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Tuesday, May 5, 2020

पेड़ों की मौज, परिंदों की पिकनिक

पेड़ों की मौज, परिंदों की पिकनिक

कोरोना की वैश्विक महामारी के चलते आम जनजीवन में व्याप्त चहल-पहल को मानो ग्रहण लग गया है। कहते भी हैं- मन खुशी तऽ गाई गीत। यहां तो हर शख्स हर पल चिंता और चिंतन में डूबा है। आपसी बातचीत में सबसे पहला सवाल यही होता है- आपका शहर-गांव तो कोरोना के कहर से बचा हुआ है न? और फिर इसके बाद एक-दूसरे को जरूरी सलाह- घर में ही रहिएगा। अपना ध्यान रखिएगा। 

जीवन से रौनक सिरे से गायब है। यदि किसी ने इसे बरकरार रखा भी है तो चेहरे पर लगे मास्क के कारण दिखता नहीं। वह तो भला हो सरकार बहादुर का कि शराब की बिक्री की अनुमति दे दी। इसकी वजह चाहे देश व राज्यों की डूबती अर्थव्यवस्था को सहारा देना हो या फिर सुरा प्रेमियों को गम गलत करने का सुअवसर प्रदान करना, मगर इस फैसले से करीब डेढ़ महीने के बाद मधुशालाओं पर गजब की रौनक देखने को मिली। सोमरस के प्रति लोगों में जैसी दीवानगी दिखी, वैसी ही दीवानगी यदि जीवन और जीवन मूल्यों के प्रति हो जाए तो कोरोना क्या, कोई भी परेशानी मानव और मानवता का बाल भी बांका नहीं कर सकेगी। 

खैर, मेरा मकसद अभी इस मुद्दे पर उपदेश झाड़ना नहीं है। मैं तो कोरोना काल के इस दौर में प्रकृति की उन्मुक्त हंसी आपसे शेयर करने के लिए मुखातिब हुआ हूं। मीडिया में आए दिन खबरें आ रही हैं कि ऋषिकेश में गंगा का प्रवाह इतना निर्मल हो गया है कि तलहटी के पत्थर नजर आने लगे हैं। पश्चिम बंगाल के रायगंज से कंचनजंघा की शफ्फाक चोटियां दिखने लगी हैं। और भी दूसरी जगहों से ऐसे ही सुहाने मनभावन समाचार। हालांकि जंगल में मोर नाचा किसने देखा... इसका सच्चा आनंद तो तब है जब खुद वहां जाकर प्रकृति में आए इस सुखद बदलाव का नजारा किया जाए। लॉकडाउन के चलते फिलहाल यह तो संभव नहीं, मगर अपने आसपास भी इसे महसूस किया जा सकता है। लखनऊ में मेरे आवास के सामने पार्क और दफ्तर के रास्ते में सड़क किनारे से लेकर डिवाइडर तक पर लगे पेड़ों की रौनक देखते ही बनती है। वाहनों से निकलने वाली जहरीली गैस से अब उनका दम नहीं घुट रहा। पहियों से उड़ने वाली धूल की परत उनके पत्तों पर नहीं जम रही। ... और रही-सही कसर बीच-बीच में होने वाली बरसात पूरी कर देती है। बारिश के बाद पेड़ों की हरियाली में क्या कमाल का निखार आ जाता है और वे मानो गाने लगते हैं -आज ही हमने बदले हैं कपड़े, 
आज ही हम नहाए हुए हैं।
फिल्म थ्री इडियट्स से कुछ पंक्तियां उधार लूं तो अहसास कुछ इस तरह होता है : 
शाखों पर पत्ते गा रहे हैं
फूलों पर भंवरे गा रहे हैं
दीवानी किरणें गा रही हैं
दो पंछी गा रहे हैं
दो फूलों की बगियों में
हो रही है गुफ्तगू...

...और पेड़ जब इस तरह मोद मनाते हैं तो उन पर आश्रय पाने वाले परिंदों की खुशी भी छिपाए नहीं छिपती। वे भी पिकनिक मनाने के मूड में आ जाते हैं। तभी तो यहां मेरे आवास के सामने पार्क में भोर की कौन कहे, दिन में भी पंछियों की मीठी चहचहाहट वातावरण को गुंजायमान किए रहती है। कोयल की लंबी कूक बरबस ही बचपन के दिनों में लौटा ले जाती है जब हम आम के बगीचे में उसके सुर में सुर मिलाया करते थे। तब कोयल भी शायद हम बच्चों की भावना को समझ जाती थी और एक सच्चे तथा अच्छे प्रतियोगी की तरह लगातार हमारी बेसुरी " कू " का जवाब अपनी मीठी कूक से दिया करती थी। 

चलते-चलते

किसान परिवार से होने के कारण आजकल की बेमौसम बारिश मुझे बिल्कुल भी नहीं भाती। रबी की फसलों को होने वाले नुकसान की आशंका से आंखें अनायास ही नम हो जाती हैं, मगर दुनियादारी की इस कड़वी हकीकत को तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि एक के गम में दूसरे की खुशी छिपी होती है। प्रकृति के साथ मानव ने जो अन्याय, अनाचार-अत्याचार किया है, उसकी कीमत तो चुकानी पड़ेगी ही। आमीन।

( पक्षियों के चित्र इंटरनेट से साभार)

06 मई 2020

कान का अहसान

कान का अहसान

बच्चा जब जन्म लेता है तो मां से उसका सबसे पहला संवाद शब्दों के जरिए ही होता है। कानों से होकर मां की मधुर वाणी उसके हृदय में उतरती चली जाती है और यह संबंध जन्म-जन्मांतर के लिए एक अदृश्य डोर में बंध जाता है। मां की लोरियां सुनकर वह सोता है और ताली की मधुर आवाज से उसकी नींद खुलती है। 

 ... और बच्चा जब धीरे-धीरे होश संभालता है तो " मामा- बाबा-दादा-नाना"  जैसे छोटे-छोटे शब्दों को मां से सुनकर अपने हृदय में उतारने के बाद जब उन्हें अपनी तोतली बोली में दुहराता है तो इस अलौकिक सुख का वर्णन करना बड़े-बड़े मनीषियों के लिए भी नामुमकिन हो जाता है। 

कुछ और बड़ा होने पर बच्चा जब शिक्षा प्राप्ति के लिए पाठशाला का रुख करता है तो वहां भी नर्सरी राइम्स सुनकर नये-नये शब्दों को सीखने में कानों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। यह सिलसिला समय बीतने के साथ-साथ आगे बढ़ता जाता है। फिर गोष्ठियों-सत्संगों से ज्ञान की गंगा श्रवणेन्द्रियों के रास्ते ही अंतर्मन में उतरती हैं। 

प्राचीन ग्रंथों में कहा गया है- यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे अर्थात जो शरीर में है, वही ब्रह्माण्ड में है। यह बात मानवीय सद्भावनाओं में भी लागू होती है। उम्र बीतने के साथ जब आंखों की रोशनी कम होने लगती है। फिर न चाहते हुए भी चश्मा लगाना जरूरी हो जाता है। ऐसे में चश्मे की कमानी को संभालने की जिम्मेदारी ये कान ही निभाते हैं।

आज जब कोरोना वायरस की वैश्विक महामारी के इस दौर में पूरी मानवता ही संकट में आ गई है। सरकारों ने मास्क लगाना अनिवार्य कर दिया है। यहां तक कि मास्क न लगाने पर भारी-भरकम जुर्माना और जेल तक का प्रावधान कर दिया है। ऐसे में मास्क की डोरी को टिकाए रखने की जिम्मेदारी भी कान ही निभा रहे हैं। इसलिए हम सभी को कान का अहसान मानना ही चाहिए।

22 अप्रैल 2020

#Covid 19

अपशकुन का रुदन नहीं, भूख की चीख

अपशकुन का रुदन नहीं...भूख की चीख

पूस-माघ का महीना था। सर्दी चरम पर थी। घने कोहरे को चीरती हुई बाइक ने आठ-दस किलोमीटर की स्पीड से मुझे आखिरकार कमरे पर सकुशल पहुंचा दिया था।   
लखनऊ में मैं जहां रहता हूं, उस मकान के सामने बहुत ही अच्छा और खुशनसीब पार्क है। खुशनसीब इस मायने में कि जब यह कॉलोनी बसाई जा रही थी,  इस पार्क के गिर्द रहने वालों ने सरकार पर निर्भर होने के बजाय खुद ही इसके चारों ओर अपनी-अपनी पसंद के कई सारे पौधे लगाए और अपने बच्चों की मानिंद उनकी देखभाल की। नतीजतन वे पौधे आज अच्छे-खासे दरख़्त में तब्दील होकर परिंदों के बसेरे बन गये हैं। 

उस रात इन्हीं दरख्तों पर रहने वाले परिंदे न जाने क्यों बुरी तरह बोल रहे थे। यह उनकी चहचहाहट तो बिल्कुल नहीं थी, जो अपनी मिठास से बरबस ही मन मोह लेती है। ये परिंदे तो चीख रहे थे जिससे करुण क्रंदन का आभास हो रहा था। उनकी पीड़ा समझ पाने के बावजूद मैं उनकी परेशानी दूर न कर पाने को विवश था। इसी उधेड़बुन में न जाने कब नींद आ गई। सुबह जगा तो अपने बुजुर्ग मकान मालिक से रात वाला किस्सा बयां किया। उन्होंने बताया कि इन परिंदों को खाने के लिए कुछ नहीं मिला होगा। पेट खाली होने पर सर्दी ज्यादा सताती है। आज से मैं पार्क में वॉकिंग ट्रैक पर चावल के टुकड़े बिखेर दिया करूंगा। वाकई उसके बाद फिर कभी चिड़ियों की वैसी चीख सुनाई नहीं पड़ी।

कल देर रात दफ्तर से लौटा तो रास्ते में एक जगह कई सारे कुत्ते रो रहे थे। एकबारगी तो मेरे मन में भी किसी अपशकुन की आशंका गहराने लगी, क्योंकि बचपन से ही हमें ऐसी सीख दी गई है। हालांकि कमरे पर आने के बाद भी कुत्तों का करुण क्रंदन कानों में गूंजता रहा। सोने की कोशिश नाकाम हो गई। मन में तरह-तरह के ख्याल उभरने लगे। अचानक ही पूस-माघ वाली सर्द रात में परिंदों की चीख वाली बात याद आ गई।

 दिल के किसी कोने से आवाज आई- आज जब कोरोना की वैश्विक महामारी की वजह से लॉकडाउन के चलते लोग अपने घरों में कैद होकर रह गए हैं। चाय-कॉफी की थड़ी से लेकर रेस्तरां-होटल तक सभी बंद हैं, इन बेजुबानों को रोटी-बिस्कुट का एक टुकड़ा तक मिलना मुहाल है। ऐसे में यह भी तो हो सकता है कि भूख से बेबस होकर ये बिलख रहे हों। ऐसे में मेरा निवेदन है कि आज के इस विषम हालात में हम सभी अपने आस-पड़ोस में रहने वाले आवारा कुत्तों को एकाध रोटी जरूर दे दिया करें।

15 अप्रैल 2020

# Covid 19 # Lockdown