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Tuesday, May 5, 2020

लिपस्टिक अंडर माइ मास्क

लिपस्टिक अंडर माइ मास्क

कोरोना की वैश्विक महामारी के इस दौर में सबसे अधिक जरूरी खुद को सुरक्षित रखना और अपनों की कुशलता से अवगत होना है। मैं कई दिनों से अपने प्रिय मित्र टपलू की कुशलक्षेम जानने के लिए फोन कर रहा था, लेकिन उसका फोन लग ही नहीं रहा था। मन में तरह-तरह की आशंकाएं उठ रही थीं। इसी बीच कल सुबह मेरे मोबाइल के स्क्रीन पर उसका नाम चमका तो दिल खिल उठा। हालचाल पूछने के बाद मैंने उसे फोन न उठाने के लिए उलाहना दिया तो टपलू ने बताया कि उसका मोबाइल खराब हो गया था। आफत की इस घड़ी में मोबाइल का खराब होना किसी बड़ी विपत्ति से कम नहीं है। टपलू ने बताया कि उसके किसी पड़ोसी के पास की पैड वाला पुराना मोबाइल पड़ा हुआ था। आज वही मिलने पर उसने मुझे फोन लगाया।

खैर... बातचीत शुरू हुई तो इसका दायरा भी कोरोना, लॉकडाउन और इससे उत्पन्न हालात व समस्याओं के गिर्द ही सिमटा हुआ था। इसी बीच टपलू ने कहा कि सरकार ने आदेश जारी कर दिया है कि हालात काबू में आने और लॉकडाउन खत्म होने के बाद भी लंबे समय तक सभी के लिए बाहर निकलने पर मास्क लगाना अनिवार्य होगा। कई राज्यों ने तो अभी से मास्क न लगाने पर भारी-भरकम जुर्माना और जेल तक का प्रावधान कर दिया है।

मैंने कहा, जब पूरी मानव जाति का जीवन संकट में हो तो लोगों के प्राणों की रक्षा के लिए ऐसा करना बहुत जरूरी है। टपलू मेरी बात काटते हुए बोला-पुरुष तो खैर जैसे-तैसे मास्क लगाने को तैयार भी हो जाएंगे, लेकिन रूपसी महिलाओं को मास्क लगाने के लिए राजी करना क्या इतना आसान होगा। जो महिलाएं बाल-विन्यास बिगड़ने के कारण बाइक पर पीछे बैठते समय हादसे की आशंका के बावजूद हेलमेट पहनने को तैयार नहीं होतीं, वे रूपसियां अपने होठों की सुंदरता में चार चांद लगाने वाले लिपस्टिक का मोह छोड़ पाएंगी जो अनचाहे ही मास्क के पीछे छिपकर रह जाएगा। 

मैं भी सोचने को विवश हो गया। लिपस्टिक के प्रति महिलाओं के प्रेम का ही परिणाम है कि बचपन से हम जिन सात रंगों की बात पढ़ते रहे, वे सात रंग लिपस्टिक की दुकान पर असंख्य रंगों में परिणत हो जाते हैं, जैसे कुरुक्षेत्र के मैदान में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपने विराट रूप के दर्शन कराए थे। रूपसियों के इस लिपस्टिक प्रेम ने करोड़ों-अरबों रुपये का बाजार बना रखा है, मास्क की अनिवार्यता के बाद सब कुछ धराशायी हो जाएगा। ... और फिर लिपस्टिक बनाने वाली कंपनियां अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए नये कदम उठाएंगी। महिलाओं के लिए उनके ड्रेस से मैचिंग वाले नए-नए रंग व डिजाइन के मास्क बनाएंगी। ...और फिर रूपसियों के अधरों पर अलग-अलग रंग के लिपस्टिक के स्थान पर उनके चेहरे पर रंग-बिरंगे मास्क दिखाई देने लगेंगे।

20 अप्रैल 2020

हरि अनाथ के नाथ

...हरि अनाथ के नाथ

कोरोना की वैश्विक महामारी के दौर में इसके जानलेवा संक्रमण से बचाव के लिए पूरे देश में लॉकडाउन घोषित कर दिया गया है। केंद्र सरकार व राज्य सरकारें लोगों को घरों से बाहर न निकलने और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने के सख्त निर्देश दे रही हैं। इसके बावजूद कोई पैसे के जोर पर तो कोई रसूख के बलबूते और कोई दीन-ईमान के नाम पर मनमानी करने को उतारू है। वह समझ नहीं पा रहा कि उसकी गलती दूसरों के साथ उसकी खुद की जिंदगी के लिए भी बड़ी मुसीबत बन सकती है।
वहीं ये बेजुबान आवारा पशु स्वविवेक से आत्म अनुशासन का परिचय देते हुए सोशल डिस्टेंसिंग मेंटेन कर रहे हैं। तभी तो रहीम ने लिखा है- 
रहिमन बहु भेषज करत, व्याधि न छांड़त साथ।
खग, मृग बसत अरोग वन, हरि अनाथ के नाथ।।
( भेषज = चिकित्सक)
 

# Covid 19 #Pandemic#Lockdown

वुहान, विश्व और वसुधैव कुटुंबकम्

वुहान, विश्व और वसुधैव कुटुंबकम्

मेरी दादीजी बड़ी भोली और सरल-सहज-सीधी स्वभाव की थीं। वे ज्यादा पूजा-पाठ नहीं किया करती थीं। हां, सुबह स्नान करने के बाद नियमित रूप से सूर्य भगवान को एक लोटा जल का अर्घ्य दिया करती थीं। इसके बाद भगवान सूर्य से मुखातिब होकर अस्फुट स्वर में वे कुछ बोला करती थीं। बाल-सुलभ जिज्ञासा के कारण मैं उनके पास खड़ा हो जाता यह जानने के लिए कि वे सूर्य भगवान से क्या कहती हैं। 

जो कुछ मैं समझ सका, उसका सार यही था कि हे सूर्यदेव, सारे संसार का भला करना, उसके पीछे मेरे बच्चों पर भी कृपा बनाए रखना।  किसी चालीसा, स्तोत्र, धर्मग्रंथ का पाठ नहीं, मगर भावना मानवता के सर्वोच्च स्तर पर- पूरे विश्व के कल्याण की आकांक्षा- वसुधैव कुटुंबकम् का इससे बढ़कर और कोई आदर्श हो सकता है क्या? संसार खुशहाल रहेगा तो हमारा जीवन भी सुखमय होगा, सुरक्षित होगा-इतनी उदात्त भावना।

जब हम पूरे विश्व को अपना परिवार समझने लगते हैं तो इसमें आसन्न संकटों से बचाव का दायित्व भी अधिक गुरुतर हो जाया करता है। ...तो इसका भी एक उदाहरण देखिए। उन दिनों हर किसान परिवार पशुपालक भी हुआ करता था। और सच कहूं तो पशु केवल पाले ही नहीं जाते थे, बल्कि वे परिवार के सदस्य हुआ करते थे। परिवार के सदस्यों की तरह पूरी जिम्मेदारी से उनकी देखभाल की जाती थी। उन दिनों पशुओं में "डकहा" नामक एक संक्रामक बीमारी हुआ करती थी। इसकी चपेट में आने पर देखते ही देखते मिनटों में ही पशु दम तोड़ देता था। आस-पड़ोस, टोला-मोहल्ले में ऐसी घटना होने पर लोग अपने पशुओं को उस बीमारी के संक्रमण से बचाने के लिए लाल रंग घोल कर पशुओं पर छिड़क दिया करते थे। यह महज टोटका था या एक तरह का वैक्सिनेशन, मगर था प्रभावी। 

अब मौजूदा परिदृश्य पर नजर डालें तो आधुनिक तकनीक की बदौलत हम ग्लोबल विलेज की परिकल्पना को साकार होते देखकर फूले नहीं समाते थे। दूर देश में हुए आविष्कार हमारी जीवन शैली को अपने तरीके से प्रभावित करने लगे थे, लेकिन उस अनुपात में हमने अपनी सहृदयता-उदारता का विस्तार नहीं किया। 

चीन का वुहान जब कोरोना वायरस की चपेट में आ गया तो वहां रोजाना दम तोड़ने वाले मरीजों की संख्या बाकी दुनिया के लिए महज एक संख्या भर मान ली गई। सारे देश अपने तईं निश्चिंत थे कि चीन की समस्या है तो वह भुगते या फिर बच ‌सके तो बचे। दुनिया के देश समझ नहीं पाए कि जब हवाई यातायात के जरिए वे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं तो यह जानलेवा वायरस चीन की सीमाएं लांघकर उन तक भी पहुंच सकता है। नतीजतन आज लगभग पूरा विश्व इस महामारी की चपेट में आकर कराह रहा है। ब्रिटेन के सर्व सुविधा संपन्न बकिंघम पैलेस से लेकर मुंबई की सर्व सुविधा विहीन धारावी के चॉल तक में कोरोना ने पांव पसार  लिए हैं।

मगर अफसोस, भीषण संकट की इस घड़ी में भी लोग इस अवसर को भुनाते हुए इसका  लाभ उठाने से बाज नहीं आ रहे। जमाखोरी, कालाबाजारी लोगों का स्थायी भाव बन गया है। ऐसे में खुद की भावनाओं का परिमार्जन बहुत ही जरूरी है। विज्ञान तो जब इस वायरस का समाधान खोज पाएगा, खोज ही लेगा, लेकिन तब तक हमें खुद को सुरक्षित रखते हुए अपने आस-पड़ोस में रहने वाले जरूरतमंदों को अपनी सामर्थ्य के हिसाब से यथासंभव मदद और खुद के साथ संपूर्ण मानवता के कल्याण की कामना अवश्य ही करनी चाहिए।

# Vuhan #Corona # pandemic

04 अप्रैल 2020