Sunday, May 1, 2011

सिर्फ एक प्रतिशत...

राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण समिति की ओर से झालाना स्थित राज्य संदर्भ केंद्र परिसर में पिछले दिनों 'जापान की आपदा : हमारी विपदाÓ विषयक संगोष्ठी आयोजित की गई। जापानी लेखिका तोमोको किकुचि, प्रसिद्ध लेखिका डॉ. राज बुद्धिराजा, डॉ. डी. आर. मेहता आदि ने संबोधित किया। इस अवसर पर प्रौढ़ शिक्षण समिति और प्राकृत भारती की ओर से प्रकाशित पुस्तक 'जापान की आपदा : हमारी विपदाÓ और पोस्टर 'धरती की चिंताÓ का लोकार्पण किया गया। संगोष्ठी के अंत में समिति की सचिव डॉ. अंजू ढढ्ढा मिश्र ने संकल्प पत्र प्रस्तुत किया। प्रस्तुत है संकल्प पत्र :

जापान के निवासियों पर गुजरी हृदय विदारक विभीषिका में हम सबकी संवेदना वहां के निवासियों के साथ है। इस भयंकर दुर्घटना से जूझने में जापान के निवासियों ने जिस सामथ्र्य, साहस और संयम का परिचय दिया है, वह दुनिया में एक सराहनीय मिसाल बन गया है। आइए, इसी आत्मबल का प्रयोग हम ऐसी विभीषिकाओं की संभावनाओं से लडऩे में करें, जिससे ऐसी स्थिति दुनिया को दोबारा न झेलनी पड़े।
दुनिया के ऊर्जा उत्पाद का जितना भाग आणविक ऊर्जा से प्राप्त होता है, उतना हम अपने आत्मबल से सहज ही बता सकते हैं। आइए, प्रतिज्ञा करें कि हम अपने जीवन, घर, संस्थान जहां भी हैं, वहां संसाधनों का दोहन सिर्फ एक प्रतिशत कम कर लें। हमारी यह छोटी सी चेष्टा दुनिया के वंचितों को उनके जीवन यापन के साधन मुहैया कराने के साथ ही हमें पर्यावरण संबंधी खतरों से मुक्त करा सकती है।

Friday, April 1, 2011

'अभिमन्युओंÓ का बलिदान लेता रहेगा जमाना

आज सुबह से ही मन खिन्न है, उदास है। पत्नी और बेटा बार-बार कारण पूछते रहे, लेकिन क्या बताता उनसे, ऐसा लगता है जैसे शब्द बेमानी हो गए हों। आजीविका के कारण मां-बाबूजी, घर-गांव-समाज, मित्र मंडली बहुत कुछ पीछे छूट गया, लेकिन किसी न किसी रूप में उनसे जुड़े रहने की कोशिश नहीं छोड़ी। पहले पत्र लिखता था, लेकिन जब प्रत्युत्तर आने बंद हो गए, तो धीरे-धीरे मेरा पत्रलेखन भी दम तोड़ चला। अब मोबाइल का युग है और उसी के सहारे संबंधों का सेतु बनाने का भरसक प्रयत्न करता हूं।
सुबह घर फोन किया तो मां के स्वर में उदासी थी। कई तरह की शंकाएं मन में तैरने लगीं। मैं चिंतित न होऊं, इसलिए मां कई बार मुझसे अपनी परेशानियों को साझा नहीं करतीं। बार-बार पूछने पर उन्होंने बताया कि पड़ोस का एक युवक सड़क हादसे में असमय काल के गाल में समा गया। वह बस कंडक्टर था और छुट्टी के दौरान गांव में ही कहीं जा रहा था कि किसी अज्ञात वाहन ने उसे टक्कर मार दी थी। उसका चेहरा सामने घूमने लगा। संयोगवश पिछली बार गांव की यात्रा के दौरान उसी की बस से गांव से पटना आया था। उसने बस लेकर अजमेर शरीफ आने पर जयपुर में मुझसे मिलने की बात कही थी, लेकिन उसकी यह इच्छा अधूरी ही रह गई।
मां ने एक और हादसे की सूचना दी। अपनी बेरोजगारी के दिनों में गांव के एक सज्जन बचपन में मुझे ट्यूशन पढ़ाया करते थे। अब शिक्षक की नौकरी से सेवानिवृत्त होकर गांव में ही रह रहे हैं। उनका पुत्र जो शायद गांव के ही स्कूल में शिक्षा मित्र या शिक्षक के पद पर कार्यरत था, वह भी अज्ञात वाहन की चपेट में आ गया। दोनों ही हादसे में मृतक मोटरसाइकिल से ही कहीं जा रहे थे। मोटरसाइकिल की स्पीड कितनी थी या किसकी गलती से हादसा हुआ, यह बताने वाला कोई नहीं है, क्योंकि दोनों ही हादसे ऐसी जगहों पर हुए, जहां सड़क किनारे बाग-बगीचे, खेत आदि ही हैं। ऐसे में कौन किसे दोषी ठहराए, लेकिन इन युवकों के मां-बाप, पत्नी, मासूम बच्चों व अन्य परिजनों को ढाढस बंधाने के लिए किसी के पास शब्द नहीं हैं।
बदलते हुए जमाने के साथ समय की कमी और अधिक गति की चाहत के कारण मोटरसाइकिल की ख्वाहिश अब विलासिता की बजाय जरूरत बनती जा रही है। इसके बावजूद गांव-देहात में हैलमेट नहीं पहनने का चलन भी जीवन पर भारी पड़ रहा है। शहरों की तरह सरकार को गांवों में भी दुपहिया वाहन चालकों के लिए हैलमेट पहनने की अनिवार्यता पर सख्ती करनी चाहिए अन्यथा यूं ही हादसे इन 'अभिमन्युओंÓ का बलिदान लेते रहेंगे। हालांकि मौत सबसे बड़ा सच है और इसे झुठलाया नहीं जा सकता, लेकिन जब यह इस तरह आती है तो समझना-समझाना मुश्किल हो ही जाता है।

Wednesday, March 23, 2011

पटरी पर ही निबटेंगे...

जब से सृष्टि की शुरुआत हुई है, तभी से शाश्वत सत्य की तरह प्रवृत्ति और निवृत्ति की परंपरा भी शुरू हो गई। सद्ग्रंथों से लेकर महापुरुषों तक ने समय-समय पर विभिन्न प्रसंगों में इसकी व्याख्या की, लेकिन यहां मेरा उद्देश्य उन उपदेशों की पुनरावृत्ति करना नहीं है। मैं तो सामान्य से मानव प्रवृत्ति की बात कर रहा हूं। पेट भरने की समस्या जितनी ज्वलंत है, शारीरिक प्रक्रिया उसी हिसाब से इसे खाली करने में यदि सक्षम नहीं हो तो आदमी को कई सारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। आज यदि हमारे देश में लाखों लोग पेट नहीं भर पाने की समस्या से ग्रसित हैं तो हजारों लोग ऐसे भी हैं जो समय से पेट खाली नहीं होने के कारण वैद्यों-डॉक्टरों की शरण में जाकर भांति-भांति की चूरण-चटनी-पाचक का सेवन करने को बाध्य हैं। मन मुताबिक भोजन मिलने से जितनी संतुष्टि होती है, सुबह-सुबह बिना किसी रुकावट फारिग होने से होने वाला सुख भी उससे कम नहीं होता।
तो बात फिर वहीं आती है कि सृष्टि की शुरुआत से ही पेट भरने के साथ ही निबटना भी मूलभूत आवश्यकताओं में से एक रही है। भारत गांवों का देश है, तो जाहिर सी बात है कि सभी गांवों में दशकों पहले शौचालय नहीं थे, आज भी हजारों गांवों में शौचालय नहीं हैं। शौचालय की सुविधा हो न हो, निबटना तो पड़ेगा ही, सो आदमी ने अपनी सुविधा के हिसाब से विकल्प चुनने शुरू किए होंगे। खेतों से लेकर जंगल तक को उसने निबटने का आश्रय स्थल बनाया। सभ्यता के विकास के साथ पगडंडियां जब कच्ची सड़कों में तब्दील हुई होंगी तो उसके किनारे भी विकल्प के रूप में मनुष्य के सामने आए और उसने इसे बखूबी अपनाया और आज पक्की सड़कों, जीटी रोड, चमचमाती फोर लेन सड़कों के किनारे भी सुबह-शाम निबटने वालों की परेड आसानी से दृष्टिगोचर हो जाते हैं।
अंग्रेजों ने सोने की चिडिय़ा समझकर भारत को भले ही खूब लूटा, लेकिन कई मायनों में उन्होंने विकास का मार्ग भी प्रशस्त किया। इसी कड़ी में वर्ष 1853 में भारत में पहली रेलगाड़ी चली। रेलगाड़ी चलने से पहले पटरी बिछाई गई और देशवासियों ने ट्रेन का सफर शुरू करने से पहले पटरी के किनारे या पटरी पर बैठकर निबटने का अपना मौलिक कर्तव्य निभाया। बदलते हुए समय के साथ बाकी सब कुछ बदल गया हो, लेकिन यह परंपरा आज भी सुदूर गांव-देहात से लेकर बड़े-बड़े महानगरों तक बखूबी जारी है।
रेल की दोनों पटरी भले ही अलग-अलग चलती हों, लेकिन वे मुसाफिर को उसके गंतव्य तक पहुंचा देती हैं। इसी से साहित्यकारों-व्याकरणाचार्यों ने पटरी बिठाने की बात कही।
भारत में जब स्वतंत्रता संग्राम लड़ा जा रहा था, तब अंग्रेजों का राज था और सात समंदर पार बैठी ब्रिटिश शासन व्यवस्था की कमर तोडऩे के लिए हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने रेल की पटरियां उखाड़ीं। भले ही देश स्वतंत्र हो गया, लेकिन तथाकथित आंदोलनकारी आज भी रेल यातायात बाधित करने से ही अपने संघर्ष की शुरुआत करते हैं। हमारे शासकों में भी अब इतना दमखम नहीं बचा कि वे इन आंदोलनकारियों से निबटने की माकूल योजना बना सकें। गुर्जरों ने आरक्षण के लिए राजस्थान में कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला के नेतृत्व में रेल की पटरी पर पड़ाव डाला। कई चरणों में हुए इस आंदोलन में उन्हें कुछ उपलब्धि भी मिली और इसका प्रतिफल यह हुआ कि पटरी पर पड़ाव डालना आज रोल मॉडल हो गया है। गुर्जरों के बाद अब जाट समुदाय कई सप्ताह से पटरियों पर रास्ता रोककर बैठा है। सैकड़ों ट्रेनें रोज रद्द हो रही हैं, सैकड़ों को रूट डायवर्ट कर चलाया जा रहा है। इससे हजारों-लाखों यात्रियों को जो परेशानी हो रही है, वह तो है ही, रेलवे को भी प्रतिदिन करोड़ों का नुकसान हो रहा है, लेकिन जाट हैं कि एक ही रट लगाए बैठे हैं...आरक्षण के मसले पर पटरी पर ही निबटेंगे। देखते हैं देश के तथाकथित कर्ता-धर्ता कब तक शेष देशवासियों, विशेषकर रेलयात्रियों की राह कब तक सुगम कर पाते हैं। काश! किसी राजनीतिक दल में यह हिम्मत होती या सभी राजनीतिक दल मिलकर आरक्षण की इस अमरबेल को मिटाने का साहस दिखा पाते जो हमारे देश की प्रतिभा की जड़ों को खोखला कर रही है।

Friday, January 14, 2011

तिलकुट भरबे : मकर संक्रांति पर कर्तव्य निभाने का वादा

आज यानी 14 जनवरी को परंपरागत रूप से देशभर में मकर संक्रांति का त्योहार मनाया गया। वर्षों से यह पर्व नियत तारीख यानी 14 जनवरी को मनाया जाता है। हां, कभी-कभी हिंदी तिथियों में घट-बढ़ या अन्य कारणों से 15 जनवरी को भी लोग मकर संक्रांति का पर्व मनाते हैं। हिंदी पंचांगों के जानकारों के अनुसार इस बार भी दान-पुण्य के लिए 15 जनवरी ही श्रेष्ठतर रहेगा, इसके बावजूद मकर संक्रांति का उल्लास तो 14 जनवरी को ही दिखा।
विशाल भारत देश की विस्तृत भौगोलिक बसावट के साथ ही धार्मिक-सांस्कृतिक मान्यताएं और परंपराएं भी प्रत्येक 200-400 किलोमीटर के बाद बदल जाया करती हैं, सो लोगों ने अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुसार यह पर्व मनाया। पैतृक गांव से दूर रहते हुए आज बरबस ही मकर संक्रांति की बिहार से जुड़ी यादें मानस पटल पर छा गईं। पूस-माघ की तेज सर्दी के बावजूद सभी भाई-बहनों में सुबह सबसे पहले नहाने की होड़ सी मच जाती थी, जैसे कोई मैडल मिलने वाला हो। इसके बाद दादीजी एक कटोरी में भीगा हुआ चावल-तिल और गुड़ लेकर आतीं और एक-एक कर सबकी हथेली पर देकर पूछतीं-तिलकुट भरबे? उनके सिखाए अनुसार ही जवाब में हम 'हांÓ कहते। यह क्रम वे तीन बार दुहरातीं। जब थोड़ी चेतना जगी तो मां से इसके बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि इसका मतलब है कि जब वे बूढ़ी होंगी, बीमार होंगी तो उनकी सेवा और उनकी मृत्यु के बाद उनकी मुक्ति के लिए श्राद्ध-तर्पण आदि करने का वादा करना। दादीजी तो नहीं रहीं और पहले अध्ययन और आजीविका के सिलसिले में गांव छूट गया, लेकिन अब मोबाइल फोन ने मां के प्रति अपना वादा निभाने का एक अवसर उपलब्ध कराया है, ताकि उन्हें अपनी ओर से आश्वस्त कर सकूं। पिछले कई वर्षों से यह सिलसिला चल रहा है। मकर संक्रांति के दिन स्नान-पूजा के बाद सबसे पहले घर फोन करता हूं। सबसे पहले वे यही पूछती हैं-तिलकुट भरबे? और यह सिलसिला पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहेगा और संतानें अपनी जन्मदात्री के प्रति अपना कर्तव्य निर्वहन की सीख लेती रहेंगी। नमन उन महापुरुषों को जिन्होंने इस परंपरा की शुरुआत की।

Friday, December 10, 2010

घरेलू नौकरों के अपराध : दोषी कौन?

दास और गुलाम प्रथा के विरोध में न जाने विश्व में कितने आंदोलन हुए, लेकिन आजादी के छह दशक बीतने के बाद भी भारत में लाखों लोग घरेलू नौकर के रूप में पशुओं से भी बदतर जीवन जीने को विवश हैं। मानवाधिकार दिवस पर शुक्रवार को देशभर में आयोजित कार्यक्रमों में मानवाधिकार विशेषज्ञों, मानव मात्र के पैरोकारों और बुद्धिजीवियों ने मानवाधिकार की रक्षा के बारे में बड़ी-बड़ी बातें कीं। ऐसा होना भी चाहिए। आखिर आदमी ही तो आदमी के काम आता है। इसलिए मानवाधिकारों के हनन पर चिंता जताया जाना भी चाहिए।
मैं यहां दूसरे मुद्दे पर मुखातिब हूं और मेरा मानना है कि इस मुद्दे पर भी बात की जानी चाहिए। आए दिनों मीडिया में घरेलू नौकरों की ओर से किए जाने वाले अपराधों की खबरें आती रहती हैं। इनमें एकमत से किस्मत के मारे इन नौकरों को अविश्वसनीय, बेईमान, गद्दार, मौकापरस्त आदि विशेषणों से विभूषित किया जाता है। कोई भी यह सोचने की जुर्रत नहीं करता कि आखिरकार कौन से हालात उस बालक, किशोर या युवा को घरेलू नौकरी करने पर विवश करते हैं और किसी घर में नौकरी करते हुए एक लंबी अवधि बिताने के बाद वह क्योंकर अपराध करता है। जहां तक मैं समझता हूं, इन घरेलू नौकरों के साथ कहीं भी (अपवादस्वरूप दो-चार प्रतिशत को छोड़कर) अपनापन का व्यवहार नहीं किया जाता। आजकल तो बड़े घरानों में श्वान भी राजसी ठाठ से जीते हैं और उनकी देखरेख के लिए नियुक्त नौकर कुत्तों से भी बदतर जीवन जीने को बाध्य होते हैं।
घरेलू नौकर इन बड़ी अट्टालिकाओं में मालिकों को लाखों-करोड़ों में खेलते देखता है। मजबूरी के मारे कभी वह मालिक से अपनी तनख्वाह बढ़ाने की गुजारिश करता है तो उसे सिरे से नकार दिया जाता है। मालिकों के लिए भांति-भांति के व्यंजन बनाने वाले नौकर को अक्सर बासी, जूठे और बचे-खुचे भोजन से ही अपना पेट भरना होता है। ऐसे में कई बार उनकी सहनशक्ति जवाब दे जाती है और वे मालिकों से मुक्ति पाने या फिर उनके समकक्ष आने के लिए मौका देखकर अपराधों को अंजाम दे देते हैं।
चूंकि यह कदम भावावेश में उठाया गया होता है और पुलिस से बचने की तिकड़मों से अनजान ये बेचारे शीघ्र ही गिरफ्त में भी आ जाते हैं। इसके बाद इनकी यातना का दौर शुरू होता है। इनकी पीड़ा सुनने वाला कोई नहीं होता और न ही ये वकीलों के जरिये अदालत में अपना पक्ष रख पाते। अपराधियों को दंड देने का मैं कतई विरोध नहीं करता, लेकिन यह अपराध को मिटाने का उपाय नहीं है। ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए, जिसमें किसी के अपराधी बनने के मूल कारणों को खोजा जाए और उसे सुधारने के पर्याप्त अवसर दिए जाएं। उसे रोजगारोन्मुखी शिक्षण-प्रशिक्षण देकर उसके पुनर्वास के समुचित प्रयास किए जाएं। हां, इतना अवश्य किया जा सकता है कि पुलिस ऐसे लोगों की गतिविधियों पर लगातार नजर रखे और यदि कोई दुबारा अपराध की ओर अग्रसर हो तो उसके खिलाफ दंडात्मक रवैया अपनाया जाए। कुल मिलाकर जनकल्याणकारी सरकार का कर्तव्य अपराधियों को मिटाना नहीं, बल्कि अपराध को मिटाना ही होना चाहिए। हां, संगठित अपराधों के प्रति सरकार को किसी तरह की नरमी नहीं बरतनी चाहिए।

Wednesday, November 24, 2010

बिहार ने विकास को चुना


बिहार विधानसभा के लिए छह चरणों में करीब डेढ़ माह तक चली चुनाव प्रक्रिया की पूर्णाहुति बुधवार को हुई। बिहार के मतदाताओं ने एकमत से जद (यू)-भाजपा गठबंधन के पिछले पांच साल के दौरान किए गए कामकाज पर मुहर लगा दी और यह मुहर भी ऐसी कि प्रतिपक्ष का सारा गणित ही गड़बड़ा गया। चुनाव प्रचार के दौरान सोनिया-राहुल-मनमोहन समेत कांग्रेस के दिग्गजों के आरोपों और केंद्र सरकार की ओर से दी गई सहायता को सूबे के विकास में नहीं लगाने तथा अन्य आरोपों का नीतीश ने जिस शालीनता के साथ जवाब दिया, जनता शायद उससे रीझ सी गई। यही नहीं, लालू यादव-रामविलास पासवान भी अपनी आक्रामक शैली में राजग गठबंधन पर अनर्गल प्रलाप से कतई बाज नहीं आ रहे थे, लेकिन नीतीश कुमार ने न तो कभी अपना आपा खोया और न ही सलीका छोड़ा।
देश के राजनीतिक गलियारे में जैसा कि प्रचलित है, जिस धरती पर लोकतंत्र ने पहली सांसें लीं, जातिवाद का जहर भी सबसे अधिक उसी को भुगतना पड़ा, लेकिन इस चुनाव में बिहार ने इस कलंक को काफी हद तक धो डाला। तथाकथित कई बाहुबलियों और दिग्गजों की ऐसी भद्द पिटी कि इससे उबरने में उन्हें बरसों लग जाएंगे। लालू प्रणीत राजद के पंद्रह साल के शासन के दौरान बिहार की जनता ने प्रदेश की जो दुर्गति देखी थी, वे जद (यू)-भाजपा गठबंधन सरकार के पांच साल के कार्यकाल में हुए विकास कार्यों से सहज ही अभिभूत थे।
उन्हें लग रहा था कि विकास के इस पहिये को यदि गतिमान रखना है तो इस गठबंधन को एक और अवसर देना ही होगा। सुशासन के रथ को अग्रसर करने के लिए सारथि को बदलना कदापि बुद्धिमानी नहीं होती, जिसे बिहार के मतदाताओं ने अच्छी तरह समझा। लालू के राज में बिहारवासियों की पहचान ऐसी बन गई थी जो लालू रूपी जमूरे से परेशान होने के बावजूद चुनाव आने पर उसके इशारों पर करतब दिखाने (वोट देकर उसे दुबारा सत्तासीन करने) की मूर्खता करने को विवश था। इस चुनाव परिणाम ने उस पहचान से भी बिहारवासियों को मुक्ति दिलाई है। हां, चुनावी सभाओं के दौरान जनता ने लालू के मसखरेपन का भरपूर मजा लिया, जिससे लालू-रामविलास का मुगालता बना रहा, लेकिन बेहद चतुराई से जनता ने इसे वोट में परिणत नहीं होने दिया।
कांग्रेस का हश्र तो यही होना था
देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से अब तक चार दशक से अधिक समय तक कांग्रेस का एकछत्र राज रहा था और इसी अवधि में धीरे-धीरे बिहार पतन की ओर अग्रसर होता चला गया। श्रीकृष्ण सिंह के अलावा एक भी मुख्यमंत्री नहीं हुआ, जिसे बिहार में विकास कार्यों के लिए याद किया जाए। बिहार की जनता कांग्रेस को गांधी बाबा की पार्टी समझकर वोट देती रही और कांग्रेस ने इसे अपनी जागीर समझ लिया और सत्ता-लिप्ता में डूबे उसके आकाओं ने जनता को ही भुला दिया। लंबे समय तक किसी को बेवकूफ बनाना सर्वथा असंभव है, सो बिहार की वर्तमान पीढ़ी ने इस सत्य को समझ लिया कि कांग्रेस तो कब की गांधी को ही भूलकर भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी हुई है तो फिर इसे परे झटकना ही श्रेयस्कर है।
विकास पुरुष बने रहेंगे आदर्श
नई पीढ़ी के मतदाता अपना हित-अहित अच्छी तरह समझते हैं। इन्हें मंडल-कमंडल, जाति-संप्रदाय के भुलावों से नहीं बहलाया जा सकता। जो अच्छे काम करेगा, वही राज करेगा। इसका प्रमाण सबसे पहले नरेंद्र मोदी ने दिया जो नॉन बीजेपी सभी दलों के सामूहिक प्रयासों के बावजूद तीन विधानसभा चुनावों से अपना परचम लहराए हुए हैं। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान, छत्तीसगढ़ में रमण सिंह, उड़ीसा में नवीन पटनायक आदि को विकास कार्यों की बदौलत ही जनता ने पंचवर्षीय परीक्षा में सौ में से सौ अंक दिए। जनता को चाहिए काम, काम और बस काम....और ऐसा नहीं करने वालों का मिट जाएगा नाम।
जनता को लगी अपनी जीत
चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में नीतीश कुमार ने इसे जनता की जीत बताया और जनता ने भी इसे अपनी जीत समझा। बिहार से बाहर रह रहे बिहार के लोग चुनाव परिणाम देखने के लिए सुबह से ही टेलीविजन के सामने बैठ गए थे और हर कोई बिहार स्थित अपने सगे-संबंधियों और मित्रों से फोन कर अपने गृह जिले के परिणाम को जानने को उत्सुक था। दोपहर बाद जब जद (यू)-भाजपा गठबंधन को आशातीत सफलता की पुष्टि हो गई तो एक-दूसरे को बधाई देने का सिलसिला शुरू हो गया। हर किसी को यही लग रहा था जैसे वह खुद जीत गया हो।

Thursday, November 4, 2010

लीपने से विहंस उठता था आंगन


अपने देश में भले ही बड़ी-बड़ी आवासीय अट्टालिकाएं और व्यावसायिक कॉम्पलेक्स बन चुके हैं, इसके बावजूद सचाई यह है कि भारत की आत्मा आज भी गांवों में ही बसती है। बात दीगर है कि सबको पेट भरने वाले अन्नदाता किसान ही दो वक्त की रोटी के लिए मोहताज हैं। खैर, अभी त्योहार का माहौल है और ऐसी गंभीर बातें करने का मेरा भी इरादा नहीं है, लेकिन इसे नकारा भी नहीं जा सकता।
मैं दिवाली की पूर्व संध्या पर आपसे अपनी पुरानी यादें शेयर करने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूं। श्रीमतीजी कई दिनों से यथाशक्ति घर की साफ-सफाई में लगी हैं और मन ही मन हाथ न बंटाने के लिए मुझे कोसने से भी बाज नहीं आतीं।
गुलाबी नगर में लोगों ने एक-डेढ़ महीने पहले से घरों में रंग-रोगन का काम शुरू करवा दिया था और अब उन पर चीन से आई सस्ती बिजली की लड़ियां जगमगा रही हैं। इन घरों की आभा आंखों को भाती जरूर है, लेकिन उस उल्लास का उत्स कहीं नहीं दिखता। गांवों में ऐसे पर्व-त्योहारों पर घर-आंगन को गोबर से लीपा जाता है, तो उसे देखकर लगता है जैसे आंगन विहंस उठा हो। उसकी चमक और महक अतुलनीय होती है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के शब्दों में कहूं तो---चमन में फूल खिलते हैं, वन में हंसते हैं।--तो मुझे भी कुछ ऐसी ही अनुभूति इस महानगर में होती है। लगता है बहुत कुछ पीछे छूट गया है, जिसे चाहकर भी साथ में सहेजकर नहीं रखा जा सकता। हां, यादें हैं तो सांसों के साथ अंतिम समय तक बनी रहेंगी।
सभी ब्लॉगर साथियों को इन शब्दों में ज्योतिपर्व दीपावली की मंगलकामनाएं----------

फैले यश का उजास
पूरे हों सकल आस
इस बार की दिवाली
आपके लिए हो खास....
आप सब पर मां महालक्ष्मी की कृपा बनी रहे।