Tuesday, August 11, 2020

झूला लगे आम की डाली

झूला लगे आम की डाली

मानव मन सदा कल्पनाओं के झूले पर सवार रहता है, ऐसे में उसे अपने अंदर संजोकर रखने वाले शरीर को भी तो झूलने का कोई अवसर चाहिए ही। शायद इसीलिए झूले की ईजाद की गई। द्वापर युग से जुड़ी कथाओं में सावन में गोपियों संग श्रीकृष्ण के झूला झूलने का उल्लेख है। शायद इसीलिए आज भी वृंदावन के साथ ही देशभर में भगवान श्री कृष्ण के मंदिरों में सावन महीने में झूला महोत्सव मनाया जाता है। वहीं कई राज्यों में नवयुवतियां विवाह के बाद पहले सावन में ससुराल में नहीं रहती हैं। मगर प्रेम में पगे दिल को परंपराओं के बंधन कहां सुहाते हैं। मायके में आने के बाद सावन की फुहारों के बावजूद विरह की आग नहीं बुझती हैं तो वे सहेलियों के साथ बगीचे में कजरी गाते हुए झूला झूलती हैं।

वहीं बिहार के वैशाली जिला स्थित हमारे गांव में भादो महीने में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर झूला झूलने का चलन है। गांव के पश्चिम में होने के कारण हमारे टोला को पछियारी टोला कहते हैं। कभी यहां आम के काफी बगीचे थे, इसलिए हमारे टोले को गाछी टोला भी कहा जाता था। हालांकि उतने अधिक बगीचे तो मैंने नहीं देखे, लेकिन हमारे दरवाजे के सामने ही आम का बहुत बड़ा बगीचा था। घर के आस-पड़ोस में भी आम के कई पेड़ थे। जन्माष्टमी पर इन्हीं पेड़ों पर झूला लगाए जाते।
हफ्ता भर पहले ही सावन पूर्णिमा पर राखी बंधवाते समय बहनों की खुशी के लिए कुछ भी कर गुजरने का वादा करने वाले भाइयों के लिए जन्माष्टमी का त्योहार बहनों पर इम्प्रेशन जमाने का भी अवसर होता था। ऐसे में नौजवान दो दिन पहले से ही झूला लगाने की तैयारी में जुट जाते थे। बांस और ताड़ का छज्जा काटकर लाते और उसे तराशा जाता। झूला के लिए दो तरफ से दो बांस लगाए जाते और ताड़ के छज्जे के डमखो (डंठल) को कूंचकर बांस के ऊपरी सिरे को उससे बांधकर आम के पेड़ पर काफी ऊंचाई पर लटकाया जाता। ...और नीचे बांस के दोनों सिरों में ताड़ के डमखो को कूंचकर उसमें हेंगा (पाटा) को बीच में फंसाया जाता। कई बार ताड़ के डमखो के स्थान पर साइकिल के पुराने टायर का भी इस्तेमाल किया जाता था। एल्यूमिनियम के तारों से इनको बड़ी मजबूती से बांधा जाता था।  

जन्माष्टमी के दिन तड़के ही झूला झूलने का दौर शुरू हो जाता था। बड़ी लड़कियां अपनी सहेलियों के साथ झूले पर जब दोनों छोर से मचक्का (पींगें ) मारतीं तो झूला आकाश से बात करने लगता। पर्दा प्रथा के कारण  परिवार की बहुओं का बाहर निकलना संभव नहीं था, सो कई नवविवाहित बहुएं अपनी ननदों की खुशामद कर पौ फटने से पहले झूले का आनंद लेतीं। वहीं, जिन बहुओं का नंबर नहीं आ पाता और यदि झूला दिन भर अनवरत सेवाएं देने के बाद भी सलामत बच जाता तो वे शाम के धुंधलके में अपने अरमान पूरे करतीं। इस तरह वे ससुराल में रहकर भी अपने मायके की स्वच्छंदता को जी लेती थीं।

हम बच्चों के लिए उस झूले का लुत्फ उठाना खतरे से खाली नहीं था, सो हमें उस पर झूलने की इजाजत नहीं थी। मगर भावनाएं तो हमारे भी हृदय में हिलोरें लेती रहती थीं, सो हमारी बाल मंडली खेत में हेंगा (पाटा) को बांधने के काम में आने वाली बरही और पीढ़ा लेकर गाछी में चले जाते और अपेक्षाकृत कम ऊंजाई वाली आम के पेड़ की डाली पर रस्सी डालते हुए उस पर पीढ़ा फंसाकर झूले का रूप देते। इसके बाद तलाश की जाती एक चींटी की, जिसे सबसे पहले झूला झुलाया जाता। साथ में हम बच्चे समवेत स्वर में गाते-
तोरा मायो न झुललकऊ, तोरा बापो न झुललकऊ, तोरा हमहि झुललिअऊ...
अर्थात तुम्हें मां ने भी नहीं झुलाया, तुम्हें पिता ने भी नहीं झुलाया, तुम्हें हम ही झुला रहे हैं। यह एक तरह का टोटका भी था कि जब हम झूलें तो उस दौरान रस्सी न टूटे।

सरगही का सुपर क्रेज

भगवान कृष्ण की महिमा के बारे में तो बड़े-बड़े विद्वान नहीं जान पाए तो हम बच्चे क्या समझ पाते, लेकिन परिवार के बड़े लोगों की देखा-देखी हम भी जन्माष्टमी पर उपवास रखते थे। हर घड़ी जिन बच्चों का मुंह चलता ही रहता है, वे दिन भर भूखे कैसे रहेंगे, इसे देखते हुए मां तीन-चार दिन पहले से ही पर्याप्त व्यवस्था कर लेती थी। जन्माष्टमी के दिन तड़के साढ़े तीन-चार बजे हम बच्चों को जगाकर चिवड़ा-दही-केला आदि खिला दिया जाता। भोर के इस भोजन को हमारे यहां सरगही कहा जाता है। सरगही के बाद उपवास शुरू हो जाता। बाल मंडली को दिन में एकाध बार शरबत पीने की छूट भी मिल जाती थी।
भगवान कृष्ण के नाम पर उपवास किया जाता था, सो कुछ भक्ति भाव का होना भी जरूरी था। कृष्ण भगवान का कोई मंदिर हमारे आसपास नहीं था, सो दोपहर में हम नहा-धोकर शिव मंदिर जाते और भगवान आशुतोष का जलाभिषेक करते।

पंगत में फलाहार

ऐसी मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म आधी रात में हुआ था, सो परिवार के बड़े लोग तो रात के 12 बजे घरों में ही श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाने के बाद व्रत का पारायण करते, वहीं कुछ लोग सुबह में ही व्रत खोलते, लेकिन बच्चों के लिए इतना लंबा अंतराल...आधी रात तक कैसे जगे रहते और अगर बच्चे सो जाएं तो उन्हें जगाना और भी मुश्किल। सो बीच का रास्ता निकालते हुए बच्चों को फलाहार की छूट दे दी जाती थी। सूर्यास्त होने के बाद आंगन में बच्चों की पंगत लगती और हम सभी दूध-केला, साबूदाना की खीर, आम, अमरूद आदि का भोग लगाते।

चलते-चलते
बदलते हुए समय के साथ सब कुछ महज पुराने दिनों की यादें बनकर रह गई हैं। अब न तो वे आम के पेड़ रहे और न झूला लगाने का वह उत्साह ही बचा। मगर झूला झूलने का मोह तो नई पीढ़ी के बच्चों में भी बरकरार है, सो छत की कड़ी में रस्सी बांधकर वे दो-चार पींगें भर लेते हैं। ...एक बात और। बचपन से ही देखता आया हूं कि जन्माष्टमी दो दिन होती है। इस बार भी कुछ वैसा ही रहा। लखनऊ में आज जन्माष्टमी है, जबकि बिहार में कई स्थानों पर मंगलवार को ही जन्माष्टमी मना ली गई। मुजफ्फरपुर से एक दोस्त ने जन्माष्टमी पर छत की कड़ी से बंधी रस्सी पर झूलते बच्चे का वीडियो शेयर किया तो बरबस ही बचपन के दिनों की यादें ताजा हो आईं।

Sunday, August 2, 2020

राखी का त्योहार : भावनाओं को भुनाता बाजार

मई-जून की चिलचिलाती धूप की तपन को कभी रिमझिम कभी झमाझम से बुरी तरह धोकर संपूर्ण जीव जगत और वनस्पति को तृप्त-संतृप्त कर देने वाले सावन की पूर्णाहुति भाई-बहन के प्यार के पर्व रक्षाबंधन से होती है। चंद घंटों के बाद ही क्षितिज पर भगवान भास्कर की लालिमा के साथ यह पवित्र पर्व एक बार फिर दस्तक देने वाला है। दफ्तर से लौटा हूं और न जाने पिछले कितने वर्षों की यादें किसी फिल्म के फ्लैश बैक की तरह  दिमाग में धमाचौकड़ी मचाने लगी हैं।

बचपन के दिनों में राखी के त्योहार पर उत्साह-उमंग का एक अद्भुत माहौल हमारे मन में ही नहीं, वातावरण में भी व्याप जाता था। तब खाली जेब की मजबूरी और इस मौसम में खेती के कामों की अधिकता लोगों को बाजार जाने की इजाजत नहीं देती थी। बहनें गांव में साइकिल से फेरी लगाने वाले से ही राखी खरीदती थीं। राखी भी अति साधारण-रंग-बिरंगे स्पंज वाली। हां, कुछ राखियां दो-तीन मंजिली होती थीं और उनका आकार और ऊंचाई कुछ ज्यादा हो जाया करती थी। कुछेक राखियों में चमकीली पत्तियां भी लगी होती थीं, मगर सबके मूल में स्पंज ही होता था।

रक्षाबंधन के दिन हम सुबह-सुबह नहा-धोकर तैयार हो जाते और दीदी के साथ ही छोटी बहन हमारे ललाट पर रोली का चंदन लगाकर हमारी कलाई पर अपने स्नेह का धागा बांधतीं। इसके बाद पेड़ा खिलाकर हमारा मुंह मीठा करातीं। तब गांवों में अक्सर सभी लोग गाय-भैंस पालते थे। ऐसे में पेड़ा बड़ी आसानी से घर पर ही बना लिया जाता था। तब बहन का मतलब केवल सगी बहनों से ही नहीं हुआ करता था। दीदी की सहेलियों और दोस्तों की बहनों के लिए भी हमारा स्थान उनके सगे भाई से कम नहीं होता था। सो कलाई से कोहनी तक  हमारा हाथ रंग-बिरंगी राखियों से सज जाता था और आस-पड़ोस में घूम-घूम कर एक दूसरे को अपनी राखियां दिखाया करते थे। 

समय बीतने के साथ बहुत कुछ बदल गया। पहले पढ़ाई और फिर रोजी रोजगार के लिए घर छोड़ना पड़ा और फिर रक्षाबंधन से कई दिनों पहले से आंखें डाकिये की आहट सुनने को बेताब रहती हैं। कई ज्ञात-अज्ञात कारणों से डाक विभाग के हिस्से का बहुत सारा काम कूरियर कंपनियों ने हथिया लिया है, सो कई बार राखियां कूरियर से भी आती हैं। अब तो बाजार में अनगिनत डिजाइन की राखियां नजर आती हैं। मिकी माउस, डोरेमान सरीखे कार्टून कैरेक्टर से होता हुआ राखियों का सफर अब फाइटर जेट विमान राफेल तक पहुंच चुका है। 
आज जब कोरोनावायरस की वैश्विक महामारी की वजह से हम दहशत के साए में जीने को विवश हैं, ऐसे में रक्षाबंधन का त्योहार भी इससे अछूता नहीं रह पाया है। वहीं ऑनलाइन मार्केटिंग कंपनियों ने इस आपदा को अवसर में तब्दील करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। 
पीतल जैसी चमकीली तारों से बुनी करीब चार इंच परिधि वाली खिलौना नुमा टोकरी में एक सिंपल राखी, अक्षत के आठ-दस दाने, नाममात्र की रोली और एक रुपया में चार के हिसाब से मिलने वाली सुनहरे कागज में लिपटी कुल जमा पंद्रह टॉफियां...और  कीमत ढाई सौ में एक रुपया कम...मात्र दो सौ उनचास रुपये। इस व्यापार को क्या कहा जाए। भाई के लिए बहन का स्नेह अनमोल है, चंद रुपयों में उसका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता, लेकिन भाई तक अपनी स्नेहिल भावनाओं को भेजने के लिए इतनी अधिक कीमत वसूलने को कदापि उचित नहीं ठहराया जा सकता।



Thursday, July 30, 2020

बाबू आउटडेटेड हुए, ईया हुईं इतिहास

बाबू आउटडेटेड हुए, ईया हुईं इतिहास

दीदी की जब शादी हुई, तब मैं आठ-नौ साल का था। दीदी का मेरे प्रति  अत्यधिक स्नेह भाव मुझे बार-बार उससे मिलने के लिए विवश करता था, मगर अकेले बच्चे  को भेजना मुश्किल, उसे साथ कौन लेकर जाए, सो मन मारकर रह जाता। हालांकि थोड़े समय बाद ही बालमन फिर मचलने लगता, तो मां के माध्यम से दुबारा बाबूजी की अदालत में अर्जी डाल दी जाती। आस-पड़ोस के कई अन्य परिवारों की रिश्तेदारी भी दीदी की ससुराल वाले गांव में थी। सो यदि उनमें से कोई वहां जाने वाला होता तो जरूरी हिदायतें देकर मुझे भी उनके साथ कर दिया जाता। मुझे तो मानों मुंहमांगी मुराद मिल जाती। मेरे पहुंचते ही दीदी का चेहरा भी खिल उठता। फिर वहां से मेरे लौटने के लिए भी ऐसे ही किसी जुगाड़ की तलाश की जाती और तब तक मुझे दीदी के पास रहने का मौका मिल जाता।

एक दिन दीदी के यहां बैठा था कि कई मजदूर महिलाएं खेत से मूंग की छीमी तोड़कर लाईं और अपनी-अपनी टोकरी कतार से लगाकर रख दी। तब मजदूरी में पैसे देने का चलन नहीं था। जिस फसल का काम होता, उसी में से कुछ हिस्सा बतौर मजदूरी दे दिया जाता था। उन्हीं महिला मजदूरों में से एक मॉनीटर की तरह एक-एक का नाम पुकारती। जिसका नाम पुकारा जाता वह अपनी टोकरी लेकर आगे आती। दीदी के ससुर तोड़ी हुई मूंग की छीमी का आकलन कर उसकी मजदूरी के बदले मूंग की छीमी उसकी टोकरी में छोड़कर बाकी अपनी ढेरी पर रख लेते। मेरे लिए यह सब नई बात नहीं थी। हमारे गांव में भी यह सब आम था। 

आज से 35-40 साल पहले बिहार के वैशाली और आसपास के जिलों में महिलाओं की पहचान उनके मायके या बड़ी संतान के नाम से होती थी। तब हमारे यहां मां को "माय" कहने का चलन था। सो उन्हें पुकारा जाता - रमबतिया माय, संतिया माय या फिर अमरितपुर वाली, सरसौना वाली। मगर दीदी की ससुराल में मॉनीटर बनी महिला अपनी साथी मजदूरों को उसकी बच्चे की  "माय" की जगह "मतारी" शब्द बोल रही थी। यह सुनकर मुझे कुछ अजीब सा लगता था। शायद इसीलिए कहते हैं कोस-कोस पर पानी बदले, तीन कोस पर बानी।

आज तो शहरी कल्चर ने इस कदर गांवों में सेंधमारी कर दी है कि शब्दों का सोंधापन ही खो  गया है। मेरे बाद की पीढ़ी ने मां को माय की जगह मम्मी कहना शुरू कर दिया था और अब तो मम्मी शब्द से स्त्रीबोधक "ई" ध्वनि की भी विदाई कर दी गई। बच्चे मां को मम्मा कहने लगे हैं। वहीं, हमारे जमाने में बच्चे पिता को बाबू कहते थे। लड़कियां शादी के बाद माता-पिता-घर-परिवार छोड़कर भले ही ससुराल आ जाती हैं, लेकिन मायके के संस्कार को सहेजकर लाना नहीं भूलतीं। मेरी मां और मौसी-मामू मेरे नानाजी को बाबूजी कहकर बुलाते थे, शायद इसीलिए हम भाई-बहन भी अपने पिता को बाबूजी कहना सीख गए, लेकिन चाचाओं को बड़का बाबू और छोटका बाबू ही कहते थे। अफसोस, आजकल तो गांवों में बच्चे पिता को बाबू क्या, बाबूजी कहने में भी शर्म और पापा व डैडी कहने में शान महसूस करते हैं। हां, नई पीढ़ी अपने बच्चों को "बउआ" के बदले "बाबू" जरूर कहने लगी है।

एक और बात याद आती है। हमारी एक चाची को उनके बच्चे "ईया" कहकर बुलाते थे, सो हमलोग भी उन्हें "ईया" ही कहते थे। संभव है वो चाची अपनी मां को ईया कहती  रही हों और मायके से उनके साथ चलकर यह शब्द हमारे घर तक भी पहुंच गया हो। बरसों पहले इस दुनिया से ईया की रुखसती के साथ ही यह शब्द भी इतिहास बनकर  रह गया। तब दादा को "आजा" और दादी को "आजी" भी कहते थे। हालांकि किसी को  इन संबोधनों से अपने दादा-दादी को पुकारते हुए तो मैंने नहीं सुना, लेकिन कई बुजुर्ग महिलाओं के मुंह से किसी दूसरे के दादा-दादी के लिए आजा-आजी शब्द का जिक्र करते जरूर सुनता था। 

उस जमाने में कोई विशेष वस्तु भी किसी व्यक्ति की पहचान बन जाया करती थी। दफादार रहे मेरे एक बाबा लाठी टेकते हमारे घर के पास चौक पर आते थे। सो हम उन्हें "लाठी बाबा" कहकर पुकारते थे। इसी तरह हमारी पट्टीदारी के एक चाचा शिक्षक थे। उनका स्कूल  अपेक्षाकृत अधिक दूर था। तो शायद अपने परिवार में उन्होंने ही सबसे पहले साइकिल खरीदी, इसलिए बच्चों ने उनका नाम "साइकिल बाबा" रख दिया। इसी तरह परिवार में सबसे छोटे चाचा को पहले "लाल चाचा" और सबसे छोटी चाची को "कनिया चाची" कहते थे। ये संबोधन भी अब यादों में ही जिंदा हैं। ऐसे ही बहुएं अपनी सास को "सरकारजी' कहती थीं। हमारे देखते ही देखते सासू मां के लिए बहुओं का संबोधन "अम्माजी" से होता हुआ अब "मम्मीजी" तक पहुंच चुका है।   

लंबे अंतराल के बाद किशनगंज से सुबह एक बिटिया ने फोन किया। उसका नंबर मेरे मोबाइल में सेव नहीं था। सो परिचय पूछने पर जब उसने मुझे मोहन काकू कहा तो 1991 से 1994 तक किशनगंज में बिताए सुनहरे दिनों की मीठी यादों के साथ ही बरसों पुराने ये संबोधन जेहन में सरगोशियां करने लगे। वरना आज तो भाई और दोस्तों के बच्चों की कौन कहे, बहनों और साले-सालियों के बच्चे भी मामा और फूफा-मौसा के बजाय अंकल ही बोलने लगे हैं। 

Thursday, July 23, 2020

आम की गुठली से निकलती मीठी तान

प्रकृति की लीला अपरंपार है। प्रकृति हमारी जरूरतों का न केवल ध्यान रखती है, बल्कि उन्हें पूरा भी करती है। तभी तो वैशाख-ज्येष्ठ में सूर्य का ताप जब हमारे लिए संताप का सबब बन जाता है, तो प्रकृति फलों के राजा आम का वरदान हमारी झोली में डाल देती है। जानलेवा लू से बचाव के लिए कच्चे आम को पकाकर उससे बने पना के ठेले जगह-जगह सड़कों के किनारे नजर आने लगते हैं। ..और फिर समय बीतने के साथ देखते ही देखते कुछ ही दिनों में आम हमारे जीवन में मिठास का अमृत घोलने के लिए हाजिर हो जाता है।

फिर तो आषाढ़-सावन की कौन कहे, भादो तक लोग आम की विभिन्न प्रजातियों का जमकर लुत्फ उठाते हैं। यही नहीं, इस मिठास को आम के सीजन के बाद भी संजोए रखने के लिए अमौट (मैंगो केक) भी बनाया जाता है। आजकल तो अत्याधुनिक तकनीक से बने मैंगो ड्रिंक और मैंगो जूस सालभर उपलब्ध रहते हैं। मगर अफसोस, मानव-मन मिठास की एकरसता से भी ऊब जाता है। ऐसे में चटपटी चटखार से भरपूर आम का अचार साल दर साल हमारे भोजन की थाली की शोभा बढ़ाता है। कहते हैं कि जितना पुराना अचार हो, उतना ही अधिक स्वादिष्ट होता है।

अस्तु, शहरों में तो लोग बस आम की मिठास से ही मतलब रखते हैं। आम का छिलका और गुठली उनके कचरापात्र का पेट भरती है। मगर गांवों में आदमी की बेकारी के अलावा और कुछ भी बेकार नहीं होता। वहां हर वस्तु की अपनी उपयोगिता होती है। गांवों में आम का छिलका पशुओं को खिला दिया जाता है तथा आने वाली पीढ़ियां भी आम की मिठास का लुत्फ उठा सकें, इसके लिए गुठलियां धरती मां को सौंप दी जाती हैं। धरती माता की गोद में ये गुठलियां जीवन पाकर धन्य हो जाती हैं।

हमारे गृहराज्य बिहार के वैशाली समेत आस-पड़ोस के जिलों में आम की गुठली से निकले पौधे को "अमोला" कहा जाता है। एक स्थान पर सैकड़ों गुठलियां होने के कारण अमोला का समुचित विकास नहीं हो पाता। इसलिए एक-डेढ़ फीट का होने पर अमोले को अन्यत्र रोप दिया जाता है। इसके साथ ही ये अमोला विशेष किस्म के आमों में कलम बांधने के भी काम आते हैं। शहरों के समीपवर्ती गांवों में तो नर्सरी वाले थोक के भाव अमोला खरीदकर ले जाते हैं। इस तरह लोगों को गुठलियों के भी दाम मिल जाते हैं। शायद इसीलिए कहा गया है-आम के आम, गुठली के दाम।

शहरों में तो संपन्न माता-पिता बच्चों के लिए ढेर सारे कीमती खिलौने खरीद लाते हैं, लेकिन गांवों में जब विपन्न अभिभावकों के लिए परिवार का पेट पालना ही समस्या हो, तो बच्चों के लिए खिलौने खरीदने की बात सोचना भी संभव नहीं। मगर, बच्चे तो बच्चे होते हैं। संपन्नता और विपन्नता की सीमाओं को बालमन क्या समझे। उसे तो मन बहलाने के लिए कुछ चाहिए। तभी तो शहर के बच्चे बंद कमरे की फर्श पर बैटरी की गाड़ियों को रिमोट से दौड़ाने में जो आनंद उठाते हैं, उससे कहीं अधिक आनंद गांव के बच्चे साइकिल के पुराने टायर को डंडे से मारकर भगाते हुए उसके पीछे दौड़कर उठाते हैं। गांवों के साधन विहीन बच्चे न जाने मनोरंजन के लिए ऐसे ही और कितने साधन ईजाद कर लेते हैं। इन्हीं में एक है आम की गुठलियों से बनने वाली सीटी।

बीज में वृक्ष के छुपे होने का दर्शन और आम की किस्मों को अगली पीढ़ियों के लिए महफूज रखने जैसे महान उद्देश्यों की बात तो बड़े-बुजुर्ग जानें, बच्चों को इनसे क्या काम। सो हम बच्चे अंकुर फूटती गुठलियों को निकाल लाते और उसका छिलका उतारकर गुठली के एक सिरे को ईंट या पत्थर पर घिसकर उसे सीटी की तरह बजाते। क्या खूब मीठी आवाज निकलती। हर बच्चा अपनी तरकीब से गुठली को घिसता और इससे निकलने वाली अलग-अलग आवाज समवेत रूप में अलग ही तरह का संगीत रचती। गुठलियों से बनी सीटी की वह मिठास आज भी दिल में रची-बसी है। अब जबकि आम का सीजन विदा लेने ही वाला है, बरबस ही बचपन में बजाई गुठलियों की सीटी की मिठास याद आ गई।  

विवाह की भविष्यवाणी

आम के पेड़ में बौर लगने के साथ ही हमारा दिल मानों आम की गाछी में ही अटका रहता था। जैसे ही टिकोला (अमिया) आकार लेता, हम बच्चे घर से नमक लेकर गाछी में पहुंच जाते। सितुआ (घोंघा की प्रजाति का एक जीव) में छेद कर उससे टिकोला को छीलते और उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा जाता। फिर बाल मंडली उसमें नमक छिड़ककर चटखारे लेकर खाती। टिकोला को काटने पर उससे निकलने वाले बीज को हम "कोइली" कहते थे। वह बहुत चिकना होता था। उसे अंगूठे और तर्जनी में फंसाने के बाद किसी साथी का नाम का लेकर पूछते- इसकी शादी किस दिशा में होगी?  और फिर धीरे से दोनों अंगुलियों को धीरे से दबा देते। "कोइली" अंगुलियों से छिटककर जिस दिशा में जाती, हम समझते कि उस बच्चे की शादी उसी दिशा में होगी। ... तो इस तरह "कोइली" विवाह की भविष्यवाणी भी करती थी।

Tuesday, July 14, 2020

गोरलगाई, मुंहदिखाई


गोरलगाई, मुंहदिखाई...

भारतीय सनातन परंपरा में सोलह संस्कारों की बात कही गई है। हर संस्कार के साथ कई रस्में जुड़ी होती हैं और इन संस्कारों का असली आनंद इन्हीं रस्मों में छिपा होता है। इन सोलह संस्कारों में जन्म और विवाह के अवसर पर मनाई जाने वाली खुशियों के क्या कहने। हालांकि शिशु के जन्म के समय परिवार वाले भले ही उत्सव मनाते हों, मगर अबोध शिशु इन खुशियों का मतलब क्या समझे। हां, शादी के अवसर पर परिवारी जनों के साथ ही वर-वधू भी मोद-आनंद का भरपूर लुत्फ उठाते हैं।

विवाह में वर-वधू अग्नि के गिर्द सात फेरे लेकर अपनी अलग-अलग पहचान को उसी पवित्र अग्नि में होम करके दंपती के रूप में एकाकार हो जाते हैं, वहीं दोनों के परिवार भी संबंधों के अदृश्य डोर में बंध जाते हैं। मगर अफसोस, दो दिलों और दो परिवारों के जुड़ने के इस अमूल्य आनंद के उत्सव में दिखावे का चलन कहां से आ गया। तभी तो शादी में वधू के दरवाजे पर होने वाले थोड़ी देर के आयोजन में वर पक्ष वाले अपनी श्रेष्ठता दिखाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते। गाड़ी-घोड़े के काफिले, बैंड-बाजे के साथ हर्ष फायरिंग तक दिखावे की हर रस्म निभाई जाती है। कई स्थानों पर तो कमर में तलवार लटकाए दूल्हा घोड़े पर बैठकर शादी करने जाता है और तोड़न मारकर ऐसा साबित करता है कि न जाने कितना बड़ा तीर मार दिया हो। 

संतोष की बात है कि बिहार में यह चलन नहीं है, इसलिए यह अपराध करने से मैं बच गया। मगर एक अन्य अपराधबोध आज भी सालता रहता है कि छठी से दसवीं तक रोजाना छह-सात किलोमीटर पैदल चलकर पातेपुर हाई स्कूल और फिर मुजफ्फरपुर में कॉलेज की पढ़ाई के दौरान किराए के आवास से करीब इतनी ही दूरी कदमों से नापने वाला मैं भी कार में बैठकर ही विवाह करने गया था। हांलाकि, यह अपराधबोध इस बात से थोड़ा कम अवश्य हो जाता है कि वह कार मेरे लंगोटिया यार के भैया की थी और मेरे प्रति सहज स्नेह के कारण भैया खुद उसे चलाकर ले गए थे।

अस्तु, वरमाला के आयोजन तक दूल्हे के चेहरे पर गजब सी शोखी छायी रहती है। मंडप पर पहुंचने के बाद शादी के दौरान पंडित जी के बोले गए मंत्रों को उनके पीछे-पीछे दुहराते हुए और उनके निर्देशों का पालन करते हुए दूल्हे की अकड़ ढीली पड़ने लगती है। इस दौरान कदम-कदम पर महिला मंडली की टोकाटाकी रही-सही कसर पूरी कर देती है। फिर तो वह सर्कस के शेर की तरह बिना किसी ना-नुकर के रिंग मास्टर बनी महिला मंडली के निर्देशों को चुपचाप मानता जाता है।...और फिर आ जाती है विदाई की वेला। आनंद के क्षण अचानक बंद। जाते हैं विरह की वेदना में । रोती हुई नववधू अपनी मां-बहन-भाई समेत सभी परिवारी जनों के गले लगकर विदा लेती है।
...और दूल्हा...उस बेचारे की स्थिति ऐसी हो जाती है जैसे नाटक के मंचन के समय निर्देशक किसी पात्र को मूकदर्शक बनकर खड़े रहने को विवश कर दे। होना तो यह चाहिए कि विदाई के इन क्षणों में दूल्हा विवाह समारोह में आए बड़े-बुजुर्गों को प्रणाम कर नव गृहस्थ जीवन की सफलता के लिए उनका आशीर्वाद ले। मगर वधू पक्ष में सास-ससुर-साले-साली के अलावा उस परिवार के अधिक लोगों को वह जानता ही नहीं, सो किंकर्तव्यविमूढ़ सा टुकुर-टुकुर देखता रहता है। इस बीच वधू पक्ष के ज्येष्ठ-श्रेष्ठ लोग अपनी मुट्ठी में रखे हुए रुपये दूल्हे को थमाते हैं, तब दूल्हा तत्परता से झुककर उनके पैर छूता है। बिहार में हमारे यहां इसे गोरलगाई कहते हैं। ज्येष्ठ-श्रेष्ठ लोगों के पैर छूकर आशीर्वाद लेने की बात तो समझ में आती है, यह अच्छे संस्कार का परिचायक भी है, मगर रुपये देने के बाद औपचारिकतावश किसी के पैर छूना...कितना अव्यावहारिक लगता है...मगर आन-बान-शान और मान के साथ ससुराल की धरती पर पहला कदम रखने वाले दूल्हे को लौटते वक्त यह परंपरा निभानी पड़ती है। करीब 23 साल पहले मैंने भी निभाई थी...बेमन से ही सही।  
दुल्हन की बात करें तो माता-पिता के साथ ही अपना घर-परिवार छोड़कर एक नये जीवन के सफर पर चल देती है जहां सर्वथा अनजान परिवेश-परिवार से उसका सामना होता है। दुल्हन जब ससुराल आती है तो समारोहपूर्वक उसका स्वागत किया जाता है। बहू की सुन्दर सलोनी सूरत की एक झलक देखने के बाद सास उसे मनभावन उपहार देती है। फिर शादी समारोह में पहुंचीं महिलाओं के साथ ही टोले-मोहल्ले की महिलाएं एक-एक कर कोहबर घर में सिमटी सकुचाई नवविवाहिता दुल्हन को देखती हैं। गांवों में इसे मुंहदिखाई की रस्म कहा जाता है। रसिकहृदय सौंदर्य प्रेमियों ने रमणी की आंखों की व्याख्या अपनी-अपनी कल्पना और सौंदर्य बोध के हिसाब से की है। रूपसी की आंखों पर कवियों ने भी बहुत कुछ लिखा है, लेकिन जहां तक मैं समझता हूं, यह सब खुली आंखों के लिए ही कहा गया है। जबकि मुंहदिखाई की रस्म के दौरान दुल्हन अपनी आंखें बंद रखती हैं। इसके पीछे का तर्क मेरी समझ में आज तक नहीं आया।
कई मुंहफट महिलाएं दुल्हन के रूप-रंग को लेकर अव्यावहारिक टिप्पणी करने से बाज नहीं आतीं। सो मुंहदिखाई के समय दुल्हन की आंखें भले बंद रहती हों, लेकिन जहर बुझे ये बाण कानों से होकर उसके दिल में तो उतर ही जाते हैं। कई नवविवाहिताएं इस नकारात्मक टिप्पणी को चुनौती के रूप में लेते हुए आने वाले दिनों में अपने व्यवहार से सबका दिल जीत लेती हैं। तब पति या परिवार के अन्य सदस्यों के लिए उसके रूप-सौंदर्य की कमतरी कोई मायने नहीं रखती। ...और फिर आस-पड़ोस की महिलाओं के लिए वह आदर्श बन जाती हैं।

चलते-चलते

हमारे समाज में कोई भी परंपरा यूं ही बेमतलब नहीं हुआ करती। सबके पीछे कुछ न कुछ तर्क अवश्य ही होता है। पहले के जमाने में कहते थे-उत्तम खेती, मध्यम बान, निरघिन चाकरी, भीख निदान। तब खेती का समाज में सर्वोत्तम स्थान था। बान यानी व्यापार को मध्यम दर्जे का तथा नौकरी करने को निकृष्ट कर्म माना जाता था। तो खेती करने वाले परिवार के सद्य: विवाहित युवक के पास पैसे होना दूर की कौड़ी थी। ऐसे में नवविवाहिता पत्नी के लिए कोई उपहार लाने का मन हो या फिर दोस्तों को पार्टी-शार्टी देने की बात, तो उसके लिए गोरलगाई में मिला पैसा ही काम आता था। ऐसे ही मुंहदिखाई में मिले रुपये नवविवाहिता दुल्हन के लिए भी काफी महत्व रखते थे। बीतते हुए समय के साथ बहुत कुछ बदल गया है, लेकिन संतोष की बात है कि गांवों ने अब भी ये परंपराएं संजोए रखी हैं।     

Sunday, July 12, 2020

ठेले पर मलिहाबाद

आम बस नाम का ही आम है, वरना इसकी खासियतें तो अनगिनत हैं, अनमोल हैं। तभी तो इसे फलों के राजा का ताज मिला है। अपनी अल्पज्ञता के कारण मैं जहां तक समझ पाया हूं, यह इकलौता फल है जो पेड़ पर लगने के बाद से पककर स्वत: डाल से गिरने तक हर रूप में अपने लुत्फ से हमें आह्लादित करता है। बौर झड़ने के बाद पल्लवों के बीच जैसे ही टिकोला या अमिया स्वरूप लेता है, इसकी खटास सबसे पहले अपने उदर में नवजीवन का कोंपल संजोए ममतामयी मां की पसंद बनती है। फिर इसकी चटनी हर थाली की शोभा बढ़ाती है। टिकोले में जब गुठली पूरा आकार लेता है तो अचार के रूप में इसके स्वाद को आने वाले वर्षों के लिए सहेज कर रख लिया जाता है। आम का पना जहां जानलेवा लू से बचाता है, वहीं मैंगो शेक की तरावट के क्या कहने।...और जब आम अपनी पूर्णता को प्राप्त कर लेता है तो इसकी अमृत सरीखी मिठास को अभिव्यक्त करने में शब्द कम पड़ जाएं। सीजन के बाद भी इसकी मिठास का रसास्वादन करने के लिए अमौट (मैंगो केक) बनाकर रख लिया जाता है। यदि कहूं कि आम की मिठास को निकाल दिया जाए तो जीवन में काफी बड़ा खालीपन आ जाएगा, अतिशयोक्ति नहीं होगी।

गांवों में तो बगीचों में आम के जितने पेड़, उतनी ही प्रजातियां होती हैं। रंग-रूप से लेकर आकार-प्रकार और स्वाद में एक से बढ़कर एक। ... और इन्हीं खासियतों के आधार पर इनका नामकरण भी कर दिया जाता है। जैसे-केले के आकार का है तो केरवा, सिंदूर सा रंग है तो सेंदुरिया, अधिक सन (रेशे) हों तो सनहा, बेल (बिल्व) के आकार का हो तो बेलवा, गुच्छों में फलता हो तो बरबरिया, सीप के आकार का हो तो सीपिया, अत्यधिक मीठा हो तो पूरनी मिठूबा, पकने के बाद भी खट्टापन बना रहे तो खटूबा....। गाछी में आम के जितने गाछ, उतने नाम और अलग-अलग लोगों की गाछी में अलग-अलग गाछ के अलग-अलग नाम। इस तरह एक ही गांव में सैकड़ों प्रजातियां।

कुछ आम के नाम स्थान विशेष के नाम पर भी होते हैं। जैसे-बंबइया। इस आम का मायानगरी बंबई (तब मुंबई नहीं हुआ था) से क्या कनेक्शन है, इसका तो पता नहीं, लेकिन नाम की तरह ही इसके स्वाद में भी जादू होता है। यह कच्चे में भी मीठा लगता है। इसलिए बच्चों की पहुंच से इसे बचाने के लिए विशेष जतन करने पड़ते हैं। मीडियम साइज का यह बंबइया आम अन्य आमों की तुलना में सबसे पहले पकता है और इसका स्वाद भी निराला होता है।  

इसी तरह एक आम है मालदह। रंग-रूप-आकार-सुगंध और स्वाद में इसे आमों का सरदार कह सकते हैं। मुझे यह आम सर्वाधिक पसंद है, इसलिए संभव है मैं इसकी तरफदारी कर रहा होऊं, लेकिन इसके दीवाने मेरी तरह और भी बहुत सारे होंगे, इसमें कोई शक नहीं। इसके झक्क सफेद रंग की वजह से इसे सफेद मालदह भी कहते हैं। बिना रेशे के भरपूर गूदेदार इस आम की गुठली पहुत ही पतली होती है। ...और मिठास के तो कहने ही क्या। यह हमारे पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल के मालदा जिले से जुड़ा है और बिहार तक पहुंचते-पहुंचते इसका नाम मालदह हो गया। बंगाल और बिहार के अलावा भी इस आम का जादू बरकरार है, मगर अफसोस इन दोनों राज्यों की सीमा पार करने के बाद इसका नाम लंगड़ा हो जाता है। अब आम के पैर तो होने से रहे कि वह लंगड़ा हो, मगर लोगों का क्या, अंधे का नाम नयनसुख रखने वाले यदि भले-चंगे सर्वगुण संपन्न मालदह आम का नामकरण लंगड़ा कर दें तो कौन क्या करे।

मालदह आम की खासियत के चलते एक छोटे से जिले का नाम हो जाए, यह बात बंगाल की राजधानी को कैसे रास आती, सो आम की एक और प्रजाति है कलकतिया मालदह। हालांकि रंग-रूप-आकार-स्वाद और मिठास सभी में सफेद मालदह के सामने इसकी स्थिति कहां राजा भोज, कहां गंगुआ तेली जैसी ही है।

पटना-किशनगंज रेल रूट पर दालकोला के आगे सूर्यकमल स्टेशन के पास सुरजापुर गांव है। 1991 में जब किशनगंज गया तो इस सुरजापुर गांव के सुरजापुरी आम का जादू लोगों के सिर पर चढ़कर बोल रहा था। आस-पड़ोस के जिलों पूर्णिया, कटिहार, सिलीगुड़ी और इससे आगे तक के लोग इस आम के मुरीद हैं। मैं भी जब तक किशनगंज रहा, सुरजापुरी आम का जमकर लुत्फ उठाया।

स्थान के नाम से प्रसिद्धि पाने वाले आम की बात करूं तो मलिहाबादी दशहरी का नाम बरबस ही सामने आ जाता है। लखनऊ के मलिहाबाद कस्बे की पहचान ही दशहरी आम से है। देश की कौन कहे, विदेशों तक में लोगों को भी शिद्दत से इसका इंतजार रहता है। जून मध्य से लेकर जुलाई मध्य तक लखनऊ की सड़कों के किनारे ठेलों पर जिधर नजर जाती है, दशहरी आम ही नजर आते हैं। ऐसा लगता है जैसे मलिहाबाद के आम के बागों ने ठेले पर ठिकाना जमा लिया हो। हालांकि अफसोस की बात यह है कि कोरोना वायरस की वैश्विक महामारी से उपजे संकट के इस दौर में हर शख्स बेजार है। बाजार की रौनक ही खो गई है। ऐसे में आम के ठेले पिछले वर्षों की तुलना में इस बाार कम नजर आते हैं और इसके साथ ही मलिहाबाद के आम बागवानों के चेहरों पर भी मायूसी है। आशा है, अगले साल से फिर सब सामान्य रहेगा।

Saturday, July 11, 2020

रॉन्ग नंबर

दादीजी से मिलने कभी-कभार एक बूढ़ी अम्मा आया करती थीं। आज से करीब चार दशक पहले हमारे गांव में न तो चाय का चलन था और न ही आज जैसी औपचारिक आवभगत की जरूरत। दादीजी हुक्का पीती थीं, सो बूढ़ी अम्मा के आने पर हुक्के के लिए आग की चिंगारियां लाने के लिए कहतीं। जब मैं चिंगारियां लेकर आता और बूढ़ी अम्मा के पैर छूता तो वे अपने सफेद बालों में से दो-चार बाल नोचकर मेरे सिर पर रख देतीं और कहतीं-लखिया हो। अक्षर ज्ञान से अनजान, मगर व्यावहारिक ज्ञान से परिपूर्ण इन वृद्धाओं की गिनती बीस से आगे नहीं बढ़ पाती थी। दैनंदिन जीवन में कोई वस्तु जब बीस से अधिक हो जाती तो वे एक बीस, दो बीस के हिसाब से गिनती आगे बढातीं। लेकिन ममता और आशीर्वाद का खजाना लुटाने में वे किसी सीमा का ध्यान नहीं रखती थीं। उनके आशीर्वाद का आशय लाख वर्ष की उम्र से होता था।

ऐसी ही एक दूसरी दादीजी मेरे किशोरावस्था के दौरान आशीर्वाद देतीं-भगवान जल्दी तुम्हें एक रोटपकाई (भोजन पकाने वाली पत्नी) दें। मगर, अफसोस, केवल आशीर्वाद से कुछ नहीं होता। खुद का प्रारब्ध भी तो कोई चीज होती है। तभी तो मेरे किसी साथी की मैट्रिक की परीक्षा देने के बाद रिजल्ट आने से पहले ही शादी हो गई तो कोई इंटरमीडिएट और ग्रेजुएशन करते-करते एक से दो हो गया। वहीं मुझे यूनिवर्सिटी की पढ़ाई पूरी करने के बाद भी कई वर्षों तक इंतजार करना पड़ा। आखिरकार जब अपना भी नंबर आ ही गया तो राज  खुला कि पत्नी केवल रोटी ही नहीं पकाती, अपने पर आ जाए तो दिमाग भी पकाती है। यही नहीं, मूड बना ले तो पति को पानी पिलाने में भी पीछे नहीं रहतीं।

कई साल जयपुर में साथ-साथ रहने के बाद पिंकसिटी में पत्नी को छोड़कर लखनऊ में लोनली रहने लगा तो पता चला कि शहरों में पानी एक निश्चित समय में आता है। और शायद इसीलिए शहर के लोगों की आंखों में गांव वालों की तुलना में पानी थोड़ा कम हुआ करता है। सो साहब, अखबार की नौकरी में रात ढाई-तीन बजे दफ्तर से लौटने के बाद चार बजे तक सोना हो पाता है और न चाहते हुए भी पानी भरने के लिए बेमन से ही नहीं छह से सात बजे तक उठना ही पड़ता है।

ऐसे ही कल सुबह पानी भरने के बाद सो गया था। जैसे ही आंख लगी थी कि मोबाइल की घंटी बजी।  दूसरी तरफ से पूछा गया-सुरेंद्र? मैंने रॉन्ग नंबर की बात कहकर उसे मना कर दिया और सो गया। कच्ची नींद खुलने के बाद बेचैनी की पीड़ा के कभी न कभी आप सभी भुक्तभोगी रहे हैं, उसका जिक्र करना क्या? 15-20 मिनट तक करवटें बदलने के बाद दुबारा नींद आई ही थी कि फिर मोबाइल की घंटी बजी। उठाया तो आवाज आई- विकास से बात करा दो। मैंने कहा-विकास तो पुलिस के एनकाउंटर में मर गया। जाने अब तक कहां से कहां पहुंच गया होगा। कैसे बात कराऊं? फोन करने वाले ने कहा, मैं कानपुर वाले विकास दुबे की बात नहीं कर रहा। मैंने कहा, मैं तो पिछले कई दिनों से चहुंओर बस एक ही विकास का नाम देख-सुन रहा हूं। उसने कहा, समझने की कोशिश करो, मैं विकास दुबे की नहीं, विकास यादव से बात कराने के लिए कह रहा हूं।  अब तक मेरी नींद काफूर हो चुकी थी। मैंने कहा-भलेमानस, कहां से बोल रहे हो? उसने कहा- अलीगढ़ के सिकंदरपुर से। विकास यादव से जरूरी बात करनी है। मैंने कहा, जाओ, आंख-मुंह धोकर ठंडा पानी पीओ और फिर अच्छे से नंबर देखकर दुबारा फोन मिलाओ। ...और इस तरह उससे विदा लेने के बाद मैंने सोचा कि नींद तो इसने उड़ा ही दी। अब मैं भी कुछ नाश्ता-पानी का जुगाड़ करूं।

इससे याद आया। 14-15 साल की बात है। दोपहर में खाना खाकर सोया था कि किसी महिला का फोन आया। श्रीमती ने फोन उठाया तो उधर से कोई महिला जीजाजी से बात कराने के लिए कह रही थी। अब किसी पुरुष के जीजाजी होने की तस्दीक पत्नी से बेहतर कौन कर सकता है। सो श्रीमती जी ने रॉन्ग नंबर कहकर मना कर दिया। लेकिन दुबारा-तिबारा वह रिंग करती रही और श्रीमती जी बार-बार मना करती रहीं। इस दौरान झल्लाहट की वजह से श्रीमती जी की आवाज का वॉल्यूम बढ़ जाने के कारण मेरी भी नींद खुल गई। पूछने के बाद माजरा समझ में आता तब तक फिर मोबाइल की घंटी बजने लगी। मैंने खुद कॉल रिसीव कर समझाने की कोशिश करनी चाही तो वह दक्षिण भारतीय महिला टूटी-फूटी हिंदी में मुझे ही कहने लगी, जीजाजी, आप झूठ बोल रहे हो। फोन ही नहीं उठाते हो।  बात नहीं करना चाहते। क्या बताऊं साहब, कैसे पिंड छुड़ा पाया। स्मार्ट फोन आने के बाद ट्रू कॉलर की सुविधा होने के बाद कॉल करने के बारे में पता चल जाता है, लेकिन क्या बताऊं, फीचर फोन से अपना पुराना नाता है और बात करने के लिए अमूमन मैं उसे ही उपयोग में लेता हूं।  संयोग ही कहें कि आज ही अमर उजाला में खबर देखी-स्मार्टफोन में जल्द बदल जाएंगे सभी फीचर फोन...तो उम्मीद जगी कि शायद आने वाले दिनों में रॉन्ग नंबर की परेशानी खत्म हो जाए...मगर अफसोस इसके साथ वर्षों से हमारा साथ निभा रहा फीचर फोन भी पेजर और टेलीग्राम की तरह अतीत की बात बन जाएगा।