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Thursday, December 1, 2011

'बड़की मायÓ के साथ एक युग का अवसान

आजकल बाबूजी का स्वास्थ्य कुछ ठीक नहीं चल रहा। नौकरी की अपनी मजबूरियां हैं कि चाहकर भी भौतिक दूरियां कम नहीं हो पा रहीं। हां, मन तो वहीं लगा रहता है, बाबूजी का हालचाल जानने के लिए फोन किया तो छोटा भाई घर से दूर कहीं खेत में मजदूरों से काम करवा रहा था। उसने बाबूजी के स्वास्थ्य में सुधार की सूचना दी तो मन को तसल्ली मिली लेकिन अगले ही पल उसने कहा-'बड़की माय नहीं रहींÓ। यह समाचार सुनते ही फ्लैश बैक में कई सारे दृश्य घूमने लगे। भला हो बाबूजी का जिनकी प्रेरणा से गत अगस्त में गृह प्रवास के दौरान ' बड़की मायÓ के अंतिम दर्शन का सौभाग्य मिल पाया। संयोग ऐसा कि साथ में मां-बाबूजी के साथ मेरा लंगोटिया यार अरविंद भी था जिसके साथ मैंने न जाने कितनी बार 'बड़की मायÓ के हाथों से बने व्यंजनों का लुत्फ उठाया होगा।
आज जब पुरानी यादों को सहेजने बैठा हूं तो सब कुछ किसी काल्पनिक कहानी सा लगता है। मेरा गांव बिहार का नामी ब्राह्मण बहुल गांव है। हमारे पड़ोस में है धनकौल। दूरी महज इतनी कि हमारे खेतों के पार से थोड़ा आगे बढ़ो तो वहां पहुंच जाओ। उस गांव की सर्वाधिक महत्वपूर्ण हस्ती थे श्री योगेंद्र सिंह। मेरे गांव के लगभर हर परिवार के साथ उनका उठना-बैठना-अपनापा था। यूं कहें कि मेरे गांव में होने वाले आपसी विवादों के निबटारे में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका हुआ करती थी और इसमें उनका राजपूत होना कभी आड़े नहीं आता। सही मायने में वे मानव थे-महामानव। अक्सर शाम को वे नियम से पैदल ही हमारे गांव में आते और कभी हमारे दरवाजे पर तो पड़ोस में या फिर गांव में और कहीं उनकी महफिल सजती। लोग बैठकर दिनभर का हाल-ए-बयां करने के साथ ही अपनी परेशानियां भी आपस में बांटकर मन हल्का कर लेते थे। बहुत बचपन की बात करूं तो तब तक चाय का चलन शुरू नहीं हुआ था, सो खैनी और सुपारी से ही एक-दूसरे का स्वागत किया जाता था। चूंकि मेरे बाबूजी का नाम भी योगेंद्र मिश्र है और बिहार में ऐसी परंपरा है कि लोग अपने नाम वाले व्यक्ति को नाम लेकर नहीं पुकारते बल्कि आपस में एक-दूसरे को 'मीतÓ कहा करते हैं। सो बाबूजी भी उन्हें 'मीतÓ कहा करते थे और हम सभी भाई-बहन उन्हें 'बाबाÓ या 'धनकौल वाले बाबाÓ कहकर पुकारते थे। मेरे ताऊजी 'बाबाÓ के हमउम्र थे, लेकिन बाबूजी से भी उनकी अच्छी पटती थी। 'बाबाÓ के छोटे भाई श्री देवेंद्र सिंह हाई स्कूल में गणित के सिद्धहस्त शिक्षक थे और अंग्रेजी पर भी उनका अधिकार था। पढ़ाने का तरीका इतना सहज कि एक बार जो बता दिया वह कभी भूलता नहीं था। उन्हीं का आशीर्वाद था कि बीजगणित और त्रिकोणमिति के सवालों ने मुझे कभी परेशान नहीं किया।
खैर, बात 'बाबाÓ की दरियादिली की। उनका स्टेटस क्या था, इसका अंदाजा तो मुझे किशोरावस्था में भला क्या होना था, लेकिन एक बात थी कि अपनी कैसी भी परेशानी लेकर उनके शरण में जो भी आता, उसकी समस्या लौटते वक्त नहीं रहती थी। ऐसे में मैंने ' बड़की मायÓ के चेहरे पर भी कभी शिकन या शिकायत का भाव नहीं देखा। न जाने क्या हुआ कि जब मैं बीए में पढ़ रहा था, एक दिन खबर मिली कि डकैतों ने पीट-पीटकर 'बाबाÓ की हत्या कर दी। उसके बाद जब कभी उनके घर पर गया तो जैसे लगता था कि 'बाबाÓ के साथ ही उस घर के सारे संस्कार भी विदा हो गए। कुछ वर्षों बाद देवेंद्र बाबू भी नहीं रहे। इतना ही नहीं, हमारी पीढ़ी में भी सेंध लग गया और एक असाध्य बीमारी ने अवधेश भाई साहब को भी असमय हमसे छीन लिया। रही-सही यादें 'बड़की मायÓ के साथ जुड़ी थीं, लेकिन उनके परलोकगमन के साथ ही जैसे एक युग का अवसान हो गया। ईश्वर से यही प्रार्थना है कि इन पुण्यात्माओं को शांति प्रदान करे और आने वाली पीढ़ी में ऐसे संस्कार जिनसे लोगों को याद करने का चलन बना रह सके।

Sunday, July 24, 2011

...जन्मदिन के बहाने

नौकरी पूरी करने के बाद कल रात दो बजे घर पहुंचा तो हॉल में कुर्सी पर कुछ चमकता हुआ सा प्रतीत हुआ। उठाकर देखा तो पता चला कि बेटे ने बर्थडे विश करने के लिए ग्रीटिंग कार्ड रखा हुआ था। देखकर अच्छा लगा कि बाजार से रेडिमेड कार्ड खरीदने के बजाय उसने अपनी कल्पनाओं को खुद ही आकार देने की कोशिश की थी। इसके बाद तो दिनभर मोबाइल पर शुभकामनाओं के एसएमएस आते रहे। फेसबुक पर तीस-चालीस मित्रों की शुभकामनाएं पाकर भी काफी अच्छा लगा। विशेष रूप से आदरणीय कुमार विश्वास की काव्यमय मंगलकामनाएं-
देर रात जागा होगा उस दिन ऊपर वाला ,
जिस दिन उसने तुम को अपने हाथों से था ढाला ...
जन्म दिन की ढेर सारी शुभकामनाएं.. ...
स्वस्थ रहो ...मस्त रहो ...व्यस्त रहो ...

दिल को छू गईं।
उनकी शुभकामनाओं पर इतना ही कहना चाहूंगा कि मेरी काया को अपने हाथों से ढालने के लिए विधाता अवश्य ही देर रात तक जागा था क्योंकि मेरा जन्म वाकई तड़के करीब पौने चार बजे हुआ था। खैर, इसके बाद विधाता की नाइट शिफ्ट बंद हुई या जारी रही यह तो पता नहीं, लेकिन मैं तकरीबन 14-15 साल से जीविकोपार्जन के लिए अखबार की नौकरी में रात्रि जागरण करने को विवश हूं। फेसबुक पर अन्य मित्रों की शुभकामनाओं के लिए भी हृदय से आभारी हूं, जिसके कारण अपनी मनोभावनाएं उनसे बांटने की प्रेरणा मिली।
तो पेश है मेरी रामकहानी की पहली कड़ी....
मेरे से बड़े दो भाइयों के असमय काल कवलित हो जाने के कारण पूरा परिवार मेरे जीवित रहने के प्रति आशंकित था। यही कारण रहा कि जन्म के बाद पारंपरिक रूप से होने वाले रस्मो-रिवाज व अनुष्ठानों को भी स्थगित कर दिया गया। नए कपड़ों की बजाय पुराने कपड़ों में ही लपेटकर रखा जाता था। भय इतना कि कपड़े की पुरानी मच्छरदानी को काले रंग में रंगकर उसे ही मेरा पहनावा बनाया गया।
नामकरण करने की जहमत नहीं उठाई गई। सबका मानना था कि जब इसे जीना ही नहीं है, तो नामकरण कर नवजात से अपनापन क्यों बढ़ाया जाए। परंपरागंत मान्यताओं के अनुसार एकाध किलो मड़ुआ (मोटा अनाज) के बदले गांव में प्रसव कराने वाली दाई के हाथों मुझे बेच दिया गया। इस प्रकार बेचे जाने के कारण परिवार में मुझे 'बेचनाÓ नाम से पुकारा जाने लगा। कुछ दिनों पहले हिंदी के प्रख्यात साहित्यकार पांडेय बेचन शर्मा ' उग्रÓ के बारे में पढ़ते हुए पता चला कि उनके नाम में शामिल बेचन के साथ भी कुछ ऐसा ही वाकया छिपा था।
नानाजी को किसी ने कहा कि लड़के की नाक छिदवा दो तो शायद इसकी आयु बढ़ जाए। नानाजी ने नाक छेदने वाले को बुलवाया और सुनार से कहकर नथनी भी बनवा दी। सौंदर्य में अभिवृद्धि के लिए बच्चियों की नाक पांच-छह साल की उम्र में छिदवाई जाती है और तब तक शायद भविष्य में इसकी उपयोगिता को वे समझ जाती हैं और इससे छेड़छाड़ नहीं करतीं, लेकिन कुछ माह का अबोध शिशु मैं किसी अवरोध को कैसे सहन कर पाता, इसका परिणाम यह हुआ कि एक दिन मैंने उस नथनी को खींच दिया जिससे कोमल नाक को चीरती हुई वह बाहर आ गई और उसका निशान आज भी मेरे चेहरे पर बाकायदा चस्पां है।
आगे की कहानी अगले जन्म दिन पर। तब तक गुड बॉय....

Thursday, June 30, 2011

आम हुए खास, आटे का भी टोटा

' सहदेव बोला- वैसे इन दिनों आसपास के वनों में फलों की कमी नहीं है। वृक्ष फलों के बोझ से लदे पड़े हैं। हमारा प्रयत्न है कि अन्न को अभी सुरक्षित रखा जाए और जब तक फल उपलब्ध हैं, फलाहार ही किया जाए।Ó नरेंद्र कोहली के 'महासमरÓ के पंचम खंड 'अंतरालÓ के अंतिम पृष्ठों में पांडवों के बारह वर्ष के वनवास के प्रसंग को पढ़ते हुए अचानक अपना बचपन याद आ गया। मैं गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ता था, जहां आज के इंग्लिश मीडियम स्कूल की तरह गर्मी की छुट्टी में होमवर्क का बोझ बच्चों के सिर पर नहीं लादा जाता था। ऐसे में गर्मी की छुट्टी का मतलब होता था नॉन स्टॉप मस्ती। ज्येष्ठ-आषाढ़ के महीने में हम पूरी तरह आम के बगीचे के होकर रह जाते थे। बगीचे में अस्थायी मड़ैया बना दी जाती थी, जहां हम सभी भाई-बहन दिनभर आम की रखवारी के साथ ही कोयल के साथ 'कू-कूÓ कूकने की प्रतियोगिता करते। आम के साथ ही जामुन का स्वाद भी बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करता और कई बार जामुन के पेड़ से गिरने के बाद भी उसके प्रति हमारा प्रेम कम नहीं हो पाता। ऐसी कपोल कल्पित अफवाह थी कि रात में इन बगीचों में भूत-प्रेत आते हैं, इसलिए शाम होते ही घर आ जाते थे और रात में बगीचे की रखवारी की जिम्मेदारी हमारे ताऊजी ही संभाला करते थे।
हां, तो मुझे जिस संदर्भ में 'महासमरÓ की उपरोक्त पंक्तियां मेरे बचपन में ले गईं वो कुछ यूं थीं कि घर की माली हालत सामान्य ही थी। दो ताऊ किसान ही थे और बाबूजी की शिक्षक की नौकरी से मिलने वाली पगार परिवार की गाड़ी को जैसे-तैसे खींच पाती थी। ऐसे में जब हम खाना खाने बैठते तो दादी कहतीं कि रोटी कम से कम खाओ और आम से ही पेट भरो। हालांकि विभिन्न प्रजातियों के आम से स्वाद की एकरसता की समस्या भी नहीं हुआ करती थी, फिर भी बालसुलभ मन उन तर्कों को कहां माना करता था।
उन दिनों आम हर आमजन को सुलभ था। जिनके बगीचे नहीं होते और वे बगीचे में या घर पर आते तो कभी खाली हाथ नहीं लौटते। आम बेचने का चलन तो बिल्कुल ही नहीं था या यूं कहें कि इसे बुरा माना जाता था तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। मुझे लगता है कि हर किसी की पहुंच में होने के कारण ही फलों के राजा का नामकरण 'आमÓ किया गया होगा।
आज जब गुलाबी नगर में रहते हुए 50 से 70 रुपए किलो तक आम खरीदना पड़ता है तो आटे-दाल का भाव सहज ही याद आ जाता है। बचपन से मुंह लगा आम का स्वाद अन्य खर्चों में कटौती की कीमत पर ही पूरा हो पाता है। इसके साथ ही सामान्य परचूनी की दुकान में भी 15 रुपए किलो आटा मिलता है और पैकेटबंद आटा भी 20-22 रुपए किलो तक मिल पाता है। ऐसे में आम भी खास लोगों की पहुंच तक सिमटकर रह गया है और आटे के लिए भी आम आदमी को इस कदर अंटी ढीली करनी पड़ती है कि जरूरत की बाकी चीजों के लिए समझौते के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता।

Saturday, October 16, 2010

ऐसे तो नहीं मरेगा रावण?


पश्चिम बंगाल के पड़ोस होने का प्रभाव कहा जाए कि बिहार में भी शक्ति की उपासना बड़े पैमाने पर होती है और हर पांच-छह किलोमीटर पर दुर्गा पूजा होती है, मेला भरता है। शारदीय नवरात्र के दौरान उत्सव का माहौल रहता है। इसे एक संयोग ही कहा जाएगा कि मेरे जन्म के साल ही गांव में नवयुवक संघ के बैनर तले दुर्गा पूजा और मेला शुरू हुआ। पांचवीं-छठी क्लास तक आते-आते मेरे जैसे बच्चों की भागीदारी भी मेले में होने लगी। चूंकि गांव में इतने पैसे नहीं होते, सो ग्रामीण नवयुवक ही मेले में लोगों के मनोरंजन के लिए सप्तमी से लेकर दशमी तक नाटकों का मंचन करते थे, सो मुझे भी इनमें अवसर मिला और मेरे अंदर का कलाकार निखरता रहा। बाद में नई दिल्ली में अखिल भारतीय स्तर पर संस्कृत नाटक प्रतियोगिता में भी हिस्सा लेने का अवसर मिला। खैर, मैं यहां अपनी नाट्य प्रतिभा का बखान नहीं करना चाहता, वह तो यूं ही बात निकली तो काफी पीछे तक चली गई।
जैसा मैंने शुरू में कहा कि बंगाल-बिहार-झारखंड-उत्तर प्रदेश में शक्ति स्वरूपा मां भगवती की आराधना की ही प्रधानता रहती है। जिधर से आप गुजरेंगे, नवरात्र के दौरान लाउडस्पीकर पर दुर्गा सप्तशती के श्लोक बरबस ही सुनाई देते हैं। वहां रावण के पुतले की दहन की परंपरा बहुत कम ही है। पहली बार जब मैं उपरोक्त नाट्य प्रतियोगिता के सिलसिले में विजयादशमी के दिन दिल्ली गया था तो लालकिले के सामने लाल जैन मंदिर की धर्मशाला में ठहरा था। पूरे देश के हमारे सहपाठी उसी में ठहरे थे। शाम को छत से देखा कि सामने काफी बड़ी भीड़ इकट्ठी है। रंग-बिरंगी आतिशबाजी के बीच शाम को रावण के पुतले का दहन हुआ। उसके डेढ़-दो साल बाद जयपुर आ गया। यहां भी नवरात्र के दौरान मां भगवती की आराधना में कहीं कोई कमी नहीं दिखती, लेकिन रावण के पुतले जलाने का उत्साह भगवती की भक्ति पर भारी पड़ती नजर आती है। हां, प्रवासी बंगालियों के समुदाय शहर में आधा दर्जन से अधिक स्थानों पर परंपरागत रूप से मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करते हैं और सप्तमी से लेकर विजयादशमी तक अपनी संस्कृति को जीते हैं, लेकिन इन उत्सवों में स्थानीय निवासियों की भागीदारी न के बराबर होती है। हां, गुलाबी नगर में सैकड़ों स्थानों पर सार्वजनिक रूप से बड़े पैमाने पर रावण-मेघनाद-कुंभकर्ण-अहिरावण के पुतले जलाए जाते हैं। एक तरह की होड़ होती है आयोजकों में कि किसका रावण कितना ऊंचा होगा और कौन कितनी आतिशबाजी-बारूद फूंकता है। इतना ही नहीं, कॉलोनी से लेकर गली तक में बच्चे अपने स्तर पर रावण को जलाने में पीछे नहीं रहते।
अब मैं उस मूल मुद्दे पर आता हूं जिसके लिए मैंने आज यह संवाद छेड़ा है। भगवान राम ने त्रेता युग में रावण का संहार किया था और तब से हजारों साल बीत गए, हम रावण के पुतले जलाते जा रहे हैं, लेकिन वह हर साल और बड़े रूप में चिढ़ाता हुआ हमारे सामने आ खड़ा होता है। यह आलस्य, अविश्वास, कामचोरी, भ्रष्टाचार और न जाने हमारी किन-किन कमजोरियों के रूप में दस से भी अधिक सिरों के साथ हमारे अंदर कायम हो चुका है। हम यदि अपने अंदर निहित बुराई रूपी रावण को मार सकें तभी विजयादशमी मनाना सार्थक हो सकेगा। यदि हम खुद को पाक साफ मानते हैं तो बुराई करने वालों का ही सफाया कर दें ताकि उसे और पनपने का मौका नहीं मिले। रावण को समूल मिटाने का बस यही दो तरीका मेरी समझ में आता है, अन्यथा लकीर पीटने में हमारा सानी और कहां मिल पाएगा। विजयादशमी की ढेर सारी मंगलकामनाएं।

Wednesday, March 31, 2010

भगवान से बड़ा हो गया भक्त का कद


चैत्र पूर्णिमा पर मंगलवार को हनुमानजी की जयंती मनाई गई। जहां-जहां बजरंगबली के भक्त हैं, वहां-वहां उन्होंने अपने आराध्य के जन्मदिन पर अपने-अपने तरीके से उल्लास मनाया। छोटी काशी जयपुर के मंदिरों में तो एक दिन पहले यानी सोमवार अद्र्धरात्रि से ही हनुमानजी का अभिषेक शुरू हो गया था। मंगलवार को भी दिनभर मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी। पदयात्राएं-शोभायात्राएं निकलीं, झांकियां सजाई गईं। खैर, यहां मेरा मकसद आपलोगों को हनुमान जयंती पर हुए आयोजनों की जानकारी देना नहीं है। न ही मैं हनुमानजी की कृपा के चमत्कारों से आपको अवगत कराना चाहता हूं क्योंकि पवनपुत्र के पवन की गति से भी तेज चमत्कारों के बारे में मैं अपनी अल्पज्ञता जगजाहिर नहीं करना चाहता। यहां मैं किसी और उद्देश्य से आपसे मुखातिब हूं।
ज़हां तक मैं समझता हूं, हिंदू परिवारों में कोई भी परिवार ऐसा नहीं होगा, जहां हनुमानजी की पूजा नहीं होती हो। कोई भी साक्षर शायद ऐसा नहीं होगा, जिसकी दिनचर्या हनुमान चालीसा से शुरू न होती हो। साक्षर ही क्यों, मैंने तो कई ऐसे लोगों को भी देखा है जिन्हें बिल्कुल ही अक्षरज्ञान नहीं था और उन्हें हनुमान चालीसा ही नहीं, बल्कि सुंदरकांड की चौपाइयां और दोहे तक याद हैं। मेरे गांव में आज भी हर शनिवार और मंगलवार को सुंदरकांड के सामूहिक पाठ किए जाते हैं और इसके साथ सहज रूप से ही हनुमान चालीसा का भी पाठ होता है। बस, बाकी लोगों के साथ सुनकर और उनके ताल से ताल मिलाते हुए उन निरक्षर लोगों ने भी सहज रूप से हनुमान चालीसा और सुंदरकांड को कंठस्थ कर लिया।
गांवों-कस्बों में सहज रूप से ही हनुमानजी के मंदिर दिख जाते हैं और इसका सबसे बड़ा कारण यही है कि हनुमानजी ने जिस समर्पण भाव से अपने स्वामी मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की भक्ति की, वह बेमिसाल हो गई। लंका में जब हनुमानजी सीता माता का दुख साझा करने की अशोक वाटिका पहुंचे तो उन्होंने रामदूत को अष्ट सिद्धियों और नव निधियों का वरदान दे दिया, जिन्हें हनुमानजी मुक्तहस्त से अपने भक्तों को लुटाने में कोई संकोच नहीं करते।
ऐसे में तो यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि भगवान बनना भले ही मुश्किल हो, लेकिन भक्त बनकर भी अपना कद ऊंचा बनाने की कला हनुमानजी से अवश्य ही सीखी जा सकती है।

Saturday, February 27, 2010

होली तो भौजी और साली के संग


जहां तक मैं समझ पाया हूं, पर्व-त्यौहार अप्राप्य को पाने का अवसर प्रदान करते हैं। इन विशेष अवसरों पर अपने इष्ट से अभीष्ट तथा सुख-समृद्धि का वरदान मांगते हैं। जहां तक होली की बात है, तो यह ऐसा पर्व है, जिसमें प्रकृति भी अपने विशेष रंग में रंगी नजर आती है। ऐसा लगता है, मानो प्रकृति पर वसंत का रंग छा गया हो। पेड़ों के पत्ते झड़ जाते हैं और नई कोंपलें नए जीवन का संदेश देती प्रतीत होती हैं। माघ शुक्ल पंचमी (वसंत पंचमी) के बाद दिन अनुदिन गर्म होने लगते हैं और फागुन पूर्णिमा के आते-आते सूर्य के ताप का साथ पाकर जब फगुनहट बयार चलती है तो पूरे वातावरण में ही मस्ती घोल देती है।
जब बाहर की प्रकृति बौरा जाए तो मनुष्य के अंदर की प्रकृति कहां स्थिर रह पाती है। आम तौर पर साल के तीन सौ चौंसठ दिन मितभाषी रहने वाला भी होली के दिन वाचाल हो जाता है। बड़े-बड़े मुद्दों पर जो अपनी राय देने में हमेशा कृपणता बरतते हैं, वे भी होली पर ऐसी टिप्पणी कर बैठते हैं कि लोग दांतों तले अंगुली दबाने को मजबूर हो जाते हैं। तभी तो कहते हैं--भर फागुन बुढ़वा देवर लागे....।
फिर हमारी संस्कृति तो और भी निराली है। हम जो भी अच्छा-बुरा करते हैं, उसके पीछे अपना हाथ तो कभी नहीं मानते, बस परंपरा का निर्वहन करते हैं। तभी तो होली के गीतों में राधा-कृष्ण, राम-सीता, शंकर-पार्वती ही हमारे आदर्श हैं। त्रेता में देवर लक्ष्मण ने भाभी सीता को रंग डाला, तो द्वापर में भगवान कृष्ण ने गोपियों पर इस तरह रंग उड़ेला कि घर के लोग पहचान ही न पाएं। हम तो बस उनके अनुयायी हैं और उनकी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। भोले बाबा की बूटी भंग की ठंडाई का असर ज्यों-ज्यों होता है, होली का रंग चोखा होता जाता है।
अप्राप्य को पाने की इच्छा का ही असर है कि होली गीतों में पति-पत्नी की होली कहीं ठहर नहीं पाती। हर पद में हर छंद में देवर-भाभी की ठिठोली ही होली का आदर्श हुआ करती है। इसके बाद साली का नंबर आता है। साली के संग होली खेलने का आनंद तो अवर्णनीय है। एक मित्र से बात हुई, उनकी दो-दो सालियां हैं और होली पर उनका रंगमर्दन करने के लिए वे आज ही ससुराल पहुंच गए थे। अपनी साली का आकर्षण तो यह हुआ, लेकिन भैया की साली के संग होली का आनंद तो सोने पर सुहागा के समान होता है। अब बेचारे भैया होली के इस रंगीले त्यौहार में पत्नी और साली दोनों से वंचित होकर अपने भाग्य को कोसें तो कोसते रहें।
तो आप सबको होली की रंगभरी मंगलकामनाएं। ईश्वर से प्रार्थना करें कि इस जन्म में जिनके साली और देवर नहीं हैं, उन्हें अगले जन्म में यह सुख अवश्य प्राप्त हो। कुछ अतिशयोक्ति हो तो इतना ही कहना चाहूंगा-बुरा न मानो होली है।

Monday, November 16, 2009

जीते-जी क्यों न पढ़ लें गरुड़ पुराण ?

महानगरीय जीवन की कुछ मान्यताएं बीतते हुए समय के साथ परंपरा में तब्दील हो जाती हैं। गुलाबी नगर में भी ऐसी ही एक परंपरा है। यहां किसी के परलोकगमन पर मृत्यु के तीसरे दिन तीये की बैठक होती है, जिसमें परिजन-पुरजन-मित्रजन-रिश्तेदार-साथ काम करने वाले सभी एकत्रित होते हैं और मृत व्यक्ति को श्रद्धांजलि-पुष्पांजलि निवेदित करते हैं। आम तौर पर यह कार्यक्रम एक घंटे का होता है। जिनकी मृत्यु हो चुकी है, उनके प्रति श्रद्धा निवेदित करना और उनके परिजनों के प्रति शोक-संवेदना व्यक्त करना भारतीय परंपरा के अनुकूल है।
मैं यहां कुछ अलग किस्म की पीड़ा को शेयर करने के लिए मुखातिब हूं। यहां अमूमन तीये की बैठक के दौरान पंडितजी गरुड़ पुराण के कुछ अंशों का पाठ करते हैं। जैसा कि सर्व विदित है, गरुड़ पुराण में व्यक्ति के जीवन में किए गए काम के आधार पर भोगे जाने वाले हजारों तरह के नरक का वर्णन किया गया है।
भारतीय मान्यताओं के अनुसार, यदि हमारे पुराणों में कही गई बातें सत्य हैं और हमारे जीवन के कामकाज का फल हमें मरने के बाद भोगना ही पड़ता है, तो सावधानी के तौर पर हम जीवनकाल में ही गरुड़ पुराण को क्यों न पढ़ लें, जिससे हम अपने जीवन में अच्छे काम करके अपना अगला जन्म भी संवार लें।
गरुड़ पुराण के पाठ के दौरान पंडितजी जब प्रेत के द्वारा भोगे जाने वाले असह्य कष्टों का वर्णन करते होंगे, तो उनके प्रियजनों-परिजनों को कितनी पीड़ा होती होगी। क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि ऐसे अवसरों पर गरुड़ पुराण की बजाय श्रीमद्भगवद्गीता के कुछ श्लोकों का पाठ किया जाए, जिमें मानव जीवन का सार छिपा हुआ है।

मोबाइल क्यों नहीं होता मौन?
जब किसी व्यक्ति के चिरमौन धारण करने पर शोकाभिव्यक्ति के लिए लोग एकत्रित होते हैं, ऐसे में भी कुछ लोगों का मोबाइल जब वाचाल हो जाता है तो उक्त व्यक्ति के संवेदनाशून्य होने का बोध होता है। क्या कुछ देर के लिए मोबाइल को मौन मोड पर नहीं रखा जा सकता। भाई, यदि मोबाइल प्रेम इतना ही अधिक है और उसके मौन होने पर आपका भी दिल दुखता हो तो मोबाइल को कंपायमान मोड पर कर दें, ताकि उसकी धड़कनों का अहसास आपको हो जाए और फिर आप जैसा उचित समझें, कर डालें। इतना तो ध्यान रखना ही चाहिए कि एक दिन हम सबको सदा के लिए मौन धारण करना ही है तो फिर कुछ पलों के लिए मोबाइल क्यों नहीं मौन हो सकता?

Sunday, October 4, 2009

चांदनी रात में कुछ गीत गुनगुनाइए...


गुलाबी नगर में 38 साल पहले साहित्य और संस्कृति से अंतर्मन से जुड़े कुछ लोगों ने तरुण समाज की स्थापना की थी। तभी से इस संगठन ने होली के अवसर पर महामूरख सम्मेलन और शरदोत्सव के रूप में गीत चांदनी का आयोजन शुरू किया। इन दोनों ही कवि सम्मेलनों की आज देश के गिने-चुने कवि सम्मेलनों में गिनती होती है। गुलाबी नगर के बाशिंदों को सालभर इसका इंतजार रहता है। इसके संस्थापक महानुभाव निस्संदेह अब मध्यवय के हो गए होंगे, लेकिन उनके हृदय में तरुणाई अभी शेष है और यह आयोजन अनवरत-अबाध रूप से जारी है। अभी कल शनिवार 3 अक्टूबर को आश्विन की पूनम पर शरद ऋतु की रात जयपुर के जय क्लब लॉन पर गीत चांदनी कवि सम्मेलन हुआ। आइए, गीत चांदनी के कुछ गीत आप भी हमारे साथ मिलकर गुनगुनाइए -
दिल्ली की डॉ. कीर्ति काले ने
जब बंधे बिजली स्वयं ही मोहपाशों में,
चांदनी छिप जाए शरमाकर पलाशों में,
जब छमाछम बाज उठे पायल घटाओं की,
मांग जब भरने लगे सूरज दिशाओं की।
तब हृदय के एक कोने में कोई कुछ बोल जाता है।
रचना से चांदनी और सौंदर्य व मोहब्बत का रिश्ता जोड़ा।

लखनऊ के देवल आशीष ने
हमने तो बाजी प्यार की हारी ही नहीं है,
जो चूके निशाना वो शिकारी ही नहीं है।
कमरे में इसे तू ही बता कैसे सजाएं,
तस्वीर तेरी दिल से उतारी ही नहीं है।।
के माध्यम से प्रेम को रवानी दी।

किशन सरोज ने
बिखरे रंग तूलिकाओं से, बना न चित्र हवाओं का,
इंद्रधनुष तक उड़कर पहुंचा, सोंधा इत्र हवाओं का...
से हवा की फितरत और वाराणसी के श्रीकृष्ण तिवारी ने
रेत पर एड़ी रगड़कर थक गया तो मन हुआ,
अब मैं नदी बनकर बहूं...बहने लगा।
हाथ में पत्थर लिए बच्चे मिले तो मन हुआ...
अब मैं दरख्तों सा फलूं, फलने लगा।।
के माध्यम से अपने ही रौ में बहने का अंदाजे बयां किया।

मेरठ से आए सत्यपाल सत्यम ने
हो गए संपन्न सब उपवास नभ में चांद निकला।।
बुझ गई अनगिन दृगों की प्यास नभ से चांद निकला।।
भावना जितनी अपावन थी सब हुई विसर्जित,
अब सुखद संभावना को रिक्त है मन।।
लहलहा उट्ठा है पतझर में बगीचा,
अब तो बारह मास सावन है या फागुन,
हर दिवस त्यौहार सा उल्लास, नभ में चांद निकला
से चांद के महत्व पर प्रकाश डाला।

इलाहाबाद से आई रागिनी चतुरवेदी ने
मेरे मन का फूल खिला है, हवा बताती है,
शायद तुमने याद किया है, हिचकी आती है।।
जिधर-जिधर जाती हैं नजरें, शगुन दिखाई देते,
फड़क रहीं पलकें रुक जाती नाम तुम्हारा लेते,
पिंजरे की चिड़िया भी कैसा पंख फुलाती है।।
...शायद तुमने याद किया, हिचकी आती है।।
के माध्यम से प्रियतम की यादें ताजी कीं।

बगड़ के भागीरथ सिंह भाग्य ने मीठी राजस्थानी में मरुथली माटी के सौंदर्य और महत्ता को कुछ इस तरह शब्द दिए -
म्हारे खेतां में मौसम मजूरी करे
बाजरो रात-दिन जी हजूरी करे
म्हारे खेतां री रेतां रमे रामजी
आज तन्ने रमा ल्याऊंली
चाल रे सातीड़ा म्हारे खेतां में आज
तन्नै काकड़ी खुआ ल्याऊं ली।।

ग्वालियर से आए रामप्रकाश अनुरागी ने सुनाया -
हम नदी बनकर बहे तो, सिंधु का जल हो गए।
आग सी दहती किरण से, लिपट बादल हो गए।।
फूल-फल-पत्ते टहनियां, हम तना, जड़ भी हम्हीं,
सृष्टि-बीजों को बचाने हम धरातल हो गए।।

मध्य प्रदेश के खरगौन से आए दर्द शुजालपुरी ने
उधर से तुम इधर आओ, इधर से हम उधर आएं,
हमारी राह-रोशन को सितारे भी उतर आएं।।
हमें दुनिया से क्या मतलब, हमें अपनों से क्या रिश्ता
हमें तुम ही नजर आओ, तुम्हें हम ही नजर आएं।।
के माध्यम से प्रेम में दो दिलों के एकाकार होने की कथा काव्य में कही।

गीत चांदनी का संचालन कर रहे जयपुर के हास्य व्यंग्य के कवि सुरेंद्र दुबे ने भी कुछ गंभीर पंçक्तयों से अपने फौलादी इरादों का इजहार किया -
मेरे कदमों का मंजिल से नाता है,
मुझको भी इतिहास बनाना आता है।।
हर इक बाधा शर्म से पानी-पानी है,
मेरी गति से दूरी को हैरानी है।।
हर पत्थर के मकसद से परिचित हूं मैं,
गड्ढों की फितरत जानी पहचानी है।।
मेरे पांवों से हर कांटा नजर चुराता है,
मुझको भी इतिहास बनाना आता है।।
मेरे कदमों का मंजिल से नाता है

Wednesday, September 30, 2009

...ज्यों मूक को मिल गई वाणी

आज रात दो बजे यूं ही कुछ मित्रों के ब्लॉग पढ़ रहा था कि अनायास ही ब्लॉगवाणी डॉट कॉम खोलने के लिए माउस क्लिक कर दिया। आज तो सचमुच कमाल हो गया वरना ब्लॉगवाणी की विदाई का संदेश देखकर मन खिन्न हो उठता था। ऐसा लगता है जैसे बहुत कुछ ऐसा खो गया है जो दिल की गहराइयों तक पैठ बना चुका था। मेरा आशय महज इन बातों से नहीं हुआ करता था कि ब्लॉगवाणी पर मुझे कितने लोगों ने पसंद किया या मेरा ब्लॉग सबसे अधिक पढ़े जाने वाले ब्लॉग की सूची में कितनी बार आया, बल्कि ब्लॉगवाणी खोलने के बाद पुस्तक की इंडेक्स की तरह पृष्ठ दर पृष्ठ आलेखों पर एक नजर डालना और पहली नजर में पसंद आने पर आलेख को पूरा पढ़ पाना। इतना ही नहीं, ब्लॉगवाणी ने एकाधिक बार कई सालों से बिछड़े मित्रों के ब्लॉग पढ़ने और उनसे संवाद साधने का अवसर भी उपलब्ध कराया।
ब्लॉगवाणी के बंद होने के बाद कई ब्लॉगर मित्रों से फोन पर अपनी व्यथा शेयर की, तो उधर भी पीड़ा कुछ वैसी ही महसूस हुई। ऐसा लग रहा था जैसे शब्दों से स्वर छिन गए हों। मुझ सरीखे मूकों को वाणी प्रदान करने के लिए ब्लॉगवाणी के नियंताओं का बहुत-बहुत स्वागत और हृदय से साधुवाद।

Friday, September 18, 2009

...ये कहां आ गए हम

... तो आज अमिताभ बच्चन की फिल्म -सिलसिला-से अपनी बातचीत का सिलसिला शुरू करता हूं। सुबह बिहार के किशनगंज से एक डॉक्टर मित्र का फोन आया। वे बिहार में विधानसभा की 18 सीटों पर हुए उपचुनाव में सत्तारूढ़ जनता दल यू और भाजपा की करारी शिकस्त से दुखी थे। उपचुनाव में जनता दल यू को तीन और भाजपा को मात्र दो सीटों पर संतोष करना पड़ा। पटरी से उतरे लालू यादव की लालटेन अचानक चमक उठी और राजद ने सबसे अधिक छह सीटों पर जीत हासिल की। लालू का गमछा पकड़कर रामविलास पासवान भी वैतरणी पार उतर गए और उनके प्रत्याशियों ने तीन सीटें झटक लीं। आमजन को महंगाई के मझधार में छोड़कर मितव्ययिता का राग अलापने वाली कांग्रेस के उम्मीदवार भी दो सीटें निकाल ले गए।
मेरा मकसद यहां उपचुनाव के परिणाम का विश्लेषण नहीं करना नहीं, बल्कि अपने मित्र की पीड़ा पर मरहम लगाना भर है। यह पक्की बात है कि मेरे मित्र किसी राजनीतिक दल की विचारधारा से ताल्लुकात नहीं रखते, लेकिन धरा से जुड़े होने के कारण धरातल पर होने वाले काम उनकी नजरों से नहीं बच पाते। कभी आम सुविधाएं नहीं मिलने से त्रस्त थे तो आज चिकनी सड़क पर उनकी कार भी बिना धचके दिए चलती है। आज से पांच साल पहले यदि कोई बिहार गया हो तो उसे अहसास होगा कि लालू-राबड़ी के पंद्रह साल के शासनकाल में बिहार किस हद तक पिछड़ गया था।
मेरे मित्र का तर्क था कि नीतीश कुमार ने सत्ता संभालने के बाद बिहार के कायाकल्प का प्रयास अवश्य शुरू किया है और आज सड़कों से लेकर अस्पतालों तक के सुधरे हुए हालात इसका बयान करते हैं। अन्य क्षेत्रों में भी प्रगति की रफ्तार देखी जा सकती है। मित्र की चिंता इस बात की है यदि हालात ऐसे ही रहे और लोग विकास को दरकिनार कर यदि जात-पांत जैसे मुद्दों पर मतदान करते रहे तो बिहार एक बार फिर पिछड़ेपन की गर्त में चला जाएगा। हालात बदलने के साथ विचारों में भी नयापन आना चाहिए और हमारे सोचने के स्तर में भी विकास अपेक्षित है। अन्यथा हम यही कहने को विवश होंगे.....ये कहां आ गए हम।
मैंने मित्र को दिलासा दिया कि संभव है कि नीतीश और सुशील मोदी भारतीय क्रिकेट टीम की तरह लीग मैचों में करारी शिकस्त के बाद फाइनल में शानदार वापसी करें। हालांकि उपचुनाव के परिणामों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि जनता दल यू ने रमई राम और श्याम रजक को अपनी गोद में बिठा लिया, जिनकी करतूत का फैसला जनता ने कर दिया और जनता दल यू को सीट के साथ साख व प्रतिष्ठा भी गंवानी पड़ी।
किसी विचारधारा का समर्थक होना एक बात है और किसी एक के खिलाफ बाकी सभी का एकजुट हो जाना दूसरी बात। हालांकि राजनीति में किसका गठजोड़ किसके साथ कितनी अवधि के लिए रहेगा, इसकी भविष्यवाणी करना आसान नहीं है। अंत में उधार की चार पंक्तियों के साथ अपनी बात खत्म करूंगा, शायद मेरे मित्र को कुछ तसल्ली मिले-
राजनीति में मित्र कठिन है, खुद से परे चरित्र कठिन है।
किसी जुआरी के अड्डे पर वातावरण पवित्र कठिन है।।

Sunday, June 7, 2009

न क्यू का झंझट, न बाबू से झिकझिक


अभी पिछले दिनों बहुत ही जल्दबाजी में ट्रेन यात्रा का शिड्यूल बनाना पड़ा। ऐसे में महज एकाध दिन में जयपुर से पटना की ट्रेन में आरक्षण मिल पाना बहुत ही मुश्किल था। वैसे अमूमन जयपुर से पटना के लिए साप्ताहिक ट्रेनें ही चलती हैं और उनमें बिल्कुल ही जगह नहीं थी। सुबह आठ बजे आरक्षण खिड़की खुलते ही तत्काल कोटे में टिकट बुक कराने पहुंचा तो बुकिंग क्लर्क ने सीट उपलब्ध नहीं होने की बात कही। उसका कहना था कि सीमित सीटें होती हैं और एक साथ हजारों काउंटर खुल जाते हैं, ऐसे में टिकट मिलना मुश्किल ही होता है। उससे कोई और विकल्प सुझाने को कहा तो उसका रुख तो नकारात्मक था ही, पीछे क्यू में खड़े यात्री भी अपनी बारी में देरी होने से झल्लाने लगे। ऐसे में किसी मित्र ने भारतीय रेलवे की वेबसाइट www.irctc.co.in पर अपना अकाउंट खोलकर वहां इन्क्वायरी करने और आरक्षण कराने की सलाह दी। उसके लिए किसी बैंक में अपना खाता होना जरूरी था और डेबिट कार्ड भी। वाकई यह सलाह काम की थी। आज के समय में हममें से अधिकतर के पास बैंक अकाउंट और डेबिट कार्ड अक्सर होते ही हैं। मैंने रेलवे की वेबसाइट पर अपना अकाउंट खोला। वहां तसल्ली से उस रूट की सभी ट्रेनों में सीटों की उपलब्धता देखी और रूट बदलकर जाने के भी विकल्पों की भी बिना किसी परेशानी के जानकारी ली। इसमें एक अन्य वेबसाइट www.erail.in से भी काफी मदद मिली। हां, बदले में आईसीआरटीसी सरविस चार्ज चुकाना पड़ा, लेकिन यह जेब पर विशेष भारी नहीं रहा।
मैं न तो रेलवे का मुलाजिम हूं कि उसकी तरफदारी करूं, लेकिन इतना अवश्य कहना चाहूंगा कि आज हममें से अधिकतर कम्प्यूटर लिट्रेट हैं, ई-मेल और अन्य वेबसाइटों की जानकारी के लिए नेट सरफिंग करते ही हैं। आम तौर पर शहर में हम जहां रह रहे होते हैं, जरूरी नहीं कि रेलवे रिजरवेशन काउंटर आसपास हो। ऐसे में कई किलोमीटर की यात्रा तय करके घंटों लाइन में खड़े रहने और उसके बाद भी गंतव्य का आरक्षित टिकट नहीं मिलने पर निराश होकर लौटने से अच्छा है कि www.irctc.co.in पर अपना अकाउंट खोलकर आसानी से टिकट ले लिया जाए। यह सेवा सुबह पांच बजे से देर रात्रि साढ़े ११ बजे तक उपलब्ध रहती है। इस तरह सुबह आठ बजे रेलवे के आरक्षण काउंटर खुलने से पहले और रात्रि आठ बजे (कई आरक्षण केंद्रों पर अब रात्रि 10 बजे तक भी काउंटर खुले रहते हैं) के बाद भी टिकट बुक कराए जा सकते हैं और कैंसिल भी। इस तरह इस तकनीक का लाभ उठाने में कोई हर्ज मुझे नहीं लगता। संभव है हमारे कई साथियों को इसकी जानकारी हो और वे इसका लाभ उठा भी रहे होंगे, लेकिन महज अल्पज्ञतावश अपना अनुभव शेयर करना चाहता हूं। तो यह है अरजी मेरी आगे मरजी आपकी।

Sunday, February 22, 2009

चिठिया हो तो हर कोई बांचे...


कई महीनों से ब्लॉग और ब्लॉगरों की दुनिया से दूर हूं। कुछ ऐसी व्यस्तताएं थीं कि चाहकर भी लिखने-पढ़ने का समय नहीं निकाल पाया। किन कारणों से ऐसा हुआ, इसकी चरचा फिर कभी। आज तो कुछ विशेष अनुभूतियों को लेकर हाजिर हूं, जिन्हें शेयर करने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूं।
आज सुबह करीब साढ़े सात बजे मोबाइल की रिंगटोन से नींद खुली। अखबार के दफ्तर से दो बजे फ्री होने के बाद सोते-सोते करीब तीन बज ही जाते हैं। ऐसे में सुबह नींद में खलल पड़ती है तो बहुत ही बुरा लगता है, लेकिन जब मोबाइल के दूसरी ओर कोई ऐसा शख्स हो जिसकी मधुर आवाज सुनना नींद से अधिक प्रिय हो तो फिर कोई शिकायत नहीं होती। आज भी कुछ ऐसी ही स्थिति थी। उधर से आवाज आई---`आप मंगलम जी बोल रहे हैं। मैं भागलपुर से संजीव...बीएड में हम साथ थे।´ इन अल्फाजों को सुनते ही क्षणमात्र में महीनों साथ गुजारे गए लम्हों का फ्लैश बैक मानस पटल पर घूम गया। पूछा-आपको मेरा नंबर कैसे मिला? जो जवाब मिला, उससे और भी तसल्ली हुई। उन्होंने कहा-आपने कभी पोस्टकार्ड भेजा था मेरे नाम। मम्मी कहीं रखकर भूल गईं। आज सुबह नजर पड़ी तो मैंने सोचा देखता हूं नंबर मिलाकर और बात हो गई। फिर तो हम दोनों ने बीते हुए करीब 13-14 साल का ब्यौरा एक-दूसरे को सुनाया। जहां तक मुझे याद आता है, मैंने मोबाइल कनेक्शन लेने के बाद अपने कई मित्रों को पोस्टकार्ड लिखे थे और उसमें अपनी वर्तमान स्थिति, निवास और मोबाइल नंबर का भी जिक्र किया था ताकि संबंधों को पुनरजीवित किया जा सके। पत्र लिखने की मेरी आदत रही है, जो कई मित्रों की पत्रोत्तर देने की उदासीनता की भेंट चढ़ती जा रही है, लेकिन संजीव भाई के फोन ने पत्रों की उपादेयता की नई सिरे से व्याख्या कर दी है। मैं एक बार फिर इस तथ्य को कहना चाहूंगा कि मोबाइल और इंटरनेट के इस युग में भी पत्रों की अहमियत कम नहीं हुई है।
कोशिश करूंगा कि अपने पुराने मित्रों से पत्राचार कर एक बार फिर संबंधों को रिन्यू करने की कोशिश करूं। उम्मीद है जीवन के इस मोड़ पर उन मित्रों से जुड़कर जीवन के पलों को और खुशनुमा बना सकूंगा।

Friday, December 12, 2008

`चिवड़ा-दही´ का जवाब नहीं

आइए, आज आपको बिहार के सुप्रसिद्ध डिश `चिवड़ा-दही´ की महत्ता सुनाता हूं। अभी कुछ दिनों पहले जनसत्ता में मृदुला सिन्हा का एक लेख पढ़ा था जिसमें उन्हें नारी के आंचल के दर्जनों गुण गिनाए थे। इसी बहाने उन्होंने बरगुन्ना (डेगची) के भी बारह गुणों से संपन्न होने की बात कही थी। संयोग से उसी रात जयपुर में मुझे एक शादी में जाने का अवसर मिला। जिन्होंने हमें निमंत्रण दिया था, वे हमारी प्रोफेशनल मजबूरी से वाकिफ थे कि हम देर रात ही शादी में शरीक हो सकेंगे। ऑफिस की ड्यूटी से फ्री होते-होते हम पांच-छह मित्र करीब 15 किलोमीटर की दूरी तय करके विवाह स्थल पर पहुंचे। पहुंचते-पहुंचते घड़ी की सूइयां साढ़े बारह से अधिक बजने का संकेत दे रही थीं। वहां बराती-घराती दोनों ही पक्ष के लोग भोजन कर चुके थे, दूल्हा-दुल्हन भी भोजन का स्वाद लेने के बाद विवाह-वेदी पर बैठने चले गए थे। पंडितजी व्यवस्थाएं जुटाने में लगे थे। कैटरिंग वाले और हलवाइयों ने भी भोजन शुरू कर दिया था। जो भोजन कर चुके थे, वे टेबल आदि समेट रहे थे। हमें पहुंचते ही कहा गया कि हम भी भोजन कर लें। मना करना शिष्टाचार के विपरीत होता, सो हमने भी `दाने-दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम´ पर अमल करते हुए भोजन के उस अंश को उदरस्थ करना शुरू कर दिया, जिन पर हमारा नाम लिखा था।
खाते-खाते मुझे बिहार में विवाह-शादी या अन्य अवसरों पर होने वाले भोज की याद आ गई। ऐसे अवसरों पर `चिवड़ा-दही´ ऐसा डिश होता है, जो मेजबान के पास मेहमान के लिए हर समय उपलब्ध होता है। चार बजे भोर में भी कोई छूटा हुआ बराती या अन्य अतिथि आ जाए तो बिना पेशानी पर बल लाए हुए उसके सामने `चिवड़ा-दही´ परोस दिया जाता है। सब्जी बची हो तो ठीक नहीं तो कोई बात नहीं। वैसे अमूमन ऐसे अवसरों पर आलू का अचार भी बनाया जाता है जो कई दिनों तक खराब नहीं होता और `चिवड़ा-दही´ के साथ इसका कंबिनेशन भी सही बैठता है। वैसे बतौर सहायक सब्जी या अचार न भी हो तो भी `चिवड़ा-दही-चीनी´ की त्रिवेणी ऐसा स्वाद जगाती है कि क्षुधा ही नहीं, मन भी तृप्त हो जाता है।
ऐसे में एक और वाकया याद आता है। भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी किशनगंज आए थे। मैं भी चला गया था भाषण सुनने। उन्होंने अपने भाषण में फास्ट फूड संस्कृति के बढ़ते प्रचलन का उल्लेख करते हुए कहा था कि `चिवड़ा-दही´ से अच्छा फास्ट फूड क्या होगा। बस चिवड़ा भिगोया, दही और चीनी से उसकी संगत कराई और हो गए तृप्त। बिहार के अधिकतर शहरों के भोजनालयों में भी नाश्ते के रूप में यह डिश आसानी से उपलब्ध हो जाता है।
ऐसा नहीं है कि राजस्थान में ऐसा कोई टिकाऊ डिश नहीं होता है। जरूर होगा, लेकिन बदलते हुए दौर में हम अपनी संस्कृति से ही नहीं, पारंपरिक खान-पान से भी दूर होते जा रहे हैं और ऐसे में जब चूल्हा बुझ चुका होता है, तंदूर ठंडा हो चुका होता है, हलवाई जा चुके होते हैं और फिर कोई मेहमान (असमय) आ धमकता है तो मेहमान व मेजबान दोनों को ही इन परिस्थितियों से रू-ब-रू होना ही पड़ता है।

Monday, October 27, 2008

थोड़ा कम पी मेरी रानी....दीपावली की असीम मंगलकामनाएं


इधर करीब दो-ढाई महीनों से ब्लॉग जगत से नाता टूट सा गया है। नियमित लेखन हो नहीं पाता है और पढ़ने की तो बात ही नहीं सोच सकता। कुछ व्यक्तिगत परेशानियां हैं, जिनका जिक्र फिर कभी। अभी तो यही कह सकता हूं कि विश्व के महानतम अर्थशास्त्रियों में गिने जाने वाले डॉ. मनमोहन सिंह ने जब से प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली है, महंगाई की मार से हर भारतीय की हालत खराब है। आए दिन हर परिवार में रोज-रोज बढ़ती महंगाई से पति-पत्नी तथा माता-पिता से संतानों के संबंध में खटास बढ़ती ही जा रही है। अब हर किसी की तो महंगाई भत्ता बढ़ती नहीं, न ही हर किसी को छठा वेतन आयोग जैसा कुछ मिल पाने का सुख मिल पाता है। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपित और राज्यपालों की तरह तनख्वाह बढ़ने की किस्मत भी हर किसी की कहां हुआ करती है। बावजूद इसके आटा, चावल, नमक, चीनी, तेल, बिस्किट जैसी चीजें तो हर घर में चाहिए ही। ऐसे में पत्नियों को महीने भर के घर खर्च का पैसा देकर रोज की खिच-खिच से मुक्ति पाने के आकांक्षी लोग भी पत्नियों से खिंचे-खिंचे से रहते हैं। न जाने श्रीमतीजी कब और पैसे की डिमांड कर बैठें। कई बार तो 20-22 तारीख आते-आते पैसे खत्म हो जाने की स्थिति आ जाती है। यह पीड़ा शायद 50-60 प्रतिशत पतियों की हो। वैसे तो लोगों को `माया´ (धन-संपत्ति) से मुक्ति पाने के उपाय सुझाने का ठेका साधु-महात्माओं के पास ही हुआ करता है। हालांकि आजकल मैनेजमेंट गुरु भी हाउस मैनेजमेंट और वेल्थ मैनेजमेंट के नाम से ऐसी सलाह देने में गुरेज नहीं करते।
कई बार ऐसा भी होता है, जब आपको ऐसे आदमी से भी बहुत अच्छी सलाह मिल जाती है जिसकी आपको अपेक्षा नहीं होती, या फिर आपसे बिल्कुल विपरीत पृष्ठभूमि के व्यक्ति की कोई बात ऐसी होती है कि लगता है जैसे दोनों समानानुभूति की धरातल पर खड़े हों। अभी दो दिन पहले ही गुलाबी नगरी में अजमेर रोड पर खड़े एक ट्रक आरजे-14 जीबी-3985 पर लिखी सूक्ति वाक्य सी पंक्तियां देखीं तो लगा कि इसे आपलोगों से भी शेयर किया जाए। पंक्तियां कुछ इस तरह थीं---
`थोड़ा कम पी मेरी रानी, महंगा है इराक का पानी´ ।
ड्राइवर की इस गुजारिश का उसकी गाड़ी पर कितना असर हो पाता है, इसकी सचाई का पता तो उस ड्राइवर से पूछने पर ही चल पाएगा, लेकिन महंगाई और तंगहाली से परेशान पति अपनी पत्नी से सलीके से ऐसी गुजारिश तो कर ही सकता है। अभी तो ज्योतिपर्व दीपावली की इस पावन घड़ी में धन की देवी मां लक्ष्मी से यही प्रार्थना है कि उसकी कृपा हर किसी पर बनी रहे और हर कोई कुबेर बना रहे। दीपावली की इन्हीं शुभकामनाओं के साथ----मंगलम।

Saturday, May 3, 2008

जरा याद हमें भी कर लो...

आज बहुत ही निजी बातें, ...हालांकि पहले भी सार्वजनिक अनुभवों से ज्यादा स्थान व्यक्तिगत अनुभव ही घेरते रहे हैं, लेकिन चूंकि कई लोग ब्लॉग को ऑनलाइन डायरी के रूप में परिभाषित करते हैं, सो आज यहां विचार नहीं, नितांत व्यक्तिगत अनुभव या कहें पीड़ा प्रस्तुत हैं, जिन्होंने मुझे-मेरे अंतर्मन को आहत किया। दुनिया चूंकि बहुत बड़ी है....इसलिए इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि कुछ और लोगों का अनुभव भी मेरे अनुभव के इदॅ-गिदॅ रहा हो।
बचपन में दोस्तों की लंबी फेहरिस्त होती है, और उम्र बढ़ने के साथ-साथ इसकी छंटाई होती रहती है। मेरे बचपन में काफी दोस्त थे, जिनमें से दो को मैं अपने अधिक नजदीक महसूस किया करता था। दोनों के घर अपेक्षाकृत दूर थे, सो हमारा साथ स्कूल तक ही सीमित हुआ करता था, लेकिन यह साथ इतनी ऊर्जा भर देता था कि चौबीसों घंटे साथ न होने का मलाल नहीं होता था। बदलते हुए समय के साथ हमारे अध्ययन के क्षेत्र ही नहीं बदले, कार्यक्षेत्र भी बदल गए। एक मित्र अपने गृहजिला मुख्यालय पर हैं, सो सबसे अधिक हमारी जननी-जन्मभूमि-माटी से जुड़े हैं। मैं घर से तकरीबन 35-36 घंटे की दूरी पर हूं और तीसरा दोस्त लंदन में इंजीनियर की नौकरी बजा रहा है। अपनी संपन्नता और सुविधा के कारण वह संभवत: इन घंटों में मुझसे ज्यादा नजदीक है।
यह तो भौगोलिक दूरी की बात है, दोनों मित्रों से मानसिक और भावनात्मक दूरी मैंने कभी महसूस नहीं की। एसटीडी के बावजूद अपने जिला मुख्यालय वाले दोस्त से महीने में एकाध बार बात हो ही जाती है (पहल चाहे जिधर से हो) और विदेश रहने वाला दोस्त शनिवार-रविवार को फोन करना शायद ही कभी भूलता हो।
अभी पिछले दिनों अपने जिला मुख्यालय वाले दोस्त को फोन किया तो उसने बताया कि वह अपने भतीजे के शादी समारोह में है। मैंने जब पूछा कि भाई, शादी थी तो बताते तो सही? इस पर उसने जो जवाब दिया वह मुझे मर्माहत कर गया। उसका कहना था कि यदि मैं तुझे पहले बताता तो क्या तुम आ ही जाते?
अब मैं उसे क्या बताता? सन्न सा रह गया मन मसोसकर, लेकिन उस बातचीत के पांच-छह दिन बाद भी मेरा मन बार-बार मुझे कचोटता रहता है। उसके बाद दुबारा भी उससे बात हुई, शादी सकुशल संपन्न होने की खबर दी उसने, लेकिन मेरे मन का गुबार है कि खत्म होने का नाम नहीं ले रहा। सो मैंने सोचा, दिल की आग पर ब्लॉग के माध्यम से ही कुछ ठंडे छींटे खुद ही डाल लूं। शायद करार आ जाए।
ऐसे मित्रों से मैं यही पूछना चाहता हूं कि हमारे पूर्वजों ने जो परंपराएं बनाई हैं, क्या वे महज खानापूर्ति के लिए हैं, और यदि ऐसा ही है तो हम लकीर पीटने की तर्ज पर उनका पालन क्यों करते हैं। हालांकि मुझे घर छोड़े हुए लगभग ढाई दशक हो चुके हैं, लेकिन परंपराओं को मैं आज भी नहीं भूला हूं, उन्हें आत्मसात करने की भी भरसक कोशिश करता हूं।
जहां तक मुझे याद आता है, हमारे यहां ऐसी परंपरा है कि घर में कोई शुभ कार्य हो तो कुलदेवता, ग्रामदेवता, पूर्वजों के साथ-साथ असंख्य देवी-देवताओं को निमंत्रण çदया जाता है। कोशिश होती है कि जिनसे मनमुटाव या थोड़ी-बहुत दुश्मनी भी है, उन्हें भी मांगलिक कामों में शामिल होने के लिए निमंत्रित करें। शादी-उपनयन से महीनों पहले महिलाएं गीतों के माध्यम से पूर्वजों और देवी-देवताओं के नाम ले-लेकर उनसे यज्ञ (वहां शादी-विवाह को आम बोलचाल की भाषा में यज्ञ ही कहते हैं) में शामिल होने का आह्वान करते हैं। यह हमारे विश्वास का ही प्रतिफल हुआ करता है कि हम मान लेते हैं कि सबकी उपस्थिति से ही यज्ञ सफलतापूर्वक संपन्न हो गया। अब इसकी तो कोई गारंटी नहीं मांगता कि हमने जिन देवताओं और पूर्वजों को बुलाया, उनके आने का प्रमाण-पत्र दिखाओ। यदि उनके साथ ऐसा नहीं है तो फिर दूर बैठे मित्रजनों के लिए दूरी बरतने का क्या प्रयोजन? किन्हीं मजबूरियों के चलते कोई आपसे दूर चला गया तो इसका मतलब यह तो नहीं कि उसे आप अपनी जिंदगी, अपने सुख-दुख से निकाल बाहर कर दो। ...आप यदि ऐसा कर भी देते हो और जिसे देश-प्रदेश से बाहर होने के कारण आपने दिल-निकाला दे भी दिया, लेकिन वह अपने दिल से आपको न निकाल पाए....तो इसका कोई प्रतिकार है आपके पास। सो यही निवेदन है....जरा याद हमें भी कर लो.....।

Sunday, November 11, 2007

पूछो न कैसे दिन-रैन बिताई (दो)

दीपावली का त्यौहार मनाने का हर राज्य, जिला और कहें तो गांव तक का अपना-अपना विशिष्ट तरीका होता है। फिर बच्चों का क्या, वे तो इन तरीकों के जन्मदाता होते हैं, वे जो न कर बैठें, वह कम ही होगा। जब काफी छोटा था, (जहां तक याद कर पाता हूं) तो मां के साथ दीये जलाने का अलग ही आनंद होता था। कुछ बड़ा हुआ तो दीपावली की अगली सुबह सभी भाई-बहनों में होड़ होती थी कि कौन जल्दी जगेगा। कई बार तो हम इस चक्कर में सो भी नहीं पाते थे। पौ फटने से पहले ही हम बिस्तर छोड़ देते थे और मिट्टी के जले हुए दीये (जिन्हें हम गांव की भाषा में दीवौरी कहते थे)चुन-चुनकर इकट्ठा करते थे। दिन होते ही हमारी दुकान सज जाती थी। छोटे-छोटे हाथ पटसन की पतली रस्सी बांटते, पटसन की ही डंठल(संठी) से तराजू की डंडी और बड़े दीयों से तराजू के पलड़े बनाते थे। छोटी दीवौरियां मापने के काम आती थी। तौलना भी तो मिट्टी ही होता था और बेचना-खरीदना भी वही।
समझ बढ़ी तो खेल बदला, नाटक के प्रति रुझान बढ़ा। हम साथियों सहित दसेक दिन तक हिंदी की किताब में आए नाटक की रिहसॅल करते और फिर दीपावली की रात को बैडशीट व चादरों का परदा तानकर नाटक खेलते। गांव के हम भोले बच्चों की प्रस्तुतियों का इंतजार ग्रामीणों को बेसब्री से रहता था। उनकी तालियां और महज एक-दो रुपए के इनाम हमारे लिए किसी ऑस्कर से कम नहीं होते थे। जब हमने अपने टोले में चंदा कर नाटक के लिए पहली बार माइक किया था तो हमें जो खुशी हुई थी, वह राकेश शर्मा को चांद पर जाने के बाद भी नहीं हुई होगी। नाटक का शौक आगे भी बना रहा, लेकिन अब बीतते हुए समय ने मुझे कलाकार से कलाकारों का कद्रदान बना दिया है। पिछले 12-14 साल से किसी न किसी कारणवश दीपावली पर घर न जा पाने के कारण मन में जो मलाल रहता है, उसे किससे शेयर किया जाए,कुछ समझ नहीं पाता था, कई बार डायरी पर उतारने की कोशिश की तो आंखों के पानी से कागज भीग गया, लिखा नहीं जा सका। बीबी-बच्चे जिनके बचपन का परिवेश मुझसे सवॅथा ही भिन्न रहा है, वे मेरी टीस को क्या महसूस कर सकेंगे, सो उन्हें भी हमराज नहीं बना सका। इस बार ब्लॉग ने यह मंच उपलब्ध कराया तो सोचा कि इसे आपलोगों से ही शेयर करूं।
सॉरी, त्यौहार के इस उल्लास भरे मौसम में आपबीती ले बैठा, ईश्वर से यही प्रार्थना है कि आप सभी ऐसे हषॅ के क्षणों में उनके साथ हों, जिनके साथ रहने को आपका दिल करता है। धन्यवाद मेरी व्यथा को आपने आत्मसात किया।

पूछो न कैसे दिन-रैन बिताई (एक)

दीपावली पर शुक्रवार को सुबह से ही घर में उत्सवी माहौल था। परिवार भले छोटा हो, किराये का घर उससे भी छोटा, लेकिन खुशियां बड़ी लग रही थीं। श्रीमतीजी किचन में भांति-भांति के व्यंजन बना रही थीं। बच्चे की फरमाइश पूरी करते हुए देर रात ही फुलझड़ियां, अनार, जमीन चक्कर और न जाने क्या-क्या ले आया था, सो वह भी शाम की प्लानिंग में मस्त था। मैं चूंकि सुबह तीन बजे लौटा था, सो कभी सोने का बहाना करके तो कभी रेडियो पर समाचार सुनने के बहाने आंखें मूंदे लेटा रहा। पत्नी ने झकझोरा तो दोपहर को बाजार गया और पूजा के लिए फल-फूल, मिठाई और दूसरे सामान लाकर दुबारा लेट गया। शाम हुई तो श्रीमतीजी ने सज-धजकर घर से लेकर मंदिर तक दीपक जलाए तथा आधुनिका नारी होने के नाते बच्चे को आतिशबाजी में भी साथ दिया। पूजा के समय मैं नहा-धोकर तैयार हुआ और दशॅक की भांति श्रद्धाभाव से बेटे के साथ बैठ गया। मेरा मानना है कि गृहलक्षमी ही महालक्षमी का मनुहार करे तो वे आ सकती हैं, और फिर त्रियाहठ के वशीभूत होकर टिक भी सकती हैं, चंचला जो ठहरीं। आधुनिक तकनीक ने हमें बहुत ही आजादी दे दी है। कभी लंदन-अमेरिका में पंडितों की कमी के कारण टेप चलाकर सत्यनारायण भगवान की कथा की बात किसी मैग्जीन में पढ़ी थी। मैंने भी डीवीडी प्लेयर पर महालक्षमी पूजन का एमपीथ्री चला दिया (पिछले साल पंडितजी की प्रतीक्षा में १२ ही नहीं, १-२ तक बज गए थे) और श्रीमतीजी उसी का अनुसरण करती हुई पूजा करती रहीं। आरती के दौरान स्पीकर से जब हम तीनों के समवेत स्वर मिले तो वातावरण वाकई भक्तिपूणॅ हो गया था। महालक्षमी की रखवाली का दायित्व घरवाली को सौंपकर गुरुजनों का आशीष लेने मैं निकल गया। माता-पिता से दूर रहने की एक कसक यह भी होती है ऐसे सुअवसरों पर उन सुपात्रों की तलाश करनी पड़ती है, जिनके चरण श्रद्धाभाव से छू सकूं, औपचारिकता पूरी करने भर के लिए नहीं। देर रात घर लौटा और फिर उन्हीं यादों में खो गया, जिन्होंने दिनभर मेरे अवचेतन मन को मथकर रख दिया था।
आगे की बातें फिर करेंगे....