Thursday, November 8, 2007

ज्योतिपवॅ दीपावली पर मंगलकामनाएं



दीवाली का पवॅ अलौकिक
नव ज्योति जगमगा रही,
जन-जन का पथ आलोकित हो
यह अभिलाषा जगा रही।।

दीवाली का पवॅ सुनहरा
आतिशबाजी न्यारी-न्यारी,
देख पटाखे और फुलझड़ियां
बच्चों की गूंजे किलकारी।

यहां-वहां हर गली-मोहल्ला
जिधर देखिए उधर तैयारी,
खुशियां बांटें, नाचें गाएं
बच्चे-बूढे़ सब नर नारी।

साभारः भाई किशन

धन की देवी मां लक्षमी और बुद्धि के दाता भगवान विनायक की कृपादृष्टि आप और आपके परिजनों, मित्रजनों पर बनी रहे इन्ही शुभकामनाओं के साथ
आप सबका सुहृद
मोहन मंगलम्

Wednesday, November 7, 2007

कैसे मना पाएंगे दिवाली


बड़ी अजीब बात है। अपने देश में हर कोई अपने-अपने तरीके से अपनी दुनिया को रोशन करने की जुगत में लगा हुआ है। अभी पिछले दिनों अखबारों में खबर पढ़ी कि लंदन में भी दिवाली फेस्टिवल मनाया जा रहा है और मैं हूं कि इसी चिंता में घुला जा रहा हूं कि कैसे हम मना पाएंगे दिवाली, किस मुंह से खाएंगे मिठाई। ....और घृष्टता की हद ये कि आपको भी खुशी के इस मौके पर हास्य-व्यंग्य की फुलझड़ियों की बजाय इन नीरस शब्दों को पढ़ने के लिए विवश कर रहा हूं।
एक तथ्य तो यह है कि सेंसेक्स आसमान छू रहा है, मुकेश अंबानी, अनिल अंबानी, एल. एन. मित्तल, वो डीएलएफ वाले , विप्रो वाले अजीमजी और ऐसे कितने उद्योगपति सफलता के झंडे गाड़ रहे हैं, भारत में अरब-खरबपतियों की संख्या बढ़ती जा रही है, लेकिन गरीब हैं कि कम होने का नाम ही नहीं ले रहे। या तो सरकारी योजनाएं मन से लागू नहीं की जातीं, या फिर उन्हें चलाने वाले उनसे भी ज्यादा गरीब होते हैं, जिनके लिए ये योजनाएं बनाई जाती हैं। कुछ ऐसे लोग सब्जियों का ठेला लगाकर, साइकिल पर फेरी लगाकर रेडिमेड कपड़े-साड़ियां बेचकर, गली-मोहल्ले में छोटी सी दुकान खोलकर खाने-कमाने लायक कमा लेते थे, वे सभी रिलायंस फ्रेश, बिग बाजार, स्पेंसर जैसी रिटेल चेन व बड़े-बड़े मॉल खुलने से बेरोजगार हो गए। लाखों लोग आतिशबाजी कर अपने सुखों का ढिंढोरा पीटेंगे तो ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो नगरी-नगरी द्वारे-द्वारे ढोल बजाकर पैसे मांगते हैं और जैसे-तैसे दीवाली मनाने का जुगाड़ कर पाते हैं। जिनका स्वाभिमान इसकी भी इजाजत नहीं देता वे तो मन मसोसकर ही रह जाने को विवश होंगे। ऐसे में सही मायने में दीवाली मनाना तभी साथॅक हो सकेगा जब हम सभी अपने-अपने स्तर से ऐसे बेबस लोगों के चेहरे पर खुशियों की चमक लाने का अंजुरीभर प्रयास करें, ईश्वर ने कुछ दिया है तो उसको देने में संकोच कैसा। मां लक्षमी से भी प्राथॅना कि कभी तो उन अभागों के द्वार का भी रुख करो। कुबेरों के पास तो आप डेरा जमाए ही रहती हैं।
सबके जीवन में प्रसन्नता की ज्योति का निखार हो, इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ.........

Tuesday, November 6, 2007

अच्छा तो हम चलते हैं....


...अरे ये क्या....आप तो कुछ और ही सोचने लगे। मैं ब्लॉग की दुनिया में अभी-अभी तो आपसे जुड़ा हूं और अभी आपसे बहुत सारी बातें करनी हैं। आप ब्लॉगसॅ की भावनाओं के समंदर में उतरना है। ऐसे में मैं कहां जाऊंगा आपको छोड़कर। मैं तो जिक्र कर रहा हूं पिंकसिटी के जवाहर कला केंद्र में चल रहे सांस्कृतिक उत्सव---लोकरंग २००७---का। सुदूर पूरब-उत्तर के मणिपुर, मेघालय, सिक्किम से लेकर पश्चिम में गोवा, महाराष्ट्र, गुजरात, दक्षिण में आंध्र प्रदेश, करनाटक, उड़ीसा, मेजबान राजस्थान, पड़ोसी पंजाब-हरियाणा, मध्य प्रदेश और हिमाचल प्रदेश के लगभग डेढ़ हजार कलाकारों ने लगातार ग्यारह दिनों तक अपने-अपने प्रदेशों की संस्कृति का रंग जब बिखेरा, तो दशॅक उसमें रंग से गए। जवाहर कला केंद्र के प्रशासनिक अधिकारी राजीव आचायॅ ने अपने नित नूतन परिधान औऱ शब्दों की जादूगरी से अमिट छाप छोड़ी।
इसके अलावा केंद्र के शिल्पग्राम में लगे शिल्प मेले में २२ प्रांतों के शिल्पियों ने अपनी बेजोड़ कलाकृतियां सजाईं। फूड स्टॉल्स पर भी विभिन्न राज्यों के चटपटे व्यंजनों का भी लोगों ने खूब लुत्फ उठाया।
सोमवार को ग्रांड फिनाले के साथ लोकरंग का समापन हुआ और अगले वषॅ फिर अक्टूबर-नवंबर में मिलने के वादे के साथ सभी कलाकार दीपावली मनाने अपने घरों को रवाना हो गए। तो इंतजार करें एक और ---लोकरंग---का।

Sunday, November 4, 2007

.....तो क्या प्रेमचंद पोखर खुदवाते

आइए, आज आपको अपने गांव ले चलता हूं। जिन गिनी-चुनी प्रतिभाओं की बदौलत हमारे गांव की ख्याति राष्ट्रीय क्षितिज पर हैं, उनमें मैथिली अथ च हिंदी के भी स्वनामधन्य साहित्यकार व दशॅनशास्त्री हरिमोहन झा अग्रगण्य हैं। दसवीं के बाद से ही पहले पढ़ाई, फिर आजीविका के सिलसिले में लगातार गांव से बाहर रहने के कारण मैं भी उनकी कृतियों का आनंद नहीं ले सका। बमुश्किल दो-चार मैथिली कहानियां ही पढ़ पाया था। आजकल मुझ पर पढ़ने की धुन सवार है, सो हाल ही साहित्य अकादमी से प्रकाशित उनकी प्रतिनिधि कहानियों का संकलन--बीछल कथा (मैथिली)--और हास्य-व्यंग्य विधा की पुस्तक---खट्टर काका (हिंदी में)---पढ़ने का अवसर मिला। पढ़ा तो पढ़ता ही गया और दोनों पुस्तकें पूरी करके ही दम लिया। उनकी शेष रचनाएं भी मंगाने के लिए प्रयासरत हूं ताकि उनके समग्र कृतित्व से परिचित हो पाऊं। मैथिली में प्रकाशित उनकी रचनाओं का आज भी मिथिला क्षेत्र में क्या जलवा है, इसे तो वहां जाकर ही महसूस किया जा सकता है, उनकी अधिसंख्य रचनाएं विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में स्वीकृत हैं।----खट्टर काका--- तो प्रकाशन काल से ही अखिल भारतीय स्तर पर (किंवा भारत से बाहर भी) साहित्यप्रेमियों की पसंद और चरचा का विषय रही है।
अब वो बात, जिसने मुझे प्रेरित किया यह सब लिखने को। जयपुर में हाल ही प्राथमिक शिक्षकों का राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ। इसमें भाग लेने के लिए मेरे गांव से भी एक सेवानिवृत्त शिक्षक पधारे। मैंने सहज जिज्ञासावश उनसे स्वनामधन्य हरिमोहन झा के बारे में गांव और ग्रामीणों की राय के बारे में पूछा। अगला वषॅ उनका जन्म शताब्दी वषॅ होगा।
मास्टर साहब का कहना था कि हरिमोहन झा ने अपने लेखन से साहित्य जगत को भले ही उपकृत किया हो, लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकारों में अपनी जगह बनाई हो, साहित्यप्रेमियों के लिए पूज्य बने हों, लेकिन गांव या गांव वालों के लिए क्या किया।
इस जवाब ने मुझे झकझोरकर रख दिया। मैं कुछ समझ नहीं पाया कि एक नौकरीपेशा आदमी ऐसा क्या करे कि गांव वाले उपकृत हो सकें। प्लेस ऑफ वकॅ तथा नेचर ऑफ वकॅ और फिर सीमित मात्रा में उससे प्राप्त धन से अपना व अपने परिवार का गुजर-बसर करना क्या कम कठिन होता है। मुंशी प्रेमचंद ने जिस मुफलिसी में दिन काटे यह किसी से छिपा नहीं है, ऐसे में जनसेवा के लिए वे पोखर कैसे खुदवा पाते। तो क्या लमही (प्रेमचंद का जन्मस्थान) के लोग उन्हें भुला दें। गोस्वामी तुलसीदास का जीवन काल जिस तरह बीता, मुझे नहीं लगता कि उन्होंने अपने पैतृक गांव में तुलसी के दस-बीस बिरवे भी लगाए होंगे। निराला ने अपनी जन्मस्थली में कितने स्कूल खुलवाए? तो क्या इसी बिना पर उन्हें भुला दिया जाए।
मेरा तो मानना है कि आपके इदॅ-गिदॅ से निकले मुकेश-अनिल अम्बानी, एल. एन. मित्तल सरीखे धनकुबेर अकूत दौलत और ख्याति कमाने के बाद यदि अपनी जन्मस्थली को बिसरा दें, हां की जनता के कल्याण के लिए कुछ भी न सोचों तो आप भी बेशक उन्हें बिसरा दें, इससे आपका भी कुछ नहीं बिगड़ेगा। आप यदि कतॅव्यपथ पर अग्रसर रहे, तो आपको भी जीने का रास्ता मिल ही जाएगा, लेकिन समाज को राह दिखाने वाले साहित्यकारों की उपेक्षा से आने वाली पीढियां उनके मागॅदशॅन से वंचित रह जाएंगी।
अतः मेरा निवेदन है कि आपके आसपास यदि कोई ऐसी विभूति हुई है, जिसने अपनी विलक्षण प्रतिभा का लोहा मनवाया है, तो उसके जीते-जी अथवा दिवंगत होने पर भी उनसे परिचित हों, गौरवान्वित महसूस करें, आने वाली पीढियों को भी परिचित कराएं। इसका सबसे अच्छा उदाहरण बंगाली समाज में मिलता है जहां गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की ---गीतांजलि---को गीता से कम महत्व प्राप्त नहीं है। अधिकांश घरों में आपको यह अमर कृति मिल जाएगी।

Saturday, November 3, 2007

कुछ मीठा हो जाए ...


त्यौहार का माहौल है, बाजार सज रहे हैं, सपने खिल रहे हैं, उनमें रंग भरने के प्रयास जारी हैं। ऐसे शुभ दिनों में उन लोगों को भी मिठाई का स्वाद लेने का मौका मिल सकेगा, जो पहले इनके बारे में सोचकर ही रह जाते थे। जी हां, यह सब कुछ संभव हो रहा है गोमाता की कृपा से।
........तो चलें हम उस स्थान विशेष पर। राजस्थान के अजमेर जिले का एक शहर है किशनगढ़। वहां रहती हैं किन्नर सुरेश उफॅ सुशीला। (भाषा में लिंग निरधारण नहीं कर पा रहा हूं, सो स्त्रीलिंग ही मान लें ) उन्होंने दो गायें पाल रखी हैं मोना और गीता। तो यूं हुआ कि पिछले साल दीपावली पर इन गायों ने किशनगढ़ बाजार में मिठाई की दुकान पर मुंह मार दी, तो हलवाई ने उन्हें पलटे की दे मारी। गोपाल-भक्त और गोप्रेमी सुशीला को इससे बड़ी ठेस पहुंची और उन्होंने उस हलवाई को सबक सिखाने के लिए मिठाई की अस्थायी दुकान खुलवा दी। इस दुकान पर २५ रुपए किलो में शुद्ध घी की मिठाइयां खरीदने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी थी।
इसी सुशीला ने इस बार भी किशनगढ़ के एसडीएम राजेंद्र सारस्वत से चार स्थानों पर दुकानें खोलने की अनुमति मांगी है। इन दुकानों पर देशी घी की मिठाइयां १० रुपए किलो और वनस्पति घी की मिठाइयां ५ रुपए किलो मिलेंगी। उन गायों को पलटे मारने वाला हलवाई अपनी किसम्त के पलटा खाने की कसक से उबर नहीं रहा होगा, उसकी गलती की सजा शहर के दूसरे हलवाइयों को भी भुगतनी पड़ रही है, लेकिन इसका दूसरा उज्ज्वल पहलू है कि अब ऐसे हजारों बच्चे ही नहीं, उनके मां-बाप भी मिठाइयों का लुत्फ उठा सकेंगे, जो लाचारी के कारण ललचाई आंखों से मिठाइयों को ताकने भर के लिए ही मजबूर हुआ करते थे।
बढ़ती महंगाई के दौर में कीमतें कम नहीं होंगी, इसका अहसास तो हमें भी है, लेकिन यह आशा तो हम कर ही सकते हैं कि तरक्की की रफ्तार बढ़ती रहेगी, हर हाथ को काम मिलेगा और जेब में दाम होंगे। फिर -----मन के लड्डू फीके क्यों.......वाली कहावत को मानवता झुठला सकेगी। तो हम कृतज्ञता ज्ञापित करें सुशीला किन्नर के प्रति और कामना करें कि जब उसका हृदय मूक पशु के लिए द्रवित हो सकता है तो हमारी आंखें भी दीन-हीन मनुपुत्रों के दुख से नम हो सकेंगी।

Thursday, November 1, 2007

बिना ताम-झाम के तो...

आज शाम को एक ब्लॉगची मित्र के साथ नाश्ता करने गया। दुकान तो छोटी सी थी, लेकिन जैसा नाश्ता मिला, मन प्रफुल्लित हो गया। बदले में पैसे तो देने ही थे, लेकिन मुफ्त में सलाह देने की भारतीय आदत (रिलायंस कम्युनिकेशन के एक विज्ञापन में जैसा बताया जाता है) भी कहां छूटती है। मैंने दुकानदार को फटाफट सलाह दे डाली कि भाई, बाहर रंगीन बैनर लगवाओ, जिसमें आपकी दुकान की विशेषता और चटखारे व्यंजनों का बखान हो। इस पर साथ बैठे मित्र बेसाख्ता बोल उठे--आजकल तो बिना ताम-झाम के मुरगी भी अंडे नहीं देती। यह सुनते ही मेरे मन में कुछ कौंधा और मैं फ्लैशबैक में चला गया।
मित्र की बात में कितना दम है, यह तो वे भी नहीं बता पाए, और इसका सत्यापन करने के लिए महानगर में मुरगियां कहां से आएं, लेकिन पिछले दिनों इस मामले में मेरी जो ज्ञानवृद्धि हुई थी, उसे आपसे शेयर करते हैं।
.......तो यूं हुआ कि मैं पिछले मई-जून में एक परिचित के यहां गया था। वे मुझे अपनी पॉल्ट्री फामॅ दिखाने ले गए। रात के करीब दस बजे थे। फामॅ में २००-२०० वाट के बल्व जेनरेटर के बल पर जल रहे थे। मैंने पूछा कि भाई क्या मुरगियों को अंधेरे में नींद नहीं आती कि आपने बिजली नहीं रहने पर जेनरेटर चला रखा है। इस पर उन्होंने जो राजफाश किया, उससे मैं तो दंग रह गया। उन्होंने कहा कि रात में यह लाइट इसलिए जलाई जाती है कि मुरगियों को रात का अहसास न हो औऱ वे दिन के भ्रम में अनवरत दाना खाती रहें और मुटियाती रहें। मैं उनके इस जवाब से हक्का-बक्का सा रह गया। आदमी ने अपने लाभ के लिए क्या-क्या तरकीब निकाल लिए हैं। निरीह प्राणियों को निवाला बनाना तो न जाने प्रागैतिहासिक काल से ही चला आ रहा है, उन पर अत्याचार के कैसे-कैसे तरीके ईजाद किए जा रहे हैं। भगवान बचाए ऐसे आदमी से इन प्राणियों को, इस दुनिया को न जाने कब क्या सोच ले, कर डाले।

सपने में हकीकत से रू-ब-रू


भारतीय मनीषियों ने शकुन विचार पर कई सारे ग्रंथ लिखे हैं, जिनमें सपनों के फलाफल पर काफी कुछ कहा गया है। आधुनिक मनोविश्लेषक फ्रायड ने भी चेतन--अवचेतन--और अचेतन का आधार लेकर सपनों के कारणों का बड़ा ही गहन विश्लेषण किया है।
तो आइए, आज आपको भी ले चलता हूं सपनों की दुनिया में।
आज के जमाने में जब कभी पुलिस की बात चलती है तो हमारे जेहन में पुलिस की जो छवि उभरती है, वह कामचोर, तोंदू, भ्रष्टाचारी और रौब जमाने वाले की ही होती है। आम आदमी या तो उसकी घुड़की से खौफजदा रहता है या फिर निकम्मेपन से खफा। कवियों के व्यंग्य प्रहार हों या कारटूनिस्ट की कूची, वे कभी भी पुलिसमैन को नहीं बख्शते। इसमें उनकी कोई गलती नहीं होती, न ही वे किसी पूरवाग्रह से ग्रस्त होते हैं। हालात ही ऐसे हैं कि सुस्ती और भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी पुलिसिया व्यवस्था ने इसे हीरो से विलेन की कतार में ला खड़ा किया है। ऐसा नहीं है कि कतॅव्यपरायण पुलिसवाले हैं ही नहीं, ऐसे गिने-चुने चरित्र हमारे समाज में आज भी हैं और वे रोल मॉडल भी हैं। उनके साथ कुछ गलत होता है तो इलाके की पूरी जनता उनके साथ आ खड़ी होती है।
यह क्या, मैं सपना सुनाते-सुनाते कहानी सुनाने लगा। वापस आता हूं सपने पर। हां तो मैंने देखा कि मैं एक व्यस्ततम बाजार में मित्रों के साथ चाय की थड़ी पर बैठा हूं। अचानक पुलिस की जिप्सी आकर रुकती है, उसमें एक सबइंस्पेक्टर टाइप का खाकी वरदीवाला उतरता है तथा काफी तेजी में लहराते हुए आ रहे साइकिल सवार किशोर को रोककर उसके सामने सवालों की बौछार लगा देता है। साथ में यह नसीहत भी कि वाहन कोई भी चलाओ, सावधानी तो रखो ही, अन्यथा हादसे तो राह में मुंह बाए खड़े रहते हैं।
एक पुरानी सी मोपेड खड़ी है। उस पर नए मोबाइल हैंडसेट्स से भरे दो धैले लटक रहे हैं। पुलिस वाला उसके वारिस को आवाज लगाता है, काफी देर बाद बदहवास सा एक अधेड़ गलियों में से निकलता है तो वह एसआई उसे कहता है कि इस तरह कीमती सामान को लावारिस छोड़ना क्या उचित है। यदि आपका सामान चोरी चला जाएगा तो आप पुलिस व्यवस्था को दोष दोगे, कुछ तो आपका भी फजॅ बनता है।
माहौल में सन्नाटा सा छा जाता है। लोग खुसर-फुसर करते हुए पुलिस वाले की भूमिका पर बातें करने लगते हैं। इसी बीच पुलिस वाला हमारे बीच चाय की थड़ी पर आकर बैठ जाता है और हमें बताने लगता है कि हम पुलिस वालों ने खुद ही अपनी छवि बिगाड़ ली है। आज समाज में हमारी जो छवि है, उसके जिम्मेदार भी हमीं हैं। यदि पुलिस चौकस और चुस्त होकर दिलेरी से अपना काम करे तो जनता भी उसे दुश्मन नहीं दोस्त मानकर अपनी परेशानियां बता सकती है, अपराधियों को पकड़वाने में मदद कर सकती है। कद्र का कारवां कतॅव्यपरायणता की राह से होकर गुजरता है। यदि पुलिसवाले अपनी ड्यूटी को तरीके से अंजाम दें तो कोई शक ही नहीं समाज में उनकी इज्जत होगी।
इसी बीच मेरी नींद खुल गई। सपने में दी गई पुलिसवाले की सीख पर यदि हकीकत में अमल किया जाए तो वाकई व्यवस्था सुधर सकती है। ऐसी कामना तो हम करें ही। अंत में उधार की पंक्तियां लेकर यही अजॅ करूंगा.......
जो अब भी नहीं गौर फरमाइएगा,
तो बस हाथ मलते ही रह जाइएगा।