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Monday, February 15, 2010

शिक्षा को मिल रही गति

मेरे जमाने में बच्चे सरकारी स्कूल में ही पढ़ा करते थे और यह माता-पिता के लिए भी किसी तरह से कमतरी का द्योतक नहीं होता था। मेरी स्कूली शिक्षा पूरी होने तक ही नहीं, बल्कि कॉलेज शिक्षा तक यह हाल बना रहा। वर्ष 1990 के बाद सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर कुछ इस तरह गिरता गया कि अभिभावक संसाधन नहीं होने के बावजूद बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाना मजबूरी होने लगी थी। इसके फलस्वरूप सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या दिन-ब-दिन कम होने लगी। पिछले 10-15 साल में जब भी गांव जाता था तो मित्रों की बातचीत में शिक्षा का गिरता स्तर महत्वपूर्ण हुआ करता था, लेकिन जब नीतियां बनाने वाले ही इन बातों से अनभिज्ञ हों तो आम आदमी क्या कर सकता है। इस बार पड़ोस की कई लड़कियों को स्कूल यूनिफॉर्म में देखा तो बरबस ही पूछ बैठा कि आसपास कोई कॉन्वेंट या प्राइवेट स्कूल खुला है क्या? पता चला कि इन लड़कियों को सरकार की ओर से स्कूल यूनिफॉर्म के लिए राशि उपलब्ध कराई जा रही है। इतना ही नहीं, सरकारी स्कूलों में कक्षा 9-10 में पढ़ने वाली लड़कियों को सरकार की ओर से साइकिल भी उपलब्ध कराई जा रही है, ताकि घर से स्कूल की दूरी उनकी शिक्षा में बाधक नहीं बने। यह भी पता चला कि मुख्यमन्त्री नीतीश कुमार ने इस योजना का विस्तार कर लड़कों के लिए भी साइकिल उपलब्ध कराने की घोषणा कर दी है, जिसे शीघ्र ही अमली जामा पहनाया जाएगा। जानकर खुशी हुई कि प्रदेश में शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए सरकार कुछ कर तो रही है। इसके साथ ही अपना गुजरा जमाना भी याद आ गया, जब अपने गांव से हम दर्जनों साथी पैदल ही चार-पांच किलोमीटर की दूरी तय कर बिना नागा हाई स्कूल जाया करते थे।
शिक्षा के प्रति लोगों का रुझान इस कदर बढ़ गया है कि स्कूलों के भवन छोटे पड़ने लगे हैं। इसे देखते हुए बड़े विजन वाले मुख्यमन्त्री नीतीश कुमार ने स्कूलों को क्रमोन्नत करने और उसी अनुपात में संसाधन उपलब्ध कराने के प्रयास भी जारी रखे हैं। यदि यह सब इसी तरह जारी रहा तो उम्मीद की जा सकती है कि शिक्षा को वांछित गति मिलेगी और बिहार एक बार फिर नालन्दा, तक्षशिला के गौरवशाली पथ पर अग्रसर हो सकेगा।

Tuesday, October 16, 2007

चिट्ठी नहीं चिट्ठा, डाक नहीं मेल

बदलते हुए जमाने के साथ युगधमॅ भी बदलता रहता है। किसी जमाने में आदमी भोजपत्र पर लिखता था, इसके दशॅन मेरी पीढ़ी के युवकों को संग्रहालयों में ही हो पाते हैं। मैंने लिखने का अभ्यास स्लेट पर शुरू किया था। उन दिनों ५० पैसे से लेकर एक रुपए तक में स्लेट में आती थी, जो जरा सी ऊंचाई से गिरते ही फूट जाया करती थी। अक्सर ऐसा होने पर पिताजी के क्रोध का शिकार भी होना पड़ता था। जब अच्छी तरह लिखना-पढ़ना आ गया तो मुझे अभ्यास पुस्तिका व पेंसिल उपलब्ध कराई गई थी। इसके बाद सरकंडे की कलम को स्याही भरी दवात में डुबोकर लिखने का अभ्यास काफी दिन तक कराया गया। फिर गुरुजनों से जब नींब वाली कलम से लिखने की अनुमति मिली तो ऐसी खुशी हुई कि लेखनी पकड़ते ही हम बहुत बड़े लेखक बन जाएंगे। यह यात्रा हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी होते-होते रिफिल वाली कलम तक पहुंची और कॉलेज के दिनों में पायलट पेन हमारे स्टैंडडॅ का प्रतीक हुआ करता था। माता-पिता द्वारा तय की शादी के बाद पत्नी को प्रेमिका बनाने के क्रम में उससे दूर रहकर जो प्रेम पत्र लिखे, उनमें रंग-बिरंगे जेल पेनों ने भी काफी सहायता की। अस्तु, मिलेनियम वषॅ २००० में उत्पन्न मेरे पुत्र ने अभ्यास पुस्तिका पर ही अक्षरों का अभ्यास शुरू किया। उसे कभी जब स्लेट की लिखाई के अनुभव बताता हूं तो यह उसके लिए किसी आश्चयॅ से कम नहीं होता। स्लेट से अभ्यास पुस्तिका तक होती हुई यह अक्षर यात्रा अब कम्प्यूटर लिटरेसी तक पहुंच गई है। अब तो केंद्र सरकार ने झुग्गी-झोपड़ी वाली बस्तियों में भी कम्प्यूटर लिटरेसी शुरू करने का अभियान छेड़ दिया है। वह दिन दूर नहीं जब बच्चे सीधे कम्प्यूटर पर ही अक्षरों का ज्ञान लेंगे और की-बोडॅ पर इसका अभ्यास कर इसी में ही निष्णात कहलाएंगे। अब आते हैं आधुनिक जीवन व्यवहार पर। आज के जमाने में औसत बौद्धिकजन कम्प्यूटर लिटरेसी के बिना खुद को असहाय सा महसूस करते हैं। मैंने स्वयं कई ऐसे लोगों के लिए देखा है जिन्होंने ६० वषॅ की उम्र बीतने के बाद कम्प्यूटर पर टाइपिंग सीखी और आज अभ्यास के बल पर अच्छी टाइपिंग स्पीड के धनी हैं। वह दूर नहीं जब कम्प्यूटर लिटरेट और कम्प्यूटर इलिटरेट के भी अलग-अलग वगॅ होंगे। अब मैं आज के अपने विषय पर आता हूं। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर विश्व की अन्य महत्वपूणॅ घटनाओं पर महापुरुषों के बीच जो पत्राचार हुआ करता है, उसके निहिताथॅ व्यक्तिगत ही नहीं, सामूहिक व वैश्विक भी हुआ करते थे। आज पत्र लिखने की हमारी वह आदत पक्षाघात का शिकार हो गई है। लेकिन मानव मन कभी मानता क्या है। किसी ने क्या खूब कहा है------आदत जो लगी बहुत दिन से वह दूर भला कब होती हैहै धरी चुनौटी पाकिट में पतलून के नीचे धोती हैमेरी नजर में अपनी इसी आदत को बनाए रखने के लिए ही ब्लॉग की शुरुआत की गई है। चिट्ठी का स्थान चिट्ठा (ब्लॉग) ने ले लिया है। व्यक्तिगत से लेकर सामाजिक मुद्दों पर सैकड़ों लोग अपने विचारों के आदान-प्रदान में दिन-रात लगे हैं।अब एक और पहलू, आदमी पहले डाकिये का इंतजार करता था, कुछ ऐसे लोग जिनके ज्यादा पत्र आते थे, दरवाजे पर पत्र पेटिका लगवाते थे और दोपहर बाद नियमित रूप से इसे खोलकर देखते थे कि किसी का संदेश आया है या नहीं। आज के बदले हुए जमाने में डाक (मेल) का स्थान अब ई-मेल ने ले लिया है और आदमी कम्प्यूटर ऑन करते ही सबसे पहले ई-मेल चेक करता है। प्रियजनों के ई-मेल पाकर मन मयूर उसी तरह झूम उठता है जो कभी प्यार में पगे पत्र पाकर खिल उठता था।