अपने इष्ट का चयन कर लेते हैं । अपनी समझ विकसित होने पर कुछ बच्चे अलग राह पर भी बढ़ जाते हैं।
जहां तक मैं याद कर पाता हूं, मां रविवार का व्रत रखती थी, जो सूर्यदेव को समर्पित था। इसके अलावा मंगलवार को हनुमान जी के नाम पर उनका उपवास रहता था। हम भाई-बहनों को इन दोनों ही दिन नैवेद्य के प्रसाद का इंतजार रहता था। होश संभालने के बाद मैंने सबसे पहला व्रत श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का ही रखा था।
हमारे यहां बच्चों में जन्माष्टमी का बड़ा क्रेज था। इससे एक दिन पहले भोर में उठकर सभी भाई-बहन जमकर चिवड़ा-दही खाते। इसे स्थानीय बोली में सरगही कहा जाता है । इसके बाद हमें सोने की हिदायत दी जाती, लेकिन झूला झूलने की धुन ऐसी सवार होती, कि नींद आने का सवाल ही नहीं उठता था।
सूरज की पहली किरण फूटने के साथ ही हम रस्सी और पीढ़ा लेकर निकल जाते । घर के बाहर ही आम का बगीचा था। उसकी डाल पर झूला डालकर उस पर सबसे पहले चींटी को झूलाते। यह एक टोटका था कि हम झूले पर से गिरें नहीं । दोपहर में स्नान के बाद पास के शिव मंदिर जाकर भगवान शिव का जलाभिषेक करते। तब तक भूख भी जोर मारने लगती, जिसे शरबत पीकर शांत किया जाता । शाम होने पर आंगन में पंगत लगती, और सभी बच्चे दूध-केला, अमरूद, साबूदाने की खीर आदि का भगवान श्रीकृष्ण को भोग लगाकर खुद भी जीमते।
इस तरह संसार को प्यार का पाठ पढ़ाने वाले मनमोहन कृष्ण कन्हैया से हमारा रिश्ता जुड़ा और समय बीतने ते साथ-साथ दिनों दिन और भी प्रगाढ़ होता जा रहा है । आज बचपन के एक दोस्त से बातचीत के दौरान पुरानी यादें ताजा हो आईं । सोचा, यादों की इस दुनिया में आप सभी को भी सैर करा दूं। जय श्री राधे... जय श्री कृष्ण
18 August 2017
एक पत्र नई पीढ़ी के नाम
स्वतंत्रता दिवस और जन्माष्टमी पर वॉट्सएप संदेशों की ऐसी रेलमपेल रही कि मोबाइल की हालत खस्ता हो गई। बेचारा बार-बार दम खींचने लगता। संदेशों में वीडियो, जिफ से लेकर एक से बढ़कर एक तस्वीरें तक थीं। इक्का-दुक्का टेक्स्ट मैसेज भी थे। आजकल हमलोगों की आदत इतनी बुरी हो गई है कि अपने पास आए मैसेज को फॉरवर्ड करना ही सुविधाजनक समझते हैं, लिखने की बला कौन पाले। ऐसे में जब टेक्स्ट मैसेज मिलता है, तो दिल को बड़ी तसल्ली होती है, लेकिन मेरे साथ कुछ उल्टा हुआ।
जन्माष्टमी पर एक शुभकामना संदेश में खुद के लिए ‘परम श्रद्धेय’ लिखा देखकर अटपटा-सा लगा। मैंने ऐसे महान काम नहीं किए हैं, जिनके चलते मुझे श्रद्धेय कहकर संबोधित किया जाए। महज कुछ साल पहले जन्म लेने की वजह से तो कोई श्रद्धा का पात्र नहीं बन जाता। नई पीढ़ी कई मायने में ज्ञान और समझ के स्तर पर मुझसे काफी आगे है और हर पल मैं उनसे कुछ सीखने को तत्पर रहता हूं। इसी तरह वे मेरे अनुभव का लाभ बेझिझक कभी भी ले सकते हैं।
दरअसल जहां श्रद्धा का भाव होता है, वहां दिल से दिल की दूरी बढ़ जाती है। छोटे-बड़े का अहसास एक तरह का दुराव पैदा करता है । मैं चाहता हूं कि दिल की भाव भूमि पर हम परस्पर स्नेह भाव से रहें। जहां दोनों पक्ष समान हो, न कोई जरा सा अधिक, न कोई जरा सा भी कम। हां, जब बहुत ही जरूरी हो तो नई पीढ़ी इस स्नेह में सम्मान का भाव मिला दे और बदले में मैं उनके प्रति स्नेह भाव में दुलार का समावेश कर दूं। बाकी समय एक-दूसरे के प्रति हमारा मित्रवत व्यवहार बना रहे। ... और फिर समय से पहले किसी को जबर्दस्ती उम्रदराज घोषित कर देना भी कोई अच्छी बात थोड़े ही है!
18 August 2017
भउजी नाचे छमाछम...
आम तौर पर जहां भाभी और ननद की बात सामने आने पर इन दोनों में छत्तीस का आंकड़ा रहने की बातें ही जेहन में आती हैं, वहीं भाभी और देवर का जिक्र होने पर हंसी-मजाक, चुहलबाजी से दीगर कोई बात सोची भी नहीं जा सकती। अन्य राज्यों में जहां शादी-विवाह के दौरान महिलाएं नृत्य के माध्यम से खुशी का इजहार करती हैं, वहीं बिहार के गांवों में ऐसा कोई रिवाज नहीं है। वहां शादी-विवाह में महिलाएं ढोल-मजीरे जैसे किसी साज के बगैर मंगल गीतों के जरिये नई पीढ़ी को संस्कार की सीख देने के साथ ही अपनी खुशी को भी अभिव्यक्त करती हैं। इसके बावजूद न जाने कैसे हम बचपन में खेल के दौरान अक्सर ही ये पंक्तियां गुनगुनाते-
आलूदम, मसाला कम। भउजी नाचे छमाछम...
शायद इसके पीछे अवचेतन में कहीं यह भावना बलवती रही हो कि हमारी भउजी हमेशा खुश रहें। उनका चेहरा कभी उदास न हो, क्योंकि जब मन खुश होता है तभी नाचने की कल्पना की जा सकती है। और इस तरह अनजाने में ही हम नारी सशक्तीकरण के पैरोकार बने रहे।
एक वरिष्ठ सहयोगी की फेसबुक वॉल पर वर्षों बाद भाभी से मिलने का जिक्र देखने के बाद बरबस ही यह प्रसंग मेरे स्मृति पटल पर कौंध-सा गया।
21 August 2017
धीरे-धीरे बोल कोई सुन न ले...
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