Friday, August 5, 2011

मूल उद्देश्यों की पटरी से उतरता रेलवे

नए रेल मंत्री ने व्यवस्था सुधारने की बजाय किराया नहीं बढ़ाने पर दिया जोर
हाल ही केंद्रीय मंत्रिमंडल में हुए फेरबदल में रेल मंत्री बने दिनेश त्रिवेदी ने निकट भविष्य में रेल किराया नहीं बढ़ाने की बात कही है। उनका यह बयान पूर्ववर्ती रेल मंत्रियों की तरह अपनी लोकप्रियता का ग्राफ बढ़ाने की कवायद ही प्रतीत होता है। ममता बनर्जी के पश्चिम बंगाल चुनाव में लीन हो जाने के कारण लंबे अरसे तक रेल मंत्रालय मुखियाविहीन सा हो गया था। ऐसे में नए रेल मंत्री से रेलवे की व्यवस्थाओं में सुधार की आस लगाए रेलयात्रियों को त्रिवेदी के इस बयान से झटका लगा है।
भारतीय रेलवे का ध्येय वाक्य है 'संरक्षा, सुरक्षा और समय पालनÓ अर्थात् यात्रियों को अपने संरक्षण में सुरक्षित रूप से बिना किसी परेशानी के निर्धारित समय से गंतव्य पर पहुंचाना, लेकिन वर्तमान समय में भारतीय रेल ने अपने मूल ध्येय को पूरी तरह भुला दिया है। वर्तमान समय में रिजर्वेशन के बावजूद आरक्षित कोच में सामान्य टिकट या वेटिंग लिस्ट वालों की भीड़ के कारण बैठना तक मुहाल हो जाता है। जैसे-तैसे बैठ भी गए तो ट्रेन सही-सलामत निर्धारित समय से गंतव्य पर पहुंचा देगी, इसकी कोई गारंटी नहीं होती। पिछले दिनों हुई रेल दुर्घटनाओं तथा ट्रेनों में हुई आपराधिक घटनाओं के कारण यात्रियों के मन में एक अज्ञात भय समाया रहता है। ऐसे में रेल मंत्री
को चाहिए कि वे रेल किराया न बढ़ाने का आश्वासन देने की बजाय सुरक्षित व सुखद रेलयात्रा की गारंटी देने की बात करते। इस गारंटी के लिए तो रेलयात्रियों को किराये में दो-पांच रुपए की बढ़ोतरी भी नहीं खलती।
(जयपुर से प्रकाशित हिंदी दैनिक समाचार पत्र डेली न्यूज में 2 अगस्त को प्रकाशित)

Monday, August 1, 2011

...मोर अंगना नहि बरसे बदरवा

कविकुलगुरु कालिदास ने अपनी कालजयी रचना ' मेघदूतम्Ó में कुबेर के शाप से निर्वासित यक्ष की प्रियतमा की विरह-व्यथा को शब्दों में पिरोकर बादलों की महत्ता को अलग तरीके से रूपायित किया। इसके साथ ही ' मेघदूतम्Ó में 'आषाढ़स्य प्रथम दिवसे...Ó से आषाढ़ आने पर मन के आह्लादित होने का भी बखूबी वर्णन किया। वैशाख-ज्येष्ठ में सूर्य की प्रचंड किरणों के प्रभाव से प्रकृति व अन्य प्राणियों के साथ मानव-मन भी झुलस जाता है और हर किसी की तमन्ना रहती है कि बादल बरसें और मन को हरसाएं। आषाढ़ से यह सिलसिला शुरू होकर सावन आते-आते मन में इतना बस जाता है कि प्रफुल्लित मन हर्ष के झूले पर प्यार की पींगे मारने को हर पल व्याकुल सा रहता है। तभी तो काव्य से लेकर फिल्में तक सावन के स्नेह से अभिसिक्त होकर हमारा मन हर लेती हैं।
खैर, मेरा उद्देश्य न तो कालिदास की प्रशंसा में कसीदे काढऩा था और न ही सावन को शब्दों में सजाने का है। आज तो किसी और ही कारण ने मुझे मैं तो किसी और ही उद्देश्य से आज यहां मुखातिब हूं। बरसों से रात की नौकरी के कारण सोते-जगते उनींदे ही में कब दिन बीत जाता है, पता ही नहीं चलता। आज भी दोपहर में खाना खाकर सो गया था। ऑफिस जाने के लिए चार बजे जगा तो बाहर झमाझम बरसात हो रही थी। पत्नी ने कहा कि करीब आधे घंटे पहले ही बरसात शुरू हो गई थी। मेरे ऑफिस जाने का जैसे-जैसे समय होता जा रहा था, मेरी चिंता बढ़ती जा रही थी। अखबार की नौकरी भी सीमा पर तैनात जवानों से कम महत्वपूर्ण नहीं होती। यदि ऐसे प्राकृतिक कारणों से दो-चार साथी अनुपस्थित हो जाएं तो काम काफी प्रभावित होता है। सर्दी-जुकाम से ग्रस्त मैं बुखार की आशंका के कारण बारिश में निकलने की हिम्मत भी नहीं कर पा रहा था। खैर, जैसे-तैसे साढ़े पांच बजे जब बादलों का कोष रिक्त हो गया तो मैं हल्की फुहारों के बीच रेनवाटर कोट का कवच धारण कर घर से निकला। घर से ऑफिस की 14-15 किलोमीटर की दूरी में भिगोने के लिए फुहारें भी काफी होती हैं। खैर, आधे रास्ते तक तो सड़कों पर जमा पानी भरपूर बारिश का अहसास करा रही थीं, लेकिन जैसे-जैसे ऑफिस नजदीक आता जा रहा था, अपेक्षाकृत सूखे मौसम में रेनवाटर कोट पहने मैं शायद साथी राहगीरों के लिए अचरज का केंद्र भी बना हुआ था। ऑफिस आने पर दूसरे साथियों को भी बिल्कुल सूखा देखकर अब मुझे आश्चर्य हो रहा था। कुछ साथियों के निवास के करीब तो बिल्कुल ही बरसात नहीं हुई थी और कुछ के यहां बादल दो-चार छींटे देकर गुजर लिए। सबसे आश्चर्य तो तब हुआ जब मौसम की खबर बनाने वाले साथी ने मौसम विभाग के अधिकारियों के हवाले से बताया कि गुलाबी नगर में महज 0.9 मिलीमीटर बरसात हुई है। इसका कारण यह था कि जयपुर में मौसम विभाग का कार्यालय एयरपोर्ट के पास है, जो सांगानेर इलाके में है और उधर आज महज नाममात्र को बरसात हुई थी। ऐसे में जिन इलाकों में बरसात नहीं हुई, उन लोगों के लिए तो मलाल हुआ कि वे सावन की भीगी-भीगी रुत में मौसम या फिर बादलों की मेहरबानी से महरूम रह गए वहीं इसका भी अफसोस हुआ कि मौसम विभाग को बरसात नापने के लिए इतने बड़े शहर के अलग-अलग हिस्सों में व्यवस्था होनी चाहिए ताकि मौसम विभाग का आंकड़ा हास्यास्पद न लगे। मुझमें यक्ष जैसी क्षमता तो नहीं है कि बादल मेरी मनुहार सुन पाएं, लेकिन मौसम विभाग भी यदि मेरी सलाह पर अमल कर ले तो उसकी हेठी नहीं होगी।

Sunday, July 24, 2011

...जन्मदिन के बहाने

नौकरी पूरी करने के बाद कल रात दो बजे घर पहुंचा तो हॉल में कुर्सी पर कुछ चमकता हुआ सा प्रतीत हुआ। उठाकर देखा तो पता चला कि बेटे ने बर्थडे विश करने के लिए ग्रीटिंग कार्ड रखा हुआ था। देखकर अच्छा लगा कि बाजार से रेडिमेड कार्ड खरीदने के बजाय उसने अपनी कल्पनाओं को खुद ही आकार देने की कोशिश की थी। इसके बाद तो दिनभर मोबाइल पर शुभकामनाओं के एसएमएस आते रहे। फेसबुक पर तीस-चालीस मित्रों की शुभकामनाएं पाकर भी काफी अच्छा लगा। विशेष रूप से आदरणीय कुमार विश्वास की काव्यमय मंगलकामनाएं-
देर रात जागा होगा उस दिन ऊपर वाला ,
जिस दिन उसने तुम को अपने हाथों से था ढाला ...
जन्म दिन की ढेर सारी शुभकामनाएं.. ...
स्वस्थ रहो ...मस्त रहो ...व्यस्त रहो ...

दिल को छू गईं।
उनकी शुभकामनाओं पर इतना ही कहना चाहूंगा कि मेरी काया को अपने हाथों से ढालने के लिए विधाता अवश्य ही देर रात तक जागा था क्योंकि मेरा जन्म वाकई तड़के करीब पौने चार बजे हुआ था। खैर, इसके बाद विधाता की नाइट शिफ्ट बंद हुई या जारी रही यह तो पता नहीं, लेकिन मैं तकरीबन 14-15 साल से जीविकोपार्जन के लिए अखबार की नौकरी में रात्रि जागरण करने को विवश हूं। फेसबुक पर अन्य मित्रों की शुभकामनाओं के लिए भी हृदय से आभारी हूं, जिसके कारण अपनी मनोभावनाएं उनसे बांटने की प्रेरणा मिली।
तो पेश है मेरी रामकहानी की पहली कड़ी....
मेरे से बड़े दो भाइयों के असमय काल कवलित हो जाने के कारण पूरा परिवार मेरे जीवित रहने के प्रति आशंकित था। यही कारण रहा कि जन्म के बाद पारंपरिक रूप से होने वाले रस्मो-रिवाज व अनुष्ठानों को भी स्थगित कर दिया गया। नए कपड़ों की बजाय पुराने कपड़ों में ही लपेटकर रखा जाता था। भय इतना कि कपड़े की पुरानी मच्छरदानी को काले रंग में रंगकर उसे ही मेरा पहनावा बनाया गया।
नामकरण करने की जहमत नहीं उठाई गई। सबका मानना था कि जब इसे जीना ही नहीं है, तो नामकरण कर नवजात से अपनापन क्यों बढ़ाया जाए। परंपरागंत मान्यताओं के अनुसार एकाध किलो मड़ुआ (मोटा अनाज) के बदले गांव में प्रसव कराने वाली दाई के हाथों मुझे बेच दिया गया। इस प्रकार बेचे जाने के कारण परिवार में मुझे 'बेचनाÓ नाम से पुकारा जाने लगा। कुछ दिनों पहले हिंदी के प्रख्यात साहित्यकार पांडेय बेचन शर्मा ' उग्रÓ के बारे में पढ़ते हुए पता चला कि उनके नाम में शामिल बेचन के साथ भी कुछ ऐसा ही वाकया छिपा था।
नानाजी को किसी ने कहा कि लड़के की नाक छिदवा दो तो शायद इसकी आयु बढ़ जाए। नानाजी ने नाक छेदने वाले को बुलवाया और सुनार से कहकर नथनी भी बनवा दी। सौंदर्य में अभिवृद्धि के लिए बच्चियों की नाक पांच-छह साल की उम्र में छिदवाई जाती है और तब तक शायद भविष्य में इसकी उपयोगिता को वे समझ जाती हैं और इससे छेड़छाड़ नहीं करतीं, लेकिन कुछ माह का अबोध शिशु मैं किसी अवरोध को कैसे सहन कर पाता, इसका परिणाम यह हुआ कि एक दिन मैंने उस नथनी को खींच दिया जिससे कोमल नाक को चीरती हुई वह बाहर आ गई और उसका निशान आज भी मेरे चेहरे पर बाकायदा चस्पां है।
आगे की कहानी अगले जन्म दिन पर। तब तक गुड बॉय....

Wednesday, July 20, 2011

अक्षर के जादू से तरक्की का टोटका !

राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में पश्चिम बंगाल का नाम बदलने का प्रस्ताव

पश्चिम बंगाल का इतिहास बहुत ही समृद्ध और गौरवशाली रहा है। 'गीतांजलिÓ के लिए साहित्य का नोबेल पुरस्कार पाने का गौरव गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर के नाम के साथ जुड़ा है तो स्वतंत्रता संग्राम में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की भूमिका नौजवानों के लिए अनुकरणीय रही है। समाज सुधार में राजा राम मोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर के नाम अग्रगण्य हैं तो फिल्म निर्माण-निर्देशन में सत्यजित राय अद्वितीय हैं। चिकित्सा क्षेत्र से राजनीति में आए डॉ. विधानचंद्र राय ने सेवा की ऐसी छाप छोड़ी कि आज उनका जन्मदिन डॉक्टर्स डे के रूप में मनाया जाता है। जादू के लिए भी प्रसिद्ध पश्चिम बंगाल में लंबे संघर्ष के बाद गत विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस का जादू ऐसा चला कि बाकी दलों का अस्तित्व ही कहीं खो सा गया। ऐसे में पिछले दिनों पश्चिम बंगाल मंत्रिमंडल की बैठक में राज्य का नाम बदलने का प्रस्ताव आया और बंग प्रदेश, बांग्ला प्रदेश, बंगराष्ट्र आदि नामों पर चर्चा की जा रही है। इसके पीछे यह तर्क दिया जा रहा है कि अंग्रेजी वर्णक्रम में नाम नीचे होने से राष्ट्रीय मंचों पर राज्य को अपनी बात रखने का मौका अंत में मिलता है। वर्तमान समय में प्रदेश की जनता मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में अपने दमित सपनों को साकार होते देखना चाहती है। ऐसे में तृणमूल कांग्रेस सरकार को चाहिए कि अक्षर के जादू से तरक्की का टोटका करने की बजाय ईमानदार और पारदर्शी शासन से विकास की नई इबारत लिखे, जिससे नाम नहीं, बल्कि काम के आधार पर पश्चिम बंगाल पहली पंक्ति में आ जाए।

Thursday, June 30, 2011

आम हुए खास, आटे का भी टोटा

' सहदेव बोला- वैसे इन दिनों आसपास के वनों में फलों की कमी नहीं है। वृक्ष फलों के बोझ से लदे पड़े हैं। हमारा प्रयत्न है कि अन्न को अभी सुरक्षित रखा जाए और जब तक फल उपलब्ध हैं, फलाहार ही किया जाए।Ó नरेंद्र कोहली के 'महासमरÓ के पंचम खंड 'अंतरालÓ के अंतिम पृष्ठों में पांडवों के बारह वर्ष के वनवास के प्रसंग को पढ़ते हुए अचानक अपना बचपन याद आ गया। मैं गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ता था, जहां आज के इंग्लिश मीडियम स्कूल की तरह गर्मी की छुट्टी में होमवर्क का बोझ बच्चों के सिर पर नहीं लादा जाता था। ऐसे में गर्मी की छुट्टी का मतलब होता था नॉन स्टॉप मस्ती। ज्येष्ठ-आषाढ़ के महीने में हम पूरी तरह आम के बगीचे के होकर रह जाते थे। बगीचे में अस्थायी मड़ैया बना दी जाती थी, जहां हम सभी भाई-बहन दिनभर आम की रखवारी के साथ ही कोयल के साथ 'कू-कूÓ कूकने की प्रतियोगिता करते। आम के साथ ही जामुन का स्वाद भी बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करता और कई बार जामुन के पेड़ से गिरने के बाद भी उसके प्रति हमारा प्रेम कम नहीं हो पाता। ऐसी कपोल कल्पित अफवाह थी कि रात में इन बगीचों में भूत-प्रेत आते हैं, इसलिए शाम होते ही घर आ जाते थे और रात में बगीचे की रखवारी की जिम्मेदारी हमारे ताऊजी ही संभाला करते थे।
हां, तो मुझे जिस संदर्भ में 'महासमरÓ की उपरोक्त पंक्तियां मेरे बचपन में ले गईं वो कुछ यूं थीं कि घर की माली हालत सामान्य ही थी। दो ताऊ किसान ही थे और बाबूजी की शिक्षक की नौकरी से मिलने वाली पगार परिवार की गाड़ी को जैसे-तैसे खींच पाती थी। ऐसे में जब हम खाना खाने बैठते तो दादी कहतीं कि रोटी कम से कम खाओ और आम से ही पेट भरो। हालांकि विभिन्न प्रजातियों के आम से स्वाद की एकरसता की समस्या भी नहीं हुआ करती थी, फिर भी बालसुलभ मन उन तर्कों को कहां माना करता था।
उन दिनों आम हर आमजन को सुलभ था। जिनके बगीचे नहीं होते और वे बगीचे में या घर पर आते तो कभी खाली हाथ नहीं लौटते। आम बेचने का चलन तो बिल्कुल ही नहीं था या यूं कहें कि इसे बुरा माना जाता था तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। मुझे लगता है कि हर किसी की पहुंच में होने के कारण ही फलों के राजा का नामकरण 'आमÓ किया गया होगा।
आज जब गुलाबी नगर में रहते हुए 50 से 70 रुपए किलो तक आम खरीदना पड़ता है तो आटे-दाल का भाव सहज ही याद आ जाता है। बचपन से मुंह लगा आम का स्वाद अन्य खर्चों में कटौती की कीमत पर ही पूरा हो पाता है। इसके साथ ही सामान्य परचूनी की दुकान में भी 15 रुपए किलो आटा मिलता है और पैकेटबंद आटा भी 20-22 रुपए किलो तक मिल पाता है। ऐसे में आम भी खास लोगों की पहुंच तक सिमटकर रह गया है और आटे के लिए भी आम आदमी को इस कदर अंटी ढीली करनी पड़ती है कि जरूरत की बाकी चीजों के लिए समझौते के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता।

Sunday, June 19, 2011

सदैव सामयिक है संस्कृत

राजस्थान संस्कृत अकादमी व रामानंद आध्यात्मिक सेवा समिति की ओर से झालाना सांस्थानिक क्षेत्र स्थित राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी सभागार में 'पत्रकारिता में संस्कृत : वर्तमान और भविष्यÓ पर चल रही दो दिवसीय संगोष्ठी के अंतिम दिन रविवार सुबह 'संस्कृत की सामयिकताÓ विषयक सत्र में मुझ नाचीज को भी कुछ कहने का अवसर मिला। करीब 15 साल बाद कोई सार्वजनिक मंच मिला था, इसलिए काफी संकोच भी हो रहा था, फिर पत्रकारिता को आजीविका के रूप में अपनाने तथा अन्यान्य कारणों से संस्कृत का साथ छूटे भी करीब डेढ़ दशक हो गए। एक सप्ताह पहले सूचना मिली कि मुझे भी 'संस्कृत की सामयिकताÓ पर कुछ कहना होगा और मैं पिछले एक माह से किसी और काम में लगा था, जो शनिवार शाम को ही पूरा हुआ था। ऐसे में शनिवार मध्यरात्रि ऑफिस के काम से फ्री होने के बाद जहां तक मैं सोच सका, वही मेरे वक्तव्य का हिस्सा बना। मेरी अल्पज्ञता अपनी जगह पर थी, लेकिन सौभाग्य उससे कहीं अधिक था कि श्रद्धेय बलदेवानंद सागर, प्रो. अर्कनाथ चौधरी, देवर्षि कलानाथ शास्त्री, प्रो. सुदेश शर्मा सहित संस्कृत के दशाधिक स्वनामधन्य विद्वानों के सान्निध्य में कुछ बोलने का अवसर मिला। मैंने इस आलेख को जस का तस तो नहीं पढ़ा, क्योंकि देखकर पढऩे से संप्रेषणीयता में कमी आती है और मेरा कॉन्शस भी इसकी अनुमति नहीं दे पाया, लेकिन मेरा वक्तव्य इसी के आसपास केन्द्रित था।

संस्कृत की सामयिकता

सबसे पहले तो मैं कहना चाहूंगा कि जिस विषय को आज की चर्चा का केंद्रबिंदु बनाया गया है, वह सही नहीं है। कोई वस्तु या विद्या यदि अप्रासंगिक हो जाती है तो इसकी प्रासंगिकता सिद्ध करने के लिए इसके पक्ष में विभिन्न तर्क रखे जाते हैं, लेकिन संस्कृत तो सदैव सामयिक है और रहेगी। जीवन में हर कदम पर संस्कृत हमें मार्ग दिखाती है। कोई भी जिज्ञासा हमारे मन में उठे, उसका समाधान पहले से संस्कृत के ग्रंथों में सन्निहित है। जिस तरह प्रत्येक जीवधारी के लिए ऑक्सीजन की उपयोगिता सदैव सामयिक है, वैसे ही मानव जीवन के लिए संस्कृत भाषा की उपयोगिता सर्वकालिक है।
चिकित्सा का क्षेत्र हो तो आयुर्वेद में मनुष्य के आरोग्य का वरदान संजोया हुआ है। यदि उनका पालन किया जाए तो इस आपाधापी के युग में भी सम्यक जीवन जीया जा सकता है।
संस्कृत ग्रंथों में आदर्श परिवार की व्याख्या की गई है। धर्मशास्त्रों में वर्णित जीवन पद्धति को अपनाने से परिवार में सदैव स्नेह, सामंजस्य और समरसता बनी रहती है और इन पर अमल नहीं करने से अनुशासनहीनता, उच्छृंखलता के भावों का समावेश जीवन में होता है और परिवार के बिखराव से लेकर जीवन के असमय अंत के रूप में इसके परिणाम दृष्टिगोचर होते हैं।
वर्तमान समय में पर्यावरण की सुरक्षा की चिंता बड़े जोर-शोर से की जाती है। संस्कृत ग्रंथों में ऋषि-मुनियों के जंगल में रहने, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी को अपना परिवार समझने की परिपाटी का चित्रण किया गया है। कविकुलगुरु कालिदास ने अभिज्ञानशाकुंतलम् में कण्व ऋषि और शकुंतला के माध्यम से इसका कितना मनोहारी वर्णन किया है।
व्यक्तित्व निर्माण के जो मार्ग संस्कृत ग्रंथों में दिखाए गए हैं, अन्यत्र दुर्लभ हैं। वसुधैव कुटुंबकम् का पाठ पढ़ाने वाली संस्कृत भाषा कभी भौतिकवाद को प्रश्रय नहीं देती। पुरुषार्थ चतुष्टय में भी धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष में धर्म को सर्वोपरि स्थान दिया गया है और धर्म के मार्ग पर चलने वाला अपना हित साधने के लिए कभी दूसरे का अहित नहीं कर सकता।
हर हाल में संतुलित जीवन जीने का जो उपदेश संस्कृत ग्रंथों (श्रीमद्भगवद्गीता) में --सुखदु:खे समे कृत्वा लाभालाभे जयाजयौ...।। दिया गया, वह हजारों वर्ष बाद आज भी सामयिक है और आने वाली सदियों में भी सामयिक बना रहेगा।
आजकल तनाव और अवसाद की बातें बहुधा की जाती हैं। इसके दुष्परिणामों से समाचार पत्र भरे रहते हैं। इसके बावजूद मैं कहना चाहूंगा कि आज के आदमी के तनाव या अवसाद का स्तर कुरुक्षेत्र के अर्जुन की तुलना में पासंग में भी नहीं है। ऐसे में योगेश्वर कृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश दिए थे, वे देश-काल-व्यक्ति की सीमा से परे आज भी हर किसी के लिए हैं, बशर्ते हम उसका मनन-चिंतन करने के साथ ही उस पर अमल करें।
एक बात और, संस्कृत ग्रंथों-रामायण, श्रीमद्भगवद्गीता सरीखे ग्रंथों को हमने वंदनीय मानकर इसे पूजाघर में रख दिया और रोज इसे धूप-दीप दिखा रहे हैं। आज आवश्यकता है कि संस्कृत को पूजाघर से निकालकर प्रयोग में लाया जाए और इसके माध्यम से अपने जीवन को समुन्नत बनाया जाए।
आज कम्प्यूटर के इस युग में आधुनिक वैज्ञानिकों ने भी संस्कृत को कम्प्यूटर के लिए सर्वाधिक योग्य भाषा माना है। ऐसे में युवाओं के लिए इसमें काफी अवसर हैं। संस्कृत को कम्प्यूटर के हिसाब से विकसित करने की बात की जा रही है और इसकी धीमी गति पर चिंता भी जताई जाती है, तो मैं बस इतना ही कहना चाहूंगा कि देववाणी को मन से मानव की भाषा के रूप में जब हम अपना लेंगे तो यह मशीनों को भी रास आने लगेगी और संस्कृतनिष्ठ युवकों के लिए अवश्य ही रोजगार के द्वार खुलेंगे। संस्कृत पढऩे वालों के लिए अवसरों की कमी कदापि नहीं होगी, बशर्ते वे अपने आंख-कान खोले रखें, अन्यथा इंजीनियर भी ट्यूशन पढ़ाकर घरखर्च चला रहे हैं और डॉक्टरों को अपनी डल प्रैक्टिस में जान डालने के लिए खोजने से भी टॉनिक नहीं मिलता। इसलिए आज संस्कृत के विद्यार्थी संस्कृत पर अधिकार के साथ अन्य अन्य भाषाओं, विज्ञान, देश-दुनिया में हो रहे अनुसंधानों से खुद को अपडेट रखें और उसे संस्कृत के संदर्भ में देखने की भरसक कोशिश करें। अमरकोश के साथ फादर कामिल बुल्के की डिक्शनरी का ज्ञान भी जरूरी है।
संस्कृत किसी जाति--परिधान-यूनिफॉर्म विशेष वालों के लिए ही है, इस अवधारणा को भी हमें छोडऩा होगा। आज संस्कृत पढऩे-जानने वालों को चाहिए जहां कहीं उन्हें कोई संस्कृतानुरागी मिले तो आगे बढ़कर हृदय से उसे अपनाएं, यथोचित मार्गदर्शन करें। दूसरे शब्दों में कहूं तो हमारे लिए कोई भी त्याज्य नहीं हो और हम किसी के लिए अग्राह्य न हो पाएं।
एक बात और, स्कूल-कॉलेजों में संस्कृत की शिक्षा देने के साथ ही इसे आमजन के बीच ले जाना होगा। विभिन्न प्रोफेशनल्स को यदि उनके विषय से संबंधित संस्कृत ग्रंथों के बारे में भी बताया जाए तो यह मणिकांचन संयोग बनेगा। आज किसी फिजिशियन और सर्जन को आयुर्वेद का भी ज्ञान हो तो अपने रोगियों का और भी बेहतर इलाज कर सकता है। सिविल इंजीनियर यदि वास्तु विज्ञान के ज्ञान से भी लैस हों तो उनके बनाए भवनों की गुणवत्ता के क्या कहने। किसी न्यायाधीश को न्यायिक दर्शन की भी जानकारी हो तो उसके फैसले अन्य जजों को लिए भी अनुकरणीय हो जाएंगे।
आज हम जिस दौर में जी रहे हैं, ऐसा लगता है कि भ्रष्टाचार ने सदाचार को पग-पग पर पटखनी देने की ठान ली है और मनुष्य की भौतिक सुखों की लिप्सा ऐसे में आग में घी का काम करती है। जीवन मूल्यों के पतन का ऐसा सिलसिला चल निकला है कि इससे उबरने का कोई मार्ग दिखाई नहीं देता। एक शायर के शब्दों में कहूं तो -
पीछे बंधे हैं हाथ और तय है सफर।
किससे कहें कि पांव के कांटे निकाल दे।।
तो आचरण में अशुद्धि, जीवन मूल्यों की क्षति के इस दौर में एकमात्र संस्कृत में वह ताकत है जो इस कांटे को निकालकर मानव को संस्कारित करके उचित मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे सकेगी और इसकी सामयिकता सदैव असंदिग्ध बनी रहेगी।

Tuesday, May 17, 2011

कलम की ताकत से मिटाएं भ्रष्टाचार


राजस्थान उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश और मधुर गीतों-गजलों के रचयिता जस्टिस शिवकुमार शर्मा ने कहा कि पारदर्शिता के अभाव में भ्रष्टाचार पनपता है, जो लोकतंत्र के लिए दीमक की तरह है, इसलिए पत्रकारों को चाहिए कि भ्रष्टाचार मुक्त भारत के लिए कलम का इस्तेमाल करें। वे मंगलवार को शहर के गणमान्य पत्रकारों और साहित्यकारों से मुखातिब थे। राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी की ओर से प्रकाशित और वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेश उपाध्याय लिखित पुस्तक 'पत्रकारिता : आधार, प्रकार और व्यवहारÓ के लोकार्पण समारोह में मुख्य अतिथि पद से बोलते हुए उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जनता का स्थान सबसे ऊपर है, लेकिन वर्तमान में जनता ही सबसे उपेक्षित हो गई है। ऐसा लगता है जैसे लोकतंत्र शीर्षासन करने को बाध्य है। ऐसे में पत्रकारों का दायित्व है कि वे लोकतंत्र को इसके मूल स्वरूप में लाएं। उन्होंने अपनी नई गजल के दो शेरों से अपने वक्तव्य का समान यूं किया :
शजर हरे कोहरे के पीछे थे,
दर्द कई चेहरे के पीछे थे।
घुड़सवार दिन था और हम,
अनजाने खतरे के पीछे थे।
इससे पहले डॉ. राजेश कुमार व्यास ने पुस्तक की उपादेयता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस पुस्तक में पत्रकारिता की अकादमिक की बजाय व्यावहारिक शिक्षण की बात बड़े ही सरल और सहज तरीके से बताई गई है। इसमें पत्रकारिता के दौरान कार्य-व्यवहार के दौरान आने वाले द्वंद्व का उल्लेख करते हुए उनसे पार पाने का भी रास्ता सुझाया गया है। भाषा उपदेशात्मक नहीं होने से संप्रेषणीयता बहुत ही अच्छी है।
ेलेखक ज्ञानेश उपाध्याय ने पुस्तक-सृजन और इसके उद्देश्यों में संक्षेप में अपनी बात कही। 'मुझे जो लिखना था, मैंने पुस्तक में लिख दी, अब पाठक और आलोचक इसकी विवेचना करें Ó कहते हुए उन्होंने सधे हुए वक्ता की तरह गेंद सामने वालों के पाले में डाल दी।
वरिष्ठ पत्रकार दिनेश ठाकुर ने कहा कि इस पुस्तक में अच्छे पत्रकार के गुणों का उल्लेख तो है ही, पत्रकार को अपने पेशे के प्रति प्रतिबद्ध होने के लिए आईना भी दिखाया गया है। हालांकि उन्होंने इस बात पर अफसोस जताया कि वर्तमान दौर में पत्रकारों में पढऩे की आदत खत्म सी होती जा रही है और इसी का परिणाम है कि आज की पीढ़ी के पत्रकारों में कमलेश्वर, धर्मवीर भारती, राजेंद्र माथुर जैसी प्रतिभाओं के दर्शन नहीं होते।
विशिष्ट अतिथि राजस्थान विश्वविद्यालय में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष डॉ. संजीव भानावत ने कहा कि पुस्तक में पत्रकारिता की अंदरूनी स्थितियों को सामने रखने के साथ ही शब्दों की सत्ता को बचाने की ईमानदार कोशिश की गई है। उन्होंने कहा कि इस पुस्तक से नवागत पत्रकारों को मार्गदर्शन मिल सकेगा। उन्होंने पत्रकारिता की अंदरुनी स्थितियों को सामने रखने के साहस की भी सराहना की। डॉ. भानावत ने कहा कि पुस्तक में पत्रकारिता में स्थापित प्रतिमानों पर नए तरीके से विचार किया गया है तथा सिद्धांत खो चुके प्रतिमानों पर बेबाक टिप्पणी की गई है। इसके माध्यम से शब्द की सत्ता को बचाने की ईमानदार कोशिश की गई है। भाषा-प्रवाह से पुस्तक काफी रोचक बन पड़ी है और पाठक जब एक बार इसे पढऩा शुरू करता है तो पूरा करके ही दम लेता है। (डॉ. भानावत के इस कथन की पुष्टि अन्य वक्ताओं ने भी अपने संबोधन में की।)
अध्यक्षता करते हुए अकादमी निदेशक डॉ. आर. डी. सैनी ने कहा कि हिंदी पत्रकार को अन्वेषी होने के साथ ही तथ्यों पर पैनी दृष्टि रखनी चाहिए। उन्होंने राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी की ओर से पत्रकारिता के लिए प्रकाशित पुस्तकों के बारे में भी काफी कुछ बताया। कार्यक्रम का प्रभावी संचालन मोअज्जम अली ने किया।