Wednesday, November 25, 2009

...तो सीएम-पीएम क्यों न चुने जनता?

गुलाबीनगरी में गत 23 नवंबर को हुए शहरी निकाय के चुनाव में पहली बार जनता ने अपना महापौर चुनने के लिए मतदान किया। जी हां, पहले जनता पार्षदों को चुनती थी और फिर वे सब मिलकर महापौर चुनते थे। इस बार चुनाव में दो इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) की व्यवस्था की गई थी। यानी मतदाताओं ने महापौर और पार्षद के लिए अलग-अलग वोट डाले। आज यानी 26 नवंबर को इस चुनाव का रिजल्ट आ जाएगा।
इस नई व्यवस्था के कई फायदे हैं। जैसे-पार्षदों के चुने जाने के बाद महापौर के लिए होने वाली रस्साकसी की नौबत नहीं आएगी और न ही पार्षदों की खरीद-फरोख्त हो सकेगी। इसके अलावा यह भी संभव हो सका कि यदि महापौर का उम्मीदवार आपकी पसंद के राजनीतिक दल का नहीं है, या उसके व्यक्तित्व से आपको शिकायत है तो आप उसकी जगह अन्य प्रत्याशी को अपना वोट दे सकते हैं और अपनी निष्ठा वाले राजनीतिक दल के पार्षद प्रत्याशी के पक्ष में मतदान कर सकते हैं।
इस चुनाव के बाद से ही बुद्धिजीवियों ही नहीं, आम लोगों में भी इस बात को लेकर चरचा गर्म है कि राज्य विधानसभाओं और लोकसभा चुनाव में भी यही प्रणाली क्यों न अपनाई जाए। फिर, वहां भी दल-बदल कानून, आलाकमान की ओर से यस मैन को थोपने के हालात, विधायकों-सांसदों की खरीद-फरोख्त पर रोक लग सकेगी।
हां, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के उम्मीदवारों को लेकर सार्वजनिक मंच पर विस्तृत रूप से खुली बहस होनी चाहिए। वे आम जनता के बीच खुलकर अपना पक्ष रखें और फिर मैरिट के आधार पर जनता उनका चयन करे। ऐसे में ही हमारा लोकतंत्र मजबूत हो सकेगा। आखिरकार लोकतंत्र के जनक भारतवर्ष में ही लोकतंत्र का गला कब तक घोंटा जाएगा। क्यों न हम पुरानी दकियानूसी व्यवस्था को उखाड़ फेंकें। यदि हर जायज-नाजायज बात के लिए-राजनीतिक दलों के के हितों के लिए-संविधान में संशोधन किया जा सकता है तो लोकतंत्र में प्राणवायु फूंकने के इस पवित्र उद्देश्य के लिए क्यों न संविधान में एक और संशोधन किया जाए।

Monday, November 16, 2009

जीते-जी क्यों न पढ़ लें गरुड़ पुराण ?

महानगरीय जीवन की कुछ मान्यताएं बीतते हुए समय के साथ परंपरा में तब्दील हो जाती हैं। गुलाबी नगर में भी ऐसी ही एक परंपरा है। यहां किसी के परलोकगमन पर मृत्यु के तीसरे दिन तीये की बैठक होती है, जिसमें परिजन-पुरजन-मित्रजन-रिश्तेदार-साथ काम करने वाले सभी एकत्रित होते हैं और मृत व्यक्ति को श्रद्धांजलि-पुष्पांजलि निवेदित करते हैं। आम तौर पर यह कार्यक्रम एक घंटे का होता है। जिनकी मृत्यु हो चुकी है, उनके प्रति श्रद्धा निवेदित करना और उनके परिजनों के प्रति शोक-संवेदना व्यक्त करना भारतीय परंपरा के अनुकूल है।
मैं यहां कुछ अलग किस्म की पीड़ा को शेयर करने के लिए मुखातिब हूं। यहां अमूमन तीये की बैठक के दौरान पंडितजी गरुड़ पुराण के कुछ अंशों का पाठ करते हैं। जैसा कि सर्व विदित है, गरुड़ पुराण में व्यक्ति के जीवन में किए गए काम के आधार पर भोगे जाने वाले हजारों तरह के नरक का वर्णन किया गया है।
भारतीय मान्यताओं के अनुसार, यदि हमारे पुराणों में कही गई बातें सत्य हैं और हमारे जीवन के कामकाज का फल हमें मरने के बाद भोगना ही पड़ता है, तो सावधानी के तौर पर हम जीवनकाल में ही गरुड़ पुराण को क्यों न पढ़ लें, जिससे हम अपने जीवन में अच्छे काम करके अपना अगला जन्म भी संवार लें।
गरुड़ पुराण के पाठ के दौरान पंडितजी जब प्रेत के द्वारा भोगे जाने वाले असह्य कष्टों का वर्णन करते होंगे, तो उनके प्रियजनों-परिजनों को कितनी पीड़ा होती होगी। क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि ऐसे अवसरों पर गरुड़ पुराण की बजाय श्रीमद्भगवद्गीता के कुछ श्लोकों का पाठ किया जाए, जिमें मानव जीवन का सार छिपा हुआ है।

मोबाइल क्यों नहीं होता मौन?
जब किसी व्यक्ति के चिरमौन धारण करने पर शोकाभिव्यक्ति के लिए लोग एकत्रित होते हैं, ऐसे में भी कुछ लोगों का मोबाइल जब वाचाल हो जाता है तो उक्त व्यक्ति के संवेदनाशून्य होने का बोध होता है। क्या कुछ देर के लिए मोबाइल को मौन मोड पर नहीं रखा जा सकता। भाई, यदि मोबाइल प्रेम इतना ही अधिक है और उसके मौन होने पर आपका भी दिल दुखता हो तो मोबाइल को कंपायमान मोड पर कर दें, ताकि उसकी धड़कनों का अहसास आपको हो जाए और फिर आप जैसा उचित समझें, कर डालें। इतना तो ध्यान रखना ही चाहिए कि एक दिन हम सबको सदा के लिए मौन धारण करना ही है तो फिर कुछ पलों के लिए मोबाइल क्यों नहीं मौन हो सकता?

Saturday, November 14, 2009

...और कैसा होता है प्रलय

शुक्रवार को फिल्में रिलीज होती हैं और फिल्मों के जानकार इसकी चीर-फाड़ करते हैं। आजकल जैसी फिल्में बन रही हैं, उनकी तारीफ तो विरले ही पढ़ने को मिलती है। शनिवार को भी बॉलीवुड की फिल्म -तुम मिले- और हॉलीवुड की फिल्म 2012 की समीक्षा पढ़ी। वैसे भी आजकल इन समीक्षाओं को पढ़कर और फिर किराये की सीडी लाकर ही फिल्में देखकर ही काम चलाना पड़ता है।
न तो फिल्मों के बारे में ज्यादा समझता हूं और न ही इसके बारे में जानना चाहता हूं। मैं किसी इतर कारण से आप लोगों से मुखातिब हूं। आजकल कई बार लोगों की जुबान से प्रलय की आशंका से जुड़े सवालों से दो-चार होना पड़ता है। जहां तक मैं समझता हूं, आज जिस वातावरण में हम जी रहे हैं, वह किसी प्रलय से कम नहीं है।
आप सोचिए, जब 20 रुपए किलो आटा, 20 रुपए किलो आलू और 90 से 100 रुपए किलो में दाल खरीदना पड़ रहा हो, ढाबे पर एक अति पतली रोटी के चार रुपए चुकाने पड़ रहे हों, निकम्मी सरकारों के कारण स्वाइन फ्लू के साये में जीने को आप विवश हों, सरकारी अस्पताल लोगों के उपचार का नहीं, बल्कि डॉक्टरों, कंपाउंडरों और अन्य कर्मचारियों की कमाई का सबब बने हों, मिलावटी मावा और सिंथेटिक दूध की खबरें अखबारों की मेन लीड बनती हो, ऐसे में आम आदमी के लिए एक-एक दिन गुजारना किसी प्रलय का सामना करने से कम नहीं होता। आमजन के भाग्य विधाताओं का इन समस्याओं से कोई वास्ता नहीं पड़ता, इसलिए वे इसकी फिक्र नहीं करते।
इसके बावजूद आगामी सालों में प्रलय की भविष्यवाणी करने वाले तथाकथित ज्योतिषियों से मेरा निवेदन है कि आम जनता के लिए खुद ही बहुत सारी परेशानियां मुंह बाए खड़ी रहती हैं, सो वे अपनी ऐसी भविष्यवाणियों से बाज आ जाएं ताकि लोग चैन से रह सकें।

Wednesday, November 11, 2009

बच्चों के मरने का है इंतजार


गत वर्ष दिसंबर में हुए विधानसभा चुनाव के बाद अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी तो प्रदेशवासियों में स्वच्छ प्रशासन की उम्मीद जगी थी। गहलोत चूंकि गांधीवादी माने जाते हैं और उनके सादगी भरे आचार-व्यवहार से उनके ईमानदार होने में कोई संशय नहीं होता। इसके बावजूद पिछले कुछ दिनों से कुछ घटनाएं ऐसी हो रही हैं, जिनसे बार-बार ऐसा आभास होता है कि राजस्थान में सरकार है ही नहीं। जब तक कोई राजनीतिक दल और उसके नुमाइंदे विपक्ष में होते हैं, तब तक तो -हमें ऐसा करना चाहिए-ऐसा होना चाहिए- यह वक्त की जरूरत है- सरीखे जुमले जनता को भी अच्छे लगते हैं, लेकिन सत्तासीन होने के बाद ये जुमले जनता को डंक मारने लगते हैं, चुभने लगते हैं।
पिछले 29 अक्टूबर को जयपुर शहर से महज 16-17 किलोमीटर दूर बने इंडियन ऑयल डिपो के टैंकरों में आग लग गई थी। आग ने प्रलंयकारी रूप धारण कर लिया और सरकार ने हाथ खड़े कर दिए कि इसमें हम कुछ नहीं कर सकते। यह तो ईश्वर की कृपा थी कि हवा ने आग का साथ नहीं दिया, अन्यथा मरने वालों की संख्या दर्जन में नहीं, सैकड़ों में होती और घायलों की संख्या हजारों में। भवनों व संपत्ति का नुकसान भी अरबों-खरबों तक पहुंच जाता। इस अग्निकांड के बाद प्रशासन ने जिस रूप में आपदा प्रबंधन का धर्म निभाया, वह निहायत ही दिशाहीन और अप्रभावी रहा।
आग की लपटें थमने के बाद कारबन भरे जहरीले धुएं के बादल छंटे भी नहीं थे कि तीन नवंबर को शहर के नामी अंग्रेजी मीडियम एसएमएस स्कूल की प्राइमरी कक्षा की एक बच्ची को स्वाइन फ्लू होने की जानकारी उसके पिता ने स्कूल प्रशासन को दी। इसके बाद स्कूल ने स्वविवेक से एहतियात बरतते हुए एक सप्ताह की छुट्टी की घोषणा कर दी। उसके बाद से स्वाइन फ्लू से संक्रमित होने वाले बच्चों का आंकड़ा दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। बुधवार को प्रदेश में स्वाइन फ्लू के 83 नए मरीज मिले, जिनमें 71 अकेले राजधानी जयपुर में थे। इनमें भी स्वाइन फ्लू से प्रभावित बच्चों की संख्या 41 थी। चिकित्सा मंत्री और जिला प्रशासन अभी भी निजी स्कूलों को स्वविवेक से ही स्कूल बंद करने की हिदायत दे रहे हैं। और इन निजी स्कूलों का आलम यह है कि जिन स्कूलों में किसी बच्चे की स्वाइन फ्लू की रिपोर्ट पॉजीटिव मिलती है, तो उसमें अवकाश की घोषणा कर दी जाती है। ऐसे में कई अभिभावकों में दहशत का माहौल है और कई अभिभावक प्री-कॉशन लेते हुए भय के मारे अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेज रहे। सरकारी स्कूलों के बच्चों को तो भगवान भरोसे ही छोड़ दिया गया है। उनके बच्चों के लिए या उन स्कूलों में छुट्टी घोषित करने के कोई इंस्ट्रक्शन नहीं दिए जा रहे।
स्वाइन फ्लू का प्रकोप जिस तरह से बढ़ रहा है, इसमें संदेह नहीं कि आने वाले दिनों में यह महामारी का रूप धारण कर ले। बीमारी कैसी भी हो, उपचार से बचाव का महत्व अधिक होता है और इस तथ्य को कोई नकार नहीं सकता। अगस्त में पुणे में जब स्वाइन फ्लू फैला था, तब वहां के प्रशासन ने बिना देर किए स्कूल-कॉलेजों में छुट्टी की घोषणा कर दी थी। एहतियात के तौर पर मॉल और मल्टीप्लेक्स भी बंद कर दिए गए थे। स्थिति सामान्य होने पर स्कूल-कॉलेज, मॉल-मल्टीप्लेक्स सभी खुल गए और आज वहीं सब कुछ पटरी पर है।
क्या राजस्थान सरकार इस तरह के निर्णय नहीं ले सकती? मुख्यमंत्री गहलोत बहुत ही ईमानदार हैं, लेकिन उनके ईमानदार होने भर से प्रदेश की जनता का भला नहीं होने वाला। जनता की रक्षा और भले के लिए सरकार को जरूरी और त्वरित निरणय भी लेने होंगे, तभी उसकी उपादेयता सिद्ध हो पाएगी।
मुझे तो लगता है कि राजस्थान में सरकार नाम की कोई चीज है ही नहीं या है भी तो वह कहीं लापता हो गई है, जिसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवानी पड़ेगी। या फिर इस सरकार को बड़ी संख्या में बच्चों के मरने का इंतजार है...उसके बाद ही यह चेतेगी। ईश्वर सरकार को सद्बुद्धि दे जिससे प्रदेशवासियों को इस संक्रामक बीमारी से शीघ्रातिशीघ्र मुक्ति मिल सके।

Friday, October 9, 2009

पहले सिरदर्द देते हैं और फिर हैड मसाजर...


जी हां, अभी कुछ दिनों पहले मैंने एक पोस्ट में भारतीय बाजार में चीन की घुसपैठ पर चिंता जताई थी। सच, अपने हाथ में ज्यादा कुछ नहीं है, लेकिन सोचने और कोसने से तो कोई रोक नहीं सकता। एक सप्ताह बाद दिवाली आने वाली है। कोई जमाना था जब घी के दीये जलते थे, फिर तेल के दीये हुए और अब बिजली की जगमग की इस दुनिया में भावनाएं हमारी होंगी, लेकिन लड़ियां तो चीन की ही होंगी। हमारे नीति नियंता बिजली बचाने के लिए सीएफएल जलाने की सलाह देते हैं, लेकिन भारतीय सीएफएल इतने महंगे होते हैं कि आम भारतीय चाइनीज सीएफएल जलाकर ही बिजली बचाता है, जिससे हमारी बिजली बचे न बचे, चीन की कमाई तो हो ही जाती है। सो, मेरा कहना है कि चीन की इस घुसपैठ ने मुझ जैसे हजारों लोगों को सिरदर्द दिया हुआ है।
दिवाली की बात पर आऊं, तो हमारी गुलाबीनगरी भी इन दिनों ज्योति के इस उत्सव के उल्लास में सराबोर है। पिछले दिनों दिवाली पर खरीदारी के लिए आयोजित मेले में गया तो भीड़ में एक व्यक्ति ने मेरे बालों में कुछ फिराया। एकबारगी तो यह अच्छा लगा, लेकिन तुरत ही सिर चकराया पुराने अनुभव को याद करके। करीब पंद्रह साल पहले एक मित्र ने कलकत्ता यात्रा का एक संस्मरण सुनाया था। चलती ट्रेन में एक फेरीवाला आया और चीनी बाम-चीनी बाम कहते-कहते अपनी झोली में से एक डिबिया निकाली और ----एक बार लगाते ही सिरदर्द को जड़ से मिटा देगा यह चीनी बाम......कहकर यात्रियों के माथे और आंखों के ऊपर वह बाम लगाने लगा। बाम लगाते ही ऐसी जलन हुई कि यात्रियों की आंखें खुल नहीं पा रही थीं। उसी बीच उस तथाकथित फेरीवाले के कुछ साथी अचानक प्रकट हो गए और अल्पकालिक अंधे हुए उन यात्रियों का सामान पार कर ले गए तथा चेन पुलिंग कर उतर गए। यात्रियों की आंखों में जब तक ज्योति लौटी, तब तक उनका बहुत कुछ गायब हो चुका था। मेरा मित्र भी उसी ट्रेन की दूसरी बोगी में था, जिसे कलकत्ता उतरने पर इस वाकये का पता चला।
जब मैं दिवाली मेले में गया था, तो संयोग से उस दिन पांच सौ के तीन-चार नोट शर्ट की ऊपर वाली जेब में ही थे, सो डर लगा रहा था कि उसने सिर में जादू भरे तार फिराने की आड़ में पैसे तो पार न कर लिए हों। खाली जगह पर जाकर जेब चेक की तो संतोष हुआ। अब बारी थी पता करने की उस यंत्र के बारे में जिसे सिर में फिराने पर मालिश का सा अहसास हुआ था। मेले की एक रो में गया तो वहां कई सारी दुकानों पर वह यंत्र बिक रहा था, जिसके पैकेट पर Handy head massager लिखा हुआ था। पैकेट के नीचे छोटे अक्षरों में made in china छपा हुआ था।
यह देखकर मलाल हुआ कि चीन पहले तो अपनी करनी से चाहे सैन्य घुसपैठ हो या हमारे बाजार में सेंध लगाकर-पहले तो हमें सिरदर्द देता है और फिर उससे निजात पाने के लिए हैंडी मसाजर। हर किसी उत्पाद की नकल करने में सिद्धहस्त हमारे अपने देश के महारथी कब इन छोटी-छोटी चीजें बनाने में अपनी कुशल कला का परिचय देंगे, जिससे ऐसी चीजों पर खर्च होने वाला हमारा पैसा विदेशियों की जेब के बजाय हमारे अपने उद्यमी भाइयों की तिजोरी में जाएगा।
(संभव है आपमें से बहुतों को इस चाइनीज हैड मसाजर के बारे में काफी पहले से पता हो, लेकिन मैंने तो उस दिन पहली बार ही इसे देखा था, इसलिए ऐसे मित्रों से अपने अल्पज्ञान के लिए क्षमा चाहता हूं।)

Sunday, October 4, 2009

चांदनी रात में कुछ गीत गुनगुनाइए...


गुलाबी नगर में 38 साल पहले साहित्य और संस्कृति से अंतर्मन से जुड़े कुछ लोगों ने तरुण समाज की स्थापना की थी। तभी से इस संगठन ने होली के अवसर पर महामूरख सम्मेलन और शरदोत्सव के रूप में गीत चांदनी का आयोजन शुरू किया। इन दोनों ही कवि सम्मेलनों की आज देश के गिने-चुने कवि सम्मेलनों में गिनती होती है। गुलाबी नगर के बाशिंदों को सालभर इसका इंतजार रहता है। इसके संस्थापक महानुभाव निस्संदेह अब मध्यवय के हो गए होंगे, लेकिन उनके हृदय में तरुणाई अभी शेष है और यह आयोजन अनवरत-अबाध रूप से जारी है। अभी कल शनिवार 3 अक्टूबर को आश्विन की पूनम पर शरद ऋतु की रात जयपुर के जय क्लब लॉन पर गीत चांदनी कवि सम्मेलन हुआ। आइए, गीत चांदनी के कुछ गीत आप भी हमारे साथ मिलकर गुनगुनाइए -
दिल्ली की डॉ. कीर्ति काले ने
जब बंधे बिजली स्वयं ही मोहपाशों में,
चांदनी छिप जाए शरमाकर पलाशों में,
जब छमाछम बाज उठे पायल घटाओं की,
मांग जब भरने लगे सूरज दिशाओं की।
तब हृदय के एक कोने में कोई कुछ बोल जाता है।
रचना से चांदनी और सौंदर्य व मोहब्बत का रिश्ता जोड़ा।

लखनऊ के देवल आशीष ने
हमने तो बाजी प्यार की हारी ही नहीं है,
जो चूके निशाना वो शिकारी ही नहीं है।
कमरे में इसे तू ही बता कैसे सजाएं,
तस्वीर तेरी दिल से उतारी ही नहीं है।।
के माध्यम से प्रेम को रवानी दी।

किशन सरोज ने
बिखरे रंग तूलिकाओं से, बना न चित्र हवाओं का,
इंद्रधनुष तक उड़कर पहुंचा, सोंधा इत्र हवाओं का...
से हवा की फितरत और वाराणसी के श्रीकृष्ण तिवारी ने
रेत पर एड़ी रगड़कर थक गया तो मन हुआ,
अब मैं नदी बनकर बहूं...बहने लगा।
हाथ में पत्थर लिए बच्चे मिले तो मन हुआ...
अब मैं दरख्तों सा फलूं, फलने लगा।।
के माध्यम से अपने ही रौ में बहने का अंदाजे बयां किया।

मेरठ से आए सत्यपाल सत्यम ने
हो गए संपन्न सब उपवास नभ में चांद निकला।।
बुझ गई अनगिन दृगों की प्यास नभ से चांद निकला।।
भावना जितनी अपावन थी सब हुई विसर्जित,
अब सुखद संभावना को रिक्त है मन।।
लहलहा उट्ठा है पतझर में बगीचा,
अब तो बारह मास सावन है या फागुन,
हर दिवस त्यौहार सा उल्लास, नभ में चांद निकला
से चांद के महत्व पर प्रकाश डाला।

इलाहाबाद से आई रागिनी चतुरवेदी ने
मेरे मन का फूल खिला है, हवा बताती है,
शायद तुमने याद किया है, हिचकी आती है।।
जिधर-जिधर जाती हैं नजरें, शगुन दिखाई देते,
फड़क रहीं पलकें रुक जाती नाम तुम्हारा लेते,
पिंजरे की चिड़िया भी कैसा पंख फुलाती है।।
...शायद तुमने याद किया, हिचकी आती है।।
के माध्यम से प्रियतम की यादें ताजी कीं।

बगड़ के भागीरथ सिंह भाग्य ने मीठी राजस्थानी में मरुथली माटी के सौंदर्य और महत्ता को कुछ इस तरह शब्द दिए -
म्हारे खेतां में मौसम मजूरी करे
बाजरो रात-दिन जी हजूरी करे
म्हारे खेतां री रेतां रमे रामजी
आज तन्ने रमा ल्याऊंली
चाल रे सातीड़ा म्हारे खेतां में आज
तन्नै काकड़ी खुआ ल्याऊं ली।।

ग्वालियर से आए रामप्रकाश अनुरागी ने सुनाया -
हम नदी बनकर बहे तो, सिंधु का जल हो गए।
आग सी दहती किरण से, लिपट बादल हो गए।।
फूल-फल-पत्ते टहनियां, हम तना, जड़ भी हम्हीं,
सृष्टि-बीजों को बचाने हम धरातल हो गए।।

मध्य प्रदेश के खरगौन से आए दर्द शुजालपुरी ने
उधर से तुम इधर आओ, इधर से हम उधर आएं,
हमारी राह-रोशन को सितारे भी उतर आएं।।
हमें दुनिया से क्या मतलब, हमें अपनों से क्या रिश्ता
हमें तुम ही नजर आओ, तुम्हें हम ही नजर आएं।।
के माध्यम से प्रेम में दो दिलों के एकाकार होने की कथा काव्य में कही।

गीत चांदनी का संचालन कर रहे जयपुर के हास्य व्यंग्य के कवि सुरेंद्र दुबे ने भी कुछ गंभीर पंçक्तयों से अपने फौलादी इरादों का इजहार किया -
मेरे कदमों का मंजिल से नाता है,
मुझको भी इतिहास बनाना आता है।।
हर इक बाधा शर्म से पानी-पानी है,
मेरी गति से दूरी को हैरानी है।।
हर पत्थर के मकसद से परिचित हूं मैं,
गड्ढों की फितरत जानी पहचानी है।।
मेरे पांवों से हर कांटा नजर चुराता है,
मुझको भी इतिहास बनाना आता है।।
मेरे कदमों का मंजिल से नाता है

Saturday, October 3, 2009

गांधी का गुणगान, लालबहादुर लापता


कल यानी शुक्रवार दो अक्टूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती धूमधाम से मनाई गई। संयोग कहें या दुरयोग कि पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री का जन्मदिवस भी इसी दिन था। कल के अखबारों में विभिन्न राज्य/केंद्र सरकारों और सरकारी संस्थाओं की ओर से भरपूर मात्रा में विज्ञापन प्रकाशित हुए। खलने वाली बात यह रही कि इस तुलना में लाल बहादुर शास्त्री को दस प्रतिशत भी तवज्जो नहीं दी गई। इस अवसर पर हुए आयोजनों के केंद्रबिंदु में भी महात्मा गांधी ही थे। शास्त्रीजी को याद करने के कार्यक्रम तो महज रस्म अदायगी जैसे थे। क्या लालबहादुर शास्त्री के महान व्यक्तित्व को हमारे नीति नियंताओं ने इतनी जल्दी भुला दिया। हालांकि ऐसा करने से शास्त्रीजी का कद कदापि छोटा नहीं पाएगा। शास्त्रीजी ने अपने चरित्र से जो मिसाल कायम की, उसे भुलाया नामुमकिन है। इक्के-दुक्के संगठनों को छोड़कर अधिकतर ने महात्मा गांधी पर केंद्रित कार्यक्रम ही आयोजित किए।
कायस्थ समाज से जुड़े कुछ संगठनों ने लालबहादुर शास्त्री को अवश्य याद किया, लेकिन यहां सोचने का विषय है कि क्या शास्त्रीजी को याद करने का दायित्व महज एक समाज विशेष का ही है। इसे हम देश की बदकिस्मती ही कहेंगे कि आजादी के बाद से सत्ता में आए लोगों ने जगह-जगह गांधी की प्रतिमाएं स्थापित कर, उनके नाम से संस्थाएं स्थापित कर, देश की करेंसी पर राष्ट्रपिता की फोटो छापकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली, यदि वे गांधी के आदरशों को आचरण में लाते तो ऐसी महान विभूतियों को को इस तरह भुलाने की आदत उनमें नहीं पनपती।
अपने-अपने आराध्य
कांग्रेस ने अपने आकाओं को हर तरह से तवज्जो दी, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। इसमें भी नेहरू परिवार से जुड़े नेताओं का नाम प्रथम गण्य है। भाजपा ने भी आरएसएस और जनसंघ के संस्थापकों और सरदार पटेल जैसे अपनी पसंद के नेताओं को ही अपना आराध्य समझा। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती की मेहरबानी से पूरा सूबा बाबा साहब अंबेडकर की प्रतिमाओं के पार्क के रूप में विकसित हो रहा है। इतना ही नहीं, अपने अनुयायियों द्वार भुलाए जाने की आशंका से ग्रसित बसपा सुप्रीमो जीते जी अपनी प्रतिमाएं स्थापित करने में लगी हैं। हालात ऐसे हैं कि सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में दखल देना पड़ा।
नीतीश कुमार की सार्थक पहल
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शनिवार को घोषणा की कि भारत के प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की समाधि स्थल को दर्शनीय स्थल के रूप में विकसित किया जाएगा। वे प्रथम राष्ट्रपति की 125 वीं जयंती के उपलक्ष में उनकी पुनर्प्रकाशित पुस्तकों के लोकार्पण अवसर पर बोल रहे थे।

उन्होंने शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव को निर्देश दिया कि डॉ. राजेन्द्र बाबू की समाधि स्थल पर उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी शिलालेख के माध्यम से उल्लिखित कराएं ताकि नई पीढ़ी को इस महान विभूति के बारे में जरूरी जानकारियां मिल सकें। नीतीश ने केन्द्र सरकार से भी राजेन्द्र बाबू के कृतित्व एवं व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को नयी पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए यथासंभव प्रचार-प्रसार कराए जाने का अनुरोध किया।