आज शीतलाष्टमी थी। शीतलाष्टमी से एक दिन पहले घरों में पुए-पुड़ियां और अन्य पकवान बनाए जाते हैं, जिन्हें अगले दिन शीतला माता को भोग लगाया जाता है। बाद में घरों में लोग वही कल वाला बासी भोजन ही शीतलाष्टमी को खाते हैं। ऐसी मान्यता है कि शीतला माता की ऐसी पूजा-अर्चना से छोटी माता, चेचक आदि के प्रकोप से बचाव होता है और माताजी की कृपा भक्तों पर बनी रहती है।
मुझे भी किसी मित्र से मिलने के लिए सुबह निकलना था, सो करीब साढ़े आठ बजे नहा-धोकर कॉलोनी के मंदिर पहुंचा। इस मंदिर में देवताओं में अच्छा सद्भाव है। पंचेश्वर महादेव मंदिर में शिव पंचायत के अलावा राधा-कृष्ण, मां दुरगा, हनुमानजी, नवग्रह, संतोषी माता, गणेशजी और शीतला माता की प्रतिमाएं स्थापित हैं। मंदिर से पहले वाले चौराहे पर पुए-पकवानों का ढेर लगा था और पूजा के बाद उस पर पानी डाल देने से उसकी दुरगति हो रही थी। मंदिर पहुंचा तो वहां चौराहे से भी बड़ा ढेर था और भी स्वादिष्ट पकवानों की ऐसी ही दुरगति हो रही थी। जब तथाकथित मित्र के यहां गया तो रास्ते में भी अनेक चौराहों पर इस तरह स्वादिष्ट पकवानों को देखकर आत्मा रो उठी।
किसी की आस्था से मेरी कोई शिकायत नहीं है, लेकिन आज भी जब हमारे आस-पड़ोस में ही सैकड़ों लोग भूखे रहने को विवश हैं, अन्न की ऐसी बरबादी से क्या हासिल होगा। माना, बरसों से ऐसी परंपरा चली आ रही है, लेकिन कोई ऐसा भी रास्ता तो निकाला ही जा सकता है जिससे अन्न की बरबादी न होने पाए। प्रतीक रूप में एकाध ग्रास शीतला माता के नाम पर निकालने के बाद यह खाद्य सामग्री किसी अनाथालय, कुष्ठाश्रम, मंदिरों के बाहर बैठे भिखारियों को वितरित की जा सकती है। मुझे नहीं लगता ऐसा करने से किसी का अहित होगा। यह भी सत्य है कि इससे कोई शीतला माता का कोपभाजन भी नहीं बनेगा।
कभी पढ़ा था-`युगरूपेण ही ब्राह्मणः ` यानी ब्राह्मणों को युग धर्म के अनुसार आचरण करना चाहिए। इतिहास में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो सतीप्रथा जैसी कुप्रथाओं का उन्मूलन नहीं हो पाता। ऐसा सुनते हैं कि बिहार-बंगाल-नेपाल के गांवों में पहले दुरगा पूजा के समय बकरे और भैंसे की बलि दी जाती थी, लेकिन आज प्रतीक रूप में फलों की बलि दी जाती है और भक्तों के सभी अरमान इसी से पूरे होते हैं, किसी पर माता का कोई प्रकोप नहीं होता।
आशा है आने वाले समय में लोग सीख लेंगे और अनाज का अनादर करने के बजाय इसे इसके योग्य पात्र तक पहुंचाकर अपना जीवन कृतार्थ करेंगे। इंसान भूखे, देवताओं को आफरा
आज शीतलाष्टमी थी। शीतलाष्टमी से एक दिन पहले घरों में पुए-पुड़ियां और अन्य पकवान बनाए जाते हैं, जिन्हें अगले दिन शीतला माता को भोग लगाया जाता है। बाद में घरों में लोग वही कल वाला बासी भोजन ही शीतलाष्टमी को खाते हैं। ऐसी मान्यता है कि शीतला माता की ऐसी पूजा-अर्चना से छोटी माता, चेचक आदि के प्रकोप से बचाव होता है और माताजी की कृपा भक्तों पर बनी रहती है।
मुझे भी किसी मित्र से मिलने के लिए सुबह निकलना था, सो करीब साढ़े आठ बजे नहा-धोकर कॉलोनी के मंदिर पहुंचा। इस मंदिर में देवताओं में अच्छा सद्भाव है। पंचेश्वर महादेव मंदिर में शिव पंचायत के अलावा राधा-कृष्ण, मां दुरगा, हनुमानजी, नवग्रह, संतोषी माता, गणेशजी और शीतला माता की प्रतिमाएं स्थापित हैं। मंदिर से पहले वाले चौराहे पर पुए-पकवानों का ढेर लगा था और पूजा के बाद उस पर पानी डाल देने से उसकी दुरगति हो रही थी। मंदिर पहुंचा तो वहां चौराहे से भी बड़ा ढेर था और भी स्वादिष्ट पकवानों की ऐसी ही दुरगति हो रही थी। जब तथाकथित मित्र के यहां गया तो रास्ते में भी अनेक चौराहों पर इस तरह स्वादिष्ट पकवानों को देखकर आत्मा रो उठी।
किसी की आस्था से मेरी कोई शिकायत नहीं है, लेकिन आज भी जब हमारे आस-पड़ोस में ही सैकड़ों लोग भूखे रहने को विवश हैं, अन्न की ऐसी बरबादी से क्या हासिल होगा। माना, बरसों से ऐसी परंपरा चली आ रही है, लेकिन कोई ऐसा भी रास्ता तो निकाला ही जा सकता है जिससे अन्न की बरबादी न होने पाए। प्रतीक रूप में एकाध ग्रास शीतला माता के नाम पर निकालने के बाद यह खाद्य सामग्री किसी अनाथालय, कुष्ठाश्रम, मंदिरों के बाहर बैठे भिखारियों को वितरित की जा सकती है। मुझे नहीं लगता ऐसा करने से किसी का अहित होगा। यह भी सत्य है कि इससे कोई शीतला माता का कोपभाजन भी नहीं बनेगा।
कभी पढ़ा था-`युगरूपेण ही ब्राह्मणः ` यानी ब्राह्मणों को युग धर्म के अनुसार आचरण करना चाहिए। इतिहास में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो सतीप्रथा जैसी कुप्रथाओं का उन्मूलन नहीं हो पाता। ऐसा सुनते हैं कि बिहार-बंगाल-नेपाल के गांवों में पहले दुरगा पूजा के समय बकरे और भैंसे की बलि दी जाती थी, लेकिन आज प्रतीक रूप में फलों की बलि दी जाती है और भक्तों के सभी अरमान इसी से पूरे होते हैं, किसी पर माता का कोई प्रकोप नहीं होता।
आशा है आने वाले समय में लोग सीख लेंगे और अनाज का अनादर करने के बजाय इसे इसके योग्य पात्र तक पहुंचाकर अपना जीवन कृतार्थ करेंगे। इंसान भूखे, देवताओं को आफरा
आज शीतलाष्टमी थी। शीतलाष्टमी से एक दिन पहले घरों में पुए-पुड़ियां और अन्य पकवान बनाए जाते हैं, जिन्हें अगले दिन शीतला माता को भोग लगाया जाता है। बाद में घरों में लोग वही कल वाला बासी भोजन ही शीतलाष्टमी को खाते हैं। ऐसी मान्यता है कि शीतला माता की ऐसी पूजा-अर्चना से छोटी माता, चेचक आदि के प्रकोप से बचाव होता है और माताजी की कृपा भक्तों पर बनी रहती है।
मुझे भी किसी मित्र से मिलने के लिए सुबह निकलना था, सो करीब साढ़े आठ बजे नहा-धोकर कॉलोनी के मंदिर पहुंचा। इस मंदिर में देवताओं में अच्छा सद्भाव है। पंचेश्वर महादेव मंदिर में शिव पंचायत के अलावा राधा-कृष्ण, मां दुरगा, हनुमानजी, नवग्रह, संतोषी माता, गणेशजी और शीतला माता की प्रतिमाएं स्थापित हैं। मंदिर से पहले वाले चौराहे पर पुए-पकवानों का ढेर लगा था और पूजा के बाद उस पर पानी डाल देने से उसकी दुरगति हो रही थी। मंदिर पहुंचा तो वहां चौराहे से भी बड़ा ढेर था और भी स्वादिष्ट पकवानों की ऐसी ही दुरगति हो रही थी। जब तथाकथित मित्र के यहां गया तो रास्ते में भी अनेक चौराहों पर इस तरह स्वादिष्ट पकवानों को देखकर आत्मा रो उठी।
किसी की आस्था से मेरी कोई शिकायत नहीं है, लेकिन आज भी जब हमारे आस-पड़ोस में ही सैकड़ों लोग भूखे रहने को विवश हैं, अन्न की ऐसी बरबादी से क्या हासिल होगा। माना, बरसों से ऐसी परंपरा चली आ रही है, लेकिन कोई ऐसा भी रास्ता तो निकाला ही जा सकता है जिससे अन्न की बरबादी न होने पाए। प्रतीक रूप में एकाध ग्रास शीतला माता के नाम पर निकालने के बाद यह खाद्य सामग्री किसी अनाथालय, कुष्ठाश्रम, मंदिरों के बाहर बैठे भिखारियों को वितरित की जा सकती है। मुझे नहीं लगता ऐसा करने से किसी का अहित होगा। यह भी सत्य है कि इससे कोई शीतला माता का कोपभाजन भी नहीं बनेगा।
कभी पढ़ा था-`युगरूपेण ही ब्राह्मणः ` यानी ब्राह्मणों को युग धर्म के अनुसार आचरण करना चाहिए। इतिहास में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो सतीप्रथा जैसी कुप्रथाओं का उन्मूलन नहीं हो पाता। ऐसा सुनते हैं कि बिहार-बंगाल-नेपाल के गांवों में पहले दुरगा पूजा के समय बकरे और भैंसे की बलि दी जाती थी, लेकिन आज प्रतीक रूप में फलों की बलि दी जाती है और भक्तों के सभी अरमान इसी से पूरे होते हैं, किसी पर माता का कोई प्रकोप नहीं होता।
आशा है आने वाले समय में लोग सीख लेंगे और अनाज का अनादर करने के बजाय इसे इसके योग्य पात्र तक पहुंचाकर अपना जीवन कृतार्थ करेंगे।
डर को धूल चटाकर जीता आसमान
5 years ago