<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323</id><updated>2011-12-11T06:29:46.794-08:00</updated><category term='सोचें तो सही'/><category term='यादें बाकी'/><category term='तमन्ना'/><category term='मुरली ने बजाई मुरली'/><category term='शरद की पूनम'/><category term='झंडा ऊंचा रहे हमारा'/><category term='निवेदन'/><category term='कोसें नहीं'/><category term='नाटक'/><category term='जरा सोचिए'/><category term='आत्मनिवेदन'/><category term='शुभकामना'/><category term='सरोकार'/><title type='text'>दिल से दिल की बात</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><link rel='next' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default?start-index=101&amp;max-results=100'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>156</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-8843183120268148750</id><published>2011-12-01T04:26:00.001-08:00</published><updated>2011-12-01T04:27:09.216-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आत्मनिवेदन'/><title type='text'>'बड़की मायÓ के साथ एक युग का अवसान</title><content type='html'>आजकल बाबूजी का स्वास्थ्य कुछ ठीक नहीं चल रहा। नौकरी की अपनी मजबूरियां हैं कि चाहकर भी भौतिक दूरियां कम नहीं हो पा रहीं। हां, मन तो वहीं लगा रहता है, बाबूजी का हालचाल जानने के लिए फोन किया तो छोटा भाई घर से दूर कहीं खेत में मजदूरों से काम करवा रहा था। उसने बाबूजी के स्वास्थ्य में सुधार की सूचना दी तो मन को तसल्ली मिली लेकिन अगले ही पल उसने कहा-'बड़की माय नहीं रहींÓ। यह समाचार सुनते ही फ्लैश बैक में कई सारे दृश्य घूमने लगे। भला हो बाबूजी का जिनकी प्रेरणा से गत अगस्त में गृह प्रवास के दौरान ' बड़की मायÓ के अंतिम दर्शन का सौभाग्य मिल पाया। संयोग ऐसा कि साथ में मां-बाबूजी के साथ मेरा लंगोटिया यार अरविंद भी था जिसके साथ मैंने न जाने कितनी बार 'बड़की मायÓ के हाथों से बने व्यंजनों का लुत्फ उठाया होगा। &lt;br /&gt;आज जब पुरानी यादों को सहेजने बैठा हूं तो सब कुछ किसी काल्पनिक कहानी सा लगता है। मेरा गांव बिहार का नामी ब्राह्मण बहुल गांव है। हमारे पड़ोस में है धनकौल। दूरी महज इतनी कि हमारे खेतों के पार से थोड़ा आगे बढ़ो तो वहां पहुंच जाओ। उस गांव की सर्वाधिक महत्वपूर्ण हस्ती थे श्री योगेंद्र सिंह। मेरे गांव के लगभर हर परिवार के साथ उनका उठना-बैठना-अपनापा था। यूं कहें कि मेरे गांव में होने वाले आपसी विवादों के निबटारे में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका हुआ करती थी और इसमें उनका राजपूत होना कभी आड़े नहीं आता। सही मायने में वे मानव थे-महामानव। अक्सर शाम को वे नियम से पैदल ही हमारे गांव में आते और कभी हमारे दरवाजे पर तो पड़ोस में या फिर गांव में और कहीं उनकी महफिल सजती। लोग बैठकर दिनभर का हाल-ए-बयां करने के साथ ही अपनी परेशानियां भी आपस में बांटकर मन हल्का कर लेते थे। बहुत बचपन की बात करूं तो तब तक चाय का चलन शुरू नहीं हुआ था, सो खैनी और सुपारी से ही एक-दूसरे का स्वागत किया जाता था। चूंकि मेरे बाबूजी का नाम भी योगेंद्र मिश्र है और बिहार में ऐसी परंपरा है कि लोग अपने नाम वाले व्यक्ति को नाम लेकर नहीं पुकारते बल्कि आपस में एक-दूसरे को 'मीतÓ कहा करते हैं। सो बाबूजी भी उन्हें 'मीतÓ कहा करते थे और हम सभी भाई-बहन उन्हें 'बाबाÓ या 'धनकौल वाले बाबाÓ कहकर पुकारते थे। मेरे ताऊजी 'बाबाÓ के हमउम्र थे, लेकिन बाबूजी से भी उनकी अच्छी पटती थी। 'बाबाÓ के छोटे भाई श्री देवेंद्र सिंह हाई स्कूल में गणित के सिद्धहस्त शिक्षक थे और अंग्रेजी पर भी उनका अधिकार था। पढ़ाने का तरीका इतना सहज कि एक बार जो बता दिया वह कभी भूलता नहीं था। उन्हीं का आशीर्वाद था कि बीजगणित और त्रिकोणमिति के सवालों ने मुझे कभी परेशान नहीं किया।  &lt;br /&gt;खैर, बात 'बाबाÓ की दरियादिली की। उनका स्टेटस क्या था, इसका अंदाजा तो मुझे किशोरावस्था में भला क्या होना था, लेकिन एक बात थी कि अपनी कैसी भी परेशानी लेकर उनके शरण में जो भी आता, उसकी समस्या लौटते वक्त नहीं रहती थी। ऐसे में मैंने ' बड़की मायÓ के चेहरे पर भी कभी शिकन या शिकायत का भाव नहीं देखा। न जाने क्या हुआ कि जब मैं बीए में पढ़ रहा था, एक दिन खबर मिली कि डकैतों ने पीट-पीटकर 'बाबाÓ की हत्या कर दी। उसके बाद जब कभी उनके घर पर गया तो जैसे लगता था कि 'बाबाÓ के साथ ही उस घर के सारे संस्कार भी विदा हो गए। कुछ वर्षों बाद देवेंद्र बाबू भी नहीं रहे। इतना ही नहीं, हमारी पीढ़ी में भी सेंध लग गया और एक असाध्य बीमारी ने अवधेश भाई साहब को भी असमय हमसे छीन लिया। रही-सही यादें 'बड़की मायÓ के साथ जुड़ी थीं, लेकिन उनके परलोकगमन के साथ ही जैसे एक युग का अवसान हो गया। ईश्वर से यही प्रार्थना है कि इन पुण्यात्माओं को शांति प्रदान करे और आने वाली पीढ़ी में ऐसे संस्कार जिनसे लोगों को याद करने का चलन बना रह सके।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-8843183120268148750?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/8843183120268148750/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=8843183120268148750' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/8843183120268148750'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/8843183120268148750'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2011/12/o.html' title='&apos;बड़की मायÓ के साथ एक युग का अवसान'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-1861526209231683662</id><published>2011-11-16T04:44:00.000-08:00</published><updated>2011-11-16T04:45:56.362-08:00</updated><title type='text'>दृढ़ इच्छाशक्ति से रुकेगी कालाबाजारी</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-ZDn11orgQqk/TsOweddBl3I/AAAAAAAAASY/i65ofzjObxA/s1600/p-6.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 68px; height: 400px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-ZDn11orgQqk/TsOweddBl3I/AAAAAAAAASY/i65ofzjObxA/s400/p-6.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5675573992765888370" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;तत्काल कोटे में दलाली रोकने के लिए नियमों में संशोधन के साथ मॉनिटरिंग भी है जरूरी  &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मोहन कुमार मंगलम्&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी की तत्काल कोटे में रिजर्वेशन के नियमों में परिवर्तन की घोषणा स्वागतयोग्य है। कई बार अपरिहार्य कारणों से बहुत ही कम समय में रेलयात्रा की योजना बनानी पड़ती है। ऐसे यात्रियों की सुविधा के लिए ही तत्काल कोटा शुरू किया गया था, लेकिन इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि आम आदमी की सुविधा के लिए जो नियम-कानून बनाए जाते हैं, उसका लाभ अवांछित लोग उठाने लगते हैं।&lt;br /&gt;शुरुआत में पांच दिन पहले तत्काल टिकट लेने का नियम था, लेकिन टिकटों की कालाबाजारी की काफी शिकायतें मिलने के बाद वर्ष 2009 में इसे घटाकर दो दिन कर दिया गया था। इसके बावजूद बड़े पैमाने पर  टिकटों की कालाबाजारी जारी रही। इसके मद्देनजर पिछले दिनों देशभर में सीबीआई ने छापेमारी भी की थी। इसमें सामने आया था कि एजेंट समय से पहले ही बुकिंग करा लेते थे और फिर वे इन टिकटों की कालाबाजारी करते थे। इसमें रेलवे काउंटर पर बैठे कर्मचारियों की मिलीभगत की बात भी सामने आई थी। नए नियमों के अनुसार तत्काल कोटे में टिकट अब दो दिन की बजाय एक दिन पहले ही बुक करवाए जा सकेंगे और टिकट लेते समय आईडी प्रूफ दिखाना जरूरी होगा। इसके साथ ही रेलवे काउंटरों पर सीसीटीवी कैमरे लगाने की भी घोषणा की गई है, जिससे दलालों के साथ ही इस घालमेल में लिप्त रेलकर्मियों के चेहरे भी सामने आ सकेंगे। कन्फर्म तत्काल टिकट कैंसिल कराने पर रिफंड नहीं मिलने से भी दलाल हतोत्साहित होंगे।&lt;br /&gt;(जयपुर से छपने वाले हिंदी दैनिक डेली न्यूज में 15 नवंबर को संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-1861526209231683662?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/1861526209231683662/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=1861526209231683662' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/1861526209231683662'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/1861526209231683662'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2011/11/blog-post_16.html' title='दृढ़ इच्छाशक्ति से रुकेगी कालाबाजारी'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-ZDn11orgQqk/TsOweddBl3I/AAAAAAAAASY/i65ofzjObxA/s72-c/p-6.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-294074943548206288</id><published>2011-11-09T11:02:00.001-08:00</published><updated>2011-11-09T11:03:38.107-08:00</updated><title type='text'>नारायणी में स्नान, नारायण के दर्शन</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-aKPYH91DkLk/TrrOb5oq8OI/AAAAAAAAASI/K5vOsq2a0js/s1600/gaj.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 289px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-aKPYH91DkLk/TrrOb5oq8OI/AAAAAAAAASI/K5vOsq2a0js/s400/gaj.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5673073659349758178" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;आज कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी पर बचपन या कहें किशोरावस्था की अचानक याद आ गई। मेरे गृह जिला वैशाली के मुख्यालय हाजीपुर में कार्तिक पूर्णिमा पर नारायणी (गंडक) नदी के किनारे कौनहारा घाट पर श्रद्धालुओं का भारी मेला भरता है। हर साल हम भाई-बहनों की दिली ख्वाहिश होती थी कि बाबूजी से कैसे भी मेला जाने की अनुमति मिल जाए। बाबूजी की दमा की बीमारी तथा बूढ़ी दादीजी की देखभाल की जिम्मेदारी के कारण मां को इन धार्मिक प्रयोजनों में सहभागिता का अवसर नहीं मिल पाता था, लेकिन मेरी सबसे बड़ी चाची (जिनकी कोई संतान नहीं थी) बिना नागा हर साल इस पुण्य वेला में नारायणी-स्नान करने अवश्य जाती थीं। तीन-चार दिन पहले से ही हम भाई-बहन चाची की खुशामद में लग जाते थे कि बाबूजी को मनाकर वे हमें भी अपने साथ ले चलने को राजी कर लें। बूढ़ी दादी का भी बिना शर्त समर्थन हमें मिलता था और देर-सवेर बाबूजी भी हमें भी मेला जाने की इजाजत दे ही दिया करते थे। इस मेला में जाने पर ही पता चला कि वैशाली की विश्वप्रसिद्ध ऐतिहासिकता से भी कहीं बढ़कर हाजीपुर की ऐतिहासिकता है। अमूमन हम आज के दिन ही कौनहारा घाट पहुंच जाते और जहां जगह मिलती, अपने आस-पड़ोस के लोगों और दूर-दूर के रिश्तेदारों को खोजकर उनके साथ जगह छेककर अपना ठिया बना लेते। वहां गज-ग्राह के मंदिर में जाकर बाल मन गौरव से भर जाता कि हमारी इसी धरती पर कभी भगवान विष्णु को एक हाथी की पुकार सुनकर आना पड़ा था। &lt;br /&gt; पौराणिक मान्यताओं के अनुसार विष्णुभक्त गज एक बार नारायणी नदी में पानी पीने गया तो जल में छिप ग्राह उसका पैर पकड़कर उसे खींचने लगा। गज ने बार-बार उससे छोडऩे की विनती की, लेकिन ग्राह ने एक न सुनी। इस पर गज ने अपने प्रभु की शक्ति को याद करते हुए ग्राह से कहा कि जब तक मेरे विष्णु हैं, तुम मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते। इस पर ग्राह उसे खींचकर पानी में ले जाने लगा। गज ने आत्र्त स्वर में भगवान विष्णु को पुकारा तो क्षणभर में वे प्रकट हो गए। इससे प्रफुल्लित गज ने ग्राह को ललकारते हुए कहा कि अब बताओ-कौन हारा? भगवान ने दुष्ट ग्राह को मारकर अपने प्रिय भक्त गज को मुक्ति दिलाई। आज भी गजेंद्रमोक्ष के श्लोक इस पौराणिक कथा की पुष्टि करते हैं। भगवान विष्णु अर्थात हरि के आने के कारण ही प्राचीन समय में इस शहर का नाम हरिपुर था, जिसे कालांतर में मुगल शासनकाल में हाजी शमसुद्दीन के नाम पर हाजीपुर कर दिया गया। न जाने हमारे राजनेताओं को इस गौरव का भान क्यों नहीं होता कि वे मुगल शासक हाजी शमसुद्दीन के नाम पर आज तक हाजीपुर नाम को ढो रहे हैं। कौनहारा घाट पर ही नेपाली छावनी मंदिर है, जो अपनी काष्ठ कला के लिए प्रसिद्ध है। वैशाली, हाजीपुर या कहें कि बिहार के राजनेताओं की ही कमजोर इच्छाशक्ति का दुष्परिणाम यह नेपाली छावनी भुगत रही है, अन्यथा यहां बने काठ के मंदिरों पर जितनी बारीकी से कलाकारी उकेरी गई है, उसके सामने अजंता-एलोरा की कलाकृतियां कहीं भी न टिकें। &lt;br /&gt;इस मेले के साथ ही गंडक के उस पार सोनपुर का विश्वप्रसिद्ध मेला भरता है। इसे हरिहर क्षेत्र कहा जाता है, जहां भगवान विष्णु और शंकर एक साथ विराजते हैं। कार्तिक पूर्णिमा पर तड़के तीन-चार बजे ही नारायणी में डुबकी लगाने के बाद चाची से अनुमति लेकर अपने हमउम्र दोस्तों के साथ हम सोनपुर का रुख कर लेते थे। कौनहारा से सोनपुर की लगभग तीन-चार किलोमीटर तथा कई किलोमीटर में फैले सोनपुर मेले को हम बिना किसी थकान के अपने नन्हे कदमों से ही नाप देते थे। पाथेय के रूप में नया चिवड़ा (पोहा), गुड़ और डाला छठ महापर्व का प्रसाद ठेकुआ-टिकड़ी ही हमारा नाश्ता और भोजन सभी हुआ करते थे। गिनती के पांच-दस रुपए किसी बार बाबूजी से मिल जाते थे तो कई बार उनकी आज्ञा की अवहेलना कर मेला देखने की सजा के रूप में खाली हाथ भी जाना पड़ता था। ऐसी स्थिति में मेला में कुछ खरीदने की हमारी ख्वाहिश भी जन्म नहीं ले पाती थी, लेकिन उस मानव समुद्र में सामाजिकता के विकास के कई पाठ वहां सहज ही सीखने को मिल जाते थे। मेले में खोये बच्चों-बुजुर्गों को उनके परिजनों तक पहुंचाने के लिए लाउड स्पीकर पर अनाउंस करते स्काउट के जवान, पग-पग पर व्यवस्था संभालने को तैनात विभिन्न संगठनों के स्वयंसेवक, रेलवे, कृषि विभाग, पुलिस सहित विभिन्न सरकारी विभागों की कार्यप्रणाली को दर्शाती प्रदर्शनियों में संपूर्ण भारतीयता के दर्शन से जो सीख मिली, उसे कैसे भुलाया जा सकता है।  &lt;br /&gt;हाई स्कूल पास कर जब कॉलेज में गया तो कुछ तो पढ़ाई का बोझ, फिर मा-बाबूजी से दूर रहने के कारण आत्मानुशासन का अंकुश कि अकेले रहते हुए भी कभी मुजफ्फरपुर से हाजीपुर जाकर मेला देखने की हिम्मत नहीं जुटा सका। कॉलेज-यूनिवर्सिटी की पढ़ाई पूरी करने के बाद हाजीपुर तो क्या, बिहार ही बहुत पीछे छूट गया। बचपन के मित्र जो अब भी सौभाग्य से वहां हैं, शायद इन मेलों की भीड़ का हिस्सा बन पाते होंगे। तकनीक जब आधुनिकता की सीढ़ी पर नित नए परवान चढ़ रही है, न जाने मेले का स्वरूप भी अब कितना बदल गया होगा। विगत करीब तीन दशक से जब भी कार्तिक पूर्णिमा आती है, दिल में एक कसक सी उठती है और सोचता हूं कि अगले साल अवश्य ही ऐसी जुगत बैठाऊंगा कि इस मेले में जाऊं, लेकिन कब यह दिन दुबारा आ जाता है और मन में मलाल लिए एक साल और इसी उधेड़बुन में बिताते हुए पुरानी यादें संजोने को विवश हो जाता हूं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-294074943548206288?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/294074943548206288/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=294074943548206288' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/294074943548206288'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/294074943548206288'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2011/11/blog-post_09.html' title='नारायणी में स्नान, नारायण के दर्शन'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-aKPYH91DkLk/TrrOb5oq8OI/AAAAAAAAASI/K5vOsq2a0js/s72-c/gaj.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-7263474431661018980</id><published>2011-11-02T05:47:00.000-07:00</published><updated>2011-11-02T05:50:15.815-07:00</updated><title type='text'>तन-मन-जीवन कर दो निर्मल</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-iUTWVxlOl3Q/TrE8eYHVsnI/AAAAAAAAAR8/Ki8BYl4TFBI/s1600/news.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 192px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-iUTWVxlOl3Q/TrE8eYHVsnI/AAAAAAAAAR8/Ki8BYl4TFBI/s400/news.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5670379898403140210" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संपूर्ण चराचर जगत को अपने आलोक से प्रकाशित करने वाले भगवान सूर्य की आराधना-उपासना अनादि काल से होती रही है। इसी क्रम में कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से सप्तमी तक मनाए जाने वाले सूर्य षष्ठी पर्व का महत्वपूर्ण स्थान है। बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड के जन-मन में बसे इस पर्व को 'छठ महापर्वÓ भी कहा जाता है। इस पर्व में भगवान सूर्य को अघ्र्य दी जाने वाली सामग्री कच्चे बांस की टोकरी (डाला) में रखकर नदी या तालाब किनारे तक ले जाई जाती है, इसलिए इसे 'डाला छठÓ के नाम से भी जाना जाता है। &lt;br /&gt;ऋग्वेद में देवता के रूप में सूर्य की पूजा का उल्लेख है। कई पुराणों में भी भगवान सूर्य की उपासना की चर्चा की गई है। पौराणिक काल में सूर्य को आरोग्य प्रदाता देवता के रूप में माना जाने लगा था। ऐसी मान्यता है कि नियम-निष्ठापूर्वक यह पर्व करने से कुष्ठ रोग ठीक हो जाता है। सनातन धर्म के देवताओं में अग्नि के बाद सूर्य ऐसे अकेले देवता हैं जिन्हें मूर्त रूप में देखा जा सकता है।&lt;br /&gt;छठ पर्व का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष इसकी सादगी, पवित्रता और आडंबर व दिखावा से रहित होना है। इस पर्व में न तो मंदिर की जरूरत होती है, न प्रतिमा की, न ऋचाओं-मंत्रों की, न पंडित-पुरोहितों की। पूजन सामग्री जुटाने के लिए   भी ज्यादा भागदौड़ अपेक्षित नहीं होती। इसमें बांस की टोकरी, सूप, मिट्टी के बरतनों, दीपकों, गन्ना, गुड़, चावल, गेहूं से निर्मित प्रसाद, शकरकंद, हल्दी-अदरक की गांठ, केला, नींबू जैसी सामग्री का प्रयोग किया जाता है, जो सहज ही उपलब्ध हो जाती हैं। सहकार का भाव भी इस पर्व के मूल में है, जिसके तहत हर व्यक्ति अपने पास उपलब्ध सामग्री खुले मन से आस-पड़ोस में वितरित करता है, जिससे किसी को भी किसी सामग्री की कमी नहीं रह पाती है। पर्यावरण संरक्षण का भाव भी इस महापर्व से अनायास ही जुड़ा हुआ है। इस पर्व में नदी-तालाब-जलाशयों के घाटों की सफाई कर इसे सजाया जाता है, जिससे इनका अलग ही रूप निखरकर सामने आता है। भगवान सूर्य और छठ मइया की आराधना में गाए जाने वाले सुमधुर लोकगीतों से युक्त होकर यह पर्व लोक जीवन की भरपूर मिठास का प्रसार करता है।   &lt;br /&gt;जिस तरह सूर्य बिना किसी भेदभाव के संपूर्ण जगत पर अपनी कृपा-किरणों की बौछार करते हैं, उसी प्रकार जाति-धर्म-संप्रदाय की सीमाओं से ऊपर उठकर यह पर्व मनाया जाता है। इसी भावना का प्रमाण है कि बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड के अनेक मुस्लिम परिवारों में भी दशकों से छठ पूजा की परंपरा चली आ रही है।&lt;br /&gt;छठ पर्व के रूप में पूरब से प्रस्फुटित सूर्य आराधना की रश्मियां इसे मनाने वालों के अन्य प्रदेशों का रुख करने के साथ ही साल-दर-साल विस्तार पाती हुई संपूर्ण भारतवर्ष को अपनी ज्योति से आलोकित करती जा रही है। विदेशों में भी जहां-जहां इस पर्व को मनाने वाले गए, वे अपने साथ सांस्कृतिक-धार्मिक विरासत के रूप में इस पर्व को ले गए और धीरे-धीरे कहीं लघु तो कहीं वृहद स्तर पर छठ पर्व मनाया जाने लगा है। छठ व्रत प्राय: महिलाओं द्वारा किया जाता है किंतु विशेष मनौती पूरी होने पर कुछ पुरुष भी यह कठिन व्रत रखते हैं। सूर्य की शक्तियों का मुख्य स्रोत उनकी पत्नी उषा और प्रत्यूषा हैं। छठ पर्व के दौरान सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण (प्रत्यूषा) तथा प्रात:काल में सूर्य की पहली किरण (उषा) को अघ्र्य देकर भगवान भास्कर के साथ-साथ इन दोनों शक्तियों की संयुक्त आराधना की जाती है। कमर भर पानी में खड़े होकर भगवान सूर्य का ध्यान करते समय व्रतियों के मन में प्रार्थना का यह भाव रहता है कि हे सूर्यदेव, हमारे तन-मन-जीवन का खारापन मिटाकर इसे निर्मल-मधुर कर दो जिससे बादलों से बरसने वाले पवित्र जल की तरह हम स्वयं के साथ ही जन-गण-मन के लिए मंगलकारी हो सकें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-7263474431661018980?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/7263474431661018980/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=7263474431661018980' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/7263474431661018980'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/7263474431661018980'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title='तन-मन-जीवन कर दो निर्मल'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-iUTWVxlOl3Q/TrE8eYHVsnI/AAAAAAAAAR8/Ki8BYl4TFBI/s72-c/news.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-2979333818126161734</id><published>2011-10-10T05:36:00.000-07:00</published><updated>2011-10-10T12:35:53.903-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सरोकार'/><title type='text'>सनातन धर्म की गौरवशाली परंपराएं</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-s2fACbMiTOU/TpNJATmJHVI/AAAAAAAAARo/iutRP3_o19A/s1600/mangalm%2Bji.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 214px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-s2fACbMiTOU/TpNJATmJHVI/AAAAAAAAARo/iutRP3_o19A/s400/mangalm%2Bji.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5661949426143927634" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;br /&gt;'पितृ देवो भवÓ की संस्कृति वाले देश में पूर्वजों के तर्पण और शक्तिस्वरूपा मां भगवती की आराधना के बाद आती है देवोत्थान एकादशी &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;अभी हाल ही संपन्न हुए शारदीय नवरात्र के दौरान जब हिंदू परिवारों में घर-घर शक्तिस्वरूपा मां भगवती की साधना-आराधना का दौर चल रहा था, मंदिरों में घंटा-घडिय़ाल से लेकर दुर्गा सप्तशती के श्लोकों की गूंज सुनाई दे रही थी, ऐसे में सनातन धर्म की गौरवशाली परंपराओं का सहज ही स्मरण हो आया। 'पितृ देवो भवÓ का उद्घोष करने वाले सनातन धर्म ने इसे महज वक्तव्यों और शास्त्रों तक में ही सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे आचरण में भी अपनाया। इसी का परिणाम है कि सनातन परंपरा में हमें जीवन देने वाले पूर्वजों-पितरों का स्थान देवताओं से भी ऊपर माना गया है। हिंदी पंचांग में पितृपक्ष के बाद देवोत्थान एकादशी का आना भी इसका ही सूचक है। पितरों के प्रति श्रद्धा के समर्पण को ध्यान में रखते हुए भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन माह की अमावस्या तक को पितृपक्ष या कनागत के रूप में वर्णित किया गया। इस दौरान पूर्वजों-पितरों की मृत्यु तिथि के हिसाब से उनके श्राद्ध-तर्पण-पिंडदान का विधान किया गया है। किसी भी महत्वपूर्ण तिथि को भूल जाने की मनुष्य की सहज प्रवृत्ति का भी सनातन धर्म के पुरोधाओं ने ध्यान रखा, जिसे उनकी दूरंदेशी का सूचक माना जा सकता है। किसी कारणवश यदि अपने पितरों की मृत्यु तिथि याद नहीं रख पाएं तो उनके श्राद्ध-तर्पण के लिए आश्विन अमावस्या को सर्वपितृ अमावस्या का विधान रखा गया है। इस दिन लोग अपने घर पर तो पितरों का तर्पण-श्राद्ध करते ही हैं, कई स्थानों पर सामूहिक श्राद्ध-तर्पण की व्यवस्था की जाती है ताकि साधनविहीन आदमी भी पितृ ऋण से मुक्ति पा सके। &lt;br /&gt; सनातन धर्म की उदात्त सोच के विस्तार का ही परिणाम है कि भारत में पुरुष प्रधान समाज होने के बावजूद शक्ति की आराधना को वरीयता दी गई है। पितृपक्ष-कनागत की समाप्ति के तुरंत बाद आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को नारी शक्ति की  प्रतीक के रूप में मां भगवती की पूजा-अर्चना का दौर शुरू हो जाता है। शारदीय नवरात्र के दौरान नौ दिनों तक शक्तिस्वरूपा मां दुर्गा के विविध रूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। राजस्थान में जहां घर-घर घट स्थापना कर मां दुर्गा की आराधना की जाती है, वहीं पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल और पूर्वोत्तर के राज्यों में सामूहिक स्तर पर उत्सव के रूप में यह त्यौहार मनाया जाता है। लाखों-करोड़ों रुपए खर्च कर पांडाल बनाए जाते हैं और सांस्कृतिक-धार्मिक आयोजन होते हैं। इसके बावजूद मां दुर्गा, महिषासुर, लक्ष्मी-सरस्वती तथा कार्तिकेय-गणपति की मिट्टी की ही प्रतिमाएं बनाई जाती हैं।  दुर्गा पूजा की पूर्णाहुति कन्याओं के पूजन और जीमन से होती है। आज जब समाज से कन्या भ्रूणहत्या का कलंक मिटाने के लिए सरकारी-गैर सरकारी स्तर पर किए जा रहे प्रयास भी नाकामी साबित हो रहे हैं, ऐसे में इस बात पर हमें गर्व करना चाहिए कि सनातन धर्म के कर्ता-धर्ताओं ने इस स्थिति को सदियों पहले भांप लिया था और कन्या-पूजन के रूप में नारी के महत्व को प्रतिपादित कर दिया था। शारदीय नवरात्र के दौरान नौ दिनों तक रोज विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हुए इन प्रतिमाओं के प्रति लोगों की श्रद्धा और प्रीति सहज ही बढ़ जाती है, इसके बावजूद मानव जीवन को क्षणभंगुर मानने वाला सनातन दर्शन देवी-देवताओं को भला कहां स्थायी  मानने की भूल करता। ऐसे में विजयादशमी पर इन प्रतिमाओं को शोभायात्रा के रूप में ले जाकर जलाशयों-नदियों में विसर्जन कर दिया जाता है। प्रकाश के साधनों के आविष्कार के बाद मनुष्य ने अंधकार पर विजय पाई, लेकिन धरती से अंधकार को दूर भगाने का उदाहरण केवल सनातन परंपरा में ही मिलता है, जब कार्तिक कृष्ण अमावस्या पर दीपों की जगमगाहट अंधकार के साम्राज्य को पूरी तरह मात दे देती है। अंधकार पर प्रकाश के विजय के इस पर्व के बाद कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवोत्थान एकादशी के रूप में मनाया जाता है और सनातन परंपरा स्वयं को देवताओं की पूजा-अर्चना में संलग्न कर देव ऋण से मुक्त होने का प्रयास करती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-2979333818126161734?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/2979333818126161734/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=2979333818126161734' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/2979333818126161734'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/2979333818126161734'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2011/10/blog-post.html' title='सनातन धर्म की गौरवशाली परंपराएं'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' 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पहले अगस्त में हुए सर्वेक्षण में 61 प्रतिशत लोगों ने केंद्र सरकार के प्रति असंतोष जताया था।&lt;br /&gt;बेलगाम महंगाई ने आम आदमी का जीना मुहाल कर दिया है। महंगाई को रोकने के लिए किए जा रहे प्रयास जनता को राहत नहीं पहुंचा रहे। पेट्रोल की कीमत में की गई बढ़ोतरी ने महंगाई से त्रस्त लोगों की परेशानी और भी बढ़ा दी है। महंगाई पर काबू पाने के उपाय के नाम पर हाल ही रेपो और रिवर्स रेपो दर में बढ़ोतरी से ऋणों पर ब्याज दर बढऩे की मार भी आमजन को झेलनी पड़ेगी। वहीं इस सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार 84 प्रतिशत लोगों ने अन्ना हजारे और उनके सहयोगियों द्वारा तैयार जन लोकपाल विधेयक को समर्थन दिया। लोगों का मानना है कि देश के विकास को दीमक की तरह चाट रहे भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने में यह विधेयक काफी हद तक प्रभावी होगा। ऐसे में केंद्र सरकार को चाहिए कि जनकल्याण के अपने मूल उद्देश्य को ध्यान में रखकर आमजन की परेशानियां दूर करने की पहल करे, अन्यथा  आमजन की उपेक्षा उसे भारी पड़ सकती है।&lt;br /&gt;(जयपुर से प्रकाशित हिंदी दैनिक समाचार पत्र डेली न्यूज में 22 सितंबर को प्रकाशित)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-8640498046969125180?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/8640498046969125180/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=8640498046969125180' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/8640498046969125180'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/8640498046969125180'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2011/09/blog-post.html' title='घटती लोकप्रियता का संकेत'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-4739558412115585119</id><published>2011-08-05T04:42:00.000-07:00</published><updated>2011-08-05T04:46:42.397-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सरोकार'/><title type='text'>मूल उद्देश्यों की पटरी से उतरता रेलवे</title><content type='html'>नए रेल मंत्री ने व्यवस्था सुधारने की बजाय किराया नहीं बढ़ाने पर दिया जोर&lt;br /&gt;हाल ही केंद्रीय मंत्रिमंडल में हुए फेरबदल में रेल मंत्री बने दिनेश त्रिवेदी ने निकट भविष्य में रेल किराया नहीं बढ़ाने की बात कही है। उनका यह बयान पूर्ववर्ती रेल मंत्रियों की तरह अपनी लोकप्रियता का ग्राफ बढ़ाने की कवायद ही प्रतीत होता है। ममता बनर्जी के पश्चिम बंगाल चुनाव में लीन हो जाने के कारण लंबे अरसे तक रेल मंत्रालय मुखियाविहीन सा हो गया था।  ऐसे में नए रेल मंत्री से रेलवे की व्यवस्थाओं में सुधार की आस लगाए रेलयात्रियों को त्रिवेदी के इस बयान से झटका लगा है।&lt;br /&gt;भारतीय रेलवे का ध्येय वाक्य है 'संरक्षा, सुरक्षा और समय पालनÓ अर्थात् यात्रियों को अपने संरक्षण में सुरक्षित रूप से बिना किसी परेशानी के निर्धारित समय से गंतव्य पर पहुंचाना, लेकिन वर्तमान समय में भारतीय रेल ने अपने मूल ध्येय को पूरी तरह भुला दिया है। वर्तमान समय में रिजर्वेशन के बावजूद आरक्षित कोच में सामान्य टिकट या वेटिंग लिस्ट वालों की भीड़ के कारण बैठना तक मुहाल हो जाता है। जैसे-तैसे बैठ भी गए तो ट्रेन सही-सलामत निर्धारित समय से गंतव्य पर पहुंचा देगी, इसकी कोई गारंटी नहीं होती। पिछले दिनों हुई रेल दुर्घटनाओं तथा ट्रेनों में हुई आपराधिक घटनाओं के कारण यात्रियों के मन में एक अज्ञात भय समाया रहता है। ऐसे में रेल मंत्री &lt;br /&gt;को चाहिए कि वे रेल किराया न बढ़ाने का आश्वासन देने की बजाय सुरक्षित व सुखद रेलयात्रा की गारंटी देने की बात करते। इस गारंटी के लिए तो रेलयात्रियों को किराये में दो-पांच रुपए की बढ़ोतरी भी नहीं खलती। &lt;br /&gt;(जयपुर से प्रकाशित हिंदी दैनिक समाचार पत्र &lt;span style="font-style:italic;"&gt;डेली न्यूज&lt;/span&gt; में 2 अगस्त को प्रकाशित)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-4739558412115585119?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/4739558412115585119/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=4739558412115585119' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/4739558412115585119'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/4739558412115585119'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2011/08/blog-post_05.html' title='मूल उद्देश्यों की पटरी से उतरता रेलवे'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-5419279408590154260</id><published>2011-08-01T13:00:00.000-07:00</published><updated>2011-08-01T13:02:03.748-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सोचें तो सही'/><title type='text'>...मोर अंगना नहि बरसे बदरवा</title><content type='html'>कविकुलगुरु कालिदास ने अपनी कालजयी रचना ' मेघदूतम्Ó में कुबेर के शाप से निर्वासित यक्ष की प्रियतमा की विरह-व्यथा को शब्दों में पिरोकर बादलों की महत्ता को अलग तरीके से रूपायित किया। इसके साथ ही  ' मेघदूतम्Ó में 'आषाढ़स्य प्रथम दिवसे...Ó से आषाढ़ आने पर मन के आह्लादित होने का भी बखूबी वर्णन किया। वैशाख-ज्येष्ठ में सूर्य की प्रचंड किरणों के प्रभाव से प्रकृति व अन्य प्राणियों के साथ मानव-मन भी झुलस जाता है और हर किसी की तमन्ना रहती है कि बादल बरसें और मन को हरसाएं। आषाढ़ से यह सिलसिला शुरू होकर सावन आते-आते मन में इतना बस जाता है कि प्रफुल्लित मन हर्ष के झूले पर प्यार की पींगे मारने को हर पल व्याकुल सा रहता है। तभी तो काव्य से लेकर फिल्में तक सावन के स्नेह से अभिसिक्त होकर हमारा मन हर लेती हैं। &lt;br /&gt;खैर, मेरा उद्देश्य न तो कालिदास की प्रशंसा में कसीदे काढऩा था और न ही सावन को शब्दों में सजाने का है। आज तो किसी और ही कारण ने मुझे मैं तो किसी और ही उद्देश्य से आज यहां मुखातिब हूं। बरसों से रात की नौकरी के कारण सोते-जगते उनींदे ही में कब दिन बीत जाता है, पता ही नहीं चलता। आज भी दोपहर में खाना खाकर सो गया था। ऑफिस जाने के लिए चार बजे जगा तो बाहर झमाझम बरसात हो रही थी। पत्नी ने कहा कि करीब आधे घंटे पहले ही बरसात शुरू हो गई थी। मेरे ऑफिस जाने का जैसे-जैसे समय होता जा रहा था, मेरी चिंता बढ़ती जा रही थी। अखबार की नौकरी भी सीमा पर तैनात जवानों से कम महत्वपूर्ण नहीं होती। यदि ऐसे प्राकृतिक कारणों से दो-चार साथी अनुपस्थित हो जाएं तो काम काफी प्रभावित होता है। सर्दी-जुकाम से ग्रस्त मैं बुखार की आशंका के कारण बारिश में निकलने की हिम्मत भी नहीं कर पा रहा था। खैर, जैसे-तैसे साढ़े पांच बजे जब बादलों का कोष रिक्त हो गया तो मैं हल्की फुहारों के बीच रेनवाटर कोट का कवच धारण कर घर से निकला। घर से ऑफिस की 14-15 किलोमीटर की दूरी में भिगोने के लिए फुहारें भी काफी होती हैं। खैर, आधे रास्ते तक तो सड़कों पर जमा पानी भरपूर बारिश का अहसास करा रही थीं, लेकिन जैसे-जैसे ऑफिस नजदीक आता जा रहा था, अपेक्षाकृत सूखे मौसम में रेनवाटर कोट पहने मैं शायद साथी राहगीरों के लिए अचरज का केंद्र भी बना हुआ था। ऑफिस आने पर दूसरे साथियों को भी बिल्कुल सूखा देखकर अब मुझे आश्चर्य हो रहा था। कुछ साथियों के निवास के करीब तो बिल्कुल ही बरसात नहीं हुई थी और कुछ के यहां बादल दो-चार छींटे देकर गुजर लिए। सबसे आश्चर्य तो तब हुआ जब मौसम की खबर बनाने वाले साथी ने मौसम विभाग के अधिकारियों के हवाले से बताया कि गुलाबी नगर में महज 0.9 मिलीमीटर बरसात हुई है। इसका कारण यह था कि जयपुर में मौसम विभाग का कार्यालय एयरपोर्ट के पास है, जो सांगानेर इलाके में है और उधर आज महज नाममात्र को बरसात हुई थी। ऐसे में जिन इलाकों में बरसात नहीं हुई, उन लोगों के लिए तो मलाल हुआ कि वे सावन की भीगी-भीगी रुत में मौसम या फिर बादलों की मेहरबानी से महरूम रह गए वहीं इसका भी अफसोस हुआ कि मौसम विभाग को बरसात नापने के लिए इतने बड़े शहर के अलग-अलग हिस्सों में व्यवस्था होनी चाहिए ताकि मौसम विभाग का आंकड़ा हास्यास्पद न लगे। मुझमें यक्ष जैसी क्षमता तो नहीं है कि बादल मेरी मनुहार सुन पाएं, लेकिन मौसम विभाग भी यदि मेरी सलाह पर अमल कर ले तो उसकी हेठी नहीं होगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-5419279408590154260?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/5419279408590154260/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=5419279408590154260' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/5419279408590154260'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/5419279408590154260'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2011/08/blog-post.html' title='...मोर अंगना नहि बरसे बदरवा'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-1269578454246382454</id><published>2011-07-24T13:05:00.000-07:00</published><updated>2011-07-27T11:45:54.609-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आत्मनिवेदन'/><title type='text'>...जन्मदिन के बहाने</title><content type='html'>नौकरी पूरी करने के बाद कल रात दो बजे घर पहुंचा तो हॉल में कुर्सी पर कुछ चमकता हुआ सा प्रतीत हुआ। उठाकर देखा तो पता चला कि बेटे ने बर्थडे विश करने के लिए ग्रीटिंग कार्ड रखा हुआ था। देखकर अच्छा लगा कि बाजार से रेडिमेड कार्ड खरीदने के बजाय उसने अपनी कल्पनाओं को खुद ही आकार देने की कोशिश की थी। इसके बाद तो दिनभर मोबाइल पर शुभकामनाओं के एसएमएस आते रहे। फेसबुक पर तीस-चालीस मित्रों की शुभकामनाएं पाकर भी काफी अच्छा लगा। विशेष रूप से आदरणीय कुमार विश्वास की काव्यमय मंगलकामनाएं-&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;देर रात जागा होगा उस दिन ऊपर वाला ,&lt;br /&gt;जिस दिन उसने तुम को अपने हाथों से था ढाला ...&lt;br /&gt;जन्म दिन की ढेर सारी शुभकामनाएं.. ...&lt;br /&gt;स्वस्थ रहो ...मस्त रहो ...व्यस्त रहो ...&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;दिल को छू गईं। &lt;br /&gt;उनकी शुभकामनाओं पर इतना ही कहना चाहूंगा कि मेरी काया को अपने हाथों से ढालने के लिए विधाता अवश्य ही देर रात तक जागा था क्योंकि मेरा जन्म वाकई तड़के करीब पौने चार बजे हुआ था। खैर, इसके बाद विधाता की नाइट शिफ्ट बंद हुई या जारी रही यह तो पता नहीं, लेकिन मैं तकरीबन 14-15 साल से जीविकोपार्जन के लिए अखबार की नौकरी में रात्रि जागरण करने को विवश हूं। फेसबुक पर अन्य मित्रों की शुभकामनाओं के लिए भी हृदय से आभारी हूं, जिसके कारण अपनी मनोभावनाएं उनसे बांटने की प्रेरणा मिली।&lt;br /&gt;तो पेश है मेरी रामकहानी की पहली कड़ी....&lt;br /&gt;मेरे से बड़े दो भाइयों के असमय काल कवलित हो जाने के कारण पूरा परिवार मेरे जीवित रहने के प्रति आशंकित था। यही कारण रहा कि जन्म के बाद पारंपरिक रूप से होने वाले रस्मो-रिवाज व अनुष्ठानों को भी स्थगित कर दिया गया। नए कपड़ों की बजाय पुराने कपड़ों में ही लपेटकर रखा जाता था। भय इतना कि कपड़े की पुरानी मच्छरदानी को काले रंग में रंगकर उसे ही मेरा पहनावा बनाया गया। &lt;br /&gt;नामकरण करने की जहमत नहीं उठाई गई। सबका मानना था कि जब इसे जीना ही नहीं है, तो नामकरण कर नवजात से अपनापन क्यों बढ़ाया जाए। परंपरागंत मान्यताओं के अनुसार एकाध किलो मड़ुआ (मोटा अनाज) के बदले गांव में प्रसव कराने वाली दाई के हाथों मुझे बेच दिया गया। इस प्रकार बेचे जाने के कारण परिवार में मुझे 'बेचनाÓ नाम से पुकारा जाने लगा। कुछ दिनों पहले हिंदी के प्रख्यात साहित्यकार पांडेय बेचन शर्मा ' उग्रÓ के बारे में पढ़ते हुए पता चला कि उनके नाम में शामिल बेचन के साथ भी कुछ ऐसा ही वाकया छिपा था। &lt;br /&gt;नानाजी को किसी ने कहा कि लड़के की नाक छिदवा दो तो शायद इसकी आयु बढ़ जाए। नानाजी ने नाक छेदने वाले को बुलवाया और सुनार से कहकर नथनी भी बनवा दी। सौंदर्य में अभिवृद्धि के लिए बच्चियों की नाक पांच-छह साल की उम्र में छिदवाई जाती है और तब तक शायद भविष्य में इसकी उपयोगिता को वे समझ जाती हैं और इससे छेड़छाड़ नहीं करतीं, लेकिन कुछ माह का अबोध शिशु मैं किसी  अवरोध को कैसे सहन कर पाता, इसका परिणाम यह हुआ कि एक दिन मैंने उस नथनी को खींच दिया जिससे कोमल नाक को चीरती हुई वह बाहर आ गई और उसका निशान आज भी मेरे चेहरे पर बाकायदा चस्पां है। &lt;br /&gt;आगे की कहानी अगले जन्म दिन पर। तब तक गुड बॉय....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-1269578454246382454?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/1269578454246382454/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=1269578454246382454' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/1269578454246382454'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/1269578454246382454'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2011/07/blog-post_24.html' title='...जन्मदिन के बहाने'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-3336991811623982452</id><published>2011-07-20T04:43:00.000-07:00</published><updated>2011-07-20T04:44:29.937-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सोचें तो सही'/><title type='text'>अक्षर के जादू से तरक्की का टोटका !</title><content type='html'>&lt;span style="font-style:italic;"&gt;राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में पश्चिम बंगाल का नाम बदलने का प्रस्ताव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पश्चिम बंगाल का इतिहास बहुत ही समृद्ध और गौरवशाली रहा है। 'गीतांजलिÓ के लिए साहित्य का नोबेल पुरस्कार पाने का गौरव गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर के नाम के साथ जुड़ा है तो स्वतंत्रता संग्राम में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की भूमिका नौजवानों के लिए अनुकरणीय रही है। समाज सुधार में राजा राम मोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर के नाम अग्रगण्य हैं तो फिल्म निर्माण-निर्देशन में सत्यजित राय अद्वितीय हैं। चिकित्सा क्षेत्र से राजनीति में आए डॉ. विधानचंद्र राय ने सेवा की ऐसी छाप छोड़ी कि आज उनका जन्मदिन डॉक्टर्स डे के रूप में मनाया जाता है। जादू के लिए भी प्रसिद्ध पश्चिम बंगाल में लंबे संघर्ष के बाद गत विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस का जादू ऐसा चला कि बाकी दलों का अस्तित्व ही कहीं खो सा गया। ऐसे में पिछले दिनों पश्चिम बंगाल मंत्रिमंडल की बैठक में राज्य का नाम बदलने का प्रस्ताव आया और बंग प्रदेश, बांग्ला प्रदेश, बंगराष्ट्र आदि नामों पर चर्चा की जा रही है। इसके पीछे यह तर्क दिया जा रहा है कि अंग्रेजी वर्णक्रम में नाम नीचे होने से राष्ट्रीय मंचों पर राज्य को अपनी बात रखने का मौका अंत में मिलता है। वर्तमान समय में प्रदेश की जनता मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में अपने दमित सपनों को साकार होते देखना चाहती है। ऐसे में तृणमूल कांग्रेस सरकार को चाहिए कि अक्षर के जादू से तरक्की का टोटका करने की बजाय ईमानदार और पारदर्शी शासन से विकास की नई इबारत लिखे, जिससे नाम नहीं, बल्कि काम के आधार पर पश्चिम बंगाल पहली पंक्ति में आ जाए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-3336991811623982452?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/3336991811623982452/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=3336991811623982452' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/3336991811623982452'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/3336991811623982452'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2011/07/blog-post.html' title='अक्षर के जादू से तरक्की का टोटका !'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-6574712046266035048</id><published>2011-06-30T12:00:00.001-07:00</published><updated>2011-06-30T12:00:57.511-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आत्मनिवेदन'/><title type='text'>आम हुए खास, आटे का भी टोटा</title><content type='html'>' सहदेव बोला- वैसे इन दिनों आसपास के वनों में फलों की कमी नहीं है। वृक्ष फलों के बोझ से लदे पड़े हैं। हमारा प्रयत्न है कि अन्न को अभी सुरक्षित रखा जाए और जब तक फल उपलब्ध हैं, फलाहार ही किया जाए।Ó नरेंद्र कोहली के 'महासमरÓ के पंचम खंड 'अंतरालÓ के अंतिम पृष्ठों में पांडवों के बारह वर्ष के वनवास के प्रसंग को पढ़ते हुए अचानक अपना बचपन याद आ गया। मैं गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ता था, जहां आज के इंग्लिश मीडियम स्कूल की तरह गर्मी की छुट्टी में होमवर्क का बोझ बच्चों के सिर पर नहीं लादा जाता था। ऐसे में गर्मी की छुट्टी का मतलब होता था नॉन स्टॉप मस्ती। ज्येष्ठ-आषाढ़ के महीने में हम पूरी तरह आम के बगीचे के होकर रह जाते थे। बगीचे में अस्थायी मड़ैया बना दी जाती थी, जहां हम सभी भाई-बहन दिनभर आम की रखवारी के साथ ही कोयल के साथ 'कू-कूÓ कूकने की प्रतियोगिता करते। आम के साथ ही जामुन का स्वाद भी बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करता और कई बार जामुन के पेड़ से गिरने के बाद भी उसके प्रति हमारा प्रेम कम नहीं हो पाता। ऐसी कपोल कल्पित अफवाह थी कि रात में इन बगीचों में भूत-प्रेत आते हैं, इसलिए शाम होते ही घर आ जाते थे और रात में बगीचे की रखवारी की जिम्मेदारी हमारे ताऊजी ही संभाला करते थे। &lt;br /&gt;हां, तो मुझे जिस संदर्भ में 'महासमरÓ की उपरोक्त पंक्तियां मेरे बचपन में ले गईं वो कुछ यूं थीं कि घर की माली हालत सामान्य ही थी। दो ताऊ किसान ही थे और बाबूजी की शिक्षक की नौकरी से मिलने वाली पगार परिवार की गाड़ी को जैसे-तैसे खींच पाती थी। ऐसे में जब हम खाना खाने बैठते तो दादी कहतीं कि रोटी कम से कम खाओ और आम से ही पेट भरो। हालांकि विभिन्न प्रजातियों के आम से स्वाद की एकरसता की समस्या भी नहीं हुआ करती थी, फिर भी बालसुलभ मन उन तर्कों को कहां माना करता था। &lt;br /&gt;उन दिनों आम हर आमजन को सुलभ था। जिनके बगीचे नहीं होते और वे बगीचे में या घर पर आते तो कभी खाली हाथ नहीं लौटते। आम बेचने का चलन तो बिल्कुल ही नहीं था या यूं कहें कि इसे बुरा माना जाता था तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। मुझे लगता है कि हर किसी की पहुंच में होने के कारण ही फलों के राजा का नामकरण 'आमÓ किया गया होगा। &lt;br /&gt;आज जब गुलाबी नगर में रहते हुए 50 से 70 रुपए किलो तक आम खरीदना पड़ता है तो आटे-दाल का भाव सहज ही याद आ जाता है। बचपन से मुंह लगा आम का स्वाद अन्य खर्चों में कटौती की कीमत पर ही पूरा हो पाता है। इसके साथ ही सामान्य परचूनी की दुकान में भी 15 रुपए किलो आटा मिलता है और पैकेटबंद आटा भी 20-22 रुपए किलो तक मिल पाता है। ऐसे में आम भी खास लोगों की पहुंच तक सिमटकर रह गया है और आटे के लिए भी आम आदमी को इस कदर अंटी ढीली करनी पड़ती है कि जरूरत की बाकी चीजों के लिए समझौते के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-6574712046266035048?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/6574712046266035048/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=6574712046266035048' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/6574712046266035048'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/6574712046266035048'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2011/06/blog-post_30.html' title='आम हुए खास, आटे का भी टोटा'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-1566962998994858392</id><published>2011-06-19T05:55:00.000-07:00</published><updated>2011-06-19T05:56:29.013-07:00</updated><title type='text'>सदैव सामयिक है संस्कृत</title><content type='html'>राजस्थान संस्कृत अकादमी व रामानंद आध्यात्मिक सेवा समिति की ओर से झालाना सांस्थानिक क्षेत्र स्थित राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी सभागार में 'पत्रकारिता में संस्कृत : वर्तमान और भविष्यÓ पर चल रही दो दिवसीय संगोष्ठी के अंतिम दिन रविवार सुबह  'संस्कृत की सामयिकताÓ विषयक सत्र में मुझ नाचीज को भी कुछ कहने का अवसर मिला। करीब 15 साल बाद कोई सार्वजनिक मंच मिला था, इसलिए काफी संकोच भी हो रहा था, फिर पत्रकारिता को आजीविका के रूप में अपनाने तथा अन्यान्य कारणों से संस्कृत का साथ छूटे भी करीब डेढ़ दशक हो गए। एक सप्ताह पहले सूचना मिली कि मुझे भी 'संस्कृत की सामयिकताÓ पर कुछ कहना होगा और मैं पिछले एक माह से किसी और काम में लगा था, जो शनिवार शाम को ही पूरा हुआ था। ऐसे में शनिवार मध्यरात्रि ऑफिस के काम से फ्री होने के बाद जहां तक मैं सोच सका, वही मेरे वक्तव्य का हिस्सा बना। मेरी अल्पज्ञता अपनी जगह पर थी, लेकिन सौभाग्य उससे कहीं अधिक था कि श्रद्धेय बलदेवानंद सागर, प्रो. अर्कनाथ चौधरी, देवर्षि कलानाथ शास्त्री, प्रो. सुदेश शर्मा सहित संस्कृत के दशाधिक स्वनामधन्य विद्वानों के सान्निध्य में कुछ बोलने का अवसर मिला। मैंने इस आलेख को जस का तस तो नहीं पढ़ा, क्योंकि देखकर पढऩे से संप्रेषणीयता में कमी आती है और मेरा कॉन्शस भी इसकी अनुमति नहीं दे पाया, लेकिन मेरा वक्तव्य इसी के आसपास केन्द्रित था। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;संस्कृत की सामयिकता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे पहले तो मैं कहना चाहूंगा कि जिस विषय को आज की चर्चा का केंद्रबिंदु बनाया गया है, वह सही नहीं है। कोई वस्तु या विद्या यदि अप्रासंगिक हो जाती है तो इसकी प्रासंगिकता सिद्ध करने के लिए इसके पक्ष में विभिन्न तर्क रखे जाते हैं, लेकिन संस्कृत तो सदैव सामयिक है और रहेगी। जीवन में हर कदम पर संस्कृत हमें मार्ग दिखाती है। कोई भी जिज्ञासा हमारे  मन में उठे, उसका समाधान पहले से संस्कृत के ग्रंथों में सन्निहित है। जिस तरह प्रत्येक जीवधारी के लिए ऑक्सीजन की उपयोगिता सदैव सामयिक है, वैसे ही मानव जीवन के लिए संस्कृत भाषा की उपयोगिता सर्वकालिक है। &lt;br /&gt;चिकित्सा का क्षेत्र हो तो आयुर्वेद में मनुष्य के आरोग्य का वरदान संजोया हुआ है। यदि उनका पालन किया जाए तो इस आपाधापी के युग में भी सम्यक जीवन जीया जा सकता है। &lt;br /&gt;संस्कृत ग्रंथों में आदर्श परिवार की व्याख्या की गई है। धर्मशास्त्रों में वर्णित जीवन पद्धति को अपनाने से परिवार में सदैव स्नेह, सामंजस्य और समरसता बनी रहती है और इन पर अमल नहीं करने से अनुशासनहीनता, उच्छृंखलता के भावों का समावेश जीवन में होता है और परिवार के बिखराव से लेकर जीवन के असमय अंत के रूप में इसके परिणाम दृष्टिगोचर होते हैं। &lt;br /&gt;वर्तमान समय में पर्यावरण की सुरक्षा की चिंता बड़े जोर-शोर से की जाती है। संस्कृत ग्रंथों में ऋषि-मुनियों के जंगल में रहने, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी को अपना परिवार समझने की परिपाटी का चित्रण किया गया है। कविकुलगुरु कालिदास ने अभिज्ञानशाकुंतलम् में कण्व ऋषि और शकुंतला के माध्यम से इसका कितना मनोहारी वर्णन किया है। &lt;br /&gt;व्यक्तित्व निर्माण के जो मार्ग संस्कृत ग्रंथों में दिखाए गए हैं, अन्यत्र दुर्लभ हैं। वसुधैव कुटुंबकम् का पाठ पढ़ाने वाली संस्कृत भाषा कभी  भौतिकवाद को प्रश्रय नहीं देती।  पुरुषार्थ चतुष्टय में भी धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष में धर्म को सर्वोपरि स्थान दिया गया है और धर्म के मार्ग पर चलने वाला अपना हित साधने के लिए कभी दूसरे का अहित नहीं कर सकता। &lt;br /&gt;हर हाल में संतुलित जीवन जीने का जो उपदेश संस्कृत ग्रंथों (श्रीमद्भगवद्गीता) में --सुखदु:खे समे कृत्वा लाभालाभे जयाजयौ...।। दिया गया, वह हजारों वर्ष बाद आज भी सामयिक है और आने वाली सदियों में भी सामयिक बना रहेगा।  &lt;br /&gt;आजकल तनाव और अवसाद की बातें बहुधा की जाती हैं। इसके दुष्परिणामों से समाचार पत्र भरे रहते हैं। इसके बावजूद मैं कहना चाहूंगा कि आज के आदमी के तनाव या अवसाद का स्तर कुरुक्षेत्र के अर्जुन की तुलना में पासंग में भी नहीं है। ऐसे में योगेश्वर कृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश दिए थे, वे देश-काल-व्यक्ति की सीमा से परे आज भी हर किसी के लिए हैं, बशर्ते हम उसका मनन-चिंतन करने के साथ ही उस पर अमल करें। &lt;br /&gt;एक बात और, संस्कृत ग्रंथों-रामायण, श्रीमद्भगवद्गीता सरीखे ग्रंथों को हमने वंदनीय मानकर इसे पूजाघर में रख दिया और रोज इसे धूप-दीप दिखा रहे हैं। आज आवश्यकता है कि संस्कृत को पूजाघर से निकालकर प्रयोग में लाया जाए और इसके माध्यम से अपने जीवन को समुन्नत बनाया जाए। &lt;br /&gt;आज कम्प्यूटर के इस युग में आधुनिक वैज्ञानिकों ने भी संस्कृत को कम्प्यूटर के लिए सर्वाधिक योग्य भाषा माना है। ऐसे में युवाओं के लिए इसमें काफी अवसर हैं। संस्कृत को कम्प्यूटर के हिसाब से विकसित करने की बात की जा रही है और इसकी धीमी गति पर चिंता भी जताई जाती है, तो मैं बस इतना ही कहना चाहूंगा कि देववाणी को मन से मानव की भाषा के रूप में जब हम अपना लेंगे तो यह मशीनों को भी रास आने लगेगी और संस्कृतनिष्ठ युवकों के लिए अवश्य ही रोजगार के द्वार खुलेंगे। संस्कृत पढऩे वालों के लिए अवसरों की कमी कदापि नहीं होगी, बशर्ते वे अपने आंख-कान खोले रखें, अन्यथा इंजीनियर भी ट्यूशन पढ़ाकर घरखर्च चला रहे हैं और डॉक्टरों को अपनी डल प्रैक्टिस में जान डालने के लिए खोजने से भी टॉनिक नहीं मिलता। इसलिए आज संस्कृत के विद्यार्थी संस्कृत पर अधिकार के साथ अन्य अन्य भाषाओं, विज्ञान, देश-दुनिया में हो रहे अनुसंधानों से खुद को अपडेट रखें और उसे संस्कृत के संदर्भ में देखने की भरसक कोशिश करें। अमरकोश के साथ फादर कामिल बुल्के की डिक्शनरी का ज्ञान भी जरूरी है।&lt;br /&gt;संस्कृत किसी जाति--परिधान-यूनिफॉर्म विशेष वालों के लिए ही है, इस अवधारणा को भी हमें छोडऩा होगा। आज संस्कृत पढऩे-जानने वालों को चाहिए जहां कहीं उन्हें कोई संस्कृतानुरागी मिले तो आगे बढ़कर हृदय से उसे अपनाएं, यथोचित मार्गदर्शन करें। दूसरे शब्दों में कहूं तो हमारे लिए कोई भी त्याज्य नहीं हो और हम किसी के लिए अग्राह्य न हो पाएं। &lt;br /&gt;एक बात और, स्कूल-कॉलेजों में संस्कृत की शिक्षा देने के साथ ही इसे आमजन के बीच ले जाना होगा। विभिन्न प्रोफेशनल्स को यदि उनके विषय से संबंधित संस्कृत ग्रंथों के बारे में भी बताया जाए तो यह मणिकांचन संयोग बनेगा। आज किसी फिजिशियन और सर्जन को आयुर्वेद का भी ज्ञान हो तो अपने रोगियों का और भी बेहतर इलाज कर सकता है। सिविल इंजीनियर यदि वास्तु विज्ञान के ज्ञान से भी लैस हों तो उनके बनाए भवनों की गुणवत्ता के क्या कहने। किसी न्यायाधीश को न्यायिक दर्शन की भी जानकारी हो तो उसके फैसले अन्य जजों को लिए भी अनुकरणीय हो जाएंगे। &lt;br /&gt;आज हम जिस दौर में जी रहे हैं, ऐसा लगता है कि भ्रष्टाचार ने सदाचार को पग-पग पर पटखनी देने की ठान ली है और मनुष्य की भौतिक सुखों की लिप्सा ऐसे में आग में घी का काम करती है। जीवन मूल्यों के पतन का ऐसा सिलसिला चल निकला है कि इससे उबरने का कोई मार्ग दिखाई नहीं देता। एक शायर के शब्दों में कहूं तो -&lt;br /&gt;पीछे बंधे हैं हाथ और तय है सफर।&lt;br /&gt;किससे कहें कि पांव के कांटे निकाल दे।। &lt;br /&gt;तो आचरण में अशुद्धि, जीवन मूल्यों की क्षति के इस दौर में एकमात्र संस्कृत में वह ताकत है जो इस कांटे को निकालकर मानव को संस्कारित करके उचित मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे सकेगी और इसकी सामयिकता सदैव असंदिग्ध बनी रहेगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-1566962998994858392?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/1566962998994858392/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=1566962998994858392' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/1566962998994858392'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/1566962998994858392'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='सदैव सामयिक है संस्कृत'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-1873675871366065368</id><published>2011-05-17T10:54:00.000-07:00</published><updated>2011-05-17T12:29:17.744-07:00</updated><title type='text'>कलम की ताकत से मिटाएं भ्रष्टाचार</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-93axq0QbTv4/TdLMf-3EcdI/AAAAAAAAARE/msEvA2pS860/s1600/DSC_0617.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 268px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-93axq0QbTv4/TdLMf-3EcdI/AAAAAAAAARE/msEvA2pS860/s400/DSC_0617.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5607769335851676114" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;राजस्थान उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश और मधुर गीतों-गजलों के रचयिता जस्टिस शिवकुमार शर्मा ने कहा कि पारदर्शिता के अभाव में भ्रष्टाचार पनपता है, जो लोकतंत्र के लिए दीमक की तरह है, इसलिए पत्रकारों को चाहिए कि भ्रष्टाचार मुक्त भारत के लिए कलम का इस्तेमाल करें। वे मंगलवार को शहर के गणमान्य पत्रकारों और साहित्यकारों से मुखातिब थे। राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी की ओर से प्रकाशित और वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेश उपाध्याय लिखित पुस्तक  'पत्रकारिता : आधार, प्रकार और व्यवहारÓ के लोकार्पण समारोह में मुख्य अतिथि पद से बोलते हुए उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जनता का स्थान सबसे ऊपर है, लेकिन वर्तमान में जनता ही सबसे उपेक्षित हो गई है। ऐसा लगता है जैसे लोकतंत्र शीर्षासन करने को बाध्य है। ऐसे में पत्रकारों का दायित्व है कि वे लोकतंत्र को इसके मूल स्वरूप में लाएं। उन्होंने अपनी नई गजल के दो शेरों से अपने वक्तव्य का समान यूं किया : &lt;br /&gt;शजर हरे कोहरे के पीछे थे,&lt;br /&gt;दर्द कई चेहरे के पीछे थे।&lt;br /&gt;घुड़सवार दिन था और हम,&lt;br /&gt;अनजाने खतरे के पीछे थे। &lt;br /&gt;इससे पहले डॉ. राजेश कुमार व्यास ने पुस्तक की उपादेयता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस पुस्तक में पत्रकारिता की अकादमिक की बजाय व्यावहारिक शिक्षण की बात बड़े ही सरल और सहज तरीके से बताई गई है। इसमें पत्रकारिता के दौरान कार्य-व्यवहार के दौरान आने वाले द्वंद्व का उल्लेख करते हुए उनसे पार पाने का भी रास्ता सुझाया गया है। भाषा उपदेशात्मक नहीं होने से संप्रेषणीयता बहुत ही अच्छी है। &lt;br /&gt;ेलेखक ज्ञानेश उपाध्याय ने पुस्तक-सृजन और इसके उद्देश्यों में संक्षेप में अपनी बात कही। 'मुझे जो लिखना था, मैंने पुस्तक में लिख दी, अब पाठक और आलोचक इसकी विवेचना करें Ó कहते हुए उन्होंने सधे हुए वक्ता की तरह गेंद सामने वालों के पाले में डाल दी। &lt;br /&gt;वरिष्ठ पत्रकार दिनेश ठाकुर ने कहा कि इस पुस्तक में अच्छे पत्रकार के गुणों का उल्लेख तो है ही, पत्रकार को अपने पेशे के प्रति प्रतिबद्ध होने के लिए आईना भी दिखाया गया है। हालांकि उन्होंने इस बात पर अफसोस जताया कि वर्तमान दौर में पत्रकारों में पढऩे की आदत खत्म सी होती जा रही है और इसी का परिणाम है कि आज की पीढ़ी के पत्रकारों में कमलेश्वर, धर्मवीर भारती, राजेंद्र माथुर जैसी प्रतिभाओं के दर्शन नहीं होते। &lt;br /&gt;विशिष्ट अतिथि राजस्थान विश्वविद्यालय में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष डॉ. संजीव भानावत ने कहा कि पुस्तक में पत्रकारिता की अंदरूनी स्थितियों को सामने रखने के साथ ही शब्दों की सत्ता को बचाने की ईमानदार कोशिश की गई है। उन्होंने कहा कि इस पुस्तक से नवागत पत्रकारों को मार्गदर्शन मिल सकेगा। उन्होंने   पत्रकारिता की अंदरुनी स्थितियों को सामने रखने के साहस की भी सराहना की। डॉ. भानावत ने कहा कि पुस्तक में पत्रकारिता में स्थापित प्रतिमानों पर नए तरीके से विचार किया गया है तथा सिद्धांत खो चुके प्रतिमानों पर बेबाक टिप्पणी की गई है। इसके माध्यम से शब्द की सत्ता को बचाने की ईमानदार कोशिश की गई है। भाषा-प्रवाह से पुस्तक काफी रोचक बन पड़ी है और पाठक जब एक बार इसे पढऩा शुरू करता है तो पूरा करके ही दम लेता है। (डॉ. भानावत के इस कथन की पुष्टि अन्य वक्ताओं ने भी अपने संबोधन में की।)   &lt;br /&gt;अध्यक्षता करते हुए अकादमी निदेशक डॉ. आर. डी. सैनी ने कहा कि हिंदी पत्रकार को अन्वेषी होने के साथ ही तथ्यों पर पैनी दृष्टि रखनी चाहिए। उन्होंने राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी की ओर से पत्रकारिता के लिए प्रकाशित पुस्तकों के बारे में भी काफी कुछ बताया। कार्यक्रम का प्रभावी संचालन मोअज्जम अली ने किया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-1873675871366065368?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/1873675871366065368/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=1873675871366065368' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/1873675871366065368'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/1873675871366065368'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2011/05/blog-post_17.html' title='कलम की ताकत से मिटाएं भ्रष्टाचार'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-93axq0QbTv4/TdLMf-3EcdI/AAAAAAAAARE/msEvA2pS860/s72-c/DSC_0617.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-1043837962753146181</id><published>2011-05-01T11:12:00.001-07:00</published><updated>2011-05-01T11:12:34.368-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सरोकार'/><title type='text'>सिर्फ एक प्रतिशत...</title><content type='html'>राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण समिति की ओर से झालाना स्थित राज्य संदर्भ केंद्र परिसर में पिछले दिनों 'जापान की आपदा : हमारी विपदाÓ विषयक संगोष्ठी आयोजित की गई।  जापानी लेखिका तोमोको किकुचि, प्रसिद्ध लेखिका डॉ. राज बुद्धिराजा, डॉ. डी. आर. मेहता आदि ने संबोधित किया।  इस अवसर पर प्रौढ़ शिक्षण समिति और प्राकृत भारती की ओर से प्रकाशित पुस्तक 'जापान की आपदा : हमारी विपदाÓ और पोस्टर 'धरती की चिंताÓ का लोकार्पण किया गया। संगोष्ठी के अंत में समिति की सचिव डॉ. अंजू ढढ्ढा मिश्र ने संकल्प पत्र प्रस्तुत किया। प्रस्तुत है संकल्प पत्र :  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जापान के निवासियों पर गुजरी हृदय विदारक विभीषिका में हम सबकी संवेदना वहां के निवासियों के साथ है। इस भयंकर दुर्घटना से जूझने में जापान के निवासियों ने जिस सामथ्र्य, साहस और संयम का परिचय दिया है, वह दुनिया में एक सराहनीय मिसाल बन गया है। आइए, इसी आत्मबल का प्रयोग हम ऐसी विभीषिकाओं की संभावनाओं से लडऩे में करें, जिससे ऐसी स्थिति दुनिया को दोबारा न झेलनी पड़े। &lt;br /&gt;दुनिया के ऊर्जा उत्पाद का जितना भाग आणविक ऊर्जा से प्राप्त होता है, उतना हम अपने आत्मबल से सहज ही बता सकते हैं। आइए, प्रतिज्ञा करें कि हम अपने जीवन, घर, संस्थान जहां भी हैं, वहां संसाधनों का दोहन सिर्फ एक प्रतिशत कम कर लें। हमारी यह छोटी सी चेष्टा दुनिया के वंचितों को उनके जीवन यापन के साधन मुहैया कराने के साथ ही हमें पर्यावरण संबंधी खतरों से मुक्त करा सकती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-1043837962753146181?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/1043837962753146181/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=1043837962753146181' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/1043837962753146181'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/1043837962753146181'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2011/05/blog-post.html' title='सिर्फ एक प्रतिशत...'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-3899802651812465228</id><published>2011-04-01T11:58:00.000-07:00</published><updated>2011-04-01T12:00:04.634-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सोचें तो सही'/><title type='text'>'अभिमन्युओंÓ का बलिदान लेता रहेगा जमाना</title><content type='html'>आज सुबह से ही मन खिन्न है, उदास है। पत्नी और बेटा बार-बार कारण पूछते रहे, लेकिन क्या बताता उनसे, ऐसा लगता है जैसे शब्द बेमानी हो गए हों। आजीविका के कारण मां-बाबूजी, घर-गांव-समाज, मित्र मंडली बहुत कुछ पीछे छूट गया, लेकिन किसी न किसी रूप में उनसे जुड़े रहने की कोशिश नहीं छोड़ी। पहले पत्र लिखता था, लेकिन जब प्रत्युत्तर आने बंद हो गए, तो धीरे-धीरे मेरा पत्रलेखन भी दम तोड़ चला। अब मोबाइल का युग है और उसी के सहारे संबंधों का सेतु बनाने का भरसक प्रयत्न करता हूं।  &lt;br /&gt;सुबह घर फोन किया तो मां के स्वर में उदासी थी। कई तरह की शंकाएं मन में तैरने लगीं। मैं चिंतित न होऊं, इसलिए मां कई बार मुझसे अपनी परेशानियों को साझा नहीं करतीं। बार-बार पूछने पर उन्होंने बताया कि पड़ोस का एक युवक सड़क हादसे में असमय काल के गाल में समा गया। वह बस कंडक्टर था और छुट्टी के दौरान गांव में ही कहीं जा रहा था कि किसी अज्ञात वाहन ने उसे टक्कर मार दी थी। उसका चेहरा सामने घूमने लगा। संयोगवश पिछली बार गांव की यात्रा के दौरान उसी की बस से गांव से पटना आया था। उसने बस लेकर अजमेर शरीफ आने पर जयपुर में मुझसे मिलने की बात कही थी, लेकिन उसकी यह इच्छा अधूरी ही रह गई।&lt;br /&gt;मां ने एक और हादसे की सूचना दी। अपनी बेरोजगारी के दिनों में गांव के एक सज्जन बचपन में मुझे ट्यूशन पढ़ाया करते थे। अब शिक्षक की नौकरी से सेवानिवृत्त होकर गांव में ही रह रहे हैं। उनका पुत्र जो शायद गांव के ही स्कूल में शिक्षा मित्र या शिक्षक के पद पर कार्यरत था, वह भी अज्ञात वाहन की चपेट में आ गया। दोनों ही हादसे में मृतक मोटरसाइकिल से ही कहीं जा रहे थे। मोटरसाइकिल की स्पीड कितनी थी या किसकी गलती से हादसा हुआ, यह बताने वाला कोई नहीं है, क्योंकि दोनों ही हादसे ऐसी जगहों पर हुए, जहां सड़क किनारे बाग-बगीचे, खेत आदि ही हैं। ऐसे में कौन किसे दोषी ठहराए, लेकिन इन युवकों के मां-बाप, पत्नी, मासूम बच्चों व अन्य परिजनों को ढाढस बंधाने के लिए किसी के पास शब्द नहीं हैं।  &lt;br /&gt;बदलते हुए जमाने के साथ समय की कमी और अधिक गति की चाहत के कारण मोटरसाइकिल की ख्वाहिश अब विलासिता की बजाय जरूरत बनती जा रही है। इसके बावजूद गांव-देहात में हैलमेट नहीं पहनने का चलन भी जीवन पर भारी पड़  रहा है। शहरों की तरह सरकार को गांवों में भी दुपहिया वाहन चालकों के लिए हैलमेट पहनने की अनिवार्यता पर सख्ती करनी चाहिए अन्यथा यूं ही हादसे इन 'अभिमन्युओंÓ का बलिदान लेते रहेंगे। हालांकि मौत सबसे बड़ा सच है और इसे झुठलाया नहीं जा सकता, लेकिन जब यह इस तरह आती है तो समझना-समझाना मुश्किल हो ही जाता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-3899802651812465228?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/3899802651812465228/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=3899802651812465228' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/3899802651812465228'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/3899802651812465228'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2011/04/o.html' title='&apos;अभिमन्युओंÓ का बलिदान लेता रहेगा जमाना'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-5566166385884701325</id><published>2011-03-23T11:42:00.001-07:00</published><updated>2011-03-23T11:42:34.416-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जरा सोचिए'/><title type='text'>पटरी पर ही निबटेंगे...</title><content type='html'>जब से सृष्टि की शुरुआत हुई है, तभी से शाश्वत सत्य की तरह प्रवृत्ति और निवृत्ति की परंपरा भी शुरू हो गई। सद्ग्रंथों से लेकर महापुरुषों तक ने समय-समय पर विभिन्न प्रसंगों में इसकी व्याख्या की, लेकिन यहां मेरा उद्देश्य उन उपदेशों की पुनरावृत्ति करना नहीं है। मैं तो सामान्य से मानव प्रवृत्ति की बात कर रहा हूं। पेट भरने की समस्या जितनी ज्वलंत है, शारीरिक प्रक्रिया उसी हिसाब से इसे खाली करने में यदि सक्षम नहीं हो तो आदमी को कई सारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। आज यदि हमारे देश में लाखों लोग पेट नहीं भर पाने की समस्या से ग्रसित हैं तो हजारों लोग ऐसे भी हैं जो समय से पेट खाली नहीं होने के कारण वैद्यों-डॉक्टरों की शरण में जाकर भांति-भांति की चूरण-चटनी-पाचक का सेवन करने को बाध्य हैं। मन मुताबिक भोजन मिलने से जितनी संतुष्टि होती है, सुबह-सुबह बिना किसी रुकावट फारिग होने से होने वाला सुख भी उससे कम नहीं होता। &lt;br /&gt;तो बात फिर वहीं आती है कि सृष्टि की शुरुआत से ही पेट भरने के साथ ही निबटना भी मूलभूत आवश्यकताओं में से एक रही है। भारत गांवों का देश है, तो जाहिर सी बात है कि सभी गांवों में दशकों पहले शौचालय नहीं थे, आज भी हजारों गांवों में शौचालय नहीं हैं। शौचालय की सुविधा हो न हो,  निबटना तो पड़ेगा ही, सो आदमी ने अपनी सुविधा के हिसाब से विकल्प चुनने शुरू किए होंगे। खेतों से लेकर जंगल तक को उसने निबटने का आश्रय स्थल बनाया। सभ्यता के विकास के साथ पगडंडियां जब कच्ची सड़कों में तब्दील हुई होंगी तो उसके किनारे भी विकल्प के रूप में मनुष्य के सामने आए और उसने इसे बखूबी अपनाया और आज पक्की सड़कों, जीटी रोड, चमचमाती फोर लेन सड़कों के किनारे भी सुबह-शाम निबटने वालों की परेड आसानी से दृष्टिगोचर हो जाते हैं। &lt;br /&gt;अंग्रेजों ने सोने की चिडिय़ा समझकर भारत को भले ही खूब लूटा, लेकिन कई मायनों में उन्होंने विकास का मार्ग भी प्रशस्त किया। इसी कड़ी में वर्ष 1853 में भारत में पहली रेलगाड़ी चली। रेलगाड़ी चलने से पहले पटरी बिछाई गई और देशवासियों ने ट्रेन का सफर शुरू करने से पहले पटरी के किनारे या पटरी पर बैठकर निबटने का अपना मौलिक कर्तव्य निभाया। बदलते हुए समय के साथ बाकी सब कुछ बदल गया हो, लेकिन यह परंपरा आज भी सुदूर गांव-देहात से लेकर बड़े-बड़े महानगरों तक बखूबी जारी है। &lt;br /&gt;रेल की दोनों पटरी भले ही अलग-अलग चलती हों, लेकिन वे मुसाफिर को उसके गंतव्य तक पहुंचा देती हैं। इसी से साहित्यकारों-व्याकरणाचार्यों ने पटरी बिठाने की बात कही। &lt;br /&gt;भारत में जब स्वतंत्रता संग्राम लड़ा जा रहा था, तब अंग्रेजों का राज था और सात समंदर पार बैठी ब्रिटिश शासन व्यवस्था की कमर तोडऩे के लिए हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने रेल की पटरियां उखाड़ीं। भले ही देश स्वतंत्र हो गया, लेकिन तथाकथित आंदोलनकारी आज भी रेल यातायात बाधित करने से ही अपने संघर्ष की शुरुआत करते हैं। हमारे शासकों में भी अब इतना दमखम नहीं बचा कि वे इन आंदोलनकारियों से निबटने की माकूल योजना बना सकें। गुर्जरों ने आरक्षण के लिए राजस्थान में कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला के नेतृत्व में रेल की पटरी पर पड़ाव डाला। कई चरणों में हुए इस आंदोलन में उन्हें कुछ उपलब्धि भी मिली और इसका प्रतिफल यह हुआ कि पटरी पर पड़ाव डालना आज रोल मॉडल हो गया है। गुर्जरों के बाद अब जाट समुदाय कई सप्ताह से पटरियों पर रास्ता रोककर बैठा है। सैकड़ों ट्रेनें रोज रद्द हो रही हैं, सैकड़ों को रूट डायवर्ट कर चलाया जा रहा है। इससे हजारों-लाखों यात्रियों को जो परेशानी हो रही है, वह तो है ही, रेलवे को भी प्रतिदिन करोड़ों का नुकसान हो रहा है, लेकिन जाट हैं कि एक ही रट लगाए बैठे हैं...आरक्षण के मसले पर पटरी पर ही निबटेंगे। देखते हैं देश के तथाकथित कर्ता-धर्ता कब तक शेष देशवासियों, विशेषकर रेलयात्रियों की राह कब तक सुगम कर पाते हैं। काश! किसी राजनीतिक दल में यह हिम्मत होती या सभी राजनीतिक दल मिलकर आरक्षण की इस अमरबेल को मिटाने का साहस दिखा पाते जो हमारे देश की प्रतिभा की जड़ों को खोखला कर रही है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-5566166385884701325?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/5566166385884701325/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=5566166385884701325' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/5566166385884701325'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/5566166385884701325'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2011/03/blog-post.html' title='पटरी पर ही निबटेंगे...'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-8140077535689236462</id><published>2011-01-14T11:30:00.000-08:00</published><updated>2011-01-14T11:31:58.827-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='निवेदन'/><title type='text'>तिलकुट भरबे : मकर संक्रांति पर कर्तव्य निभाने का वादा</title><content type='html'>आज यानी 14 जनवरी को परंपरागत रूप से देशभर में मकर संक्रांति का त्योहार मनाया गया। वर्षों से यह पर्व नियत तारीख यानी 14 जनवरी को मनाया जाता है। हां,  कभी-कभी हिंदी तिथियों में घट-बढ़ या अन्य कारणों से 15 जनवरी को भी लोग मकर संक्रांति का पर्व मनाते हैं। हिंदी पंचांगों के जानकारों के अनुसार इस बार भी दान-पुण्य के लिए 15 जनवरी ही श्रेष्ठतर रहेगा, इसके बावजूद मकर संक्रांति का उल्लास तो 14 जनवरी को ही दिखा। &lt;br /&gt;विशाल भारत देश की विस्तृत भौगोलिक बसावट के साथ ही धार्मिक-सांस्कृतिक मान्यताएं और परंपराएं भी प्रत्येक 200-400 किलोमीटर के बाद बदल जाया करती हैं, सो लोगों ने अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुसार यह पर्व मनाया। पैतृक गांव से दूर रहते हुए आज बरबस ही मकर संक्रांति की बिहार से जुड़ी यादें मानस पटल पर छा गईं। पूस-माघ की तेज सर्दी के बावजूद सभी भाई-बहनों में सुबह सबसे पहले नहाने की होड़ सी मच जाती थी, जैसे कोई मैडल मिलने वाला हो। इसके बाद दादीजी एक कटोरी में भीगा हुआ चावल-तिल और गुड़ लेकर आतीं और एक-एक कर सबकी हथेली पर देकर पूछतीं-तिलकुट भरबे? उनके सिखाए अनुसार ही जवाब में हम  'हांÓ कहते।  यह क्रम वे तीन बार दुहरातीं। जब थोड़ी चेतना जगी तो मां से इसके बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि इसका मतलब है कि जब वे बूढ़ी होंगी, बीमार होंगी तो उनकी सेवा और उनकी मृत्यु के बाद उनकी मुक्ति के लिए श्राद्ध-तर्पण आदि करने का वादा करना। दादीजी तो नहीं रहीं और पहले अध्ययन और आजीविका के सिलसिले में गांव छूट गया, लेकिन अब मोबाइल फोन ने मां के  प्रति अपना वादा निभाने का एक अवसर उपलब्ध कराया है, ताकि उन्हें अपनी ओर से आश्वस्त कर सकूं। पिछले कई वर्षों से यह सिलसिला चल रहा है। मकर संक्रांति के दिन स्नान-पूजा के बाद सबसे पहले घर फोन करता हूं। सबसे पहले वे यही पूछती हैं-तिलकुट भरबे? और यह सिलसिला पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहेगा और संतानें अपनी जन्मदात्री के प्रति अपना कर्तव्य निर्वहन की सीख लेती रहेंगी। नमन उन महापुरुषों को जिन्होंने इस परंपरा की शुरुआत की।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-8140077535689236462?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/8140077535689236462/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=8140077535689236462' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/8140077535689236462'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/8140077535689236462'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='तिलकुट भरबे : मकर संक्रांति पर कर्तव्य निभाने का वादा'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-1580920529580063820</id><published>2010-12-10T10:47:00.001-08:00</published><updated>2010-12-10T10:47:39.544-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जरा सोचिए'/><title type='text'>घरेलू नौकरों के अपराध : दोषी कौन?</title><content type='html'>दास और गुलाम प्रथा के विरोध में न जाने विश्व में कितने आंदोलन हुए, लेकिन आजादी के छह दशक बीतने के बाद भी भारत में लाखों लोग घरेलू नौकर के रूप में पशुओं से भी बदतर जीवन जीने को विवश हैं। मानवाधिकार दिवस पर शुक्रवार को देशभर में आयोजित कार्यक्रमों में मानवाधिकार विशेषज्ञों, मानव मात्र के पैरोकारों और बुद्धिजीवियों ने मानवाधिकार की रक्षा के बारे में बड़ी-बड़ी बातें कीं। ऐसा होना भी चाहिए। आखिर आदमी ही तो आदमी के काम आता है। इसलिए मानवाधिकारों के हनन पर चिंता जताया जाना भी चाहिए। &lt;br /&gt;मैं यहां दूसरे मुद्दे पर मुखातिब हूं और मेरा मानना है कि इस मुद्दे पर भी बात की जानी चाहिए। आए दिनों मीडिया में घरेलू नौकरों की ओर से किए जाने वाले अपराधों की खबरें आती रहती हैं। इनमें एकमत से किस्मत के मारे इन नौकरों को अविश्वसनीय, बेईमान, गद्दार, मौकापरस्त आदि विशेषणों से विभूषित किया जाता है। कोई भी यह सोचने की जुर्रत नहीं करता कि आखिरकार कौन से हालात उस बालक, किशोर या युवा को घरेलू नौकरी करने पर विवश करते हैं और किसी घर में नौकरी करते हुए एक लंबी अवधि बिताने के बाद वह क्योंकर अपराध करता है। जहां तक मैं समझता हूं, इन घरेलू नौकरों के साथ कहीं भी (अपवादस्वरूप दो-चार प्रतिशत को छोड़कर) अपनापन का व्यवहार नहीं किया जाता। आजकल तो बड़े घरानों में श्वान भी राजसी ठाठ से जीते हैं और उनकी देखरेख के लिए नियुक्त नौकर कुत्तों से भी बदतर जीवन जीने को बाध्य होते हैं। &lt;br /&gt;घरेलू नौकर इन बड़ी अट्टालिकाओं में मालिकों को लाखों-करोड़ों में खेलते देखता है। मजबूरी के मारे कभी वह मालिक से अपनी तनख्वाह बढ़ाने की गुजारिश करता है तो उसे सिरे से नकार दिया जाता है। मालिकों के लिए भांति-भांति के व्यंजन बनाने वाले नौकर को अक्सर बासी, जूठे और बचे-खुचे भोजन से ही अपना पेट भरना होता है। ऐसे में कई बार उनकी सहनशक्ति जवाब दे जाती है और वे मालिकों से मुक्ति पाने या फिर उनके समकक्ष आने के लिए मौका देखकर अपराधों को अंजाम दे देते हैं। &lt;br /&gt;चूंकि यह कदम भावावेश में उठाया गया होता है और पुलिस से बचने की तिकड़मों से अनजान ये बेचारे शीघ्र ही गिरफ्त में भी आ जाते हैं। इसके बाद इनकी यातना का दौर शुरू होता है। इनकी पीड़ा सुनने वाला कोई नहीं होता और न ही ये वकीलों के जरिये अदालत में अपना पक्ष रख पाते। अपराधियों को दंड देने का मैं कतई विरोध नहीं करता, लेकिन यह अपराध को मिटाने का उपाय नहीं है। ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए, जिसमें किसी के अपराधी बनने के मूल कारणों को खोजा जाए और उसे सुधारने के पर्याप्त अवसर दिए जाएं। उसे रोजगारोन्मुखी शिक्षण-प्रशिक्षण देकर उसके पुनर्वास के समुचित प्रयास किए जाएं। हां, इतना अवश्य किया जा सकता है कि पुलिस ऐसे लोगों की गतिविधियों पर लगातार नजर रखे और यदि कोई दुबारा अपराध की ओर अग्रसर हो तो उसके खिलाफ दंडात्मक रवैया अपनाया जाए। कुल मिलाकर जनकल्याणकारी सरकार का कर्तव्य अपराधियों को मिटाना नहीं, बल्कि अपराध को मिटाना ही होना चाहिए। हां, संगठित अपराधों के प्रति सरकार को किसी तरह की नरमी नहीं बरतनी चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-1580920529580063820?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/1580920529580063820/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=1580920529580063820' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/1580920529580063820'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/1580920529580063820'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2010/12/blog-post.html' title='घरेलू नौकरों के अपराध : दोषी कौन?'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-5030169725951092427</id><published>2010-11-24T10:40:00.000-08:00</published><updated>2010-11-24T11:33:00.769-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सरोकार'/><title type='text'>बिहार ने विकास को चुना</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/TO1oUwgYfuI/AAAAAAAAAQs/SZ9emkvWRTM/s1600/nitish.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 266px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/TO1oUwgYfuI/AAAAAAAAAQs/SZ9emkvWRTM/s400/nitish.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5543201422190345954" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;बिहार विधानसभा के लिए छह चरणों में करीब डेढ़ माह तक चली चुनाव प्रक्रिया की पूर्णाहुति बुधवार को हुई। बिहार के मतदाताओं ने एकमत से जद (यू)-भाजपा गठबंधन के पिछले पांच साल के दौरान किए गए कामकाज पर मुहर लगा दी और यह मुहर भी ऐसी कि प्रतिपक्ष का सारा गणित ही गड़बड़ा गया। चुनाव प्रचार के दौरान सोनिया-राहुल-मनमोहन समेत कांग्रेस के दिग्गजों के आरोपों और केंद्र सरकार की ओर से दी गई सहायता को सूबे के विकास में नहीं लगाने तथा अन्य आरोपों का नीतीश ने जिस शालीनता के साथ जवाब दिया, जनता शायद उससे रीझ सी गई। यही नहीं, लालू यादव-रामविलास पासवान भी अपनी आक्रामक शैली में राजग गठबंधन पर अनर्गल प्रलाप से कतई बाज नहीं आ रहे थे, लेकिन नीतीश कुमार ने न तो कभी अपना आपा खोया और न ही सलीका छोड़ा। &lt;br /&gt;देश के राजनीतिक गलियारे में जैसा कि प्रचलित है, जिस धरती पर लोकतंत्र ने पहली सांसें लीं, जातिवाद का जहर भी सबसे अधिक उसी को भुगतना पड़ा, लेकिन इस चुनाव में बिहार ने इस कलंक को काफी हद तक धो डाला। तथाकथित कई बाहुबलियों और दिग्गजों की ऐसी भद्द पिटी कि इससे उबरने में उन्हें बरसों लग जाएंगे। लालू प्रणीत राजद के पंद्रह साल के शासन के दौरान बिहार की जनता ने प्रदेश की जो दुर्गति देखी थी, वे जद (यू)-भाजपा गठबंधन सरकार के पांच साल के कार्यकाल में हुए विकास कार्यों से सहज ही अभिभूत थे।&lt;br /&gt;उन्हें लग रहा था कि विकास के इस पहिये को यदि गतिमान रखना है तो इस गठबंधन को एक और अवसर देना ही होगा। सुशासन के रथ को अग्रसर करने के लिए सारथि को बदलना कदापि बुद्धिमानी नहीं होती, जिसे बिहार के मतदाताओं ने अच्छी तरह समझा। लालू के राज में बिहारवासियों की पहचान ऐसी बन गई थी जो लालू रूपी जमूरे से परेशान होने के बावजूद चुनाव आने पर उसके इशारों पर करतब दिखाने (वोट देकर उसे दुबारा सत्तासीन करने) की मूर्खता करने को विवश था। इस चुनाव परिणाम ने उस पहचान से भी बिहारवासियों को मुक्ति दिलाई है। हां, चुनावी सभाओं के दौरान जनता ने लालू के मसखरेपन का भरपूर मजा लिया, जिससे लालू-रामविलास का मुगालता बना रहा, लेकिन बेहद चतुराई से जनता ने इसे वोट में परिणत नहीं होने दिया। &lt;br /&gt;कांग्रेस का हश्र तो यही होना था&lt;br /&gt;देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से अब तक चार दशक से अधिक समय तक कांग्रेस का एकछत्र राज रहा था और इसी अवधि में धीरे-धीरे बिहार पतन की ओर अग्रसर होता चला गया। श्रीकृष्ण सिंह के अलावा एक भी मुख्यमंत्री नहीं हुआ, जिसे बिहार में विकास कार्यों के लिए याद किया जाए। बिहार की जनता कांग्रेस को गांधी बाबा की पार्टी समझकर वोट देती रही और कांग्रेस ने इसे अपनी जागीर समझ लिया और सत्ता-लिप्ता में डूबे उसके आकाओं ने जनता को ही भुला दिया। लंबे समय तक किसी को बेवकूफ बनाना सर्वथा असंभव है, सो बिहार की वर्तमान पीढ़ी ने इस सत्य को समझ लिया कि कांग्रेस तो कब की गांधी को ही भूलकर भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी हुई है तो फिर इसे परे झटकना ही श्रेयस्कर है। &lt;br /&gt;विकास पुरुष बने रहेंगे आदर्श&lt;br /&gt;नई पीढ़ी के मतदाता अपना हित-अहित अच्छी तरह समझते हैं। इन्हें मंडल-कमंडल, जाति-संप्रदाय के भुलावों से नहीं बहलाया जा सकता। जो अच्छे काम करेगा, वही राज करेगा। इसका प्रमाण सबसे पहले नरेंद्र मोदी ने दिया जो नॉन बीजेपी सभी दलों के सामूहिक प्रयासों के बावजूद तीन विधानसभा चुनावों से अपना परचम लहराए हुए हैं। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान, छत्तीसगढ़ में रमण सिंह, उड़ीसा में नवीन पटनायक आदि को विकास कार्यों की बदौलत ही जनता ने पंचवर्षीय परीक्षा में सौ में से सौ अंक दिए। जनता को चाहिए काम, काम और बस काम....और ऐसा नहीं करने वालों का मिट जाएगा नाम। &lt;br /&gt;जनता को लगी अपनी जीत&lt;br /&gt;चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में नीतीश कुमार ने इसे जनता की जीत बताया और जनता ने भी इसे अपनी जीत समझा। बिहार से बाहर रह रहे बिहार के लोग चुनाव परिणाम देखने के लिए सुबह से ही टेलीविजन के सामने बैठ गए थे और हर कोई बिहार स्थित अपने सगे-संबंधियों और मित्रों से फोन कर अपने गृह जिले के परिणाम को जानने को उत्सुक था। दोपहर बाद जब जद (यू)-भाजपा गठबंधन को आशातीत सफलता की पुष्टि हो गई तो एक-दूसरे को बधाई देने का सिलसिला शुरू हो गया। हर किसी को यही लग रहा था जैसे वह खुद जीत गया हो।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-5030169725951092427?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/5030169725951092427/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=5030169725951092427' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/5030169725951092427'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/5030169725951092427'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2010/11/blog-post_24.html' title='बिहार ने विकास को चुना'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/TO1oUwgYfuI/AAAAAAAAAQs/SZ9emkvWRTM/s72-c/nitish.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-5501989817626576798</id><published>2010-11-04T11:16:00.001-07:00</published><updated>2010-11-04T11:18:12.868-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यादें बाकी'/><title type='text'>लीपने से विहंस उठता था आंगन</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/TNL4zzP21uI/AAAAAAAAAQk/O1fWpjblNAQ/s1600/Diwali_Diya.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 300px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/TNL4zzP21uI/AAAAAAAAAQk/O1fWpjblNAQ/s400/Diwali_Diya.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5535760460805494498" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;अपने देश में भले ही बड़ी-बड़ी आवासीय अट्टालिकाएं और व्यावसायिक कॉम्पलेक्स बन चुके हैं, इसके बावजूद सचाई यह है कि भारत की आत्मा आज भी गांवों में ही बसती है। बात दीगर है कि सबको पेट भरने वाले अन्नदाता किसान ही दो वक्त की रोटी के लिए मोहताज हैं। खैर, अभी त्योहार का माहौल है और ऐसी गंभीर बातें करने का मेरा भी इरादा नहीं है, लेकिन इसे नकारा भी नहीं जा सकता। &lt;br /&gt;मैं दिवाली की पूर्व संध्या पर आपसे अपनी पुरानी यादें शेयर करने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूं। श्रीमतीजी कई दिनों से यथाशक्ति घर की साफ-सफाई में लगी हैं और मन ही मन हाथ न बंटाने के लिए मुझे कोसने से भी बाज नहीं आतीं। &lt;br /&gt;गुलाबी नगर में लोगों ने एक-डेढ़ महीने पहले से घरों में रंग-रोगन का काम शुरू करवा दिया था और अब उन पर चीन से आई सस्ती बिजली की लड़ियां जगमगा रही हैं। इन घरों की आभा आंखों को भाती जरूर है, लेकिन उस उल्लास का उत्स कहीं नहीं दिखता। गांवों में ऐसे पर्व-त्योहारों पर घर-आंगन को गोबर से लीपा जाता है, तो उसे देखकर लगता है जैसे आंगन विहंस उठा हो। उसकी चमक और महक अतुलनीय होती है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के शब्दों में कहूं तो---चमन में फूल खिलते हैं, वन में हंसते हैं।--तो मुझे भी कुछ ऐसी ही अनुभूति इस महानगर में होती है। लगता है बहुत कुछ पीछे छूट गया है, जिसे चाहकर भी साथ में सहेजकर नहीं रखा जा सकता। हां, यादें हैं तो सांसों के साथ अंतिम समय तक बनी रहेंगी। &lt;br /&gt;सभी ब्लॉगर साथियों को इन शब्दों में ज्योतिपर्व दीपावली की मंगलकामनाएं----------&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;फैले यश का उजास&lt;br /&gt;पूरे हों सकल आस&lt;br /&gt;इस बार की दिवाली&lt;br /&gt;आपके लिए हो खास....&lt;br /&gt;आप सब पर मां महालक्ष्मी की कृपा बनी रहे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-5501989817626576798?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/5501989817626576798/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=5501989817626576798' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/5501989817626576798'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/5501989817626576798'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='लीपने से विहंस उठता था आंगन'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/TNL4zzP21uI/AAAAAAAAAQk/O1fWpjblNAQ/s72-c/Diwali_Diya.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-8102660489424101875</id><published>2010-10-22T12:04:00.000-07:00</published><updated>2010-10-22T12:48:30.682-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='निवेदन'/><title type='text'>पूजा नहीं, पढ़ने के लिए हैं संस्कृत ग्रंथ</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/TMHqbvghP5I/AAAAAAAAAQc/NGSrssyrYtg/s1600/DSC_1028.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 263px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/TMHqbvghP5I/AAAAAAAAAQc/NGSrssyrYtg/s400/DSC_1028.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5530959579717910418" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;महर्षि वाल्मीकि जयंती पर शुक्रवार को जयपुर के सूचना केंद्र में पूर्व आईपीएस अधिकारी और बिहार राज्य धार्मिक न्यास परिषद के अध्यक्ष आचार्य किशोर कुणाल का व्याखान सुनने का सुअवसर राजस्थान संस्कृत अकादमी ने उपलब्ध कराया। कुणाल ने वाल्मीकि रामाय का सामाजिक महत्व पर अपने उद्बोधन में रामायण का जो नवनीत श्रोताओं के समक्ष रखा, वह इतना उत्कृष्ट था कि श्रोता उसमें निमग्न से होते रहे। किशोर वय से कुणाल के विषय में सुना था, उनकी ईमानदारी, संस्कृत प्रेम, मानव सेवा आदि के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था। उनके अध्यात्म प्रेम का प्रमाण तो पटना जंक्शन पर उतरते ही होता है, जब महावीर मंदिर का गुंबद आपको नजर आता है। इस मंदिर में सब कुछ इतना व्यवस्थित है कि मन प्रफुल्लित और गौरवान्वित हो उठता है। महावीर मंदिर न्यास की ओर से पटना में ही संचालित महावीर कैंसर अस्पताल (हनुमानजी का एक नाम महावीर भी है) भी बिहार के कैंसर रोगियों के लिए वरदान सरीखा है। खैर, किशोर कुणाल के विषय में कुछ भी कहना सूरज को दीपक दिखाने के समान है, लेकिन भारतीय परंपरा इसकी भी अनुमति देती है। &lt;br /&gt;कुणाल का कहना था कि महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में राम का जो चरित्र उपस्थापित किया है, वह अतुलनीय है। महर्षि वाल्मीकि और महर्षि वेदव्यास ने क्रमशः रामायण और महाभारत के माध्यम से मानवता को जो सीख दी है, उस पर यदि अमल किया जाता तो यह धरती स्वर्ग हो जाती। रामायण में राम और भरत के माध्यम से बताया गया कि संबंध निर्वाह में स्वार्थपरता का कोई स्थान नहीं है और ऐसे में सर्वत्र मंगल ही मंगल होता है, त्याग की भावना के आधार पर ही सुदृढ़ समाज की रचना संभव है, जबकि महाभारत में दुर्योधन ने स्वार्थान्धता के कारण सूई की नोक के बराबर जमीन भी पांडवों को न देने की घोषणा करके जिस दुस्साहस का परिचय दिया, उसकी परिणति संपूर्ण भारत के महाविनाश से हुई। वाल्मीकि ने अपने महाकाव्य से रचनात्मकता का संदेश दिया, जबकि व्यास ने चेतावनी दी कि स्वार्थ के वशीभूत रहोगे तो विनाश अवश्यंभावी है। आचार्य कुणाल के व्याख्यान में जो कुछ था, उसका अवगाहन ही किया जा सकता है, उसे शब्दों में बांधने का सामर्थ्य मुझमें कतई नहीं है। सीता निर्वासन प्रसंग की चर्चा के दौरान कुणाल इतने भावुक हो उठे कि उनकी आंखों से अश्रुधारा बह निकली और गला रूंध सा गया। &lt;br /&gt;इससे पहले राजस्थान विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के प्रोफेसर नंदकिशोर पाण्डेय ने रामायण में वर्णित राम-भरत मिलन के सूत्र को पकड़कर तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था की अद्भुत व्याख्या की। चित्रकूट में राम-भरत संवाद के दौरान वर्णित श्लोकों की व्याख्या उन्होंने वर्तमान संदर्भ से जोड़ते हुए  बखूबी किया। हिन्दी के साथ संस्कृत भाषा पर भी उनका अधिकार सुनते ही बनता था। उन्होंने कहा कि इसमें दो राय नहीं है कि तुलसीदास ने रामकथा को जन-जन तक पहुंचाया, लेकिन रामकथा तुलसी के प्रादुर्भाव से हजारों वर्ष पहले भी भारत ही नहीं, बल्कि भारत से बाहर भी प्रचलित थी। उन्होंने इसके पक्ष में कई प्रमाण भी दिए। &lt;br /&gt;अध्यक्षीय उद्बोधन में संस्कृत मनीषी देवर्षि कलानाथ शास्त्री का कहना था कि कथा-प्रवचन सरीखे सार्वजनिक कार्यक्रमों में ऐसे विद्वानों के व्याख्यान होने चाहिए, ताकि आमजन संस्कृत और भारतीय संस्कृति में छिप गूढ़ तत्वों से अवगत होकर इसे आचरण में ला सके। &lt;br /&gt;मैं समझता हूं कि भारतीय संस्कृत ग्रंथों में ज्ञान का जो खजाना भरा पड़ा है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। श्रीमद्भगवद्गीता और रामचरितमानस अमूमन प्रत्येक हिन्दू घर में अवश्य होता है, लेकिन अफसोस इसे लाल कपड़े में बांधकर पूजाघर में रख दिया गया है। परिवार के लोग प्रतिदिन स्नान के बाद इन ग्रंथों में अगरबत्ती दिखाना नहीं भूलते। अब जरूरत है कि इन ग्रंथों को पूजाघर से निकालकर ड्राइंग रूम और घर की पुस्तकालय में प्रतिष्ठित किया जाए और नियमित रूप से इनका स्वाध्याय किया जाए और इससे जीवन प्रबंधन और सफलता का नवनीत निकालकर उससे जीवन को धन्य किया जाए। माता-पिता खुद भी संस्कृत ग्रंथों का अध्ययन करें औऱ अपनी संतान को भी इसके लिए प्रेरित करें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-8102660489424101875?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/8102660489424101875/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=8102660489424101875' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/8102660489424101875'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/8102660489424101875'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2010/10/blog-post_22.html' title='पूजा नहीं, पढ़ने के लिए हैं संस्कृत ग्रंथ'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/TMHqbvghP5I/AAAAAAAAAQc/NGSrssyrYtg/s72-c/DSC_1028.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-901322607515637417</id><published>2010-10-18T11:36:00.000-07:00</published><updated>2010-10-18T11:49:21.776-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='निवेदन'/><title type='text'>हवा का रुख तो भांपो</title><content type='html'>बड़े-बुजुर्ग कहा करते हैं कि हवा का रुख भांपकर ही कोई काम करना चाहिए। किसानों के लिए तो यह कई मायने में बहुत ही जरूरी हुआ करता है। हवा का रुख देखकर ही तय करते हैं कि किस हवा का प्रभाव उनकी फसलों के लिए कैसा रहेगा। बारिश के मौसम में मैंने कई बार पिताजी को कहते सुना करता था कि किस नक्षत्र में किस हवा के प्रभाव से बरसात हुआ करेगी और यह अक्सर सच भी साबित हुआ करती थी। विशेषकर गेहूं और धान तैयार करते समय हवा की उपादेयता काफी महत्वपूर्ण हुआ करती है। अब तो कई बार किसानों को टेबल फैन या पेडेस्टल फैन लगाकर भी गेहूं से भूसा उड़ाते देखने का मौका मिल जाता है। समुद्र में मछली पकड़ने वाले मछुआरों के लिए हवा का रुख का आकलन जीविका ही नहीं, जीवन के लिहाज से भी काफी महत्वपूर्ण होता है। &lt;br /&gt;हवा के रुख की महत्ता का अहसास आज सुबह बेटे ने कराया। वह अपनी कॉलोनी के सामुदायिक केंद्र में सामूहिक रूप से आयोजित रावण-दहन देखने गया था। वहां जब रावण के पुतले में आग लगाई गई तो आधा ही पुतला जल पाया। बच्चा कह रहा था कि आग लगाने वालों ने हवा का रुख भांपे बिना आग लगा दी, जिससे ऐसा हुआ और लोगों को रावण-दहन का पूरा मजा नहीं आया। कल रात को ऑफिस में भी फोटोग्राफर कह रहे थे कि कई स्थानों पर रावण के पुतले अधजले रह गए, या फिर उन्हें जलाने में अतिरिक्त मशक्कत करनी पड़ी और दर्शकों का मजा भी किरकिरा हुआ। ऐसे में यह सोचने पर विवश होना पड़ता है कि विज्ञान चाहे जितनी तरक्की कर ले लेकिन पुराने समय से चली आ रही मान्यताओं की उपयोगिता कभी खत्म नहीं हो सकेगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-901322607515637417?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/901322607515637417/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=901322607515637417' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/901322607515637417'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/901322607515637417'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2010/10/blog-post_18.html' title='हवा का रुख तो भांपो'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-168099213229773349</id><published>2010-10-16T13:08:00.000-07:00</published><updated>2010-10-16T13:43:46.875-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आत्मनिवेदन'/><title type='text'>ऐसे तो नहीं मरेगा रावण?</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/TLoLx6yKnMI/AAAAAAAAAQU/Fl7_Cn8m1wE/s1600/ravan.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 376px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/TLoLx6yKnMI/AAAAAAAAAQU/Fl7_Cn8m1wE/s400/ravan.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5528744444771867842" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;पश्चिम बंगाल के पड़ोस होने का प्रभाव कहा जाए कि बिहार में भी शक्ति की उपासना बड़े पैमाने पर होती है और हर पांच-छह किलोमीटर पर दुर्गा पूजा होती है, मेला भरता है। शारदीय नवरात्र के दौरान उत्सव का माहौल रहता है। इसे एक संयोग ही कहा जाएगा कि मेरे जन्म के साल ही गांव में नवयुवक संघ के बैनर तले दुर्गा पूजा और मेला शुरू हुआ। पांचवीं-छठी क्लास तक आते-आते मेरे जैसे बच्चों की भागीदारी भी मेले में होने लगी। चूंकि गांव में इतने पैसे नहीं होते, सो ग्रामीण नवयुवक ही मेले में लोगों के मनोरंजन के लिए सप्तमी से लेकर दशमी तक नाटकों का मंचन करते थे, सो मुझे भी इनमें अवसर मिला और मेरे अंदर का कलाकार निखरता रहा। बाद में नई दिल्ली में अखिल भारतीय स्तर पर संस्कृत नाटक प्रतियोगिता में भी हिस्सा लेने का अवसर मिला। खैर, मैं यहां अपनी नाट्य प्रतिभा का बखान नहीं करना चाहता, वह तो यूं ही बात निकली तो काफी पीछे तक चली गई। &lt;br /&gt;जैसा मैंने शुरू में कहा कि बंगाल-बिहार-झारखंड-उत्तर प्रदेश में शक्ति स्वरूपा मां भगवती की आराधना की ही प्रधानता रहती है। जिधर से आप गुजरेंगे,  नवरात्र के दौरान लाउडस्पीकर पर दुर्गा सप्तशती के श्लोक बरबस ही सुनाई देते हैं। वहां रावण के पुतले की दहन की परंपरा बहुत कम ही है। पहली बार जब मैं उपरोक्त नाट्य प्रतियोगिता के सिलसिले में विजयादशमी के दिन दिल्ली गया था तो लालकिले के सामने लाल जैन मंदिर की धर्मशाला में ठहरा था। पूरे देश के हमारे सहपाठी उसी में ठहरे थे। शाम को छत से देखा कि सामने काफी बड़ी भीड़ इकट्ठी है। रंग-बिरंगी आतिशबाजी के बीच शाम को रावण के पुतले का दहन हुआ। उसके डेढ़-दो साल बाद जयपुर आ गया। यहां भी नवरात्र के दौरान मां भगवती की आराधना में कहीं कोई कमी नहीं दिखती, लेकिन रावण के पुतले जलाने का उत्साह भगवती की भक्ति पर भारी पड़ती नजर आती है। हां, प्रवासी बंगालियों के समुदाय शहर में आधा दर्जन से अधिक स्थानों पर परंपरागत रूप से मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करते हैं और सप्तमी से लेकर विजयादशमी तक अपनी संस्कृति को जीते हैं, लेकिन इन उत्सवों में स्थानीय निवासियों की भागीदारी न के बराबर होती है। हां, गुलाबी नगर में सैकड़ों स्थानों पर सार्वजनिक रूप से बड़े पैमाने पर रावण-मेघनाद-कुंभकर्ण-अहिरावण के पुतले जलाए जाते हैं। एक तरह की होड़ होती है आयोजकों में कि किसका रावण कितना ऊंचा होगा और कौन कितनी आतिशबाजी-बारूद फूंकता है। इतना ही नहीं, कॉलोनी से लेकर गली तक में बच्चे अपने स्तर पर रावण को जलाने में पीछे नहीं रहते। &lt;br /&gt;अब मैं उस मूल मुद्दे पर आता हूं जिसके लिए मैंने आज यह संवाद छेड़ा है। भगवान राम ने त्रेता युग में रावण का संहार किया था और तब से हजारों साल बीत गए, हम रावण के पुतले जलाते जा रहे हैं, लेकिन वह हर साल और बड़े रूप में चिढ़ाता हुआ हमारे सामने आ खड़ा होता है। यह आलस्य, अविश्वास, कामचोरी, भ्रष्टाचार और न जाने हमारी किन-किन कमजोरियों के रूप में दस से भी अधिक सिरों के साथ हमारे अंदर कायम हो चुका है। हम यदि अपने अंदर निहित बुराई रूपी रावण को मार सकें तभी विजयादशमी मनाना सार्थक हो सकेगा। यदि हम खुद को पाक साफ मानते हैं तो बुराई करने वालों का ही सफाया कर दें ताकि उसे और पनपने का मौका नहीं मिले। रावण को समूल मिटाने का बस यही दो तरीका मेरी समझ में आता है, अन्यथा लकीर पीटने में हमारा सानी और कहां मिल पाएगा। विजयादशमी की ढेर सारी मंगलकामनाएं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-168099213229773349?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/168099213229773349/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=168099213229773349' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/168099213229773349'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/168099213229773349'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='ऐसे तो नहीं मरेगा रावण?'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/TLoLx6yKnMI/AAAAAAAAAQU/Fl7_Cn8m1wE/s72-c/ravan.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-1560561015438495800</id><published>2010-07-20T04:52:00.000-07:00</published><updated>2010-07-20T04:55:51.268-07:00</updated><title type='text'>मैं एक अघोषित पागल हूं.</title><content type='html'>काफी दिनों से ब्लॉग जगत से गायब हूं। लिखने की कौन कहे, पढ़ने तक का समय नहीं मिल पाता। आज कहीं यह विचारों को उद्वेलित करने वाली कविता पढ़ी, तो सोचा कि आपसे भी शेयर करूं। वरिष्ठ समाजवादी नेता रामदत्त जोशी ने यह कविता लिखी थी। वे प्रजा समाजवादी पारटी के टिकट पर नैनीताल जिले काशीपुर से दो बार विधायक रहे। जैसा कि हमेशा से होता आया है, सिद्धांतों से समझौता नहीं करने वाला इस शख्स का दशकों पहले गरीबी और अभाव में निधन हो गया। श्रद्धांजलि सहित प्रस्तुत है उनकी यह कविता----&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नैनीताल की शाम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं एक अघोषित पागल हूं. जो बीत गया मैं वो कल हूं.&lt;br /&gt;कालांतर ने परिभाषाएं, शब्दों के अर्थ बदल डाले,&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;सिद्धांतनिष्ठ तो सनकी हैं, खब्ती हैं नैतिकता वाले, &lt;br /&gt;नहीं धन बटोरने का शऊर, ज्यों बंद अकल के हैं ताले,&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;ईमानदार हैं बेवकूफ़, वह तो मूरख हैं मतवाले? &lt;br /&gt;आदर्शवाद है पागलपन, लेकिन मैं उसका कायल हूं. &lt;br /&gt;मैं एक अघोषित पागल हूं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्वाचित जन सेवक होकर भी मैंने वेतन नहीं लिया,&lt;br /&gt;जो फ़र्स्ट क्लास का नकद किराया भी मिलता था नहीं लिया,&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;पहले दरजे में रेल सफ़र की फ्री सुविधा को नहीं लिया, &lt;br /&gt;साधारण श्रेणी में जनता के साथ खुशी से सफ़र किया, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो व्यर्थ मरूस्थल में बरसा मैं एक अकेला बादल हूं. &lt;br /&gt;मैं एक अघोषित पागल हूं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जनता द्वारा परित्यक्त विधायक को पेनशन के क्या माने?&lt;br /&gt; है एक डकैती-कानूनी, जनता बेचारी क्या जाने? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कानून बनाना जनहित में जिनका कत्तर्व्य वही जाने- &lt;br /&gt;क्यों अपनी ही ऐवर्य वृद्धि के नियम बनाते मन-माने? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आंसू से जो धुल जाता है, दुखती आंखों का काजल हूं.&lt;br /&gt;मैं एक अघोषित पागल हूं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सादा जीवन, ऊंचे विचार, यह सब ढकोसले बाजी हैं? &lt;br /&gt;अबके ज्यादातर नेतागण झूठे पाखंडी पाजी है,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; कुर्सी पाने के लिए शत्रुवत सांप छछूंदर राजी हैं,&lt;br /&gt; कोई वैचारिक-वाद नहीं, कोई सैद्धांतिक सोच नहीं,&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;सर्वोपरि कुर्सीवाद एका, जिसका निंदक मैं पागल हूं.&lt;br /&gt;मैं एक अघोषित पागल हूं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;है राजनीति तिकड़म बाजी, धोखे, घपले, हैं घोटाले, &lt;br /&gt;गिरते हैं इसी समुंदर में, सारे समाज के पतनाले,&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;गंगाजल हो या गंदाजल, हैं नीचे को बहने वाले, &lt;br /&gt;संपूर्ण राष्ट्र का रक्त हो गया है विषाक्त मानस काले,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; इसके दोषी जन प्रतिनिधियों को अपराधी कहता पागल हूं.&lt;br /&gt;मैं एक अघोषित पागल हूं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बापू के मन में पीड़ा थी, भारत में व्याप्त गरीबी की, &lt;br /&gt;समृद्ध तबके के गांधी ने आधे वस्त्रों में रहकर ही,&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;ग्रामीण कुटीरों से फूंकीथी स्वतंत्रता की रणभेरी,&lt;br /&gt; उनका संदेशा था ‘शासक नेताओं रहना सावधान’&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;सत्ता करती है भ्रष्ट, मगर यह पागलपन है, पागल हूं. &lt;br /&gt;मैं एक अघोषित पागल हूं.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-1560561015438495800?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/1560561015438495800/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=1560561015438495800' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/1560561015438495800'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/1560561015438495800'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2010/07/blog-post.html' title='मैं एक अघोषित पागल हूं.'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-7986897387472794745</id><published>2010-05-25T13:16:00.000-07:00</published><updated>2010-05-25T13:18:35.835-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सोचें तो सही'/><title type='text'>पैसा दीजिए, पानी देखिए</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/S_wweLROfuI/AAAAAAAAAQE/6ypEPM1QE_k/s1600/dsc_0077.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 304px; height: 400px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/S_wweLROfuI/AAAAAAAAAQE/6ypEPM1QE_k/s400/dsc_0077.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5475304541954932450" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;पेयजल समस्या पर होने वाली सेमिनारों-संगोष्ठियों में वक्ता बड़ी संजीदगी से कहते हैं कि यदि पानी का मोल नहीं समझा,  इसे व्यर्थ बहाना नहीं छोड़ा ...तो आने वाले दिनों में पानी के लिए विश्वयुद्ध लड़े जाएंगे। भविष्य की बातें तो भविष्य पर ही छोड़ दें, फिलहाल ख्यातनाम व्यंग्य लेखक शरद जोशी की एक अति लघु चुटीली रचना के सहारे अपनी बात कहना चाहता हूं। (स्मृति दोष के कारण संभव है इसमें कुछ त्रुटि भी हो)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;18वीं सदी: दूध की नदियां बहती हैं, बच्चों को दूध में नहलाइए। &lt;br /&gt;19 वीं सदी : दूध कुछ कम हुआ, बच्चों को दूध पिलाइए।&lt;br /&gt;20वीं सदी : दूध और कम हो गया, बच्चों को दूध दिखाइए।&lt;br /&gt;21 वीं सदी : दूध अब बीते दिनों की बात हो गई, बच्चों को दूध की कहानियां सुनाइए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नित्य-प्रति दूध के बढ़ते दामों ने स्वर्गीय शरद जोशी की रचना को सच कर दिखाया है। कम से कम मध्यमवर्गीय परिवारों की तो ऐसी ही स्थिति हो गई है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हां, तो मैं पानी की बात कह रहा था और रास्ता भटकर दूध पर आ गया। दूध की तो छोडि़ए, यह तो कुछ दिनों में विलासिता संबंधी वस्तु में शामिल कर ली जाएगी।&lt;br /&gt;...तो मैं पानी पर ही आता हूं। गुलाबी नगर में प्यास के मारे लोगों की परेशानियों की खबर अखबारों की सुर्खियां बनी हुई हैं। ऐसे में नगरीय विकास के लिए जिम्मेदार सरकारी संस्था जयपुर विकास प्राधिकरण (जेडीए) ने शहर की मुख्य सड़क जवाहरलाल नेहरू मार्ग के किनारे ‘जलधारा’ परियोजना शुरू की है। यह शाम 5 से रात 9 बजे तक खुली रहती है। करीब आधा किलोमीटर लंबे नाले के किनारे लाइटें लगाई गई हैं और इसके दोनों ओर 15-20 फुट ऊंचे फव्वारे लगाए गए हैं। इसकी टिकट दर 10 रुपए प्रति व्यक्ति है, लेकिन जयपुरवासियों की इसके प्रति दीवानगी को देखते हुए शनिवार-रविवार और छुट्टियों के दिन यह दर दोगुनी अर्थात 20 रुपए कर दी गई है। इसके बावजूद इसके प्रति लोगों की दीवानगी कम नहीं हो पाई है। &lt;br /&gt;इस तरह लोग पानी देखने के लिए पैसे दे रहे हैं। यदि ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले दिनों में अन्य स्थानों पर नदी की लहरों और समंदर में उठ रहे ज्वारभाटों को देखने के बदले भी पैसे देने पड़ेंगे। ईश्वर करे, ऐसा दिन नहीं आए और आने वाले मानसून में पर्याप्त बारिश हो, जिससे धरती संतृप्त हो,  नदी-नालों में पानी भर जाए और हां,  ...इतना पानी अवश्य ही बचे जो लोगों की आंखों में बना रहे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-7986897387472794745?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/7986897387472794745/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=7986897387472794745' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/7986897387472794745'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/7986897387472794745'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2010/05/blog-post_25.html' title='पैसा दीजिए, पानी देखिए'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/S_wweLROfuI/AAAAAAAAAQE/6ypEPM1QE_k/s72-c/dsc_0077.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-8981010608975896717</id><published>2010-05-10T13:37:00.000-07:00</published><updated>2010-05-10T13:53:48.258-07:00</updated><title type='text'>आस्था अपार, भाषा बनी दीवार</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/S-hyTOT-HxI/AAAAAAAAAP8/R2lME1gcYCI/s1600/manglam.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 249px; height: 400px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/S-hyTOT-HxI/AAAAAAAAAP8/R2lME1gcYCI/s400/manglam.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5469747422026407698" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;विश्व क्षितिज पर गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने भारत को जो पहचान दिलाई, उसके लिए प्रत्येक भारतवासी उनके प्रति कृतज्ञ है। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित उनकी अमर कृति 'गीतांजलि ' अधिकतर बंगाली परिवारों में 'गीता' और  'रामचरितमानस' की तरह रखी जाती है। रेल मंत्री ममता बनर्जी ने बंगभूमि निवासिनी का कर्तव्य निभाते हुए रेलवे मंत्रालय की ओर से रवींद्र नाथ टैगोर की 150 वीं जयंती वर्ष के उपलक्ष में 9 मई को दिल्ली तथा राजस्थान से प्रकाशित होने वाले हिंदी के अखबारों में पूरे पृष्ठ का विज्ञापन प्रकाशित कराया। जिसे जैसे मौका मिलता है, अपनी जन्मभूमि, भाषा, आकाओं तथा जिस किसी के भी वह कृतज्ञ होता है, से उऋण होने के लिए इस प्रकार के प्रयास करता है। इससे मुझे कोई एतराज भी नहीं है, लेकिन हिंदी भाषी पाठक होने के नाते मेरी यह पीड़ा रही कि गुरुदेव के चित्र के नीचे बांगला भाषा में लिखी पंक्तियां मेरे लिए 'काला अक्षर भैंस बराबर' थीं। ममता बनर्जी को यदि यह राष्ट्रव्यापी विज्ञापन छपवाना ही था तो क्षेत्र विशेष की भाषा में यदि इसका लिप्यांतरण करवा देतीं तो अच्छा रहता।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-8981010608975896717?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/8981010608975896717/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=8981010608975896717' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/8981010608975896717'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/8981010608975896717'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='आस्था अपार, भाषा बनी दीवार'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/S-hyTOT-HxI/AAAAAAAAAP8/R2lME1gcYCI/s72-c/manglam.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-4159752212583081288</id><published>2010-04-14T13:21:00.000-07:00</published><updated>2010-04-14T13:24:37.321-07:00</updated><title type='text'>बंद पिंजरे में तोता ने दिया अंडा!</title><content type='html'>टीआरपी बढ़ाने के चक्कर में आजकल टेलीविजन पर तरह-तरह की अविश्वसनीय खबरों का प्रसारण आम बात है। कई बार तो इन पर भरोसा करना बहुत ही मुश्किल होता है, लेकिन प्रिंट मीडिया में काफी हद तक ऐसी खबरों से परहेज किया जाता है। बुधवार १४ अप्रेल की रात इंटरनेट पर दैनिक जागरण देख रहा था तो बिहार के समस्तीपुर जिले की खबरों में यह खबर दिखी। १० अप्रेल को यह खबर नेट पर डाली गई है और संभव है ९ या १० अप्रेल को बिहार से प्रकाशित दैनिक जागरण में प्रमुखता से छपी भी हो। आशा है,आप भी इस खबर से अचंभित हुए बिना नहीं रहेंगे। चूंकि इंटरनेट का विस्तार बहुत ही व्यापक है, संभव है समस्तीपुर में जिस स्थान की यह खबर है, उसके आसपास के किसी पाठक की नजर भी इस पर पड़े और इसकी सत्यता का राजफाश हो सके। प्रस्तुत है जस की तस दैनिक जागरण पर प्रकाशित खबर-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समस्तीपुर। आश्चर्य परंतु सत्य का दावा। दस वर्षो से पिंजरे में बंद एक तोते ने अंडा देकर लोगों को हैरत में डाल दिया है। इस कौतूहल को अपनी आंखों से देखने के लिए लोगों की भीड़ शुक्रवार को काशीपुर मोहल्ले में रहने वाले संवेदक मुरारी सिंह के आवास पर लगी रही। शहर के कृष्णापुरी मोहल्ला में रहने वाले श्री सिंह का कहना है कि इस पालतू तोता करीब दस वर्ष पूर्व उनके घर आया था। बच्चों ने उसे पिंजरे में बंद कर दिया। तब से वह पिंजरे में ही कैद है। तीन दिन पूर्व इस तोते ने पिंजरे में ही एक अंडा दिया। जिसे घर के किसी बच्चे ने नष्ट कर दिया था। जानकारी मिलने पर वे खुद आश्चर्य में पड़ गए थे। इसी बीच शुक्रवार को तोते ने फिर से एक अंडा दिया। यह पिंजरे में मौजूद है। बिना किसी दूसरे तोते के संपर्क का अंडा देना सबको आश्चर्य में डाल रहा है। दूसरी ओर इंडियन बर्ड कंजरवेशन नेटवर्क के स्टेट काडिनेटर अरविंद मिश्रा का कहना है कि बिना जोड़े का यह संभव नहीं है। अंडा देने से पूर्व पक्षी कई चरणों से गुजरता है। इसी तरह पक्षी विशेषज्ञ, बोटेनिस्ट सह एमआरएम कालेज, दरभंगा के प्राचार्य विद्या कुमार झा ने भी दावे को सिरे से खारिज किया है। पशुपालन पदाधिकारी डा. एके सिंह भी इससे इनकार करते हैं। वैसे उनका कहना है कि अंडा की जांच किये बिना कुछ भी कहना ठीक नहीं होगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-4159752212583081288?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/4159752212583081288/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=4159752212583081288' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/4159752212583081288'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/4159752212583081288'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='बंद पिंजरे में तोता ने दिया अंडा!'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-528094135454693116</id><published>2010-03-31T12:29:00.000-07:00</published><updated>2010-03-31T12:31:11.600-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आत्मनिवेदन'/><title type='text'>भगवान से बड़ा हो गया भक्त का कद</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/S7Oi4kAq8kI/AAAAAAAAAP0/KusGuDgJL5g/s1600/hanumanji.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 397px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/S7Oi4kAq8kI/AAAAAAAAAP0/KusGuDgJL5g/s400/hanumanji.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5454882666298667586" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;चैत्र पूर्णिमा पर मंगलवार को हनुमानजी की जयंती मनाई गई। जहां-जहां बजरंगबली के भक्त हैं, वहां-वहां उन्होंने अपने आराध्य के जन्मदिन पर अपने-अपने तरीके से उल्लास मनाया। छोटी काशी जयपुर के मंदिरों में तो एक दिन पहले यानी सोमवार अद्र्धरात्रि से ही हनुमानजी का अभिषेक शुरू हो गया था। मंगलवार को भी दिनभर मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी। पदयात्राएं-शोभायात्राएं निकलीं, झांकियां सजाई गईं। खैर, यहां मेरा मकसद आपलोगों को हनुमान जयंती पर हुए आयोजनों की जानकारी देना नहीं है। न ही मैं हनुमानजी की कृपा के चमत्कारों से आपको अवगत कराना चाहता हूं क्योंकि पवनपुत्र के पवन की गति से भी तेज चमत्कारों के बारे में मैं अपनी अल्पज्ञता जगजाहिर नहीं करना चाहता। यहां मैं किसी और उद्देश्य से आपसे मुखातिब हूं। &lt;br /&gt;ज़हां तक मैं समझता हूं, हिंदू परिवारों में कोई भी परिवार ऐसा नहीं होगा, जहां हनुमानजी की पूजा नहीं होती हो। कोई भी साक्षर शायद ऐसा नहीं होगा, जिसकी दिनचर्या हनुमान चालीसा से शुरू न होती हो। साक्षर ही क्यों, मैंने तो कई ऐसे लोगों को भी देखा है जिन्हें बिल्कुल ही अक्षरज्ञान नहीं था और उन्हें हनुमान चालीसा ही नहीं, बल्कि सुंदरकांड की चौपाइयां और दोहे तक  याद हैं। मेरे गांव में आज भी हर शनिवार और मंगलवार को सुंदरकांड के सामूहिक पाठ किए जाते हैं और इसके साथ सहज रूप से ही हनुमान चालीसा का भी पाठ होता है। बस, बाकी लोगों के साथ सुनकर और उनके ताल से ताल मिलाते हुए उन निरक्षर लोगों ने भी सहज रूप से हनुमान चालीसा और सुंदरकांड को कंठस्थ कर लिया। &lt;br /&gt;गांवों-कस्बों में सहज रूप से ही हनुमानजी के मंदिर दिख जाते हैं और इसका सबसे बड़ा कारण यही है कि हनुमानजी ने जिस समर्पण भाव से अपने स्वामी मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की भक्ति की, वह बेमिसाल हो गई। लंका में जब हनुमानजी सीता माता का दुख साझा करने की अशोक वाटिका पहुंचे तो उन्होंने रामदूत को अष्ट सिद्धियों और नव निधियों का वरदान दे दिया, जिन्हें हनुमानजी मुक्तहस्त से अपने भक्तों को लुटाने में कोई संकोच नहीं करते। &lt;br /&gt;ऐसे में तो यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि भगवान बनना भले ही मुश्किल हो, लेकिन भक्त बनकर भी अपना कद ऊंचा बनाने की कला हनुमानजी से अवश्य ही सीखी जा सकती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-528094135454693116?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/528094135454693116/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=528094135454693116' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/528094135454693116'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/528094135454693116'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2010/03/blog-post_31.html' title='भगवान से बड़ा हो गया भक्त का कद'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/S7Oi4kAq8kI/AAAAAAAAAP0/KusGuDgJL5g/s72-c/hanumanji.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-3097103720759597143</id><published>2010-03-19T12:46:00.000-07:00</published><updated>2010-03-19T12:47:55.409-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सोचें तो सही'/><title type='text'>'ढंग` और 'ढोंग` के संगम से मिलती है सफलता</title><content type='html'>कल एक चिकित्सक मित्र से मिलने गया तो वहां उच्च सरकारी सेवा के अंतिम पायदान पर खड़े एक महानुभाव के भी दर्शन हुए। बातों ही बात में मीडिया की भूमिका या कहें कि उपादेयता पर चर्चा छिड़ी तो उक्त महानुभाव ने बड़े पते की बात की। आप भी गौर फरमाएं। उन महानुभाव का कहना था कि किसी भी काम में सफलता के लिए 'ढंग` और 'ढोंग` का समन्वय जरूरी था। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति में कितनी ही योग्यता क्यों न हो, यदि तथाकथित 'ढोंग` का सहारा लेकर उसने अपने चारों ओर विशेष आभामंडल नहीं बना रखा है तो उसकी ख्याति एक कमरे में ही सिमटकर रह जाएगी। हालांकि उनका यह भी कहना था कि इस 'ढोंग`  के साथ यदि उचित मात्रा में योग्यता का समन्वय नहीं है तो भी यह 'ढोंग` अथ च चमत्कार अधिक दिनों तक नहीं चलने वाला। &lt;br /&gt;इस पते की बात से मुझे किसी महान व्यक्ति की यह उक्ति सहसा ही याद आ गई - आप काफी आदमी को कुछ समय के लिए बेवकूफ बना सकते हैं और कुछ आदमी को काफी समय के लिए बेवकूफ बना सकते हैं। काफी आदमी को काफी समय के लिए बेवकूफ बनाना मुश्किल होता है, नामुमकिन भी यदि आप राजनेता नहीं हैं, क्योंकि राजनेता तो कुछ भी कर सकते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-3097103720759597143?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/3097103720759597143/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=3097103720759597143' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/3097103720759597143'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/3097103720759597143'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2010/03/blog-post_19.html' title='&apos;ढंग` और &apos;ढोंग` के संगम से मिलती है सफलता'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-671810575046758810</id><published>2010-03-12T11:49:00.000-08:00</published><updated>2010-03-12T11:50:50.920-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सोचें तो सही'/><title type='text'>हींग की दाल, रुद्राक्ष की चटनी</title><content type='html'>इस पखवाड़े को यदि बजट पखवाड़ा कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी से लेकर विभिन्न राज्यों के वित्त मंत्री और मुख्यमंत्री (जो वित्त मंत्रालय भी देखते हैं) अपने-अपने राज्यों के बजट पेश करने में जुटे हैं। अब इन बजट से जनता का कितना भला हो पाता है, यह तो उसकी किस्मत ही है। &lt;br /&gt;शुरुआत यदि केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी की ओर से प्रस्तुत आम बजट से करें तो उन्होंने उसमें कोई ऐसा प्रावधान नहीं किया जिससे महंगाई से पीडि़त लोगों  को राहत मिल पाती। हां,  डीजल तथा पेट्रोल पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क में एक-एक रुपए प्रति लीटर की वृद्धि करने की भी घोषणा की, जिससे इनके मूल्यों में ढाई रुपए प्रति लीटर से अधिक की वृद्धि हो गई। अब इसके दूरगामी परिणाम एक के बाद एक सामने आने लगे हैं। ट्रक ऑपरेटर भाड़ा बढ़ाने के लिए राष्ट्रव्यापी आंदोलन की चेतावनी दे रहे हैं। ऑटो रिक्शा से लेकर स्कूल वैन और सवारी बसें चलाने वाली सरकारी निगम व निजी बस मालिक तक किराया बढ़ाने की बात कर रहे हैं। आम आदमी की जिजीविषा है कि इसके बावजूद वह जिंदा रहेगा। गृहिणियां रोज-रोज महंगी हो रही दाल में पानी मिलाते-मिलाते परेशान हैं। आखिर कितना पानी मिलाएं। पिछले दिनों अखबारों में खबर छपी थी कि प्रणव मुखर्जी की बिटिया ने वित्त मंत्री पापा को खुला पत्र लिखा था कि सड़कों पर लड़कियों को छेडऩे वालों पर टैक्स लगा दिया जाए। इसका तो मुखर्जी को ध्यान नहीं रहा, लेकिन घर में डाइनिंग टेबल पर हींग के बेस्वाद होने की बात उन्हें याद रही। शायद हींग की क्वालिटी अच्छी नहीं रही हो, सो उन्होंने बजट के दौरान दरियादिली दिखाते हुए हींग की कीमत में कभी की घोषणा कर दी। अब उन्हें कौन बताए कि दाल बनेगी तब तो हींग का छौंक लगेगा। जब लोगों की जेब में दाल खरीदने लायक ही पैसे नहीं होंगे तो सस्ती हींग किस काम की। &lt;br /&gt;अन्य राज्यों के बजट में क्या कुछ हुआ, यह तो गहन अध्ययन का श्रमसाध्य विषय है, लेकिन राजस्थान के गांधीवादी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने हद के बाहर जाकर खाद्यान्न, दलहन, तिलहन सहित कई अन्य वस्तुओं पर वैट दर 4 से बढ़ाकर 5 प्रतिशत कर दी और गलती का पता चलने पर अगले ही दिन उन्हें यह घोषणा वापस लेने को बाध्य होना पड़ा। दरअसल सेल्स टैक्स एक्ट के तहत राज्य सरकार को इन वस्तुओं पर वैट बढ़ाने का हक ही नहीं था। गहलोत ने बजट भाषण के दौरान रुद्राक्ष को करमुक्त करने की घोषणा की। अब उन्हें कौन बताए कि भूखे भजन न होहिं गोपाला। जब पेट भरा होता है तभी भक्ति में भी मन रमता है। भूखे पेट भी उसी स्थिति में भजन हो पाता है जब भजन के बाद पर्याप्त फलाहार की संभावना हो। &lt;br /&gt;हमारे आसमानी राजनेताओं की सोच देखकर तो यही लगता है जैसे वे कह रहे हों-हींग की दाल खाओ रुद्राक्ष की चटनी के साथ, भली करेंगे राम।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-671810575046758810?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/671810575046758810/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=671810575046758810' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/671810575046758810'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/671810575046758810'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='हींग की दाल, रुद्राक्ष की चटनी'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-2751870552400194607</id><published>2010-03-05T12:07:00.000-08:00</published><updated>2010-03-05T12:19:35.791-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जरा सोचिए'/><title type='text'>अनवांटेड 36 महीने मनमोहनी सरकार के</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/S5FlW1kkVcI/AAAAAAAAAPk/pxLLySim1GA/s1600-h/pragnanncy.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 168px; height: 320px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/S5FlW1kkVcI/AAAAAAAAAPk/pxLLySim1GA/s320/pragnanncy.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5445244867479623106" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;तत्कालीन प्रधानमन्त्री चन्द्रशेखर की सरकार से कांग्रेस के समर्थन वापस लेने के बाद जब विश्वासमत पर लोकसभा में बहस हो रही थी, तो चन्द्रशेखर ने बड़े ही उदास स्वर में कहा था-&lt;br /&gt;&lt;em&gt;गैर मुमकिन है कि हालात की गुत्थी सुलझे, &lt;br /&gt;अहले दानिश ने बड़ा सोच के उलझाया है। &lt;/em&gt;&lt;br /&gt;आज सहसा ही चंद्रशेखर द्वारा उद्धृत ये पंक्तियां याद आ गईं। वर्तमान दौर में केन्द्र में यूपीए की गठबंधन सरकार सत्तासीन है और देश का मध्यमवरगीय परिवार दिनोंदिन महंगाई की चक्की में पिसता हुआ उपरोक्त पंक्तियों को ही दुहराता रहता है। प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह पहला कार्यकाल कुशलतापूर्वक पूरा कर दूसरी पारी खेल रहे हैं। यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी के प्रति उनकी निष्ठा में कहीं कोई कोताही नहीं दिखती, सो उनकी कुरसी को तो कोई खतरा नहीं दिखता, लेकिन वर्तमान दौर में आमजन का पेट भरना मुश्किल हो गया है। सरकार न जाने क्या कर रही है? रही-सही कसर वित्त मन्त्री प्रणव मुखर्जी ने आम बजट में पूरी कर दी। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में हुई बढ़ोतरी के कारण प्रत्यक्ष रूप में वाहनों से प्रति सौ रुपए मिलने वाला एवरेज तो कम हो ही गया है, वहीं इसका परोक्ष प्रभाव भी आने वाले दिनों में वस्तुओं के परिवहन की लागत बढ़ने से सामने आएगा। &lt;br /&gt;यह सब तो अर्थशास्त्रियों के चिन्तन का विषय है, लेकिन आम आदमी की चिन्ता को भी कैसे नकार दिया जाए। मैं भी अपनी पीड़ा को दबा नहीं पाता हूं और लिखना कुछ चाहता हूं, लिखने कुछ और ही लगता हूं।  &lt;br /&gt;खैर, अब आज की उस खबर पर आता हूं, जिसने मुझे इन पंक्तियों को लिखने के लिए झकझोरा। राजस्थान के सर्वाधिक प्रसारित-प्रतिष्ठित अखबार राजस्थान पत्रिका में शुक्रवार को अन्तिम पृष्ठ पर ---गर्भनिरोधक गोलियों के विज्ञापन पर रोक---शीर्षक खबर ने सहसा ही ध्यान खींचा। खबर में यौन संपर्क के 72 घंटे में गोली लेने पर गर्भ नहीं ठहरने का दावा करने वाले विज्ञापन पर रोक की बात कही गई थी। इस गोली का नाम शायद ---अनवांटेड 72---है। अपने देश में बहुसंख्यक बीपीएल परिवारों के मनोरंजन का सहारा दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल पर इसके इतने विज्ञापन आते थे कि पूछो मत। खबर में खुलासा था कि केन्द्रीय स्वास्थ्य मन्त्रालय की बजाय अपने अधिकार क्षेत्र के बाहर जाकर केन्द्र सरकार के औषधि नियन्त्रक ने वर्ष 2007 में इमरजेंसी गर्भनिरोधक गोलियों के विज्ञापन दिखाए जाने की छूट दी थी। इसमें उक्त गोलियां बनाने वाली कंपनी के अलावा तथाकथित औषधि नियन्त्रक का हित कितना सधा, यह तो जांच का विषय है। 2007 से अब तक सोचें तो लगभग 36 महीने बाद आखिरकार मनमोहनी सरकार चेत पाई। हालांकि यह इकलौता मामला नहीं है। कई अन्य दवाओं के विज्ञापन भी टेलीविजन पर बेधड़क दिखाए जा रहे हैं और सैकड़ों लोग उनके साइड इफेक्ट से जूझने को विवश हैं। आशा है सरकार इन मामलों पर भी ध्यान देगी और लोगों को उनके घर के पास सस्ती और अच्छी क्वालिटी वाली स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराएगी, जिससे आमजन विज्ञापनों की बजाय सरकारी अस्पतालों और डॉक्टरों पर यकीन करके इलाज कराने के लिए कदम बढ़ा सकें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-2751870552400194607?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/2751870552400194607/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=2751870552400194607' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/2751870552400194607'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/2751870552400194607'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2010/03/36.html' title='अनवांटेड 36 महीने मनमोहनी सरकार के'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/S5FlW1kkVcI/AAAAAAAAAPk/pxLLySim1GA/s72-c/pragnanncy.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-6604559224391703346</id><published>2010-02-27T12:18:00.000-08:00</published><updated>2010-02-27T12:25:52.853-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आत्मनिवेदन'/><title type='text'>होली तो भौजी और साली के संग</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/S4l_smcTKDI/AAAAAAAAAPc/ZLay3XHWEak/s1600-h/devar.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 80px; height: 80px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/S4l_smcTKDI/AAAAAAAAAPc/ZLay3XHWEak/s400/devar.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5443022028864170034" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;जहां तक मैं समझ पाया हूं, पर्व-त्यौहार अप्राप्य को पाने का अवसर प्रदान करते हैं। इन विशेष अवसरों पर अपने इष्ट से अभीष्ट तथा सुख-समृद्धि का वरदान मांगते हैं। जहां तक होली की बात है, तो यह ऐसा पर्व है, जिसमें प्रकृति भी अपने विशेष रंग में रंगी नजर आती है। ऐसा लगता है, मानो प्रकृति पर वसंत का रंग छा गया हो। पेड़ों के पत्ते झड़ जाते हैं और नई कोंपलें नए जीवन का संदेश देती प्रतीत होती हैं। माघ शुक्ल पंचमी (वसंत पंचमी) के बाद दिन अनुदिन गर्म होने लगते हैं और फागुन पूर्णिमा के आते-आते सूर्य के ताप का साथ पाकर जब फगुनहट बयार चलती है तो पूरे वातावरण में ही मस्ती घोल देती है। &lt;br /&gt;जब बाहर की प्रकृति बौरा जाए तो मनुष्य के अंदर की प्रकृति कहां स्थिर रह पाती है। आम तौर पर साल के तीन सौ चौंसठ दिन मितभाषी रहने वाला भी होली के दिन वाचाल हो जाता है। बड़े-बड़े मुद्दों पर जो अपनी राय देने में हमेशा कृपणता बरतते हैं, वे भी होली पर ऐसी टिप्पणी कर बैठते हैं कि लोग दांतों तले अंगुली दबाने को मजबूर हो जाते हैं। तभी तो कहते हैं--भर फागुन बुढ़वा देवर लागे....।&lt;br /&gt;फिर हमारी संस्कृति तो और भी निराली है। हम जो भी अच्छा-बुरा करते हैं, उसके पीछे अपना हाथ तो कभी नहीं मानते, बस परंपरा का निर्वहन करते हैं। तभी तो होली के गीतों में राधा-कृष्ण, राम-सीता, शंकर-पार्वती ही हमारे आदर्श हैं। त्रेता में देवर लक्ष्मण ने भाभी सीता को रंग डाला, तो द्वापर में भगवान कृष्ण ने गोपियों पर इस तरह रंग उड़ेला कि घर के लोग पहचान ही न पाएं। हम तो बस उनके अनुयायी हैं और उनकी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। भोले बाबा की बूटी भंग की ठंडाई का असर ज्यों-ज्यों होता है, होली का रंग चोखा होता जाता है। &lt;br /&gt;अप्राप्य को पाने की इच्छा का ही असर है कि होली गीतों में पति-पत्नी की होली कहीं ठहर नहीं पाती। हर पद में हर छंद में देवर-भाभी की ठिठोली ही होली का आदर्श हुआ करती है। इसके बाद साली का नंबर आता है। साली के संग होली खेलने का आनंद तो अवर्णनीय है। एक मित्र से बात हुई, उनकी दो-दो सालियां हैं और होली पर उनका रंगमर्दन करने के लिए वे आज ही ससुराल पहुंच गए थे। अपनी साली का आकर्षण तो यह हुआ, लेकिन भैया की साली के संग होली का आनंद तो सोने पर सुहागा के समान होता है। अब बेचारे भैया होली के इस रंगीले त्यौहार में पत्नी और साली दोनों से वंचित होकर अपने भाग्य को कोसें तो कोसते रहें।  &lt;br /&gt;तो आप सबको होली की रंगभरी मंगलकामनाएं। ईश्वर से प्रार्थना करें कि इस जन्म में जिनके साली और देवर नहीं हैं, उन्हें अगले जन्म में यह सुख अवश्य प्राप्त हो। कुछ अतिशयोक्ति हो तो इतना ही कहना चाहूंगा-बुरा न मानो होली है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-6604559224391703346?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/6604559224391703346/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=6604559224391703346' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/6604559224391703346'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/6604559224391703346'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2010/02/blog-post_27.html' title='होली तो भौजी और साली के संग'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/S4l_smcTKDI/AAAAAAAAAPc/ZLay3XHWEak/s72-c/devar.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-4174941220194723050</id><published>2010-02-25T11:40:00.000-08:00</published><updated>2010-02-25T11:44:06.770-08:00</updated><title type='text'>'करप्ट' हो गई खेती ?</title><content type='html'>भारतीय जनजीवन में अंग्रेजी और भ्रष्टाचार गड्डमड्ड हो गए हैं। अंग्रेजी के बिना कई स्थानों पर काम नहीं चलता तो भ्रष्टाचार के बिना हम काम चलाना चाहते ही नहीं। कई मामलों में ऐसा भी देखने में आया है कि महज सामाजिक रुतबे के लिए लोग अंग्रेजी अखबार मंगवाते हैं और ड्राइंग रूम में टेबिल पर अंग्रेजी की विशिष्ट पत्रिकाएं सजाकर रखते हैं। भ्रष्टाचार का आलम तो यह है कि पिता खुद ही अपनी संतान को इसके लिए प्रेरित करता है। &lt;br /&gt;महज थोड़ी सी सुविधा या समय बचाने के लिए लोग भ्रष्टाचार को जान-बूझकर बढ़ावा देते हैं। मेरा तो मानना है कि हर आदमी यदि अपनी जगह पर ईमान पर चलना चाहे और भ्रष्टाचार को बढ़ावा न देने की ठान ले, तो इस संक्रामक बीमारी को मिटाने में देर नहीं लगेगी अन्यथा यह घुन की तरह पूरी व्यवस्था को ही अंदर ही अंदर चट कर जाएगी। &lt;br /&gt;खैर, अब मैं उस मुद्दे पर आता हूं, जिसने मुझे इन पंक्तियों को लिखने के लिए प्रेरित किया। पिछले दिनों बिहार प्रवास के दौरान एक मित्र से मिलने उनके गांव गया। मित्र घर पर नहीं थे, सो उनके पिताजी से वार्तालाप का दौर शुरू हो गया। बिहार की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक चर्चा के बाद खेती-किसानी का प्रसंग भी सामने आया। मैंने इस वर्ष धान की फसल के बारे में पूछा तो बड़ी ही सहजता से उन्होंने कहा कि मेरे बेटे तो करप्ट खेती करते हैं, धान-गेहूं को कम ही तवज्जो देते हैं। उसमें लाभ कम होता है। मैं समझ नहीं पा रहा था कि खेती कैसे करप्ट हो गई और फिर यह फायदे का सौदा कैसे हो गई। उनकी नजर में खुद को नासमझ साबित करना मुझे भी नागवार गुजरा, सो मैं बातचीत को यूं ही खींचने लगा। मसलन, इस समय उनकी खेतों में कौन सी फसलें उगी हुई हैं आदि-इत्यादि। उन्होंने टमाटर, गोभी, मिर्च जैसी सब्जियों के नाम गिनाए तब मेरी समझ में आया कि वे कैश क्रॉप की बात कर रहे थे। 9वीं-10 वीं में अर्थशास्त्र भी एक विषय हुआ करता था तो खाद्य फसल और व्यावसायिक फसलों के बारे में पढ़ा था। व्यावसायिक फसलों को ही वे कैश क्रॉप की बजाय करप्ट खेती कह रहे थे। वाकई खाद्य फसलों की तुलना में व्यावसायिक फसलें अधिक लाभप्रद होती हैं, यदि सब कुछ उसके अनुकूल हो। &lt;br /&gt;जानकर संतोष हुआ कि कीटनाशकों और उर्वरकों के प्रयोग से फसलें भले ही हानिकारक हो गई हों, लेकिन यह किसी भी रूप में  'करप्ट' होने से बची हुई है। हां, सब्जियों का आकार समय से पहले बढ़ाने तथा दुधारू पशुओं में दूध बढ़ाने के लिए कुछ किसान अवश्य ही घातक ऑक्सिटोसिन का प्रयोग करते हैं, लेकिन यह अपवादस्वरूप ही हैं। सरकारों को यह व्यवस्था करनी चाहिए कि किसानों को उनकी लागत और मेहनत के अनुपात में उनकी उपज का उचित मूल्य मिले तो यह चलन भी रुक सकता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-4174941220194723050?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/4174941220194723050/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=4174941220194723050' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/4174941220194723050'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/4174941220194723050'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2010/02/blog-post_4104.html' title='&apos;करप्ट&apos; हो गई खेती ?'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-6864299586166741371</id><published>2010-02-25T05:29:00.001-08:00</published><updated>2010-02-25T05:30:00.203-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सोचें तो सही'/><title type='text'>रेल बजट में राजनीति हावी</title><content type='html'>रेलवे स्टेशनों पर रेलवे का ध्येय वाक्य-संरक्षा, सुरक्षा, समय पालन-लिखा रहता है, लेकिन रेल मंत्री ममता बनर्जी के   बजट में इस ध्येय वाक्य पर अमल करने की कोई इच्छाशक्ति नहीं दिखी या कहें कि इस पर ध्यान देना भी उचित नहीं समझा गया। हालांकि ममता ने अपने बजट भाषण में रेलवे के सामाजिक उत्तरदायित्व का जिक्र अवश्य किया, लेकिन उस पर भी राजनीतिक उत्तरदायित्व बाजी मार गया। &lt;br /&gt;पूर्ववर्ती बड़बोले रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने बिहार का बेड़ा गर्क करने के बाद सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए यात्री किराये में वृद्धि नहीं करने की परिपाटी शुरू की थी और अब शायद पश्चिम बंगाल और बिहार में अगले कुछ महीनों में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर ममता बनर्जी भी किराया बढ़ाने की हिम्मत नहीं जुटा सकीं। इसी कड़ी में खाद्यान्नों और किरासन तेल की भाड़ा दरों में 100 रुपए प्रति माल डिब्बा कटौती किए जाने का प्रस्ताव भी आमजन के हित में कम, तृणमूल कांग्रेस व यूपीए के पक्ष में ही अधिक दिखता है।  &lt;br /&gt;जहां तक मैं समझता हूं, रेलवे के ध्येय वाक्य का पालन रेल मंत्री की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए थी। कोई भी आदमी जब ट्रेन से सफर करता है तो उसका पहला उद्देश्य तय समय में सुरक्षित अपने गंतव्य पर पहुंचना होता है, भले ही उसे 500 रुपए के स्थान पर 502 या 503 रुपए खर्च करने पड़ें, लेकिन लगता है कि रेलवे मंत्रालय को इससे कुछ भी लेना नहीं है। तथाकथित सुपरफास्ट ट्रेनों का भी 8-10 घंटे लेट होना आम बात हो गई है। रेलवे मंत्रालय को इन राजनेताओं ने अपनी लोकप्रियता कमाने का जरिया बना लिया है। तभी तो लोकसभा चुनाव के बाद रेल मंत्रालय को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया जाता है। &lt;br /&gt;कुछ बातें इस बजट में अच्छी भी हैं, जिनकी प्रशंसा की जानी चाहिए। मसलन, एक निश्चित समयावधि में बिना चौकीदार वाले रेलवे क्रॉसिंग पर चौकीदारों की नियुक्ति करना, कैंसर रोगियों को नि:शुल्क यात्रा की सुविधा मुहैया करवाना, बड़े रेलवे स्टेशनों पर अंडरपास व सीमित ऊंचाई वाले सब-वे का निर्माण, सरप्लस रेल भूमि पर अस्पताल और स्कूल-कॉलेज खोलना, लाइसेंसधारी कुलियों, वेंडरों व हॉकरों के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजना का विकास जैसे कदम अवश्य ही सराहनीय हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-6864299586166741371?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/6864299586166741371/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=6864299586166741371' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/6864299586166741371'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/6864299586166741371'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2010/02/blog-post_25.html' title='रेल बजट में राजनीति हावी'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-421668760190509892</id><published>2010-02-20T12:21:00.000-08:00</published><updated>2010-02-20T12:24:00.221-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सोचें तो सही'/><title type='text'>बारह बजे लेट नहीं, चार बजे भेंट नहीं</title><content type='html'>इस बार पटना से वापसी में अकेला ही था। हावड़ा-जम्मूतवी हिमगिरि एक्सप्रेस से लखनऊ तक आना था। सफर दिन का था और मैं अकेले ही था, सो सहयात्रियों से बातचीत शुरू हो गई। सहयात्रियों में पटना सचिवालय में कार्यरत दो बड़े अधिकारी थे। इनमें से एक अपनी बिटिया को बैंक पीओ की लिखित परीक्षा दिलवाने के लिए लखनऊ जा रहे थे, तो दूसरे बिटिया को बैंक पीओ के लिए ही ज्वाइन कराने जा रहे थे। आपस में उनकी भी जान-पहचान नहीं थी, लेकिन जब उनकी बातचीत शुरू हुई, तो पता चला कि वे दोनों एक ही स्थान पर काम करते हैं। एक वित्त विभाग में थे तो दूसरे अभियन्त्रण सेवा में। &lt;br /&gt;मेरी सहज जिज्ञासा वर्तमान दौर में सरकारी कामकाज के बारे में जानने की हुई, तो एक अधिकारी की बिटिया के मुंह से सहज ही निकल पड़ा-बारह बजे लेट नहीं, चार बजे भेंट नहीं। मैंने इसे थोड़ा और स्पष्ट करने को कहा तो उसका कहना था कि पहले तो यह आलम यह था कि सरकारी दफ्तरों में अधिकारियों-कर्मचारियों को केवल वेतन से ही वास्ता था, काम से उनका कोई लेना-देना नहीं होता था। राज्य प्रशासन के सबसे बड़े दफ्तर शासन सचिवालय में दोपहर 12 बजे तक तो कर्मचारी-अधिकारी पहुंचते ही नहीं थे और पहुंचते भी थे तो आपस में गप्पें हांकने और चाय-नाश्ता करने के बाद चार बजे तक विदा हो लेते थे। &lt;br /&gt;मैंने अभियन्त्रण सेवा के अधिकारी से इन दिनों सचिवालय में उनकी उपस्थिति समय के बारे में पूछा तो मुख्यमन्त्री नीतीश कुमार की सख्ती से चिढ़े हुए से लगे। उन्हें शिकायत थी कि वर्तमान में तो सवेरे साढ़े नौ बजे ऑफिस में आ ही जाना पड़ता है। 10 मिनट से अधिक देरी होने पर उपस्थिति पंजिका सीनियर अधिकारी के पास चली जाती है और अगले दिन स्पष्टीकरण देना पड़ता है। &lt;br /&gt;जहां तक मैं समझता हूं, माता-पिता अपनी सन्तान के लिए पहले रोल मॉडल होते हैं। यदि सन्तान ही माता-पिता की कर्तव्यहीनता या कामचोरी का मजाक बनाए, तो इससे बुरी बात और कोई नहीं हो सकती। यदि माता-पिता के आचरण में ही कमी होगी, तो वे अपनी सन्तान के लिए रोल मॉडल कैसे बन पाएंगे और उनके लिए आदर्श कैसे स्थापित कर पाएंगे। राज्य और राष्ट्र के चरित्र और विकास की बात तो तब की जाए, जब इसकी सबसे छोटी इकाई परिवार में सब कुछ उचित और सन्तुलित हो।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-421668760190509892?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/421668760190509892/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=421668760190509892' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/421668760190509892'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/421668760190509892'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2010/02/blog-post_20.html' title='बारह बजे लेट नहीं, चार बजे भेंट नहीं'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-608651955135344116</id><published>2010-02-18T12:21:00.000-08:00</published><updated>2010-02-18T12:41:13.140-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सरोकार'/><title type='text'>बिहार - समय के साथ बदल रहा है स्वाद</title><content type='html'>बीतते हुए समय के साथ बिहार में बहुत कुछ बदलता जा रहा है। वंशवृद्धि के कारण हुए बंटवारे से खेत भले ही सिकुड़ती जा रही हो, उपज काफी बढ़ गई है। पिताजी ने बताया कि पहले जब लोगों के पास काफी खेत थे तो बहुत बड़ी आबादी मड़ुवा, जनेरा, सामा-कोदो खाने को विवश थी। जो यह सब भी नहीं खरीद पाते थे, उनके लिए गूलर और बरगद के फल भी प्रकृति के वरदान से कम नहीं हुआ करते थे। शकरकन्द, खेसारी और मड़ुवा की स्थिति ऐसी थी कि कई गांवों की पहचान ही इसी से होती थी। मसलन जिस गांव में मड़ुवा की खेती अधिक होती थी, वहां के अधिकतर लोग घेंघा रोग से पीçड़त होते थे। इसी तरह खेसारी की उपज अधिक मात्रा में होती थी, वहां के लोगों में जोड़ों में ददॅ की समस्या आम थी। ऐसे गांवों के लोगों के पैर अमूमन टेढ़े हो जाया करते थे, जिस कारण चलने में उन्हें असह्य पीड़ा होती थी। नई पीढ़ी को तो इन अभिशापों से मुक्ति मिल चुकी है, लेकिन पुरानी पीढ़ी के लोग आज भी इस पीड़ा का दंश झेलते देखे जा सकते हैं। आज की तारीख में कोई भी मोटा अनाज खाना पसन्द नहीं करता और करे भी तो ये मोटे अनाज बड़ी मुश्किल से मिलते हैं क्योंकि किसानों ने घाटे का सौदा समझकर इन्हें उपजाना ही बन्द कर दिया है। पहले मजबूरी में सत्तू खाते थे और-अभावे शालिचूर्णम्-कहावत आम थी, लेकिन आज सत्तू रंगीन पॉलिथिन में गैस्टि्रक की औषधि के रूप में 200-250 ग्राम पैकिंग में बिकता है। इसी तरह गरीबी का सहारा भुना हुआ मक्का पॉप कॉर्न बनकर इतरा रहा है। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;चना आउट, राजमा इन&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/S32ldvlto_I/AAAAAAAAAPU/7H8IqsIFjIs/s1600-h/chana.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 300px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/S32ldvlto_I/AAAAAAAAAPU/7H8IqsIFjIs/s400/chana.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5439685855342863346" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो-ढाई दशक पहले गांव छूटने के कारण वहां से जुड़ी कई चीजें भी छूट गईं।  कई स्वाद अविस्मरणीय हैं, लेकिन जबान को उन्हें चखने का अवसर ही नहीं मिल पाता। इस बार जनवरी में गया तो चने का साग खाने की इच्छा बरबस ही बलवती हो उठी। छोटे भाई को पूछा तो पता चला कि अब अपने खेतों में तो क्या, पूरे गांव में ही कहीं चने की खेती नहीं होती। इस तरह मन की बात मन में ही रह गई। भला हो भतीजे का जो पटना में रहकर प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी कर रहा है। उसे फोन कर दिया था तो वह ट्रेन में बिठाने आया तो चने का साग खरीदकर ले आया, जो बिहार से जयपुर के लिए महत्वपूर्ण सौगात था हमारे लिए। &lt;br /&gt;हां, इस बार गांव में कई स्थानों पर एक नई फसल देखी। पूछने पर पता चला कि यह राजमा है। कभी अरहर की दाल किसी घर में बनती थी तो उसकी सोंधी महक पूरे मोहल्ले में फैल जाती थी, अब राजमे की खुशबू का विस्तार इस तरह होता है या नहीं, यह तो मुझे नहीं पता, लेकिन यह तो पक्का है कि अरहर की जगह लोगों की जीभ को राजमा का स्वाद भी भा गया है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-608651955135344116?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/608651955135344116/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=608651955135344116' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/608651955135344116'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/608651955135344116'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2010/02/blog-post_18.html' title='बिहार - समय के साथ बदल रहा है स्वाद'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/S32ldvlto_I/AAAAAAAAAPU/7H8IqsIFjIs/s72-c/chana.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-7637974561761741220</id><published>2010-02-17T12:09:00.000-08:00</published><updated>2010-02-17T12:11:44.598-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सरोकार'/><title type='text'>बिहार - समृद्धि आई तो भागे अपराध</title><content type='html'>सूरज की किरणें जब अपना उजास फैलाती हैं, तो घटाटोप अंधकार का साम्राज्य भी खत्म हो जाता है। सरकारी कायदा जब सुधरता है तो बहुत सारी व्यवस्थाएं खुद-ब-खुद पटरी पर आ जाती हैं। पिछले डेढ़-दो दशक में जिस तरह अपहरण काण्ड कुटीर उद्योग की श्रेणी में आ गए थे और इनसे सम्बंधित खबरें रोज अखबारों की लीड बना करती थीं, अब वह स्थिति नहीं है। बहुत हद तक अपराध पर काबू पा लिया गया है। वर्तमान महानिदेशक आनन्द शंकर (जो सम्भवतया सेवानिवृत्ति के करीब ही हैं) कृष्णभक्ति के साथ अपनी ईमानदारी के लिए भी जाने जाते हैं। इसी का परिणाम है कि पटना में स्थान-स्थान पर पुलिस के जवान मुस्तैद नज़र आते हैं। लालू प्रसाद यादव की रहनुमाई वाले राष्ट्रीय जनता दल की ओर से गत 28 जनवरी को आहूत बिहार बन्द के दौरान नीतीश सरकार और आनन्द शंकर का ही प्रताप था कि पटना में कोई अप्रिय वारदात नहीं हुई। बन्द के बावजूद मैंने एक मित्र के साथ मोटरसाइकिल पर 20-25 किलोमीटर की यात्रा की, लेकिन कहीं किसी ने बदतमीजी नहीं की। ऐसा लग रहा था कि दुकानदारों ने भी बेमन से ही अपने प्रतिष्ठान बन्द कर रखे थे। जिस किसी से बात की, वह महंगाई से तो त्रस्त तो था, लेकिन इसके लिए राज्य की नीतीश सरकार को जिम्मेदार नहीं मान रहा था। शाम 4 बजते-बजते तो सब कुछ सामान्य हो गया था।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/S3xNPu4D9OI/AAAAAAAAAPM/8YxYgy_9X1w/s1600-h/Anand_Shankar.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 357px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/S3xNPu4D9OI/AAAAAAAAAPM/8YxYgy_9X1w/s400/Anand_Shankar.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5439307382633264354" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;डीजीपी आनन्द शंकर&lt;br /&gt;अपराधों पर अंकुश लगा है तो इसका कारण लोगों को रोजगार मिलना भी माना जा सकता है। पूरे बिहार में जिस बड़े पैमाने पर सड़कें बन रही हैं और दूसरे भी काम हो रहे हैं, उसमें हजारों लोगों को रोजगार मिला है। इसके अलावा राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना (जिसमें महात्मा गांधी के नाम की बैसाखी भी लग गई है) से भी लोगों को जीने का सहारा मिला है। आमदनी बढ़ी है तो खर्च के रास्ते भी खुलने लगे हैं। कम दूरी की पैसेंजर बसों और जीपों में भी मोबाइल की बार-बार बजती रिंगटोन से सहज ही इसका अहसास हो जाता है। पिंकसिटी जयपुर में रहते हुए जितनी मोबाइल कंपनियों के बारे में जानता था, उनके अलावा भी यूनिनॉर, एसटेल सहित कई सारी मोबाइल कंपनियों ने बखूबी अपनी उपस्थिति बनाए रखी है। इनकी आपसी जंग में उपभोक्ताओं को अच्छी और बेहतर संचार सेवाएं मिल रही हैं। जो गांव पचासों वर्ष से टेलीफोन के खंभे के लिए तरस गए थे, उन्हीं गांवों में आज तीन-चार कंपनियों के टावर कोसों दूर से नज़र आते हैं। नेटवर्क की कहीं कोई समस्या नहीं है। हां, बिजली की कमी के कारण कई बार सेलफोन को चार्ज करने की समस्या उत्पन्न हो जाती है। आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है, इस तर्ज पर मोहल्लों में जेनरेटर प्रदाताओं ने शाम के समय महज दो-तीन रुपए रोजाना की दर पर अंधेरा भगाने की व्यवस्था कर रखी है। मोबाइल हैण्डसेट बनाने वाली कंपनियां नित नए ऐसे हैण्डसेट लांच कर रही हैं, जिनके सहारे बिहार में बिजली सप्लाई की अव्यवस्था के बावजूद मोबाइल निष्प्राण नहीं हो।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-7637974561761741220?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/7637974561761741220/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=7637974561761741220' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/7637974561761741220'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/7637974561761741220'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2010/02/blog-post_17.html' title='बिहार - समृद्धि आई तो भागे अपराध'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/S3xNPu4D9OI/AAAAAAAAAPM/8YxYgy_9X1w/s72-c/Anand_Shankar.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-6794588382597516704</id><published>2010-02-15T12:14:00.000-08:00</published><updated>2010-02-15T12:15:14.148-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='झंडा ऊंचा रहे हमारा'/><title type='text'>शिक्षा को मिल रही गति</title><content type='html'>मेरे जमाने में बच्चे सरकारी स्कूल में ही पढ़ा करते थे और यह माता-पिता के लिए भी किसी तरह से कमतरी का द्योतक नहीं होता था। मेरी स्कूली शिक्षा पूरी होने तक ही नहीं, बल्कि कॉलेज शिक्षा तक यह हाल बना रहा। वर्ष 1990 के बाद सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर कुछ इस तरह गिरता गया कि अभिभावक संसाधन नहीं होने के बावजूद बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाना मजबूरी होने लगी थी। इसके फलस्वरूप सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या दिन-ब-दिन कम होने लगी। पिछले 10-15 साल में जब भी गांव जाता था तो मित्रों की बातचीत में शिक्षा का गिरता स्तर महत्वपूर्ण हुआ करता था, लेकिन जब नीतियां बनाने वाले ही इन बातों से अनभिज्ञ हों तो आम आदमी क्या कर सकता है। इस बार पड़ोस की कई लड़कियों को स्कूल यूनिफॉर्म में देखा तो बरबस ही पूछ बैठा कि आसपास कोई कॉन्वेंट या प्राइवेट स्कूल खुला है क्या? पता चला कि इन लड़कियों को सरकार की ओर से स्कूल यूनिफॉर्म के लिए राशि उपलब्ध कराई जा रही है। इतना ही नहीं, सरकारी स्कूलों में कक्षा 9-10 में पढ़ने वाली लड़कियों को सरकार की ओर से साइकिल भी उपलब्ध कराई जा रही है, ताकि घर से स्कूल की दूरी उनकी शिक्षा में बाधक नहीं बने। यह भी पता चला कि मुख्यमन्त्री नीतीश कुमार ने इस योजना का विस्तार कर लड़कों के लिए भी साइकिल उपलब्ध कराने की घोषणा कर दी है, जिसे शीघ्र ही अमली जामा पहनाया जाएगा। जानकर खुशी हुई कि प्रदेश में शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए सरकार कुछ कर तो रही है। इसके साथ ही अपना गुजरा जमाना भी याद आ गया, जब अपने गांव से हम दर्जनों साथी पैदल ही चार-पांच किलोमीटर की दूरी तय कर बिना नागा हाई स्कूल जाया करते थे। &lt;br /&gt;शिक्षा के प्रति लोगों का रुझान इस कदर बढ़ गया है कि स्कूलों के भवन छोटे पड़ने लगे हैं। इसे देखते हुए बड़े विजन वाले मुख्यमन्त्री नीतीश कुमार ने स्कूलों को क्रमोन्नत करने और उसी अनुपात में संसाधन उपलब्ध कराने के प्रयास भी जारी रखे हैं। यदि यह सब इसी तरह जारी रहा तो उम्मीद की जा सकती है कि शिक्षा को वांछित गति मिलेगी और बिहार एक बार फिर नालन्दा, तक्षशिला के गौरवशाली पथ पर अग्रसर हो सकेगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-6794588382597516704?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/6794588382597516704/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=6794588382597516704' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/6794588382597516704'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/6794588382597516704'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2010/02/blog-post_15.html' title='शिक्षा को मिल रही गति'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-6585142961265299186</id><published>2010-02-14T11:35:00.000-08:00</published><updated>2010-02-14T11:44:23.517-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सरोकार'/><title type='text'>बिहार - गांवों की चमाचम सड़कें करती हैं स्वागत</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/S3hSb2ExYLI/AAAAAAAAAPE/ssadwb6Af5M/s1600-h/bihar.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 291px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/S3hSb2ExYLI/AAAAAAAAAPE/ssadwb6Af5M/s400/bihar.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5438187188375347378" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;करीब 18 माह के लंबे अरसे के बाद पिछले दिनों बिहार जाने का सुअवसर मिला। वैसे गत वर्ष मई में भी गया था, लेकिन समयाभाव में पटना से ही लौट आने के कारण यह लकीर छूकर आने भर की यात्रा रह गई थी। इस बार दर्जनों गांवों की यात्रा के क्रम में डेढ़-दो सौ किलोमीटर का सफर मोटरसाइकिल और बसों से किया। मैंने पहले भी कई बार कहा है कि किसी राजनीतिक दल से मेरा वास्ता नहीं है, लेकिन आंखों देखी सच को झुठलाना भी पाप से कम नहीं है। सो इस बार गांवों में जो तस्वीर दिखी, उसके लिए बिहार के मुख्यमन्त्री नीतीश कुमार वाकई प्रशंसा के हकदार हैं। जी हां, जिन गांवों में पहले कच्ची सड़क से जाना पड़ता था, (जो कई स्थानों पर पगडण्डी सी हुआ करती थी), वहां इस बार पक्की चमचमाती सड़क से हमने सफर किया। इसमें न तो कहीं धचके थे और न ही धूल हमारे सिर पर सवार होने को आतुर थी। हां, कहीं-कहीं धूल थी भी, तो वहां सड़क के लिए हो रही मिट्टी भराई के कारण थी। स्थानीय बाशिन्दों में इस बात का सन्तोष और खुशी थी कि उनके गांव में भी अब पक्की सड़क होगी। बिहार के बड़बोले तत्कालीन मुयमन्त्री लालू प्रसाद यादव ने अपने शासनकाल में सूबे की सड़कों को हेमामालिनी के गाल जैसी करने के दावे किए थे, लेकिन तब वहां की सड़कों के गड्ढे चेचक के दाग से भी कहीं अधिक गहरे हुआ करते थे। बस, ट्रक, जीप, कार से तीस-चालीस किलोमीटर के सफर में टायरों का एक-दो बार पंचर होना लाजिमी था। ऐसे में मितभाषी मुख्यमन्त्री नीतीश कुमार ने सड़कों का कायकल्प कर दिया है। &lt;br /&gt;पटना में भी सड़कों का स्तर काफी सुधर गया है। यहां की सड़कों को देखकर लगता है कि आप किसी बड़े प्रदेश की राजधानी में हैं। ऐसा नहीं है कि कमियां नहीं हैं, अभी भी पटना में ही बहुत सुधार की दरकार है, लेकिन जिस गति से काम हो रहा है, यदि यह सब अबाध गति से चलता रहा तो आने वाले तीन-चार साल में हालात और भी बेहतर होंगे। &lt;br /&gt;मुंह चिढ़ाता राजधानी का बस स्टैण्ड&lt;br /&gt;पहले पटना रेलवे जंक्शन से बाहर निकलते ही महावीर मन्दिर से थोड़ी दूर पर ही वीर कुंवर सिंह बस स्टैण्ड हुआ करता था, जिसे शहर में होने वाले ट्रैफिक जाम से निजात दिलाने के लिए अब जंक्शन के दक्षिणी ओर करबिगहिया में शिफ्ट कर दिया गया है। वहां कम स्थान होने के कारण पहले बहुत सारी दिक्कतें थीं, लेकिन नए स्टैण्ड पर काफी जगह होने के बावजूद अव्यवस्थाएं भी उसी अनुपात में पसरी हुई हैं। गन्दगी का आलम ऐसा है कि वहां जाकर अगले गन्तव्य के लिए बस पकड़ना काफी मुसीबत भरा होता है। यह तो पक्की बात है कि आज के दौर के राजनेता बस से सफर नहीं करते, तो उन्हें बस स्टैण्ड के हालात से वास्ता नहीं पड़ता होगा, लेकिन आमजन को होने वाली परेशानियों से उनका बेखबर रहना तो किसी भी सूरत में अच्छी बात नहीं है। विशेष रूप से तब, जब इस तथाकथित अन्तरराज्यीय बस स्टैण्ड के पास ही चाणक्य राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय भी शुरू किया गया है, इस ओर से नीति नियन्ताओं का आंखें मून्दे रहना कदापि शोभनीय नहीं है। आशा की जानी चाहिए, अगली यात्रा तक बस का सफर तो सुहाना होगा ही, बस स्टैण्ड के हालात भी अवश्य ही सुधर जाएंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-6585142961265299186?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/6585142961265299186/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=6585142961265299186' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/6585142961265299186'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/6585142961265299186'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2010/02/blog-post.html' title='बिहार - गांवों की चमाचम सड़कें करती हैं स्वागत'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/S3hSb2ExYLI/AAAAAAAAAPE/ssadwb6Af5M/s72-c/bihar.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-7907736936858372773</id><published>2009-11-25T11:14:00.000-08:00</published><updated>2009-11-25T11:20:19.868-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सोचें तो सही'/><title type='text'>...तो सीएम-पीएम क्यों न चुने जनता?</title><content type='html'>गुलाबीनगरी में गत 23 नवंबर को हुए शहरी निकाय के चुनाव में पहली बार जनता ने अपना महापौर चुनने के लिए मतदान किया। जी हां, पहले जनता पार्षदों को चुनती थी और फिर वे सब मिलकर महापौर चुनते थे। इस बार चुनाव में दो इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) की व्यवस्था की गई थी। यानी मतदाताओं ने महापौर और पार्षद के लिए अलग-अलग वोट डाले। आज यानी 26 नवंबर को इस चुनाव का रिजल्ट आ जाएगा। &lt;br /&gt;इस नई व्यवस्था के कई फायदे हैं। जैसे-पार्षदों के चुने जाने के बाद महापौर के लिए होने वाली रस्साकसी की नौबत नहीं आएगी और न ही पार्षदों की खरीद-फरोख्त हो सकेगी। इसके अलावा यह भी संभव हो सका कि यदि महापौर का उम्मीदवार आपकी पसंद के राजनीतिक दल का नहीं है, या उसके व्यक्तित्व से आपको शिकायत है तो आप उसकी जगह अन्य प्रत्याशी को अपना वोट दे सकते हैं और अपनी निष्ठा वाले राजनीतिक दल के पार्षद प्रत्याशी के पक्ष में मतदान कर सकते हैं।&lt;br /&gt;इस चुनाव के बाद से ही बुद्धिजीवियों ही नहीं, आम लोगों में भी इस बात को लेकर चरचा गर्म है कि राज्य विधानसभाओं और लोकसभा चुनाव में भी यही प्रणाली क्यों न अपनाई जाए। फिर, वहां भी दल-बदल कानून, आलाकमान की ओर से यस मैन को थोपने के हालात, विधायकों-सांसदों की खरीद-फरोख्त पर रोक लग सकेगी। &lt;br /&gt;हां, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के उम्मीदवारों को लेकर सार्वजनिक मंच पर विस्तृत रूप से खुली बहस होनी चाहिए। वे आम जनता के बीच खुलकर अपना पक्ष रखें और फिर मैरिट के आधार पर जनता उनका चयन करे। ऐसे में ही हमारा लोकतंत्र मजबूत हो सकेगा। आखिरकार लोकतंत्र के जनक भारतवर्ष में ही लोकतंत्र का गला कब तक घोंटा जाएगा। क्यों न हम पुरानी दकियानूसी व्यवस्था को उखाड़ फेंकें। यदि हर जायज-नाजायज बात के लिए-राजनीतिक दलों के के हितों के लिए-संविधान में संशोधन किया जा सकता है तो लोकतंत्र में प्राणवायु फूंकने के इस पवित्र उद्देश्य के लिए क्यों न संविधान में एक और संशोधन किया जाए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-7907736936858372773?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/7907736936858372773/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=7907736936858372773' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/7907736936858372773'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/7907736936858372773'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2009/11/blog-post_25.html' title='...तो सीएम-पीएम क्यों न चुने जनता?'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-5614658873279845973</id><published>2009-11-16T04:25:00.000-08:00</published><updated>2009-11-16T04:27:47.988-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आत्मनिवेदन'/><title type='text'>जीते-जी क्यों न पढ़ लें गरुड़ पुराण ?</title><content type='html'>महानगरीय जीवन की कुछ मान्यताएं बीतते हुए समय के साथ परंपरा में तब्दील हो जाती हैं। गुलाबी नगर में भी ऐसी ही एक परंपरा है। यहां किसी के परलोकगमन पर मृत्यु के तीसरे दिन तीये की बैठक होती है, जिसमें परिजन-पुरजन-मित्रजन-रिश्तेदार-साथ काम करने वाले सभी एकत्रित होते हैं और मृत व्यक्ति को श्रद्धांजलि-पुष्पांजलि निवेदित करते हैं। आम तौर पर यह कार्यक्रम एक घंटे का होता है। जिनकी मृत्यु हो चुकी है, उनके प्रति श्रद्धा निवेदित करना और उनके परिजनों के प्रति शोक-संवेदना व्यक्त करना भारतीय परंपरा के अनुकूल है। &lt;br /&gt;मैं यहां कुछ अलग किस्म की पीड़ा को शेयर करने के लिए मुखातिब हूं। यहां अमूमन तीये की बैठक के दौरान पंडितजी गरुड़ पुराण के कुछ अंशों का पाठ करते हैं। जैसा कि सर्व विदित है, गरुड़ पुराण में व्यक्ति के जीवन में किए गए काम के आधार पर भोगे जाने वाले हजारों तरह के नरक का वर्णन किया गया है। &lt;br /&gt;भारतीय मान्यताओं के अनुसार, यदि हमारे पुराणों में कही गई बातें सत्य हैं और हमारे जीवन के कामकाज का फल हमें मरने के बाद भोगना ही पड़ता है, तो सावधानी के तौर पर हम जीवनकाल में ही गरुड़ पुराण को क्यों न पढ़ लें, जिससे हम अपने जीवन में अच्छे काम करके अपना अगला जन्म भी संवार लें। &lt;br /&gt;गरुड़ पुराण के पाठ के दौरान पंडितजी जब प्रेत के द्वारा भोगे जाने वाले असह्य कष्टों का वर्णन करते होंगे, तो उनके प्रियजनों-परिजनों को कितनी पीड़ा होती होगी। क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि ऐसे अवसरों पर गरुड़ पुराण की बजाय श्रीमद्भगवद्गीता के कुछ श्लोकों का पाठ किया जाए, जिमें मानव जीवन का सार छिपा हुआ है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मोबाइल क्यों नहीं होता मौन?&lt;br /&gt;जब किसी व्यक्ति के चिरमौन धारण करने पर शोकाभिव्यक्ति के लिए लोग एकत्रित होते हैं, ऐसे में भी कुछ लोगों का मोबाइल जब वाचाल हो जाता है तो उक्त व्यक्ति के संवेदनाशून्य होने का बोध होता है। क्या कुछ देर के लिए मोबाइल को मौन मोड पर नहीं रखा जा सकता। भाई, यदि मोबाइल प्रेम इतना ही अधिक है और उसके मौन होने पर आपका भी दिल दुखता हो तो मोबाइल को कंपायमान मोड पर कर दें, ताकि उसकी धड़कनों का अहसास आपको हो जाए और फिर आप जैसा उचित समझें, कर डालें। इतना तो ध्यान रखना ही चाहिए कि एक दिन हम सबको सदा के लिए मौन धारण करना ही है तो फिर कुछ पलों के लिए मोबाइल क्यों नहीं मौन हो सकता?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-5614658873279845973?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/5614658873279845973/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=5614658873279845973' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/5614658873279845973'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/5614658873279845973'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2009/11/blog-post_16.html' title='जीते-जी क्यों न पढ़ लें गरुड़ पुराण ?'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-7480038914622315463</id><published>2009-11-14T12:12:00.001-08:00</published><updated>2009-11-14T12:13:05.975-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जरा सोचिए'/><title type='text'>...और कैसा होता है प्रलय</title><content type='html'>शुक्रवार को फिल्में रिलीज होती हैं और फिल्मों के जानकार इसकी चीर-फाड़ करते हैं। आजकल जैसी फिल्में बन रही हैं, उनकी तारीफ तो विरले ही पढ़ने को मिलती है। शनिवार को भी बॉलीवुड की फिल्म -तुम मिले- और हॉलीवुड की फिल्म 2012 की समीक्षा पढ़ी। वैसे भी आजकल इन समीक्षाओं को पढ़कर और फिर किराये की सीडी लाकर ही फिल्में देखकर ही काम चलाना पड़ता है। &lt;br /&gt;न तो फिल्मों के बारे में ज्यादा समझता हूं और न ही इसके बारे में जानना चाहता हूं। मैं किसी इतर कारण से आप लोगों से मुखातिब हूं। आजकल कई बार लोगों की जुबान से प्रलय की आशंका से जुड़े सवालों से दो-चार होना पड़ता है। जहां तक मैं समझता हूं, आज जिस वातावरण में हम जी रहे हैं, वह किसी प्रलय से कम नहीं है। &lt;br /&gt;आप सोचिए, जब 20 रुपए किलो आटा, 20 रुपए किलो आलू और 90 से 100 रुपए किलो में दाल खरीदना पड़ रहा हो, ढाबे पर एक अति पतली रोटी के चार रुपए चुकाने पड़ रहे हों, निकम्मी सरकारों के कारण स्वाइन फ्लू के साये में जीने को आप विवश हों,  सरकारी अस्पताल लोगों के उपचार का नहीं, बल्कि डॉक्टरों, कंपाउंडरों और अन्य कर्मचारियों की कमाई का सबब बने हों, मिलावटी मावा और सिंथेटिक दूध की खबरें अखबारों की मेन लीड बनती हो, ऐसे में आम आदमी के लिए एक-एक दिन गुजारना किसी प्रलय का सामना करने से कम नहीं होता। आमजन के भाग्य विधाताओं का इन समस्याओं से कोई वास्ता नहीं पड़ता, इसलिए वे इसकी फिक्र नहीं करते। &lt;br /&gt;इसके बावजूद आगामी सालों में प्रलय की भविष्यवाणी करने वाले तथाकथित ज्योतिषियों से मेरा निवेदन है कि आम जनता के लिए खुद ही बहुत सारी परेशानियां मुंह बाए खड़ी रहती हैं, सो वे अपनी ऐसी भविष्यवाणियों से बाज आ जाएं ताकि लोग चैन से रह सकें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-7480038914622315463?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/7480038914622315463/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=7480038914622315463' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/7480038914622315463'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/7480038914622315463'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2009/11/blog-post_14.html' title='...और कैसा होता है प्रलय'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-6674880505523877669</id><published>2009-11-11T11:56:00.000-08:00</published><updated>2009-11-11T12:01:19.269-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सोचें तो सही'/><title type='text'>बच्चों के मरने का है इंतजार</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SvsX8WMfDCI/AAAAAAAAAOI/iZsOZKQM5Zc/s1600-h/swine+flu.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 140px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SvsX8WMfDCI/AAAAAAAAAOI/iZsOZKQM5Zc/s200/swine+flu.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5402938503478578210" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;गत वर्ष दिसंबर में हुए विधानसभा चुनाव के बाद अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी तो प्रदेशवासियों में स्वच्छ प्रशासन की उम्मीद जगी थी। गहलोत चूंकि गांधीवादी माने जाते हैं और उनके सादगी भरे आचार-व्यवहार से उनके ईमानदार होने में कोई संशय नहीं होता। इसके बावजूद पिछले कुछ दिनों से कुछ घटनाएं ऐसी हो रही हैं, जिनसे बार-बार ऐसा आभास होता है कि राजस्थान में सरकार है ही नहीं। जब तक कोई राजनीतिक दल और उसके नुमाइंदे विपक्ष में होते हैं, तब तक तो -हमें ऐसा करना चाहिए-ऐसा होना चाहिए- यह वक्त की जरूरत है- सरीखे जुमले जनता को भी अच्छे लगते हैं, लेकिन सत्तासीन होने के बाद ये जुमले जनता को डंक मारने लगते हैं, चुभने लगते हैं। &lt;br /&gt;पिछले 29 अक्टूबर को जयपुर शहर से महज 16-17 किलोमीटर दूर बने इंडियन ऑयल डिपो के टैंकरों में आग लग गई थी। आग ने प्रलंयकारी रूप धारण कर लिया और सरकार ने हाथ खड़े कर दिए कि इसमें हम कुछ नहीं कर सकते। यह तो ईश्वर की कृपा थी कि हवा ने आग का साथ नहीं दिया, अन्यथा मरने वालों की संख्या दर्जन में नहीं, सैकड़ों में होती और घायलों की संख्या हजारों में। भवनों व संपत्ति का नुकसान भी अरबों-खरबों तक पहुंच जाता। इस अग्निकांड के बाद प्रशासन ने जिस रूप में आपदा प्रबंधन का धर्म निभाया, वह निहायत ही दिशाहीन और अप्रभावी रहा। &lt;br /&gt;आग की लपटें थमने के बाद कारबन भरे जहरीले धुएं के बादल छंटे भी नहीं थे कि तीन नवंबर को शहर के नामी अंग्रेजी मीडियम एसएमएस स्कूल की प्राइमरी कक्षा की एक बच्ची को स्वाइन फ्लू होने की जानकारी उसके पिता ने स्कूल प्रशासन को दी। इसके बाद स्कूल ने स्वविवेक से एहतियात बरतते हुए एक सप्ताह की छुट्टी की घोषणा कर दी। उसके बाद से स्वाइन फ्लू से संक्रमित होने वाले बच्चों का आंकड़ा दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। बुधवार को प्रदेश में स्वाइन फ्लू के 83 नए मरीज मिले, जिनमें 71 अकेले राजधानी जयपुर में थे। इनमें भी स्वाइन फ्लू से प्रभावित बच्चों की संख्या 41 थी। चिकित्सा मंत्री और जिला प्रशासन अभी भी निजी स्कूलों को स्वविवेक से ही स्कूल बंद करने की हिदायत दे रहे हैं। और इन निजी स्कूलों का आलम यह है कि जिन स्कूलों में किसी बच्चे की स्वाइन फ्लू की रिपोर्ट पॉजीटिव मिलती है, तो उसमें अवकाश की घोषणा कर दी जाती है। ऐसे में कई अभिभावकों में दहशत का माहौल है और कई अभिभावक प्री-कॉशन लेते हुए भय के मारे अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेज रहे। सरकारी स्कूलों के बच्चों को तो भगवान भरोसे ही छोड़ दिया गया है। उनके बच्चों के लिए या उन स्कूलों में छुट्टी घोषित करने के कोई इंस्ट्रक्शन नहीं दिए जा रहे। &lt;br /&gt;स्वाइन फ्लू का प्रकोप जिस तरह से बढ़ रहा है, इसमें संदेह नहीं कि आने वाले दिनों में यह महामारी का रूप धारण कर ले। बीमारी कैसी भी हो, उपचार से बचाव का महत्व अधिक होता है और इस तथ्य को कोई नकार नहीं सकता। अगस्त में पुणे में जब स्वाइन फ्लू फैला था, तब वहां के प्रशासन ने बिना देर किए स्कूल-कॉलेजों में छुट्टी की घोषणा कर दी थी। एहतियात के तौर पर मॉल और मल्टीप्लेक्स भी बंद कर दिए गए थे। स्थिति सामान्य होने पर स्कूल-कॉलेज, मॉल-मल्टीप्लेक्स सभी खुल गए और आज वहीं सब कुछ पटरी पर है। &lt;br /&gt;क्या राजस्थान सरकार इस तरह के निर्णय नहीं ले सकती? मुख्यमंत्री गहलोत बहुत ही ईमानदार हैं, लेकिन उनके ईमानदार होने भर से प्रदेश की जनता का भला नहीं होने वाला। जनता की रक्षा और भले के लिए सरकार को जरूरी और त्वरित निरणय भी लेने होंगे, तभी उसकी उपादेयता सिद्ध हो पाएगी।  &lt;br /&gt;मुझे तो लगता है कि राजस्थान में सरकार नाम की कोई चीज है ही नहीं या है भी तो वह कहीं लापता हो गई है, जिसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवानी पड़ेगी। या फिर इस सरकार को बड़ी संख्या में बच्चों के मरने का इंतजार है...उसके बाद ही यह चेतेगी। ईश्वर सरकार को सद्बुद्धि दे जिससे प्रदेशवासियों को इस संक्रामक बीमारी से शीघ्रातिशीघ्र मुक्ति मिल सके।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-6674880505523877669?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/6674880505523877669/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=6674880505523877669' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/6674880505523877669'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/6674880505523877669'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='बच्चों के मरने का है इंतजार'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SvsX8WMfDCI/AAAAAAAAAOI/iZsOZKQM5Zc/s72-c/swine+flu.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-7303017144411209341</id><published>2009-10-09T13:13:00.000-07:00</published><updated>2009-10-09T13:16:46.241-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सोचें तो सही'/><title type='text'>पहले सिरदर्द देते हैं और फिर हैड मसाजर...</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/Ss-aBVi5QJI/AAAAAAAAAOA/Iz981mKM-bY/s1600-h/China_Handy+HeMassager.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 167px; height: 200px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/Ss-aBVi5QJI/AAAAAAAAAOA/Iz981mKM-bY/s200/China_Handy+HeMassager.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5390696626739822738" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;जी हां, अभी कुछ दिनों पहले मैंने एक पोस्ट में भारतीय बाजार में चीन की घुसपैठ पर चिंता जताई थी। सच, अपने हाथ में ज्यादा कुछ नहीं है, लेकिन सोचने और कोसने से तो कोई रोक नहीं सकता। एक सप्ताह बाद दिवाली आने वाली है। कोई जमाना था जब घी के दीये जलते थे, फिर तेल के दीये हुए और अब बिजली की जगमग की इस दुनिया में भावनाएं हमारी होंगी, लेकिन लड़ियां तो चीन की ही होंगी। हमारे नीति नियंता बिजली बचाने के लिए सीएफएल जलाने की सलाह देते हैं, लेकिन भारतीय सीएफएल इतने महंगे होते हैं कि आम भारतीय चाइनीज सीएफएल जलाकर ही बिजली बचाता है, जिससे हमारी बिजली बचे न बचे, चीन की कमाई तो हो ही जाती है। सो, मेरा कहना है कि चीन की इस घुसपैठ ने मुझ जैसे हजारों लोगों को सिरदर्द दिया हुआ है। &lt;br /&gt;दिवाली की बात पर आऊं, तो हमारी गुलाबीनगरी भी इन दिनों ज्योति के इस उत्सव के उल्लास में सराबोर है। पिछले दिनों दिवाली पर खरीदारी के लिए आयोजित मेले में गया तो भीड़ में एक व्यक्ति ने मेरे बालों में कुछ फिराया। एकबारगी तो यह अच्छा लगा, लेकिन तुरत ही सिर चकराया पुराने अनुभव को याद करके। करीब पंद्रह साल पहले एक मित्र ने कलकत्ता यात्रा का एक संस्मरण सुनाया था। चलती ट्रेन में एक फेरीवाला आया और चीनी बाम-चीनी बाम कहते-कहते अपनी झोली में से एक डिबिया निकाली और ----एक बार लगाते ही सिरदर्द को जड़ से मिटा देगा यह चीनी बाम......कहकर यात्रियों के माथे और आंखों के ऊपर वह बाम लगाने लगा। बाम लगाते ही ऐसी जलन हुई कि यात्रियों की आंखें खुल नहीं पा रही थीं। उसी बीच उस तथाकथित फेरीवाले के कुछ साथी अचानक प्रकट हो गए और अल्पकालिक अंधे हुए उन यात्रियों का सामान पार कर ले गए तथा चेन पुलिंग कर उतर गए। यात्रियों की आंखों में जब तक ज्योति लौटी, तब तक उनका बहुत कुछ गायब हो चुका था। मेरा मित्र भी उसी ट्रेन की दूसरी बोगी में था, जिसे कलकत्ता उतरने पर इस वाकये का पता चला। &lt;br /&gt;जब मैं दिवाली मेले में गया था, तो संयोग से उस दिन पांच सौ के तीन-चार नोट शर्ट की ऊपर वाली जेब में ही थे, सो डर लगा रहा था कि उसने सिर में जादू भरे तार फिराने की आड़ में पैसे तो पार न कर लिए हों। खाली जगह पर जाकर जेब चेक की तो संतोष हुआ। अब बारी थी पता करने की उस यंत्र के बारे में जिसे सिर में फिराने पर मालिश का सा अहसास हुआ था। मेले की एक रो में गया तो वहां कई सारी दुकानों पर वह यंत्र बिक रहा था, जिसके पैकेट पर Handy head massager लिखा हुआ था। पैकेट के नीचे छोटे अक्षरों में made in china छपा हुआ था। &lt;br /&gt;यह देखकर मलाल हुआ कि चीन पहले तो अपनी करनी से चाहे सैन्य घुसपैठ हो या हमारे बाजार में सेंध लगाकर-पहले तो हमें सिरदर्द देता है और फिर उससे निजात पाने के लिए हैंडी मसाजर। हर किसी उत्पाद की नकल करने में सिद्धहस्त हमारे अपने देश के महारथी कब इन छोटी-छोटी चीजें बनाने में अपनी कुशल कला का परिचय देंगे, जिससे ऐसी चीजों पर खर्च होने वाला हमारा पैसा विदेशियों की जेब के बजाय हमारे अपने उद्यमी भाइयों की तिजोरी में जाएगा। &lt;br /&gt;(संभव है आपमें से बहुतों को इस चाइनीज हैड मसाजर के बारे में काफी पहले से पता हो, लेकिन मैंने तो उस दिन पहली बार ही इसे देखा था, इसलिए ऐसे मित्रों से अपने अल्पज्ञान के लिए क्षमा चाहता हूं।)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-7303017144411209341?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/7303017144411209341/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=7303017144411209341' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/7303017144411209341'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/7303017144411209341'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2009/10/blog-post_09.html' title='पहले सिरदर्द देते हैं और फिर हैड मसाजर...'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/Ss-aBVi5QJI/AAAAAAAAAOA/Iz981mKM-bY/s72-c/China_Handy+HeMassager.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-5154196968979740113</id><published>2009-10-04T13:46:00.000-07:00</published><updated>2009-10-04T13:47:53.160-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आत्मनिवेदन'/><title type='text'>चांदनी रात में कुछ गीत गुनगुनाइए...</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SskI830idxI/AAAAAAAAAN4/QEQUehNClI8/s1600-h/kirti.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 103px; height: 200px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SskI830idxI/AAAAAAAAAN4/QEQUehNClI8/s200/kirti.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5388848270994994962" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;गुलाबी नगर में 38 साल पहले साहित्य और संस्कृति से अंतर्मन से जुड़े कुछ लोगों ने तरुण समाज की स्थापना की थी। तभी से इस संगठन ने होली के अवसर पर महामूरख सम्मेलन और शरदोत्सव के रूप में गीत चांदनी का आयोजन शुरू किया। इन दोनों ही कवि सम्मेलनों की आज देश के गिने-चुने कवि सम्मेलनों में गिनती होती है। गुलाबी नगर के बाशिंदों को सालभर इसका इंतजार रहता है। इसके संस्थापक महानुभाव निस्संदेह अब मध्यवय के हो गए होंगे, लेकिन उनके हृदय में तरुणाई अभी शेष है और यह आयोजन अनवरत-अबाध रूप से जारी है। अभी कल शनिवार 3 अक्टूबर को आश्विन की पूनम पर शरद ऋतु की रात जयपुर के जय क्लब लॉन पर गीत चांदनी कवि सम्मेलन हुआ। आइए, गीत चांदनी के कुछ गीत आप भी हमारे साथ मिलकर गुनगुनाइए -  &lt;br /&gt;दिल्ली की डॉ. कीर्ति काले ने &lt;br /&gt;जब बंधे बिजली स्वयं ही मोहपाशों में, &lt;br /&gt;चांदनी छिप जाए शरमाकर पलाशों में, &lt;br /&gt;जब छमाछम बाज उठे पायल घटाओं की, &lt;br /&gt;मांग जब भरने लगे सूरज दिशाओं की। &lt;br /&gt;तब हृदय के एक कोने में कोई कुछ बोल जाता है। &lt;br /&gt;रचना से चांदनी और सौंदर्य व मोहब्बत का रिश्ता जोड़ा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लखनऊ के देवल आशीष ने &lt;br /&gt;हमने तो बाजी प्यार की हारी ही नहीं है, &lt;br /&gt;जो चूके निशाना वो शिकारी ही नहीं है। &lt;br /&gt;कमरे में इसे तू ही बता कैसे सजाएं,&lt;br /&gt; तस्वीर तेरी दिल से उतारी ही नहीं है।। &lt;br /&gt;के माध्यम से प्रेम को रवानी दी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किशन सरोज ने &lt;br /&gt;बिखरे रंग तूलिकाओं से, बना न चित्र हवाओं का, &lt;br /&gt;इंद्रधनुष तक उड़कर पहुंचा, सोंधा इत्र हवाओं का...&lt;br /&gt;से हवा की फितरत और वाराणसी के श्रीकृष्ण तिवारी ने &lt;br /&gt;रेत पर एड़ी रगड़कर थक गया तो मन हुआ, &lt;br /&gt;अब मैं नदी बनकर बहूं...बहने लगा। &lt;br /&gt;हाथ में पत्थर लिए बच्चे मिले तो मन हुआ...&lt;br /&gt;अब मैं दरख्तों सा फलूं, फलने लगा।। &lt;br /&gt;के माध्यम से अपने ही रौ में बहने का अंदाजे बयां किया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरठ से आए सत्यपाल सत्यम ने &lt;br /&gt;हो गए संपन्न सब उपवास नभ में चांद निकला।। &lt;br /&gt;बुझ गई अनगिन दृगों की प्यास नभ से चांद निकला।। &lt;br /&gt;भावना जितनी अपावन थी सब हुई विसर्जित, &lt;br /&gt;अब सुखद संभावना को रिक्त है मन।। &lt;br /&gt;लहलहा उट्ठा है पतझर में बगीचा, &lt;br /&gt;अब तो बारह मास सावन है या फागुन, &lt;br /&gt;हर दिवस त्यौहार सा उल्लास, नभ में चांद निकला&lt;br /&gt;से चांद के महत्व पर प्रकाश डाला। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इलाहाबाद से आई रागिनी चतुरवेदी ने &lt;br /&gt;मेरे मन का फूल खिला है, हवा बताती है, &lt;br /&gt;शायद तुमने याद किया है, हिचकी आती है।। &lt;br /&gt;जिधर-जिधर जाती हैं नजरें, शगुन दिखाई देते, &lt;br /&gt;फड़क रहीं पलकें रुक जाती नाम तुम्हारा लेते, &lt;br /&gt;पिंजरे की चिड़िया भी कैसा पंख फुलाती है।। &lt;br /&gt;...शायद तुमने याद किया, हिचकी आती है।।&lt;br /&gt; के माध्यम से प्रियतम की यादें ताजी कीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बगड़  के भागीरथ सिंह भाग्य ने मीठी राजस्थानी में मरुथली माटी के सौंदर्य और महत्ता को कुछ इस तरह शब्द दिए - &lt;br /&gt;म्हारे खेतां में मौसम मजूरी करे&lt;br /&gt;बाजरो रात-दिन जी हजूरी करे&lt;br /&gt;म्हारे खेतां री रेतां रमे रामजी&lt;br /&gt;आज तन्ने रमा ल्याऊंली&lt;br /&gt;चाल रे सातीड़ा म्हारे खेतां में आज&lt;br /&gt;तन्नै काकड़ी खुआ ल्याऊं ली।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्वालियर से आए रामप्रकाश अनुरागी ने सुनाया - &lt;br /&gt;हम नदी बनकर बहे तो, सिंधु का जल हो गए।&lt;br /&gt;आग सी दहती किरण से, लिपट बादल हो गए।।&lt;br /&gt;फूल-फल-पत्ते टहनियां, हम तना, जड़ भी हम्हीं,&lt;br /&gt;सृष्टि-बीजों को बचाने हम धरातल हो गए।। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मध्य प्रदेश के खरगौन से आए दर्द शुजालपुरी ने &lt;br /&gt;उधर से तुम इधर आओ, इधर से हम उधर आएं,&lt;br /&gt;हमारी राह-रोशन को सितारे भी उतर आएं।।&lt;br /&gt;हमें दुनिया से क्या मतलब, हमें अपनों से क्या रिश्ता&lt;br /&gt;हमें तुम ही नजर आओ, तुम्हें हम ही नजर आएं।। &lt;br /&gt;के माध्यम से प्रेम में दो दिलों के एकाकार होने की कथा काव्य में कही।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;गीत चांदनी का संचालन कर रहे जयपुर के हास्य व्यंग्य के कवि सुरेंद्र दुबे ने भी कुछ गंभीर पंçक्तयों से अपने फौलादी इरादों का इजहार किया -&lt;br /&gt;मेरे कदमों का मंजिल से नाता है,&lt;br /&gt;मुझको भी इतिहास बनाना आता है।।&lt;br /&gt;हर इक बाधा शर्म से पानी-पानी है,&lt;br /&gt;मेरी गति से दूरी को हैरानी है।।&lt;br /&gt;हर पत्थर के मकसद से परिचित हूं मैं,&lt;br /&gt;गड्ढों की फितरत जानी पहचानी है।।&lt;br /&gt;मेरे पांवों से हर कांटा नजर चुराता है, &lt;br /&gt;मुझको भी इतिहास बनाना आता है।।&lt;br /&gt;मेरे कदमों का मंजिल से नाता है&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-5154196968979740113?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/5154196968979740113/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=5154196968979740113' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/5154196968979740113'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/5154196968979740113'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2009/10/blog-post_04.html' title='चांदनी रात में कुछ गीत गुनगुनाइए...'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SskI830idxI/AAAAAAAAAN4/QEQUehNClI8/s72-c/kirti.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-2388625242683303796</id><published>2009-10-03T13:07:00.000-07:00</published><updated>2009-10-03T13:12:25.497-07:00</updated><title type='text'>गांधी का गुणगान, लालबहादुर लापता</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SsevhYjT1vI/AAAAAAAAANg/LOtWfRUwOaM/s1600-h/05shastri.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 118px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SsevhYjT1vI/AAAAAAAAANg/LOtWfRUwOaM/s200/05shastri.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5388468467233183474" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;कल यानी शुक्रवार दो अक्टूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती धूमधाम से मनाई गई। संयोग कहें या दुरयोग कि पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री का जन्मदिवस भी इसी दिन था। कल के अखबारों में विभिन्न राज्य/केंद्र सरकारों और सरकारी संस्थाओं की ओर से भरपूर मात्रा में विज्ञापन प्रकाशित हुए। खलने वाली बात यह रही कि इस तुलना में लाल बहादुर शास्त्री को दस प्रतिशत भी तवज्जो नहीं दी गई। इस अवसर पर हुए आयोजनों के केंद्रबिंदु में भी महात्मा गांधी ही थे। शास्त्रीजी को याद करने के कार्यक्रम तो महज रस्म अदायगी जैसे थे। क्या लालबहादुर शास्त्री के महान व्यक्तित्व को हमारे नीति नियंताओं ने इतनी जल्दी भुला दिया। हालांकि ऐसा करने से शास्त्रीजी का कद कदापि छोटा नहीं पाएगा। शास्त्रीजी ने अपने चरित्र से जो मिसाल कायम की, उसे भुलाया नामुमकिन है। इक्के-दुक्के संगठनों को छोड़कर अधिकतर ने महात्मा गांधी पर केंद्रित कार्यक्रम ही आयोजित किए। &lt;br /&gt;कायस्थ समाज से जुड़े कुछ संगठनों ने लालबहादुर शास्त्री को अवश्य याद किया, लेकिन यहां सोचने का विषय है कि क्या शास्त्रीजी को याद करने का दायित्व महज एक समाज विशेष का ही है। इसे हम देश की बदकिस्मती ही कहेंगे कि आजादी के बाद से सत्ता में आए लोगों ने जगह-जगह गांधी की प्रतिमाएं स्थापित कर, उनके नाम से संस्थाएं स्थापित कर, देश की करेंसी पर राष्ट्रपिता की फोटो छापकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली, यदि वे गांधी के आदरशों को आचरण में लाते तो ऐसी महान विभूतियों को को इस तरह भुलाने की आदत उनमें नहीं पनपती।  &lt;br /&gt;अपने-अपने आराध्य&lt;br /&gt;कांग्रेस ने अपने आकाओं को हर तरह से तवज्जो दी, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। इसमें भी नेहरू परिवार से जुड़े नेताओं का नाम प्रथम गण्य है। भाजपा ने भी आरएसएस और जनसंघ के संस्थापकों और सरदार पटेल जैसे अपनी पसंद के नेताओं को ही अपना आराध्य समझा। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती की मेहरबानी से पूरा सूबा बाबा साहब अंबेडकर की प्रतिमाओं के पार्क के रूप में विकसित हो रहा है। इतना ही नहीं, अपने अनुयायियों द्वार भुलाए जाने की आशंका से ग्रसित बसपा सुप्रीमो जीते जी अपनी प्रतिमाएं स्थापित करने में लगी हैं। हालात ऐसे हैं कि सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में दखल देना पड़ा। &lt;br /&gt;नीतीश कुमार की सार्थक पहल&lt;br /&gt;बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शनिवार को घोषणा की कि भारत के प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की समाधि स्थल को दर्शनीय स्थल के रूप में विकसित किया जाएगा। वे प्रथम राष्ट्रपति की 125 वीं जयंती के उपलक्ष में उनकी पुनर्प्रकाशित पुस्तकों के लोकार्पण अवसर पर बोल रहे थे। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/Ssev7aLdZzI/AAAAAAAAANo/A-fQ4EMRvlQ/s1600-h/rajendra+prasad.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 144px; height: 200px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/Ssev7aLdZzI/AAAAAAAAANo/A-fQ4EMRvlQ/s200/rajendra+prasad.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5388468914346616626" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव को निर्देश दिया कि डॉ. राजेन्द्र बाबू की समाधि स्थल पर उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी शिलालेख के माध्यम से उल्लिखित कराएं ताकि नई पीढ़ी को इस महान विभूति के बारे में जरूरी जानकारियां मिल सकें। नीतीश ने केन्द्र सरकार से भी राजेन्द्र बाबू के कृतित्व एवं व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को नयी पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए यथासंभव प्रचार-प्रसार कराए जाने का अनुरोध किया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-2388625242683303796?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/2388625242683303796/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=2388625242683303796' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/2388625242683303796'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/2388625242683303796'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2009/10/blog-post_03.html' title='गांधी का गुणगान, लालबहादुर लापता'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SsevhYjT1vI/AAAAAAAAANg/LOtWfRUwOaM/s72-c/05shastri.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-5335325036789766619</id><published>2009-10-02T06:40:00.001-07:00</published><updated>2009-10-02T06:42:21.561-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जरा सोचिए'/><title type='text'>बापू के बहाने</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SsYDIps7TuI/AAAAAAAAANY/45D2gfCg0sw/s1600-h/mahatma-gandhi1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 154px; height: 200px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SsYDIps7TuI/AAAAAAAAANY/45D2gfCg0sw/s200/mahatma-gandhi1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5387997451363503842" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;आज शाम साढ़े चार बजे टेलीविजन का स्विच ऑन किया तो दूरदर्शन के नेशनल चैनल पर नई दिल्ली स्थित तीस जनवरी मार्ग से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जयंती पर आयोजित कार्यक्रम का सीधा प्रसारण चल रहा था। आज की ताजा खबरों से अवगत होने के लिए दूरदर्शन के न्यूज चैनल पर गया तो वह भी राष्ट्रीय धर्म का निर्वहन करते हुए इसी कार्यक्रम को लाइव टेलीकास्ट कर रहा था। &lt;br /&gt;अच्छी बात है, राष्ट्रपिता और जन-जन के बापू के प्रति कृतज्ञता का भाव हमें प्रकट करना ही चाहिए, सो लाइव टेलीकास्ट ही देखता रहा। इस बीच सर्वधर्म प्रार्थना सभा शुरू हुई। इसमें विभिन्न धरमों  के प्रतिनिधियों ने अपने-अपने धर्मग्रंथ से प्रार्थना-मंत्र आदि का वाचन किया। मुझे जो बात खली वो यह थी कि हममें से अधिकतर लोगों को अलग-अलग धरमों की प्रार्थना का शब्दार्थ या भावार्थ समझ में नहीं आया। (शायद मुझ सरीखे अन्य लोगों को भी यह बात खली हो।) &lt;br /&gt;ऐसे में मेरी गुजारिश है कि इन धर्म विशेष की प्रार्थना का शब्दार्थ-भावार्थ भी यदि टेलीविजन स्क्रीन पर दिखाया जाए, तो लोग अन्य धरमों की प्रार्थना और उसमें दिए गए मानव-कल्याण के संदेश के बारे में जान और समझ सकेंगे। इससे  सर्वधर्म प्रार्थना सभा अपने उद्देश्य में सफल हो सकेगी और देश में सर्वधर्म समभाव का वातावरण भी बन सकेगा। मुझे नहीं लगता कि ऐसा करने से आयोजन में किसी प्रकार का विघ्न हो सकेगा।&lt;br /&gt;...हो चुकी है शुरुआत &lt;br /&gt;बचपन में गांव में सत्यनारायण भगवान की पूजा में जाता था तो पंडितजी संस्कृत में ही कथा का पाठ करते थे। तब अक्सर देखने में आता थी कि हम बच्चे ही नहीं, बल्कि बड़े-बुजुर्ग भी कथा का अर्थ समझें या न समझें, भक्ति भाव से हाथ जोड़े आरती होने और प्रसाद मिलने तक बैठे रहते थे। आजकल गांवों में ही नहीं, शहरों में भी कई बार देखने को मिलता है कि सत्यनारायण भगवान की पूजा के दौरान हिंदी में ही कथा होती है और लोग भक्ति भाव से साथ ही कथा का अर्थ भी समझ पाते हैं। ऐसे में निस्संदेह कथा से उनका जुड़ाव अधिक हो पाता है। हिंदू परिवारों के विवाह समारोहों में भी पंडितजी अक्सर संस्कृत मंत्रों के हिंदी अनुवाद भी बोलते हैं, जिससे परिणय सूत्र में बंधने वाला युगल अपने भावी जीवन के आदरशों को समझ पाता है और विवाह के आयोजन में शामिल होने वाले लोग भी इन वैदिक मंत्रों में निहित भावार्थ के बारे में जान पाते हैं। &lt;br /&gt;...इनका क्या करें? &lt;br /&gt;बापू को श्रद्धांजलि देने के लिए आयोजित कार्यक्रम में एक केंद्रीय मंत्री बार-बार घड़ी देख रहे थे। उनकी यह मनोदशा मन को कचोटती है कि यदि इनके पास समय नहीं था तो महज दिखावे के लिए ऐसे कार्यक्रमों में आने की क्या जरूरत थी। यदि आप स्वर्ग में ही नहीं, बल्कि जन-जन के मन में विद्यमान इन महान विभूतियों के प्रति सच्ची श्रद्धा नहीं रखेंगे, तो आपके अनुयायियों या मतदाताओं में आपके प्रति आस्था कैसे जगेगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-5335325036789766619?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/5335325036789766619/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=5335325036789766619' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/5335325036789766619'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/5335325036789766619'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='बापू के बहाने'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SsYDIps7TuI/AAAAAAAAANY/45D2gfCg0sw/s72-c/mahatma-gandhi1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-654170434735385240</id><published>2009-09-30T13:50:00.000-07:00</published><updated>2009-09-30T13:51:10.692-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आत्मनिवेदन'/><title type='text'>...ज्यों मूक को मिल गई वाणी</title><content type='html'>आज रात दो बजे यूं ही कुछ मित्रों के ब्लॉग पढ़ रहा था कि अनायास ही ब्लॉगवाणी डॉट कॉम खोलने के लिए माउस क्लिक कर दिया। आज तो सचमुच कमाल हो गया वरना ब्लॉगवाणी की विदाई का संदेश देखकर मन खिन्न हो उठता था। ऐसा लगता है जैसे बहुत कुछ ऐसा खो गया है जो दिल की गहराइयों तक पैठ बना चुका था। मेरा आशय महज इन बातों से नहीं हुआ करता था कि ब्लॉगवाणी पर मुझे कितने लोगों ने पसंद किया या मेरा ब्लॉग सबसे अधिक पढ़े जाने वाले ब्लॉग की सूची में कितनी बार आया, बल्कि ब्लॉगवाणी खोलने के बाद पुस्तक की इंडेक्स की तरह पृष्ठ दर पृष्ठ आलेखों पर एक नजर डालना और पहली नजर में पसंद आने पर आलेख को पूरा पढ़ पाना। इतना ही नहीं, ब्लॉगवाणी ने एकाधिक बार कई सालों से बिछड़े मित्रों के ब्लॉग पढ़ने और उनसे संवाद साधने का अवसर भी उपलब्ध कराया। &lt;br /&gt;ब्लॉगवाणी के बंद होने के बाद कई ब्लॉगर मित्रों से फोन पर अपनी व्यथा शेयर की, तो उधर भी पीड़ा कुछ वैसी ही महसूस हुई। ऐसा लग रहा था जैसे शब्दों से स्वर छिन गए हों। मुझ सरीखे मूकों को वाणी प्रदान करने के लिए ब्लॉगवाणी के नियंताओं का बहुत-बहुत स्वागत और हृदय से साधुवाद।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-654170434735385240?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/654170434735385240/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=654170434735385240' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/654170434735385240'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/654170434735385240'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2009/09/blog-post_30.html' title='...ज्यों मूक को मिल गई वाणी'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-799866430024475288</id><published>2009-09-28T06:28:00.000-07:00</published><updated>2009-09-29T12:01:12.937-07:00</updated><title type='text'>अर्द्धांगिनी मतलब....</title><content type='html'>चार दिन पहले मैंने पत्नी के सहयोग से ही बड़ी मंजिलें पाने का जिक्र किया था। आज सुबह एक मित्र से बात की तो पत्नी को लेकर अपनी पीड़ा वे दबा नहीं सके। हालांकि उनकी पीड़ा वैसी नहीं थी, जैसी पत्नी पीड़ितों की होती है। आज तक अमूमन हमलोग यही पढ़ते-सुनते आए हैं कि शादी के बाद पत्नी को पाकर ही मनुष्य का व्यक्तित्व पूर्णता को प्राप्त करता है। मित्र ने अर्द्धांगिनी शब्द की एक नई व्याख्या प्रस्तुत की। उनका कहना था कि जिसके आधे अंग में हमेशा बीमारी रहती हो, उसे अर्द्धांगिनी कहते हैं। यह बीमारी मानसिक, शारीरिक, शक की या कुछ और तरह की हो सकती है। उनकी पीड़ा उनकी पत्नी के अभी हाल ही बीमार हो जाने को लेकर थी। उनकी पत्नी के आधे चेहरे पर लकवा हो गया था, जो उपचार के बाद अब काफी हद तक ठीक है। वे कह रहे थे कि आजकल महिलाओं में व्रत-उपवास करने की क्षमता पहले की तुलना में काफी कम हो गई है, फिर भी वे निर्जला उपवास करने से बाज नहीं आतीं। गांवों में तो महिलाएं आम तौर पर दोपहर दो बजे से पहले खाना नहीं खातीं। इस तरह खाली पेट रहने से होने वाली कई बीमारियां उन्हें घेर लेती हैं। &lt;br /&gt;मित्र ने गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस का रेफरेंस देकर कहा - &lt;br /&gt;नारी सुभाव सत्य कवि कहहिं। अवगुण आठ सदा उर रहहिं।&lt;br /&gt;साहस अनृत चपलता माया। भय अविवेक असौच अदाया। &lt;br /&gt;मैंने कहा कि तुलसी बाबा ने आदर्श नारी में ये अवगुण नहीं गिनाए हैं। काल के मुख में जाने को आतुर खुद अविवेक में अंधे रावण ने मंदोदरी को संबोधित करते हुए उपरोक्त पंक्तयां कही थीं। फिर कोई चाहे कुछ भी तर्क थे, गोस्वामी जी की इन पंक्तियों में कही गई नारी की भूमिका से कोई इनकार नहीं कर सकता __&lt;br /&gt;नारी विवश नर सकल गोसाईं। नाचहिं नट मर्कट की नाईं।। &lt;br /&gt;और तुलसी बाबा ने ही सर्वशक्तिमान ईश्वर के हाथों में मनुष्य की स्थिति का वर्णन करते समय भी कुछ ऐसे ही शब्दों का प्रयोग किया है -&lt;br /&gt;सबहिं नचावत राम गोसाईं। नाचत नट मर्कट की नाईं। &lt;br /&gt;इसलिए नारी के प्रति इस तरह के भाव लाना कदापि उचित नहीं है। मेरे काफी समझाने के बाद वे मेरे तर्क से सहमत हुए। यहां मेरे यह उद्धृत करने का उद्देश्य महज इतना ही है कि अपनी सहगामिनी के प्रति हम मनुष्यों (तथाकथित बुद्धिजीवियों) के मन में सदैव कुछ न कुछ चलता ही रहता है, जिसकी परिणति कभी इस तरह की अभिनव परिभाषाओं से हो जाया करती है। &lt;br /&gt;इससे यदि किसी की भावनाएं आहत हुई हों तो किसी अज्ञात कवि की इन पंक्तियों के माध्यम से क्षमा चाहता हूं - &lt;br /&gt;इस दुनिया में अपना क्या है, सब कुछ लिया उधार। &lt;br /&gt;सारा लोहा उन लोगों का, अपनी केवल धार।।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-799866430024475288?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/799866430024475288/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=799866430024475288' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/799866430024475288'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/799866430024475288'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2009/09/blog-post_28.html' title='अर्द्धांगिनी मतलब....'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-1292264637359761258</id><published>2009-09-27T11:36:00.003-07:00</published><updated>2009-09-27T11:48:55.101-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सोचें तो सही'/><title type='text'>आस्था अपार, उल्लास अदृश्य</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/Sr-zZJmtm-I/AAAAAAAAANQ/3jXC0ovn82E/s1600-h/durga.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 133px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/Sr-zZJmtm-I/AAAAAAAAANQ/3jXC0ovn82E/s200/durga.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5386220924014795746" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;शक्ति की आराधना के पर्व शारदीय नवरात्र की पूरणाहुति महानवमी पर रविवार को हुई। आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से शुरू हुए इस पर्व में श्रद्धालुओं ने अपनी श्रद्धा और सामरथ्र्य के अनुसार मां भगवती की आराधना की। संपूर्ण भारतवर्ष में मां भगवती की आराधना हुई। गुलाबीनगरी में रह रहे बंगाली समाज के लोगों ने शहर में कई स्थानों पर सामूहिक दुगाü पूजा महोत्सवों का आयोजन किया। इन महोत्सवों में स्थानीय लोगों की भागीदारी न के बराबर रही। ऐसे में यह बात कचोटती है कि उनके मन में मां भगवती के प्रति आस्था की कोई कमी नहीं है, या यूं कहें कि चहुंओर आस्था का पारावार है, लेकिन हृदय से सहज निःसृत होने वाला उल्लास नहीं दिखा। पश्चिम बंगाल, पूवीü उत्तर प्रदेश, बिहार और पूर्वोत्तर के राज्यों की तरह सार्वजनिक रूप से दुगाü पूजा उत्सव आयोजित न किए जाएं तो कोई बात नहीं, लेकिन स्थानीय लोगों को भी इन कार्यक्रमों में सहभागिता अवश्य निभानी चाहिए। इससे स्थानीय लोगों में आप्रवासी लोगों के प्रति अपनत्व का भाव बढ़ेगा तथा उन्हें बंगाली संस्कृति के बारे में बहुत कुछ जानने समझने का अवसर मिलेगा। आप्रवासी लोगों में भी अकेलेपन का बोध कम होगा। यहां यह तथ्य भी विचारणीय है कि राजस्थान या जयपुर में शारदीय नवरात्र के दौरान घरों में परंपरागत रूप से माता भगवती की सगुण रूप में ही पूजा-अर्चना की जाती है और कलशस्थापना के साथ ही पूजा-स्थल पर भगवती की तस्वीर भी रखी जाती है। इसके बावजूद सामूहिक पूजा पांडालों में आयोजित आध्यात्मिक तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों से इस तरह की दूरी-बेरुखी को किसी भी तरह से अच्छा नहीं कहा जा सकता। स्थिति तो कई बार ऐसी होती है कि पूजा पांडाल से सटे इलाके में भी स्थानीय लोग इस उत्सव से बिल्कुल ही अनजान होते हैं। इस मुद्दे पर अवश्य ही पुनर्विचार किया जाना चाहिए।  &lt;br /&gt;दशहरा मेले की रहेगी बहार&lt;br /&gt;जयपुर के साथ ही पूरे राजस्थान में विजयादशमी पर सोमवार को दशहरा मेलों की बहार रहेगी। दशहरे का उत्साह तो यहां देखते ही बनता है। चंबल के किनारे बसे कोटा का दशहरा मेला तो देश ही नहीं, विश्व में प्रसिद्ध है। शहरों में जगह-जगह खानदान सहित दशानन के पुतले जलाए जाएंगे। आयोजकों में रावण के पुतले की ऊंचाई को लेकर होड़ रहेगी। इस दौरान मंचों पर सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से कार्यक्रम में चार चांद लगाए जाएंगे, वहीं रंग-बिरंगी आतिशबाजी से आसमान अट जाएगा। इतना ही नहीं, गली-मोहल्लों में भी बच्चे अपने स्तर से रावण के पुतले बनाकर उसका दहन करेंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-1292264637359761258?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/1292264637359761258/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=1292264637359761258' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/1292264637359761258'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/1292264637359761258'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2009/09/blog-post_27.html' title='आस्था अपार, उल्लास अदृश्य'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/Sr-zZJmtm-I/AAAAAAAAANQ/3jXC0ovn82E/s72-c/durga.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-688328963771778706</id><published>2009-09-25T12:27:00.000-07:00</published><updated>2009-09-25T12:55:16.906-07:00</updated><title type='text'>पत्नी न चाहे तो...</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/Sr0gEwI1UQI/AAAAAAAAANI/tYb1q7Vm_X0/s1600-h/vimla-1.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 134px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/Sr0gEwI1UQI/AAAAAAAAANI/tYb1q7Vm_X0/s200/vimla-1.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5385495995418497282" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;अभी शçक्त की आराधना का पर्व नवरात्र चल रहा है। सच है, शçक्त के बिना व्यçक्तत्व की कल्पना बेमानी है। शçक्त - वैचारिक, शारीरिक, बौद्धिक, सामाजिक, राजनीतिक हर रूप में जरूरी है। इस शçक्त की पहली इकाई पत्नी है, जिसके मिलने के बाद ही व्यçक्त पूर्ण हो पाता है। व्यçक्त की परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व के प्रति जो भी जिमेदारियां हों, लेकिन एक पति की सबसे बड़ी जिमेदारी पत्नी के अरमानों को पूरा करना ही होता है। ऐसा मैं नहीं कह रहा, बल्कि महान लोगों का भी यही कथन है। मैं तो महज -महाजनो गतो स पन्थाज् -का अनुपालन करते हुए इसकी पुनरावृçत्त कर रहा हूं। सच है, यदि पति के व्यवहार से पत्नी संतुष्ट नहीं हो तो तिल का ताड़ बनाकर आदमी का जीना मुश्किल कर सकती है। बाद में बच्चों का साथ भी यदि मां को मिल जाए तो पति के लिए तो इहलोक और परलोक दोनों ही बिगड़ जाते हैं। &lt;br /&gt;यह तो पृष्ठभूमि थी। भागीरथी सेवा प्रन्यास और अन्य सहयोगी संस्थाओं की ओर से जयपुर में गुरुवार को आयोजित एक कार्यक्रम में मुयमंत्री अशोक गहलोत ने यात पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा की पत्नी को क्वकस्तूरबा गांधी सेवा पुरस्कारं प्रदान किया। इस अवसर पर विमला बहुगुणा ने अपने संबोधन में महात्मा गांधी की शिष्या सरला बहन के साथ पहाड़ों में किए गए समाज सुधार के कामों से लोगों को अवगत कराया। &lt;br /&gt;प्रन्यास के अध्यक्ष पंचशील जैन ने बताया कि यह पुरस्कार पति के साथ कंधा से कंधा मिलाकर चलने वाली विभूति को दिया जाता है। इसमें कोई शक नहीं कि मोहनदास करमचंद गांधी की पत्नी कस्तूरबा गांधी ने यदि उनका हर कदम पर साथ नहीं दिया होता, तो शायद वे महात्मा गांधी, राष्ट्रपिता और बापू नहीं बन पाते। ऐसी किस्मत विरले लोगों को ही मिल पाती है और फिर वे अपने जीवन में यथेष्ट की प्राçप्त कर पूर्ण संतुष्ट होकर जीते हैं और कई मामलों में मील के पत्थर भी साबित होते हैं। प्रन्यास ने पिछले वर्ष प्रथम कस्तूरबा गांधी पुरस्कार प्रसिद्ध समाजसेवी बाबा आटे की पत्नी साधना ताई को उनके आश्रम में जाकर दिया था। &lt;br /&gt;निष्काम कर्मयोगी का समान&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/Sr0bXeVMM8I/AAAAAAAAANA/xJfN5Mf8d4g/s1600-h/mohan.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 134px; height: 200px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/Sr0bXeVMM8I/AAAAAAAAANA/xJfN5Mf8d4g/s200/mohan.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5385490819497866178" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कार्यक्रम में दो दर्जन से अधिक संस्थाओं के संस्थापक, महात्मा गांधी की नीतियों को आत्मसात करने वाले निष्काम कर्मयोगी मोहनभाई को 90 वर्ष पूरे कर दसवें दशक में प्रवेश पर समानित किया गया। 91 वर्ष की आयु में भी मोहनभाई की सक्रियता युवाओं का मार्ग प्रशस्त करती है। जब वे माइक पर आए तो उनकी उपस्थिति तथा वक्तृत्व को पूरा सभागार अनुभूत कर रहा था। इतनी उपलçब्धयों के बावजूद इतनी सरलता-सहजता से परिपूर्ण व्यçक्तत्व जिसके बारे में बताने के लिए शब्द नहीं मिलें। ईश्वर से प्रार्थना कि ऐसी विभूति को अच्छे स्वास्थ्य के साथ लंबी आयु प्रदान करे जिससे भावी पीढ़ी उनका मार्गदर्शन ले सके।&lt;br /&gt;(तकनीकी कारणों से हुई अशुद्धियों के लिए खेद है)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-688328963771778706?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/688328963771778706/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=688328963771778706' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/688328963771778706'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/688328963771778706'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2009/09/blog-post_25.html' title='पत्नी न चाहे तो...'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/Sr0gEwI1UQI/AAAAAAAAANI/tYb1q7Vm_X0/s72-c/vimla-1.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-5077488912369703140</id><published>2009-09-20T12:32:00.001-07:00</published><updated>2009-09-20T12:35:22.636-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सरोकार'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जरा सोचिए'/><title type='text'>देव तुम्हारे, मंत्र हमारे - यह कैसी घुसपैठ ?</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SraD2JAMcgI/AAAAAAAAAMw/-4W5zaUJmIg/s1600-h/Hindu-God-Statues.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 148px; height: 200px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SraD2JAMcgI/AAAAAAAAAMw/-4W5zaUJmIg/s200/Hindu-God-Statues.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5383635370720915970" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;आजकल मीडिया में चीन के घुसपैठ की खबरें रोज ही आ रही हैं। होना तो यह चाहिए कि हमारे देश की सीमाओं की ओर जो आंखें उठें, उन्हें बिना समय गंवाए फोड़ दिया जाए, लेकिन जब देश का शीर्ष नेतृत्व ही लचर व्यक्तित्व के हाथों में है तो कोई क्या करे। खैर, हमारे राजनेता जो भी करें, इस देश की सेना पर हमें पूरा भरोसा है कि सीमा की ओर बढ़ने वाले किसी भी हाथ को मरोड़ने की ताकत उनमें है। &lt;br /&gt;मैं यहां दूसरे घुसपैठ की बात कर रहा हूं जो पिछले कई सालों से चल रही है और हमारे नीति नियंता हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। शनिवार को शारदीय नवरात्र शुरू हुए। इससे दो दिन पहले किसी अखबार में खबर पढ़ी कि नवरात्र में पूजन के लिए चीन में बनी मां भगवती की प्रतिमाएं बाजार में आ गई हैं। यह कैसी बात है कि होली पर चाइनीज पिचकारियां और मकर संक्रांति पर चीन में बने पतंगों और मांझे की बाजार में बाढ़ आ जाती है। अभी आने वाले दिनों में दीपावली भी रंग-बिरंगी चाइना मेड बिजली के बल्वों की लड़ियां भी बाजार में धड़ल्ले से बिकेंगी। बिजली का खरचा बचाने वाली सीएफएल लाइटों में भी चाइनीज सीएफएल का बाजार में काफी दखल है। खरीदने वालों का तर्क होता है कि चाइनीज सामान की गुणवत्ता भले दोयम दरजे की हो, वे टिकाऊ नहीं होते हों, लेकिन उनकी कीमत भारतीय उत्पादों की तुलना में काफी कम होती है। &lt;br /&gt;ऐसे में सरकार से मेरा सवाल है कि यदि चीन सस्ती दरों पर  बिकने वाली वस्तुएं बेचकर मुनाफा कमा सकता है तो हमारे देश की कंपनियां ऐसा क्यों नहीं कर पातीं। व्यापारियों के मुनाफे पर मैं बंदिश लगाने का पक्षधर कदापि नहीं हूं, लेकिन कम लाभ से अधिक बिक्री करके भी तो मुनाफा बढ़ाया जा सकता है। &lt;br /&gt;बचपन में सीख मिली थी कि किसी रेखा को बिना मिटाए छोटी करने की तरकीब है कि उसके नीचे बड़ी रेखा खींच दी जाए। हमारे देश के राष्ट्रप्रेमी व्यापारी भी इस तरकीब से अपना मुनाफा बरकरार रखते हुए चीनी घुसपैठ से देश को बचा सकते हैं। अन्यथा बच्चे हमारे खिलौने उनके, उड़ान हमारी डोर उनकी और मंत्र हमारे, देव उनके का राग आने वाले दिनों में हमारे देश पर काफी भारी पड़ सकता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-5077488912369703140?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/5077488912369703140/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=5077488912369703140' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/5077488912369703140'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/5077488912369703140'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2009/09/blog-post_20.html' title='देव तुम्हारे, मंत्र हमारे - यह कैसी घुसपैठ ?'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SraD2JAMcgI/AAAAAAAAAMw/-4W5zaUJmIg/s72-c/Hindu-God-Statues.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-7044535076661775639</id><published>2009-09-18T12:44:00.001-07:00</published><updated>2009-09-18T12:53:17.969-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आत्मनिवेदन'/><title type='text'>...ये कहां आ गए हम</title><content type='html'>... तो आज अमिताभ बच्चन की फिल्म -सिलसिला-से अपनी बातचीत का सिलसिला शुरू करता हूं। सुबह बिहार के किशनगंज से एक डॉक्टर मित्र का फोन आया। वे बिहार में विधानसभा की 18 सीटों पर हुए उपचुनाव में सत्तारूढ़ जनता दल यू और भाजपा की करारी शिकस्त से दुखी थे। उपचुनाव में जनता दल यू को तीन और भाजपा को मात्र दो सीटों पर संतोष करना पड़ा। पटरी से उतरे लालू यादव की लालटेन अचानक चमक उठी और राजद ने सबसे अधिक छह सीटों पर जीत हासिल की। लालू का गमछा पकड़कर रामविलास पासवान भी वैतरणी पार उतर गए और उनके प्रत्याशियों ने तीन सीटें झटक लीं। आमजन को महंगाई के मझधार में छोड़कर मितव्ययिता का राग अलापने वाली कांग्रेस के उम्मीदवार भी दो सीटें निकाल ले गए। &lt;br /&gt;मेरा मकसद यहां उपचुनाव के परिणाम का विश्लेषण नहीं करना नहीं, बल्कि अपने मित्र की पीड़ा पर मरहम लगाना भर है। यह पक्की बात है कि मेरे मित्र किसी राजनीतिक दल की विचारधारा से ताल्लुकात नहीं रखते, लेकिन धरा से जुड़े होने के कारण धरातल पर होने वाले काम उनकी नजरों से नहीं बच पाते। कभी आम सुविधाएं नहीं मिलने से त्रस्त थे तो आज चिकनी सड़क पर उनकी कार भी बिना धचके दिए चलती है। आज से पांच साल पहले यदि कोई बिहार गया हो तो उसे अहसास होगा कि लालू-राबड़ी के पंद्रह साल के शासनकाल में बिहार किस हद तक पिछड़ गया था। &lt;br /&gt;मेरे मित्र का तर्क था कि नीतीश कुमार ने सत्ता संभालने के बाद बिहार के कायाकल्प का प्रयास अवश्य शुरू किया है और आज सड़कों से लेकर अस्पतालों तक के सुधरे हुए हालात इसका बयान करते हैं। अन्य क्षेत्रों में भी प्रगति की रफ्तार देखी जा सकती है। मित्र की चिंता इस बात की है यदि हालात ऐसे ही रहे और लोग विकास को दरकिनार कर यदि जात-पांत जैसे मुद्दों पर मतदान करते रहे तो बिहार एक बार फिर पिछड़ेपन की गर्त में चला जाएगा। हालात बदलने के साथ विचारों में भी नयापन आना चाहिए और हमारे सोचने के स्तर में भी विकास अपेक्षित है। अन्यथा हम यही कहने को विवश होंगे.....ये कहां आ गए हम।&lt;br /&gt; मैंने मित्र को दिलासा दिया कि संभव है कि नीतीश और सुशील मोदी भारतीय क्रिकेट टीम की तरह लीग मैचों में करारी शिकस्त के बाद फाइनल में शानदार वापसी करें। हालांकि उपचुनाव के परिणामों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि जनता दल यू ने रमई राम और श्याम रजक को अपनी गोद में बिठा लिया, जिनकी करतूत का फैसला जनता ने कर दिया और जनता दल यू को सीट के साथ साख व प्रतिष्ठा भी गंवानी पड़ी। &lt;br /&gt;किसी विचारधारा का समर्थक होना एक बात है और किसी एक के खिलाफ बाकी सभी का एकजुट हो जाना दूसरी बात। हालांकि राजनीति में किसका गठजोड़ किसके साथ कितनी अवधि के लिए रहेगा, इसकी भविष्यवाणी करना आसान नहीं है। अंत में उधार की चार पंक्तियों के साथ अपनी बात खत्म करूंगा, शायद मेरे मित्र को कुछ तसल्ली मिले- &lt;br /&gt;राजनीति में मित्र कठिन है, खुद से परे चरित्र कठिन है।&lt;br /&gt;किसी जुआरी के अड्डे पर वातावरण पवित्र कठिन है।।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-7044535076661775639?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/7044535076661775639/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=7044535076661775639' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/7044535076661775639'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/7044535076661775639'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2009/09/blog-post_18.html' title='...ये कहां आ गए हम'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-3546850106611060161</id><published>2009-09-17T12:37:00.000-07:00</published><updated>2009-09-17T12:39:21.342-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जरा सोचिए'/><title type='text'>सैशे में बिकता सुख</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SrKQVBi-q1I/AAAAAAAAAMo/cGvZZ7oAGEE/s1600-h/chik-satin-shampoo.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 182px; height: 200px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SrKQVBi-q1I/AAAAAAAAAMo/cGvZZ7oAGEE/s200/chik-satin-shampoo.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5382523195527965522" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कहा करते थे कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है और उनके तथाकथित अनुयायियों ने गांधी दर्शन को दरकिनार कर दिया। सत्तासीन नेताओं ने गांवों को उनके हाल पर छोड़ दिया। सुविधाओं के अभाव में गांव लाचार लोगों की शरणस्थली बनकर रह गए और न जाने क्या-क्या खोने की कीमत पर आज भी शहरों की ओर पलायन थमा नहीं है। &lt;br /&gt;कवि गाते-गाते अघाते नहीं रहे कि भारतमाता ग्रामवासिनी, लेकिन कविहृदय व्यक्ति के सत्ता के शीर्षस्थ पद पर पहुंचने के बावजूद गांवों की तकदीर नहीं बदली। गांव में रहने वालों की न जाने कितनी लालसाएं धन के अभाव में दम तोड़ती रहीं। &lt;br /&gt;बदलते समय के साथ राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने गांधी के गांवों की ओर रुख किया है और आज सैशे की शक्ल में गांव और गरीबों की जेब के हिसाब से सारे उत्पाद उपलब्ध कराए जा रहे हैं। जी हां, नीम-बबूल की दातुन करने वाले बच्चे कॉलगेट पाउडर और डाबर दंतमंजन से दांत साफ कर रहे हैं। झोपड़ी में रहने वाली रमणी भी एक रुपए के शैंपू से अपने बालों को रेशमी लुक देती है। अब वह कपड़े धोने वाले पाउडर से बालों की गंदगी मिटाने को मजबूर नहीं है। पीयर्स जैसा अभिजात्य वर्ग का साबुन छोटी साइज में आने के कारण सर्वसुलभ हो गया है। &lt;br /&gt;राम करे ऐसा न हो&lt;br /&gt;महंगाई ने सुरसा की तरह मुंह फाड़ना शुरू कर दिया है और हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह कोई हनुमानजी तो हैं नहीं कि अपनी बुद्धिमत्ता से सुरसा से पार पा जाएं। आज की तारीख में आम आदमी का जीना मुश्किल हो रहा है। आटा-दाल-आलू-सब्जियों के भाव आसमान छू रहे हैं। टिफिन में रोटियां कम हो रही हैं, दाल पतली हो रही है, सब्जी की गिरती क्वालिटी का तो कहना ही क्या? अभी पिछले दिनों मीडिया में खबर आई कि मध्य प्रदेश में पाउच में दाल बिक रहा है। महंगाई की रफ्तार यही बनी रही तो वह दिन दूर नहीं जब आटा-चावल भी पाउच में मिले। ईश्वर से यही प्रार्थना है कि ऐसा दिन कभी न आए और आम आदमी को पेट भरने में कोई मुसीबत नहीं आए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-3546850106611060161?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/3546850106611060161/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=3546850106611060161' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/3546850106611060161'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/3546850106611060161'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2009/09/blog-post_17.html' title='सैशे में बिकता सुख'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SrKQVBi-q1I/AAAAAAAAAMo/cGvZZ7oAGEE/s72-c/chik-satin-shampoo.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-4631230934123375095</id><published>2009-09-04T12:47:00.001-07:00</published><updated>2009-09-04T13:08:23.769-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जरा सोचिए'/><title type='text'>भुट्टे की भ्रूणहत्या</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SqFu8uPiosI/AAAAAAAAAMg/BUiEbovVVVg/s1600-h/cover-corn.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SqFu8uPiosI/AAAAAAAAAMg/BUiEbovVVVg/s200/cover-corn.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5377701419541504706" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;दसवीं पास करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए गांव छोड़कर शहर में आया तो मक्के का लावा (जिसे अब पॉप कॉर्न कहा जाने लगा है) ठेले पर बिकता देख अक्सर अचरज होता था कि यह भी कोई बिकने की चीज है। गांवों में तो इसे सबसे अधिक हेय समझा जाता था। हालात ऐसे थे कि मजदूर भी मजदूरी में मक्का लेना पसंद नहीं करते थे। बदलते हुए समय के साथ बहुत कुछ बदला। अब कभी काफी हिम्मत जुटाकर किसी मल्टीप्लेक्स में फिल्म देखने जाता हूं तो बच्चे के कहने पर पॉप कॉर्न खरीदना पड़ता है। पांच रुपए में गिनती के दाने मिलते हैं। &lt;br /&gt;खैर, यह तो समय-समय की बात है। अभी चार-पांच दिन पहले पत्नी और बच्चे के साथ बिग बाजार गया। वहां पॉलीथिन में पैक भुट्टे देखकर बरबस ही निगाह उस ओर चली गई। देखा तो पचीस रुपए में दो भुट्टे थे और उस पर अंग्रेजी में अमेरिकन पॉप कॉर्न की परची चिपकी हुई थी। इंग्लिश स्कूल में पढ़ने वाले गांव की संस्कृति से अनजान बच्चा मचल गया तो मजबूरन दो भुट्टों का एक पैकेट लेना ही पड़ा। मजबूरी यह भी थी कि एक भुट्टा खरीदने की छूट नहीं थी। उसके बगल में ही मैंने एक और उससे भी छोटा पैकेट देखा, जिसमें भुट्टा खाने के बाद जो अवशिष्ट (जिसे हम गांव की भाषा में नेढ़ा कहते थे) जैसा कुछ था काफी पतला। सेल्समैन से पूछा तो उसने बताया कि यह भुट्टे में दाने आने से पहले की चीज है इसकी सब्जी बनती है। उसकी कीमत भी दो सौ रुपए प्रतिकिलो से अधिक थी। अपनी जेब और जरूरत से बाहर की चीज थी, सो मैंने खिसकना ही उचित समझा। &lt;br /&gt;अब इसके दूसरे पहलू पर गौर करें तो कुछ बातें ऐसी हैं, जो कचोटती हैं। इस साल मानसून की बेरुखी ने विश्वभर के नीति नियंताओं की पेशानी पर पसीना ला दिया है। हर ओर यहीं चिंता है कि मंदी के इस दौर में बढ़ती महंगाई और अनाज के घटते उत्पादन के कारण लोगों का पेट भरना भी कहीं मुश्किल न हो जाए। ऐसे में मोटे अनाज से भी जरूरतमंदों का पेट भर जाए तो बड़ी बात है। इस तरह के हालात में हम यह सोचने को बाध्य हैं कि महज कुछ लोगों के मुंह के स्वाद के लिए इन तथाकथित अमेरिकन भुट्टे की भ्रूणहत्या न की जाए, तो इनसे होने वाला मक्का काफी लोगों के पेट भर सकता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-4631230934123375095?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/4631230934123375095/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=4631230934123375095' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/4631230934123375095'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/4631230934123375095'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2009/09/blog-post.html' title='भुट्टे की भ्रूणहत्या'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SqFu8uPiosI/AAAAAAAAAMg/BUiEbovVVVg/s72-c/cover-corn.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-1677642939258187837</id><published>2009-08-18T12:20:00.000-07:00</published><updated>2009-08-18T12:22:39.731-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जरा सोचिए'/><title type='text'>...पेट भरे से काम</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/Sor_ZqeQwdI/AAAAAAAAAMY/k-rPOFgrBwE/s1600-h/swine_flu_0427.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 112px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/Sor_ZqeQwdI/AAAAAAAAAMY/k-rPOFgrBwE/s200/swine_flu_0427.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5371386321955766738" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;बचपन में हम चार भाई-बहनों में जो भी खाने के समय आनाकानी नहीं करता, नाक-भौं नहीं सिकोड़ता, उसकी बड़ाई में मां अक्सर एक जुमले का इस्तेमाल करती थी-भोनू भाव न जाने, पेट भरे से काम। तब तो यह सुनने में अच्छा लगता था और अब इस आदत का दूरगामी परिणाम यह देखने को मिलता है कि घरवाली भी जब कभी सब्जी में नमक डालना भूल जाती है या फिर दो दिन के कोटे का नमक एक ही दिन डाल देती है, तो भी बिना शिकायत के खाना खा लिया करता हूं। अपनी भूल का अहसास उन्हें तब होता है जब वे स्वयं उस भोजन को उदरस्थ करती हैं या फिर बेटा उन्हें टोक देता है। खैर, यहां इस चरचा का उद्देश्य अपने घर की रामकहानी को जगजाहिर करना कतई नहीं है। इसे तो बस एक पृष्ठभूमि के तौर पर इस्तेमाल करना चाहता हूं। पीड़ा तो कोई और ही है जिसे शेयर किए बिना नहीं रह सका। &lt;br /&gt;अभी अपने देश में चारों तरफ स्वाइन फ्लू का खौफ फैला हुआ है। हालांकि इसकी आशंका तो तीन-चार महीने से जताई जा रही थी, लेकिन हमारी सरकार भी अपनी आदतें छोड़ नहीं सकती। जब पानी सिर से गुजरा तो सुध लेने की सोची। यह बात दीगर है कि सरकार की इस नाकामी और सुस्ती के कारण बीसियों लोगों की सांसें थम गईं और हजारों की सांसें अटकी हुई हैं। &lt;br /&gt;जैसा कि दस्तूर है, व्यापारियों का अपना हित सबसे बढ़कर होता है। उन्हें जनहित से क्या लेना-देना? तभी तो पांच-सात रुपए में बिकने वाला मास्क पचास से अस्सी रुपए में बिक रहा है और आम तौर पर पचास रुपए में मिलने वाला विशेष मास्क पांच सौ रुपए में भी उपलब्ध नहीं है। &lt;br /&gt;कुछ ऐसा ही हाल महंगाई के साये में जी रहे करोड़ों लोगों का है। विख्यात इकोनॉमिस्ट डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में मुद्रास्फीति हर सप्ताह रसातल में जा रही है और उसी तुलना में महंगाई सातवें आसमान पर चढ़कर नित नई ऊंचाइयों को छू रही है। इसी का रोना है कि -दाल रोटी खाओ प्रभु का गुण गाओ- का जुमला अपना मायने खो चुका है। आम आदमी की थाली में सब्जियां तो वैसे ही नहीं हुआ करती थीं, बढ़ती कीमतों के कारण दाल रसोई से गायब होती जा रही है या फिर बनती भी है तो उसमें पानी की मात्रा जरूरत से अधिक होती ही है। &lt;br /&gt;चीनी की बढ़ती कीमत ने मेहमानों की मनुहार में कटौती कर दी है। पहले जहां मेहमानों को पानी के साथ कुछ मीठा देना मुनासिब समझा जाता था, वहीं आज डायबिटीज वाले मेहमान (अल्पकालिक) का आना अच्छा लगता है क्योंकि वे फीकी चाय जो पीते हैं। मंदी के दौर में जमाखोरी करने वालों की चांदी हो रही है और सरकारी नीतियों के नियंता महज सावधान कर रहे हैं कि महंगाई और बढ़ेगी। कुछ कर सको तो कर लो अन्यथा स्वाइन फ्लू से बच भी गए तो भुखमरी से तो मरना ही पड़ेगा। ऐसे में इन जमाखोरों और मुनाफाखोरों के लिए उपरोक्त जुमले में थोड़ा सा बदलाव करते हुए कहना चाहता हूं-कोई जिए कोई मरे, पेट भरे से काम।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-1677642939258187837?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/1677642939258187837/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=1677642939258187837' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/1677642939258187837'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/1677642939258187837'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='...पेट भरे से काम'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/Sor_ZqeQwdI/AAAAAAAAAMY/k-rPOFgrBwE/s72-c/swine_flu_0427.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-4800854987286659688</id><published>2009-06-07T13:07:00.000-07:00</published><updated>2009-06-11T06:15:22.520-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आत्मनिवेदन'/><title type='text'>न क्यू का झंझट, न बाबू से झिकझिक</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SiwfTAB5ZZI/AAAAAAAAAMQ/sTCYrfTfICY/s1600-h/1222.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 126px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SiwfTAB5ZZI/AAAAAAAAAMQ/sTCYrfTfICY/s200/1222.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5344681269067867538" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;अभी पिछले दिनों बहुत ही जल्दबाजी में ट्रेन यात्रा का शिड्यूल बनाना पड़ा। ऐसे में महज एकाध दिन में जयपुर से पटना की ट्रेन में आरक्षण मिल पाना बहुत ही मुश्किल था। वैसे अमूमन जयपुर से पटना के लिए साप्ताहिक ट्रेनें ही चलती हैं और उनमें बिल्कुल ही जगह नहीं थी। सुबह आठ बजे आरक्षण खिड़की खुलते ही तत्काल कोटे में टिकट बुक कराने पहुंचा तो बुकिंग क्लर्क ने सीट उपलब्ध नहीं होने की बात कही। उसका कहना था कि सीमित सीटें होती हैं और एक साथ हजारों काउंटर खुल जाते हैं, ऐसे में टिकट मिलना मुश्किल ही होता है। उससे कोई और विकल्प सुझाने को कहा तो उसका रुख तो नकारात्मक था ही, पीछे क्यू में खड़े यात्री भी अपनी बारी में देरी होने से झल्लाने लगे। ऐसे में किसी मित्र ने भारतीय रेलवे की वेबसाइट  &lt;a href="http://www.irctc.co.in"&gt;www.irctc.co.in&lt;/a&gt; पर अपना अकाउंट खोलकर वहां इन्क्वायरी करने और आरक्षण कराने की सलाह दी। उसके लिए किसी बैंक में अपना खाता होना जरूरी था और डेबिट कार्ड भी। वाकई यह सलाह काम की थी। आज के समय में हममें से अधिकतर के पास बैंक अकाउंट और डेबिट कार्ड अक्सर होते ही हैं। मैंने रेलवे की वेबसाइट पर अपना अकाउंट खोला। वहां तसल्ली से उस रूट की सभी ट्रेनों में सीटों की उपलब्धता देखी और रूट बदलकर जाने के भी विकल्पों की भी बिना किसी परेशानी के जानकारी ली। इसमें एक अन्य वेबसाइट &lt;a href="www.erail.in"&gt;www.erail.in &lt;/a&gt;से भी काफी मदद मिली। हां, बदले में आईसीआरटीसी सरविस चार्ज चुकाना पड़ा, लेकिन यह जेब पर विशेष भारी नहीं रहा। &lt;br /&gt;मैं न तो रेलवे का मुलाजिम हूं कि उसकी तरफदारी करूं, लेकिन इतना अवश्य कहना चाहूंगा कि आज हममें से अधिकतर कम्प्यूटर लिट्रेट हैं, ई-मेल और अन्य वेबसाइटों की जानकारी के लिए नेट सरफिंग करते ही हैं। आम तौर पर शहर में हम जहां रह रहे होते हैं, जरूरी नहीं कि रेलवे रिजरवेशन काउंटर आसपास हो। ऐसे में कई किलोमीटर की यात्रा तय करके घंटों लाइन में खड़े रहने और उसके बाद भी गंतव्य का आरक्षित टिकट नहीं मिलने पर निराश होकर लौटने से अच्छा है कि &lt;a href="www.irctc.co.in"&gt;www.irctc.co.in &lt;/a&gt;पर अपना अकाउंट खोलकर आसानी से टिकट ले लिया जाए। यह सेवा सुबह पांच बजे से देर रात्रि साढ़े ११ बजे तक उपलब्ध रहती है। इस तरह सुबह आठ बजे रेलवे के आरक्षण काउंटर खुलने से पहले और रात्रि आठ बजे (कई आरक्षण केंद्रों पर अब रात्रि 10 बजे तक भी काउंटर खुले रहते हैं) के बाद भी टिकट बुक कराए जा सकते हैं और कैंसिल भी। इस तरह इस तकनीक का लाभ उठाने में कोई हर्ज मुझे नहीं लगता। संभव है हमारे कई साथियों को इसकी जानकारी हो और वे इसका लाभ उठा भी रहे होंगे, लेकिन महज अल्पज्ञतावश अपना अनुभव शेयर करना चाहता हूं। तो यह है अरजी मेरी आगे मरजी आपकी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-4800854987286659688?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/4800854987286659688/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=4800854987286659688' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/4800854987286659688'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/4800854987286659688'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2009/06/blog-post_07.html' title='न क्यू का झंझट, न बाबू से झिकझिक'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SiwfTAB5ZZI/AAAAAAAAAMQ/sTCYrfTfICY/s72-c/1222.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-1275836990020519961</id><published>2009-06-04T06:45:00.000-07:00</published><updated>2009-06-04T07:46:14.858-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सरोकार'/><title type='text'>अपहरण का ग्रहण - कब छूटेगा दाग</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SifbqjgQtcI/AAAAAAAAAMA/bGGXDfZNScY/s1600-h/nn-1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 178px; height: 200px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SifbqjgQtcI/AAAAAAAAAMA/bGGXDfZNScY/s200/nn-1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5343481007029925314" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;बस और ट्रेन के सफर में करीब 38 घंटे बिताने के कारण काफी थकान हो गई थी, सो बिस्तर पर जाते ही गहरी नींद की आगोश में समा गया। सुबह करीब छह बजे नींद खुली तो सामने रखे हिंदुस्तान अखबार के मुख्य शीर्षक -बेटा तो नहीं, लाश मिली- ने विचलित कर दिया। समाचार के अनुसार दो दिन पहले शहर के ही 14 वर्ष को दो किशोरों ने कंकड़बाग की पीसी कॉलोनी से एक व्यवसायी के आठ वर्षीय पुत्र सत्यम का अपहरण कर लिया और बाद में उसकी हत्या कर दी। इसके बाद अपहर्ताओं ने बच्चे के पिता से पचास लाख की फिरौती मांगी। पुलिस ने बच्चे का शव बरामद कर अपहरण और हत्या के आरोपी अविनाश और मो. खुर्शीद उर्फ मोनू को गिरफ्तार कर लिया। &lt;br /&gt;यह दीगर बात है कि लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के करीब पंद्रह वर्ष के शासनकाल में अपहरण उद्योग अपने चरम पर था, लेकिन नीतीश राज में भी यह सिलसिला थमा नहीं है। गाहे-बेगाहे ऐसी खबरें आती ही रहती हैं। सरकार यदि दृढ़ इच्छाशक्ति दिखाए और सुशासन देने के अपने वादे पर कायम रहे तो अपहरण के दाग को भी धोया जा सकता है। अभी हाल ही हुए लोकसभा चुनाव में बिहार के मतदाताओं ने बाहुबलियों और उनके परिजनों को हराकर अपने दामन से बहुत बड़ा कलंक धो दिया है। जनता भी जागरूक रहे तो अपराध और अपराधियों पर अंकुश लगाना मुश्किल नहीं होगा। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SifdOJxwt7I/AAAAAAAAAMI/hdvZKPRcKuA/s1600-h/nn.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 57px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SifdOJxwt7I/AAAAAAAAAMI/hdvZKPRcKuA/s200/nn.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5343482718110922674" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह कैसी प्रतिभा&lt;br /&gt;बिहार में पिछले डेढ़ दशक के लालू-राबड़ी राज में अपहरण उद्योग जिस तरह चरम पर था, उससे प्रेरित होकर बिहार से ही जुड़े  प्रकाश झा ने -अपहरण-फिल्म बनाई थी, जो देशभर में चरचा का विषय बनी थी। पुलिस पूछताछ में बालक सत्यम के अपहरण और हत्या के आरोपियों ने कबूल किया कि उन्होंने कई बार -अपहरण- फिल्म देखी और इसके एक-एक फ्रेम का गहन अध्ययन किया। दरअसल दोनों आरोपी फटाफट अकूत धन-संपत्ति हासिल कर रईसजादों की तरह जीना चाहते थे। ऐसे में यह जानकर अफसोस होता है कि एक फिल्म निर्माता निर्देशक बिहार की तथाकथित यथास्थिति को बखूबी रूपहले परदे पर उतारकर नाम और दाम कमाना चाहता है तो उससे प्रेरणा लेने वाले बिहार के ही किशोर किसी मासूम की जान लेकर अपना खुद का वर्तमान और भविष्य दोनों बिगाड़ लेते हैं। ऐसे में जरूरी है कि बिहार को बीमारू राज्य की श्रेणी से निकालने और बदहाली से मुक्ति दिलाने के लिए राजनीति से ऊपर उठकर उद्योग-धंधों का जाल बिछाया जाए। लोगों को काम मिलेगा तो वे संभवतया अपराध के दलदल में नहीं फंसेंगे और फिर इस तरह किसी का लाल असमय उससे नहीं छिनेगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-1275836990020519961?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/1275836990020519961/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=1275836990020519961' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/1275836990020519961'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/1275836990020519961'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2009/06/blog-post_04.html' title='अपहरण का ग्रहण - कब छूटेगा दाग'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SifbqjgQtcI/AAAAAAAAAMA/bGGXDfZNScY/s72-c/nn-1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-7645628579056982310</id><published>2009-06-03T06:45:00.001-07:00</published><updated>2009-06-03T06:46:55.634-07:00</updated><title type='text'>पटना बाई मिडनाइट बदल गई है तस्वीर</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SiZ-oftGZAI/AAAAAAAAAL4/6qvRrv6wqSQ/s1600-h/PATNA%2520JUNCTION.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 133px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SiZ-oftGZAI/AAAAAAAAAL4/6qvRrv6wqSQ/s200/PATNA%2520JUNCTION.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5343097242092200962" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;अभी पिछले शनिवार को सात-आठ घंटे के लिए पटना जाने का अवसर मिला। वैसे तो साल में एकाध बार जाना होता ही है। अमूमन जयपुर से जिस ट्रेन से जाता हूं, वह मध्य रात्रि बारह बजे बाद ही पटना पहुंचाती है। हर बार ऐसा ही होता था कि पटना के रहवासी सहयात्री भी वहां के माहौल को देखते हुए स्टेशन पर ही रात बिताने की सलाह देते थे और वे खुद भी हमारे साथ वेटिंग रूम में बैठकर ऊंघते रहते थे। इस दफा पहली बार ऐसा हुआ कि ट्रेन मध्य रात्रि साढ़े बारह बजे पटना पहुंची और स्टेशन पर रात नहीं बितानी पड़ी। अगले दिन दोपहर को मेरी ट्रेन थी, सो मुझे पटना में ही भतीजे के कमरे पर रुकना था। मां-पिताजी को गांव ले जाने के लिए छोटा भाई गाड़ी लेकर आया था। मां-पिताजी और छोटे भाई को विदा करने के बाद भतीजे के साथ मैं महेंद्रू जाने वाली ऑटो पर बैठ गया। ऑटो में दो-तीन सवारियां और बैठीं। सवारियों को गांधी मैदान, अशोक राजपथ उतारने के बाद ऑटो चालक ने हमें भी सकुशल हमारे गंतव्य पर उतार दिया। वाकई जिस पटना में रात नौ बजे राहजनी के भय से गलियां सूनी हो जाती थीं, स्टेशन के बाहर बने होटल से रात को स्टेशन आकर गाड़ी पकड़ना भी खतरे से खाली नहीं हुआ करता था, वहां आधी रात को स्टेशन से महेंद्रू तक के बिना किसी विघ्न-बाधा के छोटे से सफर ने रोमांचित कर दिया। लालू-राबड़ी के करीब पंद्रह साल के शासनकाल में कानून-व्यवस्था की जिस कदर धज्जियां उड़ी थीं, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उसमें वाकई सुधार किया है और इसके लिए वे प्रशंसा के पात्र हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-7645628579056982310?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/7645628579056982310/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=7645628579056982310' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/7645628579056982310'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/7645628579056982310'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2009/06/blog-post.html' title='पटना बाई मिडनाइट बदल गई है तस्वीर'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SiZ-oftGZAI/AAAAAAAAAL4/6qvRrv6wqSQ/s72-c/PATNA%2520JUNCTION.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-1691438140231268158</id><published>2009-05-04T06:30:00.000-07:00</published><updated>2009-05-04T06:35:51.705-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सोचें तो सही'/><title type='text'>ऑरिजिनल तो यही है</title><content type='html'>डेढ़-दो माह के लंबे अंतराल के बाद आज फिर आपलोगों से मुखातिब हूं। बात ही कुछ ऐसी हुई कि व्यस्तताओं के बावजूद इस अनुभव को शेयर करने से खुद को रोक नहीं पाया। पिछले कुछ दिनों से अपना एक छोटा सा मकान बनवा रहा हूं। इसी के सिलसिले में आज प्लबंर से लैट-बाथ की फिटिंग की वस्तुएं लिखवा रहा था। जैसे-तैसे पूछ-पूछ कर वस्तुओं की लिस्ट बनाई। इस दौरान प्लम्बर ने एक वस्तु लिखवाई- ऑरिजिनल। मैं सकते में आ गया। यह क्या चीज है। आईएसआई मारका वस्तुएं खरीदने की ताकीद तो आम बात होती है और ब्रांड कंपनियों के डुप्लीकेट से बचने की सलाह भी दी जाती है परंतु खालिस ऑरिजिनल यह क्या बला है। मैंने जब उसे और स्पष्ट करने को कहा तो उसने कहा कि अरे भाई साहब, वही पेशाब करने वाला। तब बात मेरी समझ में आई कि वह यूरिनल की बात कह रहा है। उस बेचारे की भी क्या गलती है। कई सारी आम जरूरत की वस्तुएं अपने अंग्रेजी नाम से ही जानी-पहचानी जाती हैं। उनका हिंदी नाम जानने की न तो कोई कोशिश करता है और न ही यह प्रचलन में आ पाता है। दुआ करें कि ऐसी वस्तुओं के हिंदी नाम भी प्रचलन में आएं और जुबान पर चढ़ें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-1691438140231268158?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/1691438140231268158/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=1691438140231268158' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/1691438140231268158'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/1691438140231268158'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2009/05/blog-post.html' title='ऑरिजिनल तो यही है'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-5476377772955613671</id><published>2009-03-19T13:32:00.000-07:00</published><updated>2009-03-19T13:33:11.221-07:00</updated><title type='text'>इंसान भूखे, देवताओं को आफरा</title><content type='html'>आज शीतलाष्टमी थी। शीतलाष्टमी से एक दिन पहले घरों में पुए-पुड़ियां और अन्य पकवान बनाए जाते हैं, जिन्हें अगले दिन शीतला माता को भोग लगाया जाता है। बाद में घरों में लोग वही कल वाला बासी भोजन ही शीतलाष्टमी को खाते हैं। ऐसी मान्यता है कि शीतला माता की ऐसी पूजा-अर्चना से छोटी माता, चेचक आदि के प्रकोप से बचाव होता है और माताजी की कृपा भक्तों पर बनी रहती है। &lt;br /&gt; मुझे भी किसी मित्र से मिलने के लिए सुबह निकलना था, सो करीब साढ़े आठ बजे नहा-धोकर कॉलोनी के मंदिर पहुंचा। इस मंदिर में देवताओं में अच्छा सद्भाव है। पंचेश्वर महादेव मंदिर में शिव पंचायत के अलावा राधा-कृष्ण, मां दुरगा, हनुमानजी, नवग्रह, संतोषी माता, गणेशजी और शीतला माता की प्रतिमाएं स्थापित हैं। मंदिर से पहले वाले चौराहे पर पुए-पकवानों का ढेर लगा था और पूजा के बाद उस पर पानी डाल देने से उसकी दुरगति हो रही थी। मंदिर पहुंचा तो वहां चौराहे से भी बड़ा ढेर था और भी स्वादिष्ट पकवानों की ऐसी ही दुरगति हो रही थी। जब तथाकथित मित्र के यहां गया तो रास्ते में भी अनेक चौराहों पर इस तरह स्वादिष्ट पकवानों को देखकर आत्मा रो उठी। &lt;br /&gt;किसी की आस्था से मेरी कोई शिकायत नहीं है, लेकिन आज भी जब हमारे आस-पड़ोस में ही सैकड़ों लोग भूखे रहने को विवश हैं, अन्न की ऐसी बरबादी से क्या हासिल होगा। माना, बरसों से ऐसी परंपरा चली आ रही है, लेकिन कोई ऐसा भी रास्ता तो निकाला ही जा सकता है जिससे अन्न की बरबादी न होने पाए। प्रतीक रूप में एकाध ग्रास शीतला माता के नाम पर निकालने के बाद यह खाद्य सामग्री किसी अनाथालय, कुष्ठाश्रम, मंदिरों के बाहर बैठे भिखारियों को वितरित की जा सकती है। मुझे नहीं लगता ऐसा करने से किसी का अहित होगा। यह भी सत्य है कि इससे कोई शीतला माता का कोपभाजन भी नहीं बनेगा। &lt;br /&gt;कभी पढ़ा था-`युगरूपेण ही ब्राह्मणः ` यानी ब्राह्मणों को युग धर्म के अनुसार आचरण करना चाहिए। इतिहास में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो सतीप्रथा जैसी कुप्रथाओं का उन्मूलन नहीं हो पाता। ऐसा सुनते हैं कि बिहार-बंगाल-नेपाल के गांवों में पहले दुरगा पूजा के समय बकरे और भैंसे की बलि दी जाती थी, लेकिन आज प्रतीक रूप में फलों की बलि दी जाती है और भक्तों के सभी अरमान इसी से पूरे होते हैं, किसी पर माता का कोई प्रकोप नहीं होता। &lt;br /&gt;आशा है आने वाले समय में लोग सीख लेंगे और अनाज का अनादर करने के बजाय इसे इसके योग्य पात्र तक पहुंचाकर अपना जीवन कृतार्थ करेंगे। इंसान भूखे, देवताओं को आफरा&lt;br /&gt;आज शीतलाष्टमी थी। शीतलाष्टमी से एक दिन पहले घरों में पुए-पुड़ियां और अन्य पकवान बनाए जाते हैं, जिन्हें अगले दिन शीतला माता को भोग लगाया जाता है। बाद में घरों में लोग वही कल वाला बासी भोजन ही शीतलाष्टमी को खाते हैं। ऐसी मान्यता है कि शीतला माता की ऐसी पूजा-अर्चना से छोटी माता, चेचक आदि के प्रकोप से बचाव होता है और माताजी की कृपा भक्तों पर बनी रहती है। &lt;br /&gt; मुझे भी किसी मित्र से मिलने के लिए सुबह निकलना था, सो करीब साढ़े आठ बजे नहा-धोकर कॉलोनी के मंदिर पहुंचा। इस मंदिर में देवताओं में अच्छा सद्भाव है। पंचेश्वर महादेव मंदिर में शिव पंचायत के अलावा राधा-कृष्ण, मां दुरगा, हनुमानजी, नवग्रह, संतोषी माता, गणेशजी और शीतला माता की प्रतिमाएं स्थापित हैं। मंदिर से पहले वाले चौराहे पर पुए-पकवानों का ढेर लगा था और पूजा के बाद उस पर पानी डाल देने से उसकी दुरगति हो रही थी। मंदिर पहुंचा तो वहां चौराहे से भी बड़ा ढेर था और भी स्वादिष्ट पकवानों की ऐसी ही दुरगति हो रही थी। जब तथाकथित मित्र के यहां गया तो रास्ते में भी अनेक चौराहों पर इस तरह स्वादिष्ट पकवानों को देखकर आत्मा रो उठी। &lt;br /&gt;किसी की आस्था से मेरी कोई शिकायत नहीं है, लेकिन आज भी जब हमारे आस-पड़ोस में ही सैकड़ों लोग भूखे रहने को विवश हैं, अन्न की ऐसी बरबादी से क्या हासिल होगा। माना, बरसों से ऐसी परंपरा चली आ रही है, लेकिन कोई ऐसा भी रास्ता तो निकाला ही जा सकता है जिससे अन्न की बरबादी न होने पाए। प्रतीक रूप में एकाध ग्रास शीतला माता के नाम पर निकालने के बाद यह खाद्य सामग्री किसी अनाथालय, कुष्ठाश्रम, मंदिरों के बाहर बैठे भिखारियों को वितरित की जा सकती है। मुझे नहीं लगता ऐसा करने से किसी का अहित होगा। यह भी सत्य है कि इससे कोई शीतला माता का कोपभाजन भी नहीं बनेगा। &lt;br /&gt;कभी पढ़ा था-`युगरूपेण ही ब्राह्मणः ` यानी ब्राह्मणों को युग धर्म के अनुसार आचरण करना चाहिए। इतिहास में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो सतीप्रथा जैसी कुप्रथाओं का उन्मूलन नहीं हो पाता। ऐसा सुनते हैं कि बिहार-बंगाल-नेपाल के गांवों में पहले दुरगा पूजा के समय बकरे और भैंसे की बलि दी जाती थी, लेकिन आज प्रतीक रूप में फलों की बलि दी जाती है और भक्तों के सभी अरमान इसी से पूरे होते हैं, किसी पर माता का कोई प्रकोप नहीं होता। &lt;br /&gt;आशा है आने वाले समय में लोग सीख लेंगे और अनाज का अनादर करने के बजाय इसे इसके योग्य पात्र तक पहुंचाकर अपना जीवन कृतार्थ करेंगे। इंसान भूखे, देवताओं को आफरा&lt;br /&gt;आज शीतलाष्टमी थी। शीतलाष्टमी से एक दिन पहले घरों में पुए-पुड़ियां और अन्य पकवान बनाए जाते हैं, जिन्हें अगले दिन शीतला माता को भोग लगाया जाता है। बाद में घरों में लोग वही कल वाला बासी भोजन ही शीतलाष्टमी को खाते हैं। ऐसी मान्यता है कि शीतला माता की ऐसी पूजा-अर्चना से छोटी माता, चेचक आदि के प्रकोप से बचाव होता है और माताजी की कृपा भक्तों पर बनी रहती है। &lt;br /&gt; मुझे भी किसी मित्र से मिलने के लिए सुबह निकलना था, सो करीब साढ़े आठ बजे नहा-धोकर कॉलोनी के मंदिर पहुंचा। इस मंदिर में देवताओं में अच्छा सद्भाव है। पंचेश्वर महादेव मंदिर में शिव पंचायत के अलावा राधा-कृष्ण, मां दुरगा, हनुमानजी, नवग्रह, संतोषी माता, गणेशजी और शीतला माता की प्रतिमाएं स्थापित हैं। मंदिर से पहले वाले चौराहे पर पुए-पकवानों का ढेर लगा था और पूजा के बाद उस पर पानी डाल देने से उसकी दुरगति हो रही थी। मंदिर पहुंचा तो वहां चौराहे से भी बड़ा ढेर था और भी स्वादिष्ट पकवानों की ऐसी ही दुरगति हो रही थी। जब तथाकथित मित्र के यहां गया तो रास्ते में भी अनेक चौराहों पर इस तरह स्वादिष्ट पकवानों को देखकर आत्मा रो उठी। &lt;br /&gt;किसी की आस्था से मेरी कोई शिकायत नहीं है, लेकिन आज भी जब हमारे आस-पड़ोस में ही सैकड़ों लोग भूखे रहने को विवश हैं, अन्न की ऐसी बरबादी से क्या हासिल होगा। माना, बरसों से ऐसी परंपरा चली आ रही है, लेकिन कोई ऐसा भी रास्ता तो निकाला ही जा सकता है जिससे अन्न की बरबादी न होने पाए। प्रतीक रूप में एकाध ग्रास शीतला माता के नाम पर निकालने के बाद यह खाद्य सामग्री किसी अनाथालय, कुष्ठाश्रम, मंदिरों के बाहर बैठे भिखारियों को वितरित की जा सकती है। मुझे नहीं लगता ऐसा करने से किसी का अहित होगा। यह भी सत्य है कि इससे कोई शीतला माता का कोपभाजन भी नहीं बनेगा। &lt;br /&gt;कभी पढ़ा था-`युगरूपेण ही ब्राह्मणः ` यानी ब्राह्मणों को युग धर्म के अनुसार आचरण करना चाहिए। इतिहास में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो सतीप्रथा जैसी कुप्रथाओं का उन्मूलन नहीं हो पाता। ऐसा सुनते हैं कि बिहार-बंगाल-नेपाल के गांवों में पहले दुरगा पूजा के समय बकरे और भैंसे की बलि दी जाती थी, लेकिन आज प्रतीक रूप में फलों की बलि दी जाती है और भक्तों के सभी अरमान इसी से पूरे होते हैं, किसी पर माता का कोई प्रकोप नहीं होता। &lt;br /&gt;आशा है आने वाले समय में लोग सीख लेंगे और अनाज का अनादर करने के बजाय इसे इसके योग्य पात्र तक पहुंचाकर अपना जीवन कृतार्थ करेंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-5476377772955613671?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/5476377772955613671/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=5476377772955613671' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/5476377772955613671'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/5476377772955613671'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2009/03/blog-post_19.html' title='इंसान भूखे, देवताओं को आफरा'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-7303353896468337797</id><published>2009-03-08T13:41:00.000-07:00</published><updated>2009-03-08T13:43:02.133-07:00</updated><title type='text'>सबके थे गिरधारीलाल</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SbQtyGkiJII/AAAAAAAAALw/pKY3zeFqQpw/s1600-h/12rj06.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 153px; height: 156px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SbQtyGkiJII/AAAAAAAAALw/pKY3zeFqQpw/s200/12rj06.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5310920199357211778" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;जीवन अनिश्चित है और मौत ध्रुवसत्य है, लेकिन इस तथ्य को हम सभी झुठलाते रहते हैं। इस कटु सत्य का अहसास तभी होता है जब कोई गुजर जाता है। राजनीति से मेरा कोई विशेष लगाव नहीं रहा है लेकिन गुलाबी नगर में अपने 14-15 वर्ष के प्रवास के दौरान यहां के सर्वप्रिय सांसद गिरधारी लाल भार्गव की लोकप्रियता से अवश्य ही प्रभावित था। संसद में उनकी भूमिका कितनी प्रभावी रही, इसका आकलन तो राजनीति के पंडित करेंगे, लेकिन हर छोटे-बड़े, व्यक्तिगत-सामूहिक कार्यक्रमों में भार्गव की उपस्थिति उन्हें सहज ही आमजन में लोकप्रिय बनाती थी। कई कार्यक्रमों में उन्हें देखने-सुनने का मौका मिला, लेकिन कभी नहीं लगा कि यह व्यक्ति कभी `आम´ की बजाय खास बनने की इच्छा जता पाता हो। शायद यही वजह थी कि भाजपा ने उनकी लोकप्रियता का लाभ उठाते हुए छह बार सांसद बनने के बाद उन्हें लगातार सातवीं बार भी टिकट दिया था, लेकिन सत्ता में आने के बाद उनकी वरिष्ठता का लाभ नहीं दे पाई। आज के जमाने में जब एक पार्षद और पंच भी जीतने के बाद आम जनता से दूरी बना लेता है, अपने मतदाताओं से `दूर´ हो जाता है, भार्गव देश की सबसे बड़ी पंचायत के सदस्य होने के बावजूद अपने क्षेत्र की जनता के लिए सर्वसुलभ थे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-7303353896468337797?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/7303353896468337797/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=7303353896468337797' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/7303353896468337797'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/7303353896468337797'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2009/03/blog-post.html' title='सबके थे गिरधारीलाल'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SbQtyGkiJII/AAAAAAAAALw/pKY3zeFqQpw/s72-c/12rj06.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-9144831983342142305</id><published>2009-02-26T11:48:00.000-08:00</published><updated>2009-02-26T11:50:36.655-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जरा सोचिए'/><title type='text'>पेशे ने मुझे चुन लिया...</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SabyctanF0I/AAAAAAAAALg/onIOD08bBm8/s1600-h/welcome%2520to%2520sajjanpur%2520movie%2520screenshot2.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 90px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SabyctanF0I/AAAAAAAAALg/onIOD08bBm8/s200/welcome%2520to%2520sajjanpur%2520movie%2520screenshot2.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5307195785944176450" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;एक बौद्धिक अग्रज से पिछले दिनों लंबे अरसे बाद मिलना हुआ। कई सारे मसलों पर बातचीत हुई। इसी बीच उन्होंने फिल्म `वेलकम टू सज्जनपुर´ की तारीफ करते हुए इसे देखने की सलाह दी। कई सारी मजबूरियां होती हैं किसी फिल्म को सिनेमाहॉल में नहीं देख पाने की, सो रिलीज होने के समय नहीं देख पाया था। उनके आदेश पर इस फिल्म की सीडी किराये पर ले आया और देखने का समय भी निकाल लिया। श्याम बेनेगल ने हमारे गांवों की खांटी असलियत को परदे पर बखूबी उतारा है। इस बारे में समीक्षकों ने बड़ी-बड़ी तकरीरें की होंगी, बहुत कुछ लिखा गया होगा, मेरा उतना दखल भी नहीं है फिल्मों में। मैं तो महज उस एक डायलॉग से अपनी बात शुरू करना चाहता हूं जिसमें कमला कुम्हारिन (अमृता राव) जब 16 साल के अंतराल के बाद पति के नाम चिट्ठी लिखवाने के लिए अपने बचपन के सहपाठी लेटर राइटर महादेव कुशवाहा (श्रेयस तलपड़े) से मिलती है तो दोनों बीते दिनों को याद करते हैं। इस बीच जब कमला पूछती है कि तुमने चिट्ठी लिखने का पेशा क्यों चुना, तो महादेव बेलाग कह उठता है-`मैंने कहां इस पेशे को चुना, ई ससुरा पेशा ही मेरे गले पड़ गया´। &lt;br /&gt;यह इकलौते महादेव कुशवाहा की पीड़ा नहीं है। बच्चा चाहता क्या है और युवा होते-होते बन क्या जाता है। वाकई यह हमारे शिक्षा पद्धति का दोष है। हमारे देश के गांवों के लाखों बच्चे प्राइमरी से मिडिल, हाई, हायर सैकंडरी स्कूल पास करते हुए कॉलेज व यूनिवरसिटी तक की पढ़ाई पूरी कर लेते हैं, लेकिन उनके सामने अपने भविष्य को लेकर कोई निश्चित रूपरेखा नहीं होती। हालांकि शहर के बच्चों के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उनके भविष्य की चिंता करने की जिम्मेदारी उनके माता-पिता की हुआ करती है। &lt;br /&gt;नौवीं-दसवीं की हिंदी की पाठ्यपुस्तक के एक निबंध `जीवन और शिक्षण´ में भी ऐसी ही चिंता से रू-ब-रू हुआ था। गांधीजी का नाम लेकर सियासतदानों ने दशकों तक सत्तासुख भोगा, लेकिन उनके शिक्षा दर्शन को भूल गए। शिक्षा पर न जाने कितने शोध हुए, लेकिन उनके नतीजों पर अमल करने की ईमानदार कोशिश नहीं करती हमारी सरकारें। भारतमाता ग्रामवासिनी के तथ्य को भुलाकर हम प्रगति के पायदानों पर कभी नहीं चढ़ सकते। जब तक बच्चे की अभिरुचि को तरजीह नहीं दी जाएगी, शिक्षा रोजगारोन्मुखी नहीं होगी, आजादी के बाद छह दशक बीतें या साठ दशक, यह तस्वीर जस की तस ही रहेगी। भगवान करे ऐसा न हो।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-9144831983342142305?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/9144831983342142305/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=9144831983342142305' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/9144831983342142305'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/9144831983342142305'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2009/02/blog-post_26.html' title='पेशे ने मुझे चुन लिया...'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SabyctanF0I/AAAAAAAAALg/onIOD08bBm8/s72-c/welcome%2520to%2520sajjanpur%2520movie%2520screenshot2.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-5097960958829697854</id><published>2009-02-25T12:12:00.000-08:00</published><updated>2009-02-25T12:15:47.885-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जरा सोचिए'/><title type='text'>नौटंकी तो हम करते हैं</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SaWmykgKahI/AAAAAAAAALY/xXXrnE3D1hc/s1600-h/mkm.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 134px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SaWmykgKahI/AAAAAAAAALY/xXXrnE3D1hc/s200/mkm.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5306831123648244242" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;पिंकसिटी में सांस्कृतिक आयोजनों के हृदय स्थल जवाहर कला केंद्र के शिल्पग्राम में मंगलवार शाम नौटंकी देखने का सुयोग मिला। गांव छोड़े हुए करीब 25 साल हो गए, इस दरम्यान कभी नौटंकी देखने का मुहूर्त नहीं बना। वैसे भी महानगरों में ऐसे आयोजन विरले ही होते हैं, फिर रात की नौकरी के कारण इनसे महरूम ही रहना पड़ता है। बचपन से किशोरावस्था तक गांव में दुरगा पूजा के समय मेले में नौटंकी और बिदेसिया देखा करता था।   &lt;br /&gt;पुरानी बातें तो फिर कभी होंगी, अभी तो कल की बात। करौली से आए कलाकारों के दल ने आशा वरमा के निरदेशन में `हरिश्चंद्र तारामती´ की प्रस्तुति दी। गीत व नृत्य के साथ संवादों की बेहतरीन अदायगी ने दर्शकों को काफी प्रभावित किया। शिल्पग्राम में गांव सा माहौल साकार हो उठा और नगाड़े व ढोलक की जुगलबंदी ने इसमें चार चांद लगा दिए। पैर से बजने वाला हारमोनियम भी कई दर्शकों के लिए अजूबा बना हुआ था। कलाकारों ने राजा हरिश्चंद्र, उनकी पत्नी तारामती, पुत्र रोहिताश और ऋषि विश्वामित्र के पात्र में अपने जीवंत अभिनय से जान डाल दी। रोहिताश के मरने के बाद तारामती के विलाप के समय कई दर्शक आंसू पोंछते नजर आए। बिना किसी ताम-झाम और रीटेक की सुविधा के खुले रंगमंच पर ऐसी प्रस्तुतियों के लिए कलाकारों की सराहना की ही जानी चाहिए। हां, इस दौरान नगाड़ा व ढोलक बजाने वाले कलाकारों की आपस में हंसी-मजाक पर मुस्कुराहट अवश्य ही मुझ जैसे अन्य कई दर्शकों को भी खली होगी।  &lt;br /&gt;खैर, जिस विशेष बात ने मुझे यह ब्लॉग लिखने को प्रेरित किया, उसकी चरचा किए बिना बात अधूरी रह जाएगी। नाटक की समाçप्त के बाद आशा वरमा ने पात्रों का परिचय कराया। इस दौरान उन्होंने नौटंकी कला के अस्तित्व पर आ रहे संकट की बात की, सरकार की ओर से कलाकारों को प्रोत्साहन नहीं मिलने पर अफसोस जताया। इन सबसे आगे बढ़कर उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और फिल्मों में राजनेताओं को नौटंकीबाज कहने पर रुंधे गले और कड़े शब्दों में आपत्ति जताई। इस दौरान उनकी चिंता वाकई आंसुओं में डूबी हुई थी और यह दर्द उस दर्द से कहीं बढ़कर था, जो उन्होंने तारामती के किरदार में बेटे रोहिताश के निधन पर विलाप करते हुए दिखाया था। आशा वरमा का कहना था कि नौटंकी करना इतना आसान नहीं है कि राजनेता कुछ भी गलत-सलत करें तो इसे नौटंकी करार दे दिया जाए। उन्होंने कहा कि नौटंकी तो वह है जिसे हम कलाकारों ने तीन घंटे तक किया और आप सबने देखा। नौटंकी करने में कलाकारों को इन पात्रों में अपनी आत्मा डालनी पड़ती है, ये राजनेता क्या नौटंकी करेंगे जिनकी आत्मा होती ही नहीं है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-5097960958829697854?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/5097960958829697854/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=5097960958829697854' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/5097960958829697854'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/5097960958829697854'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2009/02/blog-post_25.html' title='नौटंकी तो हम करते हैं'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SaWmykgKahI/AAAAAAAAALY/xXXrnE3D1hc/s72-c/mkm.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-6986321061727730566</id><published>2009-02-22T11:56:00.000-08:00</published><updated>2009-02-22T11:57:52.009-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आत्मनिवेदन'/><title type='text'>चिठिया हो तो हर कोई बांचे...</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SaGuLN2ZFjI/AAAAAAAAALE/XVcVGOerDDo/s1600-h/letter-1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 133px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SaGuLN2ZFjI/AAAAAAAAALE/XVcVGOerDDo/s200/letter-1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5305713343738746418" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;कई महीनों से ब्लॉग और ब्लॉगरों की दुनिया से दूर हूं। कुछ ऐसी व्यस्तताएं थीं कि चाहकर भी लिखने-पढ़ने का समय नहीं निकाल पाया। किन कारणों से ऐसा हुआ, इसकी चरचा फिर कभी। आज तो कुछ विशेष अनुभूतियों को लेकर हाजिर हूं, जिन्हें शेयर करने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूं। &lt;br /&gt;आज सुबह करीब साढ़े सात बजे मोबाइल की रिंगटोन से नींद खुली। अखबार के दफ्तर से दो बजे फ्री होने के बाद सोते-सोते करीब तीन बज ही जाते हैं। ऐसे में सुबह नींद में खलल पड़ती है तो बहुत ही बुरा लगता है, लेकिन जब मोबाइल के दूसरी ओर कोई ऐसा शख्स हो जिसकी मधुर आवाज सुनना नींद से अधिक प्रिय हो तो फिर कोई शिकायत नहीं होती। आज भी कुछ ऐसी ही स्थिति थी। उधर से आवाज आई---`आप मंगलम जी बोल रहे हैं। मैं भागलपुर से संजीव...बीएड में हम साथ थे।´ इन अल्फाजों को सुनते ही क्षणमात्र में महीनों साथ गुजारे गए लम्हों का फ्लैश बैक मानस पटल पर घूम गया। पूछा-आपको मेरा नंबर कैसे मिला? जो जवाब मिला, उससे और भी तसल्ली हुई। उन्होंने कहा-आपने कभी पोस्टकार्ड भेजा था मेरे नाम। मम्मी कहीं रखकर भूल गईं। आज सुबह नजर पड़ी तो मैंने सोचा देखता हूं नंबर मिलाकर और बात हो गई। फिर तो हम दोनों ने बीते हुए करीब 13-14 साल का ब्यौरा एक-दूसरे को सुनाया। जहां तक मुझे याद आता है, मैंने मोबाइल कनेक्शन लेने के बाद अपने कई मित्रों को पोस्टकार्ड लिखे थे और उसमें अपनी वर्तमान स्थिति, निवास और मोबाइल नंबर का भी जिक्र किया था ताकि संबंधों को पुनरजीवित किया जा सके। पत्र लिखने की मेरी आदत रही है, जो कई मित्रों की पत्रोत्तर देने की उदासीनता की भेंट चढ़ती जा रही है, लेकिन संजीव भाई के फोन ने पत्रों की उपादेयता की नई सिरे से व्याख्या कर दी है। मैं एक बार फिर इस तथ्य को कहना चाहूंगा कि मोबाइल और इंटरनेट के इस युग में भी पत्रों की अहमियत कम नहीं हुई है। &lt;br /&gt;कोशिश करूंगा कि अपने पुराने मित्रों से पत्राचार कर एक बार फिर संबंधों को रिन्यू करने की कोशिश करूं। उम्मीद है जीवन के इस मोड़ पर उन मित्रों से जुड़कर जीवन के पलों को और खुशनुमा बना सकूंगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6269680552568501323-6986321061727730566?l=manglam-manavi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/feeds/6986321061727730566/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6269680552568501323&amp;postID=6986321061727730566' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/6986321061727730566'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6269680552568501323/posts/default/6986321061727730566'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manglam-manavi.blogspot.com/2009/02/blog-post.html' title='चिठिया हो तो हर कोई बांचे...'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SaGuLN2ZFjI/AAAAAAAAALE/XVcVGOerDDo/s72-c/letter-1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6269680552568501323.post-5862433126531281295</id><published>2008-12-12T11:57:00.000-08:00</published><updated>2008-12-12T11:58:33.572-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आत्मनिवेदन'/><title type='text'>`चिवड़ा-दही´ का जवाब नहीं</title><content type='html'>
